जगन्नाथ मंदिर पुरी के मुख्य द्वार पर बनी 22 सीढ़ियों में से एक सीढ़ी ऐसी भी है, जिस पर पैर रखते ही आपके सारे पुण्य समाप्त हो सकते हैं?जी हां… यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसी प्राचीन मान्यता है जिसे सुनकर बड़े-बड़े ज्ञानी भी चौंक जाते हैं।
कहते हैं, जगन्नाथ धाम की हर सीढ़ी का अपना एक रहस्य है, लेकिन तीसरी सीढ़ी… सबसे रहस्यमयी मानी जाती है। इस सीढ़ी को “यमशीला” कहा जाता है।
लेकिन आखिर क्यों?
इस रहस्य को समझने के लिए हमें समय के उस काल में जाना होगा… जब धरती पर भक्ति अपने चरम पर थी।
उस समय, जो भी भक्त भगवान जगन्नाथ के दर्शन करता… वह तुरंत पापों से मुक्त हो जाता था। केवल एक झलक… और वर्षों के पाप धुल जाते।
लोग दूर-दूर से आते, केवल एक बार भगवान के दर्शन करने के लिए।
भक्ति इतनी सरल हो गई थी कि हर कोई बिना कठिन तपस्या के ही मोक्ष की ओर बढ़ने लगा।
लेकिन यह बात एक देवता को चिंतित करने लगी।
वो थे मृत्यु के देवता — यमराज।
एक दिन यमराज चिंतित मन से सीधे भगवान के धाम पहुँचे।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
“हे प्रभु… आप तो करुणा के सागर हैं। आपके दर्शन मात्र से मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। लेकिन अगर हर कोई यूं ही मुक्त हो जाएगा… तो फिर न्याय का क्या होगा? कर्मों का हिसाब कौन देगा? यमलोक का क्या उद्देश्य रह जाएगा?”
भगवान मुस्कुराए…
उनकी मुस्कान में करुणा भी थी और गहरा रहस्य भी।
भगवान जगन्नाथ ने शांत स्वर में कहा—
“हे यमराज… तुमने जो कहा, वह सत्य है। संसार में संतुलन आवश्यक है। केवल कृपा ही नहीं, कर्मों का फल भी जरूरी है।”
कुछ क्षण के मौन के बाद उन्होंने एक अद्भुत निर्णय लिया।
“हे यमराज, तुम मेरे धाम के मुख्य द्वार पर बनी तीसरी सीढ़ी पर निवास करो। वही तुम्हारा स्थान होगा।”
यमराज आश्चर्यचकित रह गए…
“तीसरी सीढ़ी?”
भगवान बोले—
“हाँ… जो भक्त मेरे दर्शन के लिए आएगा, वह तो मेरे दर्शन से पापमुक्त हो जाएगा। लेकिन जब वह लौटेगा… और अनजाने में उस तीसरी सीढ़ी पर पैर रखेगा… तब उसके पुण्य क्षीण हो जाएंगे।”
“और तब… उसे अपने कर्मों का फल भोगने के लिए यमलोक आना ही पड़ेगा।”
मित्रों… उसी दिन से उस तीसरी सीढ़ी को “यमशीला” कहा जाने लगा।
कहा जाता है कि आज भी… उस सीढ़ी पर अदृश्य रूप में यमराज का निवास है।
भक्त जब मंदिर में प्रवेश करते हैं… तो श्रद्धा से सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। लेकिन जब वे लौटते हैं… तो कई लोग अनजाने में उस तीसरी सीढ़ी पर पैर रख देते हैं।
और यही वह क्षण होता है… जब उनके संचित पुण्य क्षीण हो जाते हैं।
इसी कारण से, कई जानकार और साधु-संत आज भी इस सीढ़ी को पार करते समय विशेष सावधानी बरतते हैं।
कुछ लोग उस सीढ़ी को छूकर प्रणाम करते हैं… लेकिन उस पर पैर रखने से बचते हैं।
क्योंकि वे जानते हैं… यह सिर्फ एक पत्थर की सीढ़ी नहीं… बल्कि कर्म और न्याय का प्रतीक है।
मित्रों… यह कथा हमें एक गहरा संदेश देती है।
भगवान की कृपा असीम है… लेकिन कर्मों का हिसाब भी उतना ही सच्चा है।
केवल दर्शन से मुक्ति नहीं मिलती… बल्कि सही कर्मों से ही जीवन सफल होता है।
तो अगली बार अगर आप पुरी के इस पवित्र धाम में जाएं…
तो इन 22 सीढ़ियों को केवल रास्ता मत समझिए…
इनमें छिपे रहस्यों को महसूस कीजिए…
क्योंकि कभी-कभी… एक छोटी सी सीढ़ी भी… आपकी पूरी किस्मत बदल सकती है।
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