प्रतीकात्मक
बॉम्बे हाईकोर्ट ने दफ्तरों में व्यवहार को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि ऑफिस में महिला सहकर्मी के सीने को घूरना या एक टक लगाकर देखना अभद्र आचरण या नैतिक रूप से गलत हो सकता है लेकिन यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354-C के तहत दंडनीय ‘ताक-झाँक’ (voyeurism) का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस मामले में 2015 से दर्ज एक FIR रद्द कर दी है।
क्या था मामला?
रिपोर्ट्स के मुताबकि, यह मामला 7 अप्रैल 2015 को मुंबई में बोरीवली पुलिस द्वारा दर्ज एक FIR के बाद शुरू हुआ था। शिकायत के मुताबिक, उस समय 39 वर्षीय आरोपित अभिजीत निगुडकर एक निजी बीमा कंपनी में असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत था जबकि 24 वर्षीय महिला शिकायतकर्ता उसी कंपनी में डिप्टी सेल्स मैनेजर थी। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपित अक्सर उसके साथ अपमानजनक व्यवहार करता, सामान्य तरीके से आँख मिलाने के बजाय उसके सीने को घूरता था और उस पर अनुचित टिप्पणियाँ करता।
शिकायत में बताया गया कि नवंबर 2014 में एक ऑफिस मीटिंग के दौरान आरोपी ने कथित तौर पर उसके साथ ऐसा व्यवहार किया। इसके बाद महिला ने अपने वरिष्ठ अधिकारी को इसकी जानकारी दी जिन्होंने मामले को उच्च प्रबंधन तक पहुँचाया।
महिला का कहना था कि आरोपित ने उसके काम में कमियाँ निकालनी शुरू कर दीं, जिसके चलते कंपनी ने उसे नोटिस जारी किया और नौकरी से निकालने की चेतावनी भी दी। कानूनी प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही कंपनी की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने इस मामले की जाँच की थी। जाँच के बाद ICC ने आरोपी निगुडकर को क्लीन चिट दे दी थी। इसी दबाव के बीच महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। FIR दर्ज होने के दो दिन बाद 9 अप्रैल 2015 को आरोपित को गिरफ्तार किया गया। हालाँकि, बाद में उसे जमानत मिल गई।
कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अमित बोरकर ने कहा, “आरोप सिर्फ इतना है कि आरोपित ने ऑफिस मीटिंग के दौरान महिला के सीने को घूरा। मान भी लें कि यह सच है, तो भी यह वॉयूरिज्म की परिभाषा में नहीं आता। कानून के शब्दों को उनकी सीमा से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।”
अदालत में समझाया गया कि IPC की धारा 354C उस स्थिति में लागू होती है जब कोई व्यक्ति किसी महिला को उसकी निजी गतिविधि (private act) के दौरान देखता है या उसकी तस्वीर/वीडियो बनाता है तो ऐसे माहौल में जहाँ महिला को उम्मीद होती है कि उसे कोई नहीं देख रहा होगा।
आरोपी के वकील अमोल पाटणकर ने दलील दी कि पहली नजर में यह मामला धारा 354-C के तहत नहीं आता। इस पर कोर्ट ने भी सहमति जताई और कहा कि यह धारा हर तरह के आपत्तिजनक नजर या खराब व्यवहार को कवर करने वाली सामान्य धारा नहीं है।
जस्टिस बोरकर ने कहा, “यह कानून तभी लागू होता है जब कोई व्यक्ति किसी महिला की निजी गतिविधि में दखल देता है या उसे रिकॉर्ड करता है, खासकर ऐसे निजी माहौल में जहाँ उसकी निजता की उम्मीद होती है। इस अपराध की जड़ ही प्राइवेसी में दखल देना है।”
वहीं, सरकारी वकील योगेश नखवा और महिला के वकील अजिंक्य उदाने ने गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसा व्यवहार महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाता है, इसलिए इसे 354C के तहत अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस धारा को ध्यान से पढ़ने पर साफ होता है कि हर वह हरकत, जो महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाए, 354C के तहत नहीं आती।
जस्टिस बोरकर ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “क्रिमिनल कानून का इस्तेमाल हर कार्यस्थल की शिकायत को वॉयूरिज्म जैसे अपराध में बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।” उन्होंने आगे कहा कि महिला को घूरना, अपमानजनक व्यवहार करना या कार्यस्थल पर उत्पीड़न करना ज्यादा से ज्यादा ‘दुर्व्यवहार’ (misconduct) या ‘अशोभनीय हरकत’ (indecency) हो सकता है लेकिन यह 354C की सीमित परिभाषा में फिट नहीं बैठता।
कोर्ट ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता को वास्तव में अपमानित और आहत महसूस हुआ होगा और कार्यस्थल का माहौल खराब हो गया होगा लेकिन केवल इन आरोपों के आधार पर 354C के तहत आपराधिक मुकदमा चलाना संभव नहीं है।
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