रामायण का वह रहस्य जिसके बिना शायद लंका विजय कभी पूरी ही नहीं होती। अगर उस एक भयावह रात पवनपुत्र हनुमान ने अपना दिव्य पंचमुखी स्वरूप धारण नहीं किया होता, तो संभव है कि अधर्म की विजय हो जाती और संसार एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ जाता जहां मर्यादा, धर्म और सत्य की ज्योति हमेशा के लिए बुझ जाती। यह केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है, यह उस क्षण की कथा है जब स्वयं समय ठहर गया था और एक भक्त ने अपने प्रभु की रक्षा के लिए अपनी समस्त दिव्य शक्तियों का आवाहन किया था।
लंका का युद्ध अपने अंतिम और सबसे निर्णायक चरण में पहुंच चुका था। रावण के एक-एक महारथी का अंत हो चुका था। मेघनाद, कुंभकर्ण और उसके अनेक पराक्रमी योद्धा युद्धभूमि में परास्त हो चुके थे। हर दिन रावण का साम्राज्य कमजोर होता जा रहा था और श्रीराम की विजय निश्चित दिखाई देने लगी थी। लेकिन रावण केवल बलवान ही नहीं था, वह अत्यंत चतुर और मायावी भी था। जब उसे समझ में आ गया कि साधारण युद्ध में वह श्रीराम को पराजित नहीं कर सकता, तब उसने अपनी अंतिम और सबसे भयानक चाल चलने का निश्चय किया।
रात का समय था। लंका के एक गुप्त कक्ष में बैठा रावण गहरी चिंता में डूबा हुआ था। तभी उसे अपने पुराने मित्र और पाताल लोक के अधिपति अहिरावण का स्मरण हुआ। अहिरावण कोई साधारण राक्षस नहीं था। वह तंत्र, मंत्र, मायावी शक्तियों और काले जादू का ऐसा महाज्ञाता था जिसके सामने बड़े-बड़े देवता भी सावधान रहते थे। कहा जाता था कि उसने ऐसी रहस्यमयी विद्याओं में सिद्धि प्राप्त कर ली थी जिनका ज्ञान स्वयं असुरों के बीच भी दुर्लभ था।
रावण ने तुरंत उसका आह्वान किया। कुछ ही क्षणों में पाताल लोक की गहरी अंधकारमयी शक्तियों से घिरा हुआ अहिरावण वहां प्रकट हुआ। उसकी आंखों में विचित्र चमक थी और उसके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान खेल रही थी। रावण ने उससे कहा, "मित्र, अब मेरी सारी आशाएं तुम पर टिकी हैं। यदि राम और लक्ष्मण जीवित रहे तो मेरा अंत निश्चित है। किसी भी प्रकार उन्हें मेरे मार्ग से हटाना होगा।"
अहिरावण ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और फिर हंसते हुए बोला, "लंकेश, चिंता मत करो। मैं ऐसी योजना बनाऊंगा कि किसी को कुछ समझने का अवसर भी नहीं मिलेगा। सूर्योदय होने से पहले राम और लक्ष्मण मेरे होंगे।"
उधर समुद्र तट पर वानर सेना युद्ध की थकान के बाद विश्राम कर रही थी। चारों ओर शांति थी। लेकिन वह शांति किसी बड़े तूफान से पहले की निस्तब्धता थी। आधी रात के समय अहिरावण अपनी मायावी शक्तियों के साथ वहां पहुंचा। उसने ऐसे मंत्रों का उच्चारण किया कि पूरी वानर सेना गहरी निद्रा में डूब गई। यहां तक कि कई वीर योद्धाओं को भी उसकी उपस्थिति का आभास तक नहीं हुआ।
अहिरावण ने विभीषण का रूप धारण किया और सुरक्षा घेरा पार कर सीधे उस स्थान तक पहुंच गया जहां श्रीराम और लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे। उसने अपने मायाजाल से दोनों भाइयों को अचेत किया और उन्हें लेकर पाताल लोक की ओर निकल पड़ा। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि किसी को कुछ समझने का अवसर ही नहीं मिला।
सुबह जब वानर सेना जागी तो पूरे शिविर में हाहाकार मच गया। श्रीराम और लक्ष्मण कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। सभी दिशाओं में खोज शुरू हुई। सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान और अन्य सभी वीर चिंतित थे। तभी विभीषण ने ध्यान लगाकर सत्य का पता लगाया और गंभीर स्वर में बोले, "यह कार्य केवल एक ही व्यक्ति कर सकता है — पाताल लोक का राजा अहिरावण।"
यह सुनते ही हनुमान जी की आंखों में अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उनके लिए श्रीराम केवल राजा नहीं थे। वे उनके प्राण, उनके आराध्य और उनके समस्त अस्तित्व का केंद्र थे। उन्होंने बिना एक क्षण गंवाए पाताल लोक की ओर प्रस्थान किया।
पाताल लोक का मार्ग अत्यंत भयावह था। वहां चारों ओर अंधकार, विषैले जीव और रहस्यमयी शक्तियां विचरण कर रही थीं। लेकिन हनुमान जी के साहस के सामने कोई बाधा टिक नहीं सकी। वे हर संकट को पार करते हुए अंततः अहिरावण के महल तक पहुंच गए।
महल के भीतर जो दृश्य उन्होंने देखा, उसे देखकर उनका हृदय क्रोध से भर उठा। विशाल यज्ञ वेदी के सामने श्रीराम और लक्ष्मण मजबूत नागपाशों में बंधे हुए थे। चारों ओर तांत्रिक मंत्रों का उच्चारण हो रहा था। राक्षस उत्सव मना रहे थे क्योंकि उन्हें विश्वास था कि अब उनकी विजय निश्चित है।
तभी हनुमान जी की दृष्टि एक विचित्र रहस्य पर पड़ी। पांच अलग-अलग दिशाओं में पांच दीपक जल रहे थे। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और आकाश की ओर स्थित उन दीपकों से अद्भुत ऊर्जा निकल रही थी। तभी अहिरावण जोर से हंसा और बोला, "वानर, तू बहुत देर से आया है। जब तक ये पांचों दीपक एक साथ नहीं बुझेंगे, तब तक मेरी मृत्यु असंभव है। मेरी प्राणशक्ति इन्हीं में सुरक्षित है।"
यह सुनकर हनुमान जी कुछ क्षण विचार में डूब गए। पांचों दीपक इतनी दूर-दूर स्थित थे कि उन्हें एक साथ बुझाना लगभग असंभव था। लेकिन यह वह समय था जब केवल बल पर्याप्त नहीं था। यहां दिव्य शक्ति और बुद्धि दोनों की आवश्यकता थी।
तभी हनुमान जी ने अपने भीतर स्थित पंचदेव शक्तियों का आवाहन किया। अगले ही क्षण उनका शरीर दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा। उनके एक नहीं, पांच मुख प्रकट हो गए।
पूर्व दिशा में स्वयं हनुमान का वानर मुख था जो अदम्य साहस और भक्ति का प्रतीक था।
दक्षिण दिशा में भगवान नरसिंह का उग्र मुख प्रकट हुआ जो अधर्म के विनाश की शक्ति था।
पश्चिम दिशा में गरुड़ मुख प्रकट हुआ जो विष और नाग शक्तियों का नाश करने वाला था।
उत्तर दिशा में भगवान वराह का मुख प्रकट हुआ जो पृथ्वी और धर्म की रक्षा का प्रतीक था।
और ऊपर आकाश की ओर भगवान हयग्रीव का दिव्य मुख प्रकट हुआ जो ज्ञान और दिव्य चेतना का स्वरूप था।
पंचमुखी हनुमान का वह विराट रूप इतना तेजस्वी था कि पूरा पाताल लोक कांप उठा। राक्षस भय से थर-थर कांपने लगे। स्वयं अहिरावण के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
अगले ही क्षण हनुमान जी ने अपने पांचों मुखों से एक साथ प्रचंड वायु प्रवाहित की। वह दिव्य वायु इतनी शक्तिशाली थी कि पांचों दिशाओं में स्थित दीपक एक ही क्षण में बुझ गए।
दीपक बुझते ही अहिरावण की सारी मायावी शक्तियां समाप्त हो गईं। उसका अभेद्य तिलिस्म टूट गया। उसके मंत्र निष्प्रभावी हो गए और उसका शरीर कमजोर पड़ने लगा।
हनुमान जी ने अवसर देखते ही अपने दिव्य पराक्रम से उस अधर्मी का अंत कर दिया। पूरी यज्ञ वेदी कांप उठी। पाताल लोक में गूंजती उसकी भयावह हंसी सदा के लिए शांत हो गई।
इसके बाद हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया। जैसे ही दोनों भाइयों ने अपने प्रिय भक्त को उस दिव्य पंचमुखी स्वरूप में देखा, उनके मुख पर प्रसन्नता की मुस्कान आ गई। श्रीराम ने प्रेमपूर्वक कहा, "हनुमान, तुम्हारी भक्ति के कारण ही धर्म की यह ज्योति आज सुरक्षित है।"
हनुमान जी ने विनम्रता से सिर झुका दिया। उनके लिए यह विजय उनकी नहीं थी। यह उनके प्रभु की कृपा थी।
यही कारण है कि पंचमुखी हनुमान को आज भी पांचों दिशाओं के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि उनका यह स्वरूप हर प्रकार के भय, तंत्र-मंत्र, नकारात्मक शक्तियों और संकटों से अपने भक्तों की रक्षा करता है। यह कथा हमें सिखाती है कि जब भक्ति सच्ची हो और उद्देश्य धर्म की रक्षा हो, तब असंभव भी संभव हो जाता है।
और शायद यही कारण है कि आज भी करोड़ों भक्त विश्वास के साथ कहते हैं — जहां राम का नाम है, वहां हनुमान हैं, और जहां हनुमान हैं, वहां किसी भी संकट का टिक पाना असंभव है।
जय श्रीराम।
जय बजरंगबली।
जय पंचमुखी हनुमान।
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