पौराणिक गाथा : जिस कुंवारी जमीन पर हुआ था दानवीर कर्ण का अंतिम संस्कार वहां वट वृक्ष पर उगते हैं 3 पत्ते


जब महाभारत का युद्ध चल रहा था और अर्जुन-कर्ण के बीच युद्ध चल रहा था, तब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया। तब कर्ण ने भीष्म पितामह के बनाएं नियमों की बात करते हुए अर्जुन से कहा, "हे अर्जुन, जब तक मैं रथ का पहिया नहीं निकाल लेता, तब तक तुम मुझ पर आक्रमण नहीं करोगे।" यह सुनकर अर्जुन रुक गया। तब भगवान कृष्ण ने कहा, ‘हे अर्जुन, तुम क्यों रुके? तीर मारो।’ जब अर्जुन ने कहा कि वह युद्ध के खिलाफ है। तब भगवान कृष्ण ने याद दिलाया कि अभिमन्यु एक अकेले योद्धा से लड़ रहा था, तब युद्ध के नियम ज्ञात नहीं थे। भरी सभा में जब द्रोपदी से अपशब्द कहे गये तो नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ?

इन शब्दों को सुनकर अर्जुन क्रोधित हो गए और उन्होंने कर्ण पर भगवान शिवजी का दिया हुआ अस्त्र चला दिया। अर्जुन के इस बाण से कर्ण मृत्यु के समीप पहुँच गया। जब कर्ण अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था तब भगवान कृष्ण ने कर्ण की परीक्षा लेने का विचार किया। भगवान कृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और कहा, ‘हे कर्ण, मेरी बेटी की शादी हो रही है और मेरे पास उसे देने के लिए सोना नहीं है, इसलिए मुझे सोना दो।’ तब कर्ण ने कहा कि मेरे पास कुछ नहीं है। मैं तुम्हें क्या दान कर सकता हूं। तब ब्राह्मण ने कहा कि तुम्हारे पास सोने का दांत है। वह दान कर दो। कर्ण ने कहा कि मुझे एक पत्थर से मारो और मेरा दांत निकाल दो। ब्राह्मण ने ऐसा करने से मनाकर दिया और कहा कि दान तो खुद ही करना पड़ता है।
इसके बाद कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और उससे अपना दांत तोड़कर ब्राह्मण को दे दिया। इस पर ब्राह्मण ने कहा कि यह दांत तो खून में गंदा हो गया उसे साफ करो। इस पर कर्ण ने अपने धनुष से धरती पर बाण चलाया तो वहां से गंगा की तेज जलधारा निकल पड़ी। उससे दांत धोकर कर्ण ने कहा अब तो ये शुद्ध हो गया। इसके बाद भगवान कृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। श्रीकृष्ण ने तब कर्ण से कहा था कि ‘‘तुम्हारी यह बाण गंगा युग युगों तक तुम्हारा गुणगान करती रहेगी।‘‘ घायल कर्ण को श्रीकृष्ण ने आशीर्वाद दिया था कि ”जब तक सूर्य, चन्द्र, तारे और पृथ्वी रहेंगे, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में किया जाएगा। संसार में तुम्हारे समान महान दानवीर न तो हुआ है और न कभी होगा।"
श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं। कर्ण ने कृष्णजी से कहा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने के कारण उसके साथ बहुत छल हुए हैं। अगली बार जब कृष्णजी धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें। इसके साथ कर्ण ने दो और वरदान मांगे। दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि अगले जन्म में कृष्णजी उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार एक कुंवारी भूमि पर करना।
मान्यता है कि भगवान को पूरी पृथ्वी पर भूमि का कोई ऐसा टुकड़ा नहीं मिला, जहां पहले किसी व्यक्ति का दाह संस्कार न हुआ हो। काफी तलाशने के बाद उन्हें केवल सूरत शहर में ताप्ती नदी के किनारे एक इंच जमीन ही ऐसी मिली, जहां पहले कभी किसी का शवदाह नहीं हुआ था। यहां एक इंच भूमि पर शव रखना असंभव था. ऐसे में भगवान कृष्ण ने उस भूमि के टुकड़े पर पहले एक बाण रखा। इसके बाद उस पर कर्ण के शरीर को रखकर दाह संस्कार किया। इस जगह को अब लोग 'तुल्सीबड़ी मंदिर' के रूप में पहचानते हैं
तापी नदी के किनारे कर्ण का शवदाह किए जाने के पश्चात् पांडवों ने जब कुंवारी भूमि होने पर शंका जताई तो श्रीकृष्णजी ने कर्ण को प्रकट करके उससे आकाशवाणी द्वारा कहलाया था कि वो सूर्य के पुत्र हैं और अश्विनी और कुमार उनके भाई हैं। तापी उनकी बहन हैं। उनका अग्निदाह कुंवारी भूमि पर ही किया गया है। पांडवों ने कहा हमें तो पता चल गया परंतु आने वाले युगों को कैसे पता चलेगा? तब भगवान कृष्ण ने कहा कि यहां पर तीन पत्रों का वट वृ़क्ष होगा जो ब्रह्मा, विष्णु, और महेश का प्रतीक रूप होगा।
यहां तीन पत्ता बड़ का एक मंदिर है। यहां बरगद का एक पेड़ है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह हजारों साल पुराना है, लेकिन इस पर आज तक सिर्फ 3 पत्ते ही आए हैं जो आज भी हरे-भरे हैं। शायद यही कारण है कि वट(बरगद) वृक्ष की दीर्घ आयु होती है। 
  
ऐसी मान्यता है कि यहां कोई भी सच्चे विश्वास के साथ प्रार्थना करेगा तो उसका मनोरथ कार्य अवश्य पूर्ण होगा।

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