माननीय सूर्यकांत जी कथनी और करनी में अंतर जिस दिन समझ जाओगे भ्रष्टाचार अपने आप समझ आ जाएगा। जब निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक फैले भ्रष्टाचार पर स्वयं संज्ञान लेने की कोशिश करोगे आंखे फट जाएँगी। जब मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस GR Swaminathan और जस्टिस Lakshminarayanan ने अदालतों में भ्रष्टाचार की बात कही थी आपको उसी समय सतर्क होकर कार्यवाही करनी थी। जबकि देश का हर नागरिक जानता है कि अदालतें, पुलिस और जितने भी पब्लिक डीलिंग विभाग कोई भ्रष्टाचार से अछूता नहीं। दूसरे, कुछ दलाल वकीलों द्वारा दायर केसों को क्यों प्राथमिकता दी जाती है? इसीलिए ये वकील एक पेशी के लाखों रूपए लेते हैं। इनके इशारे पर काम होते हैं। इस कटु सच्चाई को समझना होगा। क्योकि यह भी भ्रष्टाचार ही है।
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लेकिन क्या कॉलेजियम में चल रहा खेल साबित नहीं करता कि वह भी भ्रष्टाचार का अड्डा है। आप जनता को कुछ जानने का अधिकार ही नहीं देना चाहते। एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Justice M.R. Shah and Justice C.T. Ravikumar ने कहा है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की चयन की प्रक्रिया (कॉलेजियम के फैसले) RTI और न्यायिक समीक्षा के बाहर हैं। जजों की न्यायिक प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा भी नहीं की जा सकती।
जजों के चयन में यह पारदर्शिता का न होना अपने आप में कॉलेजियम में भ्रष्टाचार का सबूत देता है। अगर कॉलेजियम द्वारा चयन प्रक्रिया सार्वजनिक होती तब तो किसी को RTI में सूचना मांगने की जरूरत ही नहीं होती लेकिन कॉलेजियम हर तरह अपनी गतिविधियां गोपनीय रखना चाहता है और यह किसी के भी मन में शंका पैदा कर सकता है। कॉलेजियम में मेरी नज़र में सबसे बड़ा झोल वकीलों को जज बनाने में होता है।
एक यशवंत वर्मा का मामला तो आपके सामने था लेकिन उसमें क्या कार्रवाई की गई? FIR तक होने दी। सबसे बड़ा मकड़जाल न्यायपालिका ने फैला रखा है कि किसी भी जज के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए चीफ जस्टिस की अनुमति लेनी आवश्यक है और ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में निर्धारित कर दिया था।
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले हैं। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से केस फाइल का गायब हो जाना अपने आप में भ्रष्टाचार है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच के निर्णय के बाद भी रजिस्ट्री अमुक पार्टी को नोटिस जारी न करे, वह भी भ्रष्टाचार है। सुप्रीम कोर्ट के जज अगर अपनी संपत्ति का ब्यौरा नहीं देते, वह भी भ्रष्टाचार है।
केजरीवाल को 12 जुलाई, 2024 को जमानत देकर जस्टिस खन्ना का उसकी ED की गिरफ़्तारी वैधता के लिए 5 जजों की बेंच को भेजना भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। उस बेंच का 2 साल में गठन न होना भी भ्रष्टाचार है। वर्षो तक मामले लटकते रहते हैं सुप्रीम कोर्ट में लेकिन रजिस्ट्री केस आगे नहीं बढ़ाती, वह भी भ्रष्टाचार है। लालू यादव 32 साल की सजा पा कर भी जमानत पर मौज कर रहा है लेकिन किसी केस में हाई कोर्ट का फैसला न करना सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है।
अभी कुछ दिन पहले 21 मई, 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस GR Swaminathan और जस्टिस Lakshminarayanan ने टिप्पणी की थी कि “NONE CAN DENY THERE IS CORRUPTION IN JUDICIARY, THERE WERE AND ARE CORRUPT JUDGES”.
अब चीफ जस्टिस सूर्यकांत दोनों जजों से पूछें कि कौन से जज भ्रष्ट हैं-
इसके अलावा मद्रास हाई कोर्ट के ही Justice G. Jayachandran ने हाल ही में कहा है कि चुनाव याचिकाओं के निबटारे में विलम्ब Autocracy को जन्म देती है और यह लोकतंत्र के लिए खतरा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की विशेष रूप से निंदा की जहां 6 साल से 2016 चुनाव के मामले में 2019 से अपील लंबित है। उन्होंने कहा कि “DECADE LONG DELAY A ‘GRAVE MOCKERY OF JUSTICE’ AND THREAT TO DEMOCRACY” जबकि Representation of People Act के सेक्शन 86 के अनुसार चुनाव याचिका पर 6 महीने में निर्णय हो जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने NEET परीक्षा में पारदर्शिता चाही थी और सरकार ने वह करा दी। अब अपने आचरण पर भी ध्यान दीजिये मीलॉर्ड।

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