खिसाई बिल्ली खम्बा नोचे, ठीक वही हालत ममता बनर्जी की है और उसको फर्ले पर चढ़ाने वालों की भी कमी नहीं। ममता हार से इतना बौखला गयी है कि अपने आत्मसम्मान को भी भूल गयी। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने में फिर सम्मान था लेकिन विधान सभा भंग होने पर मुख्यमंत्री जाना बहुत बड़ी बेइज्जती है।
दरअसल ममता बनर्जी को यह पाठ कपिल सिब्बल ने पढ़ाया लगता है कि मैं हारी नहीं हूँ मुझे हराया गया है, इसलिए मैं इस्तीफा नहीं दूंगी। यह बयान आज सिब्बल का X पर आया है और उसने कहा है कि 25 लाख वोटरों को वोट देने से वंचित किया गया, इसलिए ममता को भाजपा ने नहीं चुनाव आयोग ने हराया है।
![]() |
| लेखक चर्चित YouTuber |
सिब्बल कुछ मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ममता सरकार की तरफ से लड़ रहा था और कुछ को TMC अध्यक्ष के तौर पर ममता की तरफ से लड़ रहा था। 2 मई को भी वो पार्टी की तरफ से कोर्ट में था। हो सकता है उसे और अन्य वकीलों को अभी तक पार्टी और सरकार से फीस न मिली हो। अगर नहीं मिली तो पार्टी की फीस तो पार्टी देगी लेकिन सरकार की तरफ से लड़ने वाले वकीलों को आने वाली भाजपा सरकार फीस देने से मना कर सकती है और कर भी देनी चाहिए क्योंकि ममता सरकार संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध लड़ रही थी जिससे भाजपा सरकार का कोई सरोकार नहीं था। अब अपनी फीस की चिंता करो कपिल सिब्बल।
ये पाठ अभिषेक मनु सिंघवी ने केजरीवाल को नहीं पढ़ाया कि “मैं हारा नहीं हूं मुझे हराया गया है, मैं इस्तीफा नहीं दूंगा”।
ममता पहली मुख्यमंत्री थी जिसने सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने की कोशिश की और वहां अपनी दलीलें भी दी। ऐसे ही केजरीवाल भी हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने पेश हुआ।
केजरीवाल ने जेल में रह कर भी त्यागपत्र देने से मना कर दिया और हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर सके। उन्होंने कह दिया कि वो किसी मुख्यमंत्री को नहीं हटा सकते। अब ममता ने भी त्यागपत्र देने से मना कर दिया। दोनों का आचरण “अराजकतावादी” है। फिर कहते फिरते हैं कि मोदी संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म कर रहा है यानि चोर मचाये शोर, संविधान की धज्जियाँ पूरा INDI गठबंधन उड़ा रहा है।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी गलती थी कि उसने SIR के खिलाफ हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट में पूरी शक्ति लगा दी और बंगाल में ही नहीं पूरे देश में धारणा (Perception) बना दी कि वह बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को बचा रही है। 12 राज्यों में SIR हुआ लेकिन कहीं कोई समस्या नहीं हुई बंगाल के सिवाय।
ममता के SIR विरोध ने हिंदू वोटर को एकजुट होने के लिए प्रेरित किया और ऐतिहासिक जीत मिली भाजपा को। जबकि एक सत्य सामने यह भी आया है कि 20 सीटों पर सबसे ज्यादा वोट कटे, जिनमें से 13 सीट ममता की पार्टी ने जीती। अगर विरोध न किया होता तो परिणाम कुछ और मिल सकता था। लेकिन सिब्बल जैसे वकीलों ने माल कमाने के लिए ममता को भड़काए रखा कि वो चुनाव आयोग की सुप्रीम कोर्ट में ऐसी तैसी कर देंगे लेकिन यह नहीं पता था कि सामने ज्ञानेश कुमार है जो उनसे भी बड़ा खिलाड़ी है।
पिछली बार ममता नंदीग्राम से हार कर मुख्यमंत्री बने रहने के लिए भवानीपुर से लड़ी थी लेकिन अबकी तो मुख्यमंत्री बन नहीं सकती और इसलिए हो सकता है अब कोई चुनाव न लड़े।
ममता ने हार कर इस्तीफा न देने की जिद करके और ज्यादा बदनामी मोल ली है और उससे भी ज्यादा दोष चन्द्रनाथ रथ की हत्या का लगेगा, बेशक ममता का उससे कोई संबंध न हो लेकिन सुवेंदु अधिकारी का PA होने के नाते दोष ममता पर ही आएगा।

No comments:
Post a Comment