पंजाब में भी ‘केजरी मॉडल’ के गुब्बारे की निकली हवा, वादों के भंवर में फंसे लाखों नाराज कर्मचारी


पंजाब में साल 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान ‘बदलाव’ की आंधी पर सवार होकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी और उसके बहुचर्चित ‘केजरी मॉडल’ की कलई अब पूरी तरह खुल चुकी है। मुफ्त बिजली और लोक-लुभावन गारंटी के विज्ञापनों की चमक के पीछे वित्तीय कुप्रबंधन का एक ऐसा दलदल तैयार हो गया है, जिसमें राज्य की रीढ़ कहे जाने वाले सरकारी कर्मचारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस प्रदेश को देश के सामने एक आदर्श गवर्नेंस मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था, आज उसी पंजाब के 3 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी सड़कों पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यह अभूतपूर्व संकट कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह उन झूठे चुनावी वादों, प्रशासनिक अहंकार और वित्तीय कंगाली का सीधा परिणाम है, जिसने पंजाब की प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह वेंटिलेटर पर लाकर खड़ा कर दिया है।

महा-हड़ताल ने आर्थिक रूप से पंगु बने राज्य की पोल खुली
राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए हवा में उछाले गए ‘केजरी मॉडल’ की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो पार्टी कल तक कर्मचारियों के हर धरने में जाकर उनके हक की वकालत करती थी, आज सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही वह उनके प्रति क्रूर और उदासीन हो गई है। इससे साफ है कि कर्मचारियों के हक की बातें सिर्फ झूठा स्वांग भर ही थीं। मुख्यमंत्री भगवंत मान का आंदोलनकारी कर्मचारियों से बात करने से साफ इनकार कर देना और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकियां देना साफ दर्शाता है कि ‘आप’ सरकार संवादहीनता के उस दौर में पहुंच चुकी है, जहां जनता और कर्मचारियों की जायज मांगें भी उसे गुनाह नजर आती हैं। 27 अगस्त की ऐतिहासिक महा-हड़ताल ने यह साबित कर दिया है कि पंजाब का कर्मचारी अब केवल कागजी आश्वासनों से बहलने वाला नहीं है। मुफ्तखोरी की राजनीति और बजटीय प्राथमिकताओं को दरकिनार करने के कारण समृद्ध राज्य आर्थिक रूप से पंगु हो चुका है और उसके कर्मचारी अपने ही हक के लिए लाठियां और पानी की बौछारें सहने को विवश हैं।

भगवंत मान सरकार ने चार सालों में केवल आश्वासन दिए
पंजाब की आप सरकार पर सवालिया निशान यह है कि आखिरकार राज्य के कर्मचारी इतने उग्र क्यों हो रहे हैं। वे सामूहिक अवकाश लेकर पूरे राज्य को ठप करने जैसा आत्मघाती कदम उठाने को क्योकर विवश हो रहे हैं? इसका सीधा-सा जवाब है कि लगातार टूटते वादे और आर्थिक शोषण। कर्मचारियों का आरोप है कि भगवंत मान सरकार ने पिछले चार सालों में केवल आश्वासन दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर एक भी वित्तीय मांग को पूरा नहीं किया। यह आंदोलन तब और भड़क उठा जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा कर्मचारियों के हक में फैसला दिए जाने के बावजूद मान सरकार ने उनके बकाया भत्तों का भुगतान नहीं किया। इसे कर्मचारी न्यायपालिका का अपमान और अपने अधिकारों पर डकैती मान रहे हैं।

कर्मचारियों को न महंगाई भत्ता न ही मिल रहा पूरा वेतन
सबसे अहम बात यह है कि राज्य के कर्मचारी संगठनों (सांझा मुलाजम मंच और पेंशनर्स फ्रंट) की मांगें कोई नई या नाजायज नहीं हैं। उनकी सबसे पहली मांग है पिछले लंबे समय से लंबित 18 प्रतिशत महंगाई भत्ता (DA) और छठे वेतन आयोग (6th Pay Commission) के बकाए का तुरंत भुगतान किया जाए। यह लगातार लेटलतीफी के चलते करीब 20,161 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू रहा है। इसके अलावा, पुरानी पेंशन योजना (OPS) की पूर्ण बहाली, कच्चे और कॉन्ट्रैक्ट (ठेके) पर काम कर रहे कर्मचारियों का नियमितीकरण, और 17 जुलाई 2020 के उस काले नोटिफिकेशन को रद्द करना जिसके तहत नए भर्ती कर्मचारियों को केवल मूल वेतन दिया जा रहा है। ये ऐसी मांगें हैं जिन पर आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए कर्मचारियों के साथ धरने पर बैठकर सहमति जताई थी।

‘केजरी मुफ्त मॉडल’ के चलते सरकार पर कर्ज का बोझ
सरकार की नीयत पर उठने वाला बड़ा सवाल यह है कि जो सरकार विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहा रही है, वह अपने कर्मचारियों की मांगें पूरी क्यों नहीं कर पा रही? असल में, ‘केजरी मॉडल’ का पूरा ढांचा मुफ्त बिजली, महिलाओं को भत्ते और अन्य लोक-लुभावन गारंटियों पर टिका है। इन गारंटियों को पूरा करने के चक्कर में पंजाब का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है। राज्य पर कर्ज का बोझ लगातार अधिक से अधिक होते हुए अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। सरकार के पास दैनिक प्रशासनिक खर्चे और कर्मचारियों को समय पर वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं, तो वह 20 हजार करोड़ से अधिक का डीए बकाया कहां से चुकाएगी? अपनी इसी वित्तीय विफलता को छिपाने के लिए सरकार कभी अदालतों का बहाना बनाती है तो कभी केंद्र सरकार पर फंड रोकने का आरोप लगाती फिरती है।

चपेट में कई प्रमुख विभाग: सचिवालय से अस्पताल तक ठप
राज्य के कर्मचारियों की इस महा-हड़ताल का असर पंजाब के किसी एक कोने में नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर देखने को मिल रहा है। पंजाब सिविल सचिवालय के कर्मचारी, डीसी दफ्तरों के कर्मचारी, राजस्व विभाग के तहसीलदार (जो पहले से ही सतर्कता छापों के खिलाफ हड़ताल पर थे), शिक्षा विभाग के सरकारी शिक्षक और पंजाब रोडवेज के कर्मचारी समेत कई संगठनों के कर्मचारी इसमें शामिल हैं। सबसे दुखद स्थिति स्वास्थ्य विभाग की है, जहां सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के हड़ताल पर जाने के कारण ओपीडी सेवाएं पूरी तरह बंद रहीं। गरीब मरीज इलाज के लिए दर-दर भटकते रहे, लेकिन भगवंत मान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है।

आप के चुनावी वादों की फेहरिस्त अब तो ‘जुमला’ बन गई
साल 2022 के चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने पंजाब के हर वर्ग के कर्मचारियों से बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्होंने कहा था कि सरकार बनते ही कैबिनेट की पहली बैठक में सभी कच्चे कर्मचारियों को पक्का कर दिया जाएगा। उन्होंने हिमाचल और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर पंजाब में भी पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करने का ढिंढोरा पीटा था। लेकिन सत्ता में आने के बाद ओपीएस के नाम पर केवल एक कागजी अधिसूचना जारी करके छोड़ दी गई, जिसे आज तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने की फाइलें आज भी सचिवालय की अलमारियों में धूल फांक रही हैं।

पंजाब के इतिहास में यह पहली बार सड़कों पर इतने कर्मचारी – भाजपा
भाजपा पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने राज्य में कर्मचारियों और पेंशनरों द्वारा की गई महा-हड़ताल को लेकर आम आदमी पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि कर्मचारी हर सरकार की रीढ़ की हड्डी होते हैं, लेकिन पंजाब के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि लाखों की संख्या में सरकारी कर्मचारी और पेंशनर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हुए हैं। ढिल्लों ने आरोप लगाया कि ‘आप’ सरकार ने कर्मचारियों का लगभग 15,000 करोड़ रुपये का महंगाई भत्ता नहीं देकर उनके साथ सीधे तौर पर धोखा किया है। माननीय हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सरकार डीए जारी करने से बच रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने दूसरे राज्यों के चुनावों में वोट बटोरने के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च कर दिए, लेकिन अपने ही राज्य के कर्मचारियों को उनका हक देने के समय खजाना खाली होने का बहाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा कर्मचारी संगठनों के साथ तय बैठकों से दो-दो बार पीछे हटना बेहद निंदनीय है। सरकार की इस टालमटोल की नीति के कारण आज आम जनता को सरकारी कार्यालयों में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी भगवंत मान सरकार की है।

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