मोहन भागवत जी ने जीवन दर्शन विस्तार से समझाया; नहीं हिंदू राष्ट्र की बात की और न मुसलमानों के लिए कुछ कहा

सुभाष चन्द्र
मैंने मोहन भागवत जी का अगस्त 29 मेडिसन स्क्वायर में दिया हुआ पूरा भाषण सुना उन्होंने मानवता और मानव के जीवन दर्शन का व्याख्यान किया और कहीं भी न हिंदू राष्ट्र की बात की और न एक शब्द मुसलमानों के लिए कहा लेकिन फिर भी प्रिंट मीडिया ने अपने शब्द उनके मुंह में घुसेड़ दिए कि उन्होंने कहा कि मुसलमानों भारत से भगाने की इच्छा रखने वाले हिंदू नहीं है जबकि यह बात उन्होंने कही ही नहीं चाहे तो कोई उनका भाषण यूट्यूब पर सुन सकता है। 

मीडिया की इस शरारत को देख लगता है मीडिया आरएसएस विरोधियों की तरह संघ का विरोधी है। क्या कभी किसी पार्टी या मीडिया को मुस्लिम लीग, हिन्दू उत्सवों पर पत्थरबाज़ी करने वालों का विरोध करते देखा है? क्योकि इन लोगों ने माँ का दूध ही नहीं पिया।   

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चर्चित YouTuber 
भागवत जी के व्याख्यान में एक बहुत विशेष बात थी जो उन्होंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से कही कि अमेरिका आप की कर्मभूमि है, आपको इसके प्रति निष्ठावान होना चाहिए जन्मभूमि/मातृभूमि के लिए कुछ कर सकते हो तो करो लेकिन जन्मभूमि/मातृभूमि आपसे यह अपेक्षा नहीं करती यह संदेश हर देश के लोगों के लिए था

उनके भाषण में एक और वृतांत प्रमुख था उन्होंने कहा कि एक समय में कुछ लोग जीविका की तलाश में निकले सब आपस में जानते थे लेकिन उनमे दो विपरीत विचार थे एक विचार था जियो और जीने दो और दूसरा विचार था, हम जिएंगे लेकिन उनको रहने देंगे जो हमारे कहे अनुसार चलेंगे, अब इसका मतलब कोई भी समझ सकता है किसके लिए कहा होगा

भागवत जी के भाषण के प्रमुख बिंदु नीचे दिए है और कोई भी उनमें किसी प्रकार की कमी निकाल कर दिखा दे, अलबत्ता राहुल विंची जरूर उनके भाषण को नफरत भरा कह सकता है जबकि उसमें नफरत की कोई बात नहीं थी

“मानवता एक है, धर्म अलग-अलग हो सकते हैं”

उन्होंने कहा कि विभिन्न धर्मों और धार्मिक परंपराओं के बावजूद मानवता मूल रूप से एक है। उनके अनुसार सत्य एक है, लेकिन उसे समझने और उस तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं।

2. विविधता में हमारी एकता की सजावट है

उन्होंने विविधता को विभाजन का कारण नहीं बल्कि अंतर्निहित एकता का सौंदर्य और विस्तार बताया। विभिन्न समुदायों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों का सम्मान, संरक्षण और स्वीकार करना आवश्यक है।

3. “मैं” और “मेरा” की बजाय “हम” और “हमारा”

भाषण का एक महत्वपूर्ण संदेश था कि केवल व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना समस्याएं पैदा करती है, जबकि “हम” और “हमारा” की भावना समाधान की दिशा देती है।

4. धर्म का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं

उन्होंने कहा कि आज धर्म को अक्सर उसके rituals और बाहरी practices से पहचाना जाता है। उनके अनुसार कर्मकांड का अपना स्थान है, लेकिन धर्म का अंतिम उद्देश्य सत्य और उच्चतर आध्यात्मिक समझ की ओर ले जाना है।

5. हर व्यक्ति की गरिमा और समानता

उन्होंने मानव गरिमा और मनुष्यों की मूलभूत समानता पर जोर दिया। उनके अनुसार बाहरी भिन्नताएँ प्रकृति की विविधता का हिस्सा हैं और उनसे मानवता की मूल एकता समाप्त नहीं होती।

6. राजनीति से अधिक समाज की शक्ति

उन्होंने यह विचार भी रखा कि स्थायी और वास्तविक परिवर्तन केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि समाज के भीतर परिवर्तन और जन-सहमति से आता है।

7. सेवा कार्यों का उल्लेख

उन्होंने RSS के सेवा कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि सेवा कार्य लोगों के प्रति भेदभाव किए बिना किए जाते हैं।की 

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