वकील प्रबल प्रताप का अपराध क्या राकेश किशोर से कम है क्या जो BCI ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की

सुभाष चन्द्र

लगभग 16/17 साल की बात है, बस में यात्रा करते दो यात्री आपस में बातचीत कर रहे थे, बातचीत करते-करते एक यात्री ने कहा "जो दौर चल रहा है वो दिन दूर नहीं जब पार्लियामेंट में मिर्च पाउडर उछाला जायेगा।" जिस तरह संसद से लेकर अब सुप्रीम कोर्ट तक में जो हरकतें हो रही है वास्तव में इन सबके लिए चिंता का विषय है। संसद में पेपर उछाले जाते हैं, टेबल पर खड़े होकर ऐसे नारेबाजी होती है जैसे कोई गली का गुंडा हो और सदन अध्यक्ष तमाशबीनों की तरह देखते रहता है, क्यों? क्यों नहीं मार्शल को बुलाकर सदन से बाहर फेंका जाता? क्यों नहीं ऐसे उप्रदवी सदस्यों को सदन से निष्काषित किया जाता? इसीलिए दोषियों को पालने में ये दोनों संस्थाएं जिम्मेदार है। नेताओं को प्रसाद की तरह जमानत दी जाती है। और जमानत देने के बाद फाइल ठंठे बस्ते में पटक जाती है। कानून मंत्री और संसद भी बेसूद हो कर सोई पड़ी रहती है। क्या देश में सफेदपोशी गुंडों का राज होगा?   

सेम ओंन यू (ले लोटा)
इन जहीलों को समझना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट कोई चौपाल, चुनावी मंच या सड़क का धरना स्थल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में यह घटना शुक्रवार की सुबह करीब 11 बजे जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने हुई। याचिकाकर्ता, जिसकी पहचान प्रबल प्रताप के तौर पर हुई, बेंच के सामने पेश हुआ और खुद को संप्रभु बताया और जजों को "न्यायिक सेवक" कहकर संबोधित करते हुए उसने कहा, "मिस्टर न्यायिक सेवक, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के ASP के खिलाफ साइबर क्राइम सिंडिकेट चलाने के लिए FIR दर्ज करने का आदेश दें।"
वह पहले भी व्यक्तिगत रूप से (Petitioner-in-Person) इलाहाबाद हाईकोर्ट में उपस्थित होकर मुकदमा लड़ चुके हैं। उदाहरण के लिए, उनकी Criminal Misc. Writ Petition No. 2989 of 2026 में भी रिकॉर्ड पर "Counsel for Petitioner: In Person" दर्ज है
यदि कोई व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के भीतर खड़े होकर न्यायाधीशों को आदेश देने की मुद्रा में कहे—"आप इसके खिलाफ FIR दर्ज करने का डायरेक्शन दीजिए"—और कागज़ लहराकर न्यायालय पर दबाव बनाने का प्रयास करे, तो यह न्यायिक मर्यादा की खुली अवमानना जैसा आचरण प्रतीत होता है।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी व्यक्ति की आवाज़ की ऊँचाई, आक्रोश या दबाव से नहीं, बल्कि संविधान, कानून और न्यायिक सिद्धांतों से संचालित होता है।
अदालत में आदेश नहीं दिए जाते, प्रार्थना की जाती है।
दबाव नहीं बनाया जाता, विधिक तर्क दिए जाते हैं।
कागज़ लहराने से न्याय नहीं मिलता, साक्ष्य और कानून से न्याय मिलता है।
यदि अदालतों में भी लोग न्यायाधीशों को निर्देश देने लगें, तो वह न्यायिक व्यवस्था नहीं, भीड़तंत्र की शुरुआत होगी।

न्यायालय की गरिमा लोकतंत्र की रीढ़ है। उसकी मर्यादा का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

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चर्चित YouTuber 
सुप्रीम कोर्ट का अपमान करने वाले कार्य वैसे तो सहन नहीं किए जाने चाहिए लेकिन हर मामले को देखने के लिए एक ही मापदंड होना चाहिए

जुलाई 10 को सुप्रीम कोर्ट में वकील प्रबल प्रताप ने एक याची के तौर पर जिरह करते हुए जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अलोक अराधे को कहा कि “माई जुडिशल सर्वेंट, मैं तुम्हे आदेश देता हूं कि तुम लखनऊ के एसपी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश दो इस पर जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि तुम मुझे आदेश दे रहे हो याचिकाकर्ता ने कहा कि बस इतना ही हमारी तरफ से था, बाकी सब रिकॉर्ड पर है इसके साथ ही उसने न्यायाधीश के लिए अपशब्द कहते हुए फ़ाइल और दस्तावेज़ पीठ की तरफ उछाल दिए 

कुछ जगह यह रिपोर्ट किया गया है कि प्रबल प्रताप ने फ़ाइल और दस्तावेज़ फेंकते हुए कहा -”ये दे देना उस (गाली) CJI को” न्यायाधीशों ने यह उसकी निराशा (frustration) कहते हुए कोई कार्रवाई नहीं की उसने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया और पूछताछ कर रही है

अगर प्रबल प्रताप वकील है जैसा कई जगह बताया गया है तो अभी तक बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) ने उसका लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने उसकी सदस्य्ता रद्द क्यों नहीं की और इलाहाबाद बार एसोसिएशन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? 

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दोनों माननीय जजों की तरफ से कोई उत्तेजनात्मक बात नहीं कही गई परंतु 6 दिसंबर 2025 को वकील राकेश किशोर का तत्कालीन चीफ जस्टिस बीआर गवई पर भड़काना तो हर तरह से जायज था लेकिन BCI ने तत्काल उसका लाइसेंस रद्द कर 71 वर्षीय वकील किशोर की प्रैक्टिस पर आजीवन प्रतिबन्ध लगा दिया और SCBA ने भी उसकी सदस्य्ता रद्द कर दी 

चीफ जस्टिस गवई एक बौद्ध हैं और उन्होंने खजुराहो के मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति को ठीक करने की आदेश मांगने वाली याचिका पर याचिकाकर्ता से कहा कि भगवान विष्णु के पास जाओ, वो ही कुछ कर सकते हैं एक अल्पसंख्यक समुदाय के जज ने खुलेआम सनातन धर्म और भगवान विष्णु का अपमान किया जिसे देख कर वकील राकेश किशोर का खून खौल गया और उन्होंने चीफ जस्टिस की तरफ जूता फेंकने की कोशिश की जूता फ़ेंक पाए या नहीं कोई नहीं जानता

चीफ जस्टिस गवई ने भी राकेश किशोर के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया था लेकिन उनके देखते देखते BCI और SCBA ने उसके प्रैक्टिस पर पाबंदी लगा कर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी इससे बड़ी कार्रवाई और क्या हो सकती थी 

मतलब गवई साहब कोई कार्रवाई न करके बड़प्पन का सबूत देना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें BCI और SCBA को भी रोकना चाहिए था हो सकता है राकेश किशोर को आभास रहा हो कि सनातन धर्म के लिए ऐसे कार्य की उन्हें क्या सजा भुगतनी पड़ सकती है और इसलिए उन्होंने सनातन धर्म के लिए अपनी यह क़ुरबानी दे दी

गवई साहब का बयान कोई नई बात नहीं है आए दिन अदालतों में बहुत कुछ कहा जाता है जो नाकाबिले बर्दाश्त होता है और किसी की भी जीवन बर्बाद कर सकता है याद तो होगा आज के चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जब उन्होंने जस्टिस परदीवाला के साथ मिलकर नूपुर शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे भयानक Hate Speech दी थी और उसका करियर चौपट कर दिया था जबकि नूपुर को उकसाने वाले और भगवान शंकर का अपमान करने वाले तस्लीम रहमानी के खिलाफ न तो कोई एक शब्द बोला और न कोई कार्रवाई करने के आदेश दिए और आज भी नूपुर शर्मा खौफ के साये में जी रही है सुरक्षा कर्मियों को साथ लेकर

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