समाज को कहां ले जाना चाहती है न्यायपालिका?

सुभाष चन्द्र

हाल ही में कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने tution center में छात्राओं से कथित छेड़छाड़ और स्थानीय लोगों पर हमले के मामले में FIR दर्ज करने से मना करते हुए कहा कि छात्राओं से छेड़छाड़ के मामले सामान्य है और किसी विशेष घटना या पीड़िता का उल्लेख नहीं किया गया है। ऐसे में व्यापक आरोपों से संघये अपराध का पता नहीं चलता मतलब छात्राओं से छेड़छाड़ आम बात है

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अगस्त 20 को दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है लिव-इन रिलेशनशिप शादी जैसा है, उसमे माता पिता दखल नहीं दे सकते मर्जी से शादी करने वाले बालिगों को जाति, पंथ, रंग, धर्म और आस्था से परे मान्यता दी जाती है और सामाजिक नैतिकता व पूर्वाग्रहों के कारण उनके मौलिक अधिकारों को कम करना किसी को व्यक्तिगत पहचान से वंचित करना है 

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा बालिग होने के नाते मर्जी से साथ रहने की स्थिति भी शादी जैसी ही होती है 

आप शादी करने वालों के मौलिक अधिकारों की बराबरी लिव-इन रिलेशन में रहने वालों से कैसे कर सकते हैं?

लेकिन फिर लिव-इन में रहने वाली लड़कियों को कई साल बाद बलात्कार का आरोप तो नहीं लगाना चाहिए जो आजकल अक्सर देखने को मिल रहे हैं

कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुईया के पास ऐसा ही एक रेप का केस आया जिसमें लड़की ने लिव-इन रिलेशन में रहने के बाद रेप का आरोप लगाया था जजों ने कहा 'यह सहमति से होता है। हम पुराने जमाने के हो सकते हैं, लेकिन शादी से पहले लड़का और लड़की बिल्कुल अजनबी होते हैं। उन्हें शादी से पहले फिजिकल रिलेशनशिप बनाने में सावधानी बरतनी चाहिए जिस महिला की बात हो रही है, वह शख्स के साथ दुबई जाने के लिए कैसे मान गई, जहां दोनों के बीच फिजिकल रिलेशनशिप बने? ये द्वापर युग नहीं जहां तथाकथित गंधर्व विवाह करने वाली शकुंतला को महलों में प्रवेश मिल जाए और उसके बेटे को सिंहासन मिले  

बिना जाने कि गंधर्व कौन होते हैं आज कल अदालत लिव-इन रिलेशन को गंधर्व विवाह के समान बता देते हैं माननीय जजों को यह इल्म नहीं है कि शकुंतला ने अपना रिश्ता निभाया लेकिन आजकल के कथित गंधर्व विवाह करने वालो का एक साल का भी भरोसा नहीं कब कौन छोड़ कर चला जाए 

आजकल हर अदालत लिव-इन रिलेशन पर अपनी अपनी समझ से निर्णय दे रही हैं इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 20 मार्च, 2026  को एक फैसले में कहा “तलाक़ के बिना लिव-इन में रहना अपराध है” और उसी हाई कोर्ट ने 25 मार्च को एक अन्य फैसले में कहा कि “शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना अपराध नहीं है” अब बताइए क्या सही है?

गुजरात हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि “सात फेरे की रस्म नहीं निभाई गई हैं तो सर्टिफिकेट होने के बावजूद हिंदू विवाह मान्य नहीं होगा”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आर्य समाज द्वारा जारी किए गए शादी के प्रमाणपत्र कानूनी और वैधानिक रूप से मान्य नहीं हैं आर्य समाज को Marriage Certificate जारी करने का अधिकार नहीं है बेशक सात फेरे ही क्यों न हो गए हों लेकिन यह नियम काजी द्वारा निकाह पढ़वाने पर लागू नहीं किये हकीकत यह है कि सनातन पद्धति पर ऊँगली उठाना आसान है लेकिन इस्लाम पर कुछ बोलने पर अदालतों में भी लगभग लकवा लग जाता है। 

एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा चाहे बच्चा पत्नी के अवैध संबंधों से पैदा हुआ हो उसका भरण पोषण पत्नी के पति को ही करना पड़ेगा एक दूसरे केस में पुरुष ने बच्चा अपना मानने से इंकार कर दिया और निजता भंग होने का आधार बना कर DNA सैंपल देने से मना कर दिया उस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता से ज्यादा जरूरी है बच्चे के पिता का पता होना

अब बताइए, जो बच्चा अवैध संबंधों से हुआ, उसका भरण पोषण बाप करेगा जबकि पता है वो उसका बच्चा नहीं है और दूसरी तरफ आप DNA टेस्ट चाहते हैं पता करने के लिए कि बच्चा अवैध है या नहीं 

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