नार्वे की पत्रकार हेले लिंग और राहुल की राजनीति

डॉ राकेश कुमार आर्य

प्रधानमंत्री मोदी जैसा कोई व्यक्तित्व जब किसी क्षेत्र में पैर रखता है तो उसे भली प्रकार यह ज्ञान होता है कि किस मोड़ पर कितने बड़े-बड़े विरोधियों से सामना करना पड़ सकता है ? जो लोग यह अनुमान नहीं लगा पाते कि जिस रास्ते को चुना गया है, उसमें कई प्रकार के अंधे मोड़ आएंगे और उन पर दुर्घटना संभावित है, वह जीवन की भूलभुलैया में यूं ही खो जाते हैं। राजनीति में जिन्हें अचानक प्रसिद्धि मिल जाती है वह उसे इसीलिए नहीं संभाल पाते कि उन्हें मिला हुआ पद सुनियोजित नहीं था बल्कि तात्कालिक आधार पर बनी हुई परिस्थितियों का परिणाम था। भारत के कई प्रधानमंत्रियों को प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य तो मिल गया परंतु क्योंकि उनके लिए यह तात्कालिक संयोग था, इसलिए उन्हें आने वाले तूफानों की या मोड़ों की कोई जानकारी नहीं थी। परिणाम यह निकला कि वह अपने आप को संभाल नहीं पाए। परंतु मोदी जी पर यह बात लागू नहीं होती । उन्होंने बहुत दूर की कौड़ियां बहुत समय पहले से सजानी आरंभ कर दी थीं। उनके लक्ष्य की प्राप्ति में जितनी भी बाधाएं थीं उन सबको कैसे दूर करना है? - इस पर उन्होंने बहुत गंभीरता से चिंतन मंथन करके आगे बढ़ना आरंभ किया था।
यही कारण है कि पीएम मोदी अपने सामना खड़े किसी संकट से घबराते नहीं हैं। वह संकट का सामना इस प्रकार करते हैं कि जैसे वह पहले से ही उसकी प्रतीक्षा में खड़े थे? नॉर्वे में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के समय पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से अचानक प्रश्न पूछा कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से प्रश्न क्यों नहीं लेते?”
लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं
हमें समझना चाहिए कि जब कहीं कोई इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की जाती है तो उसमें सब कुछ बहुत व्यवस्थित होता है। प्रश्नों को भी बहुत सीमित किया जाता है। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि किसी भी राष्ट्राध्यक्ष या विदेशी अतिथि के लिए किसी भी परिस्थिति में कोई असहज स्थिति उत्पन्न न होने पाए? इस बात को भारत में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी भी भली प्रकार जानते हैं, परंतु इसके उपरांत भी वह नॉर्वे की पत्रकार के द्वारा पूछे गए प्रश्न के संबंध में कई प्रकार की भ्रांतियां फैलाने का काम कर रहे हैं। वास्तव में उनका इस प्रकार का यह आचरण उनके पद की गरिमा को गिराता है।
इससे उनके विरोधियों को यह कहने का अवसर मिल रहा है कि राहुल गांधी यदि इस प्रकार का आचरण कर रहे हैं तो वह भी नॉर्वे की पत्रकार के द्वारा पूछे गए प्रश्न से उद्भूत विमर्श का एक अंग बन चुके हैं? ऐसी बात को भी 'भारत में लोकतंत्र खतरे में है', 'संविधान के लिए अभूतपूर्व संकट उत्पन्न हो गया है ', 'संवैधानिक प्रतिष्ठानों पर हमला हो रहे हैं', 'देश को बेच दिया गया है' - जैसे नेता प्रतिपक्ष के परंपरागत झूठ भरे विमर्श के साथ जोड़ने का प्रयास किया जाता है। प्रधानमंत्री श्री मोदी को सारा विपक्ष जुमलेबाज कहता है। यह अलग बात है कि सारा विपक्ष ही राहुल गांधी की जुमलेबाजी का शिकार हो रहा है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस समय नॉर्वे की पत्रकार ने हमारे प्रधानमंत्री से उपरोक्त प्रश्न पूछा था, उस समय वह कोई राजनीतिक मंच नहीं था बल्कि वह कूट नीतिक मंच था। जिस पर प्रश्न पूछने की भी सीमित छूट होती है। नॉर्वे की पत्रकार ने इसके बाद उपजी स्थिति को अपने अनुकूल बनाने का हरसंभव प्रयास किया। उसने इसे अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ले जाकर भुनाना आरंभ कर दिया। नॉर्वे की यह पत्रकार मोदी विरोधी मीडिया लॉबी के साथ जोड़कर काम करती रही है।
वह जिस अखबार Dagsavisen के लिए काम करती है उसके फॉलोअर्स 50,000 से भी कम हैं । इससे स्पष्ट है कि अपना सवाल दाग कर उसने अपने आप को लॉन्च करने का प्रयास किया है। भारत के नेता प्रतिपक्ष ने एक ऐसी हल्की पत्रकार को हवा देकर उसे लांच होने में सहायता प्रदान की है। राहुल गांधी के इस प्रकार के आचरण से स्पष्ट होता है कि वह सत्ता के लिए कुछ भी करने की तैयार हैं। बल्कि कहा जाए कि 'मुंगेरी लाल के सपनों' से कम नहीं। राहुल गांधी जिस प्रकार की बयानबाजी करके और ' विदेशी हस्तक्षेप' के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने के लिए उतावले दिखाई देते हैं उससे वह कभी भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएंगे। क्योंकि पीएम मोदी सत्ता में बहुत भारी भरकम होकर बैठे हैं। उन्हें उखाड़ना कदापि संभव नहीं है। विशेष रूप से तब जब भारत की वफादार और शौर्य संपन्न देशभक्त सेना अपने प्रधानमंत्री के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ी है। इसके साथ ही भारत का युवा वर्ग भी पीएम मोदी के साथ है। यही कारण रहा कि राहुल गांधी के बार-बार उकसाने के उपरांत भी भारत का युवा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ सड़कों पर नहीं आया।
अभी हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिस प्रकार राहुल गांधी की पार्टी को धोया गया है, उससे राहुल गांधी को शिक्षा लेनी चाहिए कि उनके लिए देश अभी दूर-दूर तक भी तैयार दिखाई नहीं देता। इसके उपरांत भी यदि वह नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के दुराचरण को देश में सत्ता परिवर्तन का आधार बनाने के रूप में देख रहे हैं तो इसे उनका बचकानापन भी कहा जाएगा। आज का भारत सशक्त भारत है। जागरूक और सजग भारत है। इसे झूठे विमर्श या नेरेटिव से भटकाया नहीं जा सकता। देश का परिपक्व मतदाता अब सीधे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहता है। वह चाहता है कि जिस प्रकार देश आगे बढ़ रहा है वह बढ़ता रहना चाहिए। देश के मतदाता की बनी हुई इस सोच को राहुल गांधी बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वह जितना ही अपनी भटकी हुई इस भूमिका को निभाते हैं, उतना ही देश का मतदाता उनसे दूर चला जाता है। भटकाव के लिए अब उसके पास सोचने तक का समय नहीं है। भारत की वर्तमान सशक्त स्थिति को देखकर नॉर्वे की पत्रकार को यह कहना पड़ा है कि 'वह कोई जासूस नहीं है।' परंतु यह कहना ही उसके 'कुछ होने' की ओर संकेत करता है। माना कि सारी दाल काली नहीं है परंतु दाल में काला अवश्य है।
अब हम सबके लिए बहुत ही प्रसन्नता का विषय है कि हमारे देश का मतदाता 'दाल में काला' और 'सारी दाल के काली होने' में अंतर समझने लगा है। वह यह भी समझने लगा है कि इस प्रकार दाल को काली करने का प्रयास कौन कर रहा है? और यदि दाल में काला है तो उसके लिए दोषी कौन है? राहुल गांधी को इस तथ्य को समझना होगा।

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