पौराणिक गाथा : दिल्ली के कालकाजी मन्दिर की महानता


दिल्ली के प्रसिद्ध कालकाजी मंदिर(श्री कालिका जी) की उत्पत्ति और इतिहास से जुड़ी कहानी अत्यंत प्राचीन और रोचक है। इसे "मनोकामना सिद्ध पीठ" और "जयंती पीठ" भी कहा जाता है। इस स्थान की मुख्य मूल कहानी पौराणिक कथाओं, महाभारत काल और आधुनिक इतिहास के तीन मुख्य अध्यायों में बंटी हुई है:
1. पौराणिक कथा: महाकाली का प्राकट्य (सत्ययुग)
धार्मिक मान्यताओं और 'दुर्गा सप्तशती' के अनुसार, यह कहानी सत्ययुग की है।
असुरों का आतंक: उस समय अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत (जहां आज मंदिर स्थित है) के आसपास रहने वाले देवताओं को 'रक्तबीज' और अन्य शक्तिशाली राक्षसों ने बहुत प्रताड़ित किया।
कौशिकी देवी का जन्म: राक्षसों से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने ब्रह्मा जी और माता पार्वती की आराधना की। देवताओं की प्रार्थना पर माता पार्वती के अंश से देवी कौशिकी प्रकट हुईं, जिन्होंने राक्षसों का संहार करना शुरू किया।
रक्तबीज की चुनौती: जब देवी कौशिकी ने रक्तबीज पर प्रहार किया, तो उसके रक्त(खून) की बूंदें जैसे ही धरती पर गिरतीं, वैसे ही हर बूंद से एक नया और शक्तिशाली राक्षस पैदा हो जाता। इससे राक्षसों की सेना लगातार बढ़ती गई।
महाकाली का रूप: तब माता पार्वती ने क्रोध में आकर अपने मुख से 'मां काली' को प्रकट किया। मां काली का रूप अत्यंत विशाल और भयानक था। उन्होंने अपना मुंह आकाश से लेकर धरती तक फैला लिया।
असुरों का अंत: इसके बाद देवी कौशिकी राक्षसों का वध करती गईं और मां काली उनके रक्त की बूंदों को धरती पर गिरने से पहले ही अपने मुख में समेटती(पीती) गईं। इस तरह रक्तबीज और अन्य असुरों का अंत हुआ।
विराजमान होना: युद्ध के बाद देवताओं ने मां काली से इसी स्थान पर रुकने की प्रार्थना की। माता देवताओं की भक्ति से प्रसन्न हुईं और उन्होंने इसी सूर्यकूट पर्वत पर स्वयं को 'पिंडी'(स्वयंभू रूप) के रूप में स्थापित कर लिया।
2. महाभारत काल की कथा
कालकाजी मंदिर का संबंध द्वापर युग यानी महाभारत काल से भी मजबूती से जुड़ा हुआ है।
पांडवों की आराधना: माना जाता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांचों पांडवों (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) को शक्ति और विजय प्राप्त करने के लिए इसी सूर्यकूट पर्वत पर मां कालका की पूजा करने की सलाह दी थी।
विजय का आशीर्वाद: पांडवों ने यहां आकर कठिन तपस्या और पूजा की, जिससे प्रसन्न होकर मां कालका ने उन्हें युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद दिया। कुरुक्षेत्र का युद्ध जीतने के बाद पांडवों ने यहां आकर माता का आभार व्यक्त किया और मंदिर का एक हिस्सा बनवाया था।
3. लोककथा: गाय और दूध की कहानी
एक स्थानीय लोककथा यह भी है कि सदियों पहले जब यह इलाका पूरी तरह जंगली और पहाड़ी था, तब यहां चरवाहे अपनी गाएं चराने आते थे।
वहां एक चमत्कारिक घटना घटने लगी—एक गाय हर रोज जंगल में एक निश्चित चट्टान(पिंडी) के पास जाकर खड़ी हो जाती और उसके थनों से अपने आप दूध बहने लगता, जिससे पिंडी का अभिषेक हो जाता था।
जब चरवाहों और स्थानीय लोगों ने यह दृश्य देखा, तो उन्हें समझ आया कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं बल्कि साक्षात देवी का रूप है। इसके बाद वहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना शुरू हो गई।
4. आधुनिक इतिहास और जीर्णोद्धार
समय के साथ इस सिद्धपीठ का स्वरूप बदलता रहा:
मराठा काल (1764 ईस्वी): इतिहास के अनुसार, इस प्राचीन मंदिर के मुख्य और पुराने हिस्से का पुनरुद्धार 1764 ईस्वी में मराठों द्वारा कराया गया था।
मुगल काल (अकबर द्वितीय के समय): 1816 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर शाह द्वितीय के पेशकार (कोषाध्यक्ष) राजा केदारनाथ ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और इसकी संरचना में कुछ बदलाव किए।
वास्तुकला: आज जो मंदिर हम देखते हैं, उसका मुख्य गर्भगृह अष्टकोणीय (8 कोनों वाला) है, जो संगमरमर से बना है। मंदिर में कुल 12 द्वार हैं, जो वर्ष के 12 महीनों और द्वादश आदित्यों को दर्शाते हैं।

मान्यता है कि कालकाजी मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से आता है, मां कालका उसकी झोली कभी खाली नहीं रखतीं। यही कारण है कि इसे आज भी दिल्ली के सबसे जाग्रत और प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। 

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