लगभग 16/17 साल की बात है, बस में यात्रा करते दो यात्री आपस में बातचीत कर रहे थे, बातचीत करते-करते एक यात्री ने कहा "जो दौर चल रहा है वो दिन दूर नहीं जब पार्लियामेंट में मिर्च पाउडर उछाला जायेगा।" जिस तरह संसद से लेकर अब सुप्रीम कोर्ट तक में जो हरकतें हो रही है वास्तव में इन सबके लिए चिंता का विषय है। संसद में पेपर उछाले जाते हैं, टेबल पर खड़े होकर ऐसे नारेबाजी होती है जैसे कोई गली का गुंडा हो और सदन अध्यक्ष तमाशबीनों की तरह देखते रहता है, क्यों? क्यों नहीं मार्शल को बुलाकर सदन से बाहर फेंका जाता? क्यों नहीं ऐसे उप्रदवी सदस्यों को सदन से निष्काषित किया जाता? इसीलिए दोषियों को पालने में ये दोनों संस्थाएं जिम्मेदार है। नेताओं को प्रसाद की तरह जमानत दी जाती है। और जमानत देने के बाद फाइल ठंठे बस्ते में पटक जाती है। कानून मंत्री और संसद भी बेसूद हो कर सोई पड़ी रहती है। क्या देश में सफेदपोशी गुंडों का राज होगा?
सुप्रीम कोर्ट का अपमान करने वाले कार्य वैसे तो सहन नहीं किए जाने चाहिए लेकिन हर मामले को देखने के लिए एक ही मापदंड होना चाहिए।
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जुलाई 10 को सुप्रीम कोर्ट में वकील प्रबल प्रताप ने एक याची के तौर पर जिरह करते हुए जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अलोक अराधे को कहा कि “माई जुडिशल सर्वेंट, मैं तुम्हे आदेश देता हूं कि तुम लखनऊ के एसपी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश दो। इस पर जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि तुम मुझे आदेश दे रहे हो। याचिकाकर्ता ने कहा कि बस इतना ही हमारी तरफ से था, बाकी सब रिकॉर्ड पर है। इसके साथ ही उसने न्यायाधीश के लिए अपशब्द कहते हुए फ़ाइल और दस्तावेज़ पीठ की तरफ उछाल दिए।
कुछ जगह यह रिपोर्ट किया गया है कि प्रबल प्रताप ने फ़ाइल और दस्तावेज़ फेंकते हुए कहा -”ये दे देना उस (गाली) CJI को”। न्यायाधीशों ने यह उसकी निराशा (frustration) कहते हुए कोई कार्रवाई नहीं की। उसने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया और पूछताछ कर रही है।
अगर प्रबल प्रताप वकील है जैसा कई जगह बताया गया है तो अभी तक बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) ने उसका लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने उसकी सदस्य्ता रद्द क्यों नहीं की और इलाहाबाद बार एसोसिएशन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दोनों माननीय जजों की तरफ से कोई उत्तेजनात्मक बात नहीं कही गई परंतु 6 दिसंबर 2025 को वकील राकेश किशोर का तत्कालीन चीफ जस्टिस बीआर गवई पर भड़काना तो हर तरह से जायज था। लेकिन BCI ने तत्काल उसका लाइसेंस रद्द कर 71 वर्षीय वकील किशोर की प्रैक्टिस पर आजीवन प्रतिबन्ध लगा दिया और SCBA ने भी उसकी सदस्य्ता रद्द कर दी।
चीफ जस्टिस गवई एक बौद्ध हैं और उन्होंने खजुराहो के मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति को ठीक करने की आदेश मांगने वाली याचिका पर याचिकाकर्ता से कहा कि भगवान विष्णु के पास जाओ, वो ही कुछ कर सकते हैं। एक अल्पसंख्यक समुदाय के जज ने खुलेआम सनातन धर्म और भगवान विष्णु का अपमान किया जिसे देख कर वकील राकेश किशोर का खून खौल गया और उन्होंने चीफ जस्टिस की तरफ जूता फेंकने की कोशिश की। जूता फ़ेंक पाए या नहीं कोई नहीं जानता।
चीफ जस्टिस गवई ने भी राकेश किशोर के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया था लेकिन उनके देखते देखते BCI और SCBA ने उसके प्रैक्टिस पर पाबंदी लगा कर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी। इससे बड़ी कार्रवाई और क्या हो सकती थी।
मतलब गवई साहब कोई कार्रवाई न करके बड़प्पन का सबूत देना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें BCI और SCBA को भी रोकना चाहिए था। हो सकता है राकेश किशोर को आभास रहा हो कि सनातन धर्म के लिए ऐसे कार्य की उन्हें क्या सजा भुगतनी पड़ सकती है और इसलिए उन्होंने सनातन धर्म के लिए अपनी यह क़ुरबानी दे दी।
गवई साहब का बयान कोई नई बात नहीं है। आए दिन अदालतों में बहुत कुछ कहा जाता है जो नाकाबिले बर्दाश्त होता है और किसी की भी जीवन बर्बाद कर सकता है। याद तो होगा आज के चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जब उन्होंने जस्टिस परदीवाला के साथ मिलकर नूपुर शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे भयानक Hate Speech दी थी और उसका करियर चौपट कर दिया था जबकि नूपुर को उकसाने वाले और भगवान शंकर का अपमान करने वाले तस्लीम रहमानी के खिलाफ न तो कोई एक शब्द बोला और न कोई कार्रवाई करने के आदेश दिए और आज भी नूपुर शर्मा खौफ के साये में जी रही है सुरक्षा कर्मियों को साथ लेकर।
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