विपक्ष का एक ही एजेंडा ! संसद चलने मत दो! जनता जाए भाड़ में


विपक्ष को जनता का डर नहीं लगता या जनता को मूर्ख समझ लिया है?
कुछ समय से विपक्ष का एक ही एजेंडा दिखाई दे रहा है! संसद चलने मत दो!
अरे भाई, जनता ने आपको संसद में नारे लगाने और हंगामा करने के लिए नहीं भेजा है। सरकार से सवाल है तो पूछिए, सरकार से असहमति है तो बहस कीजिए, कोई गंभीर मुद्दा है तो उसके तथ्य रखिए।
लेकिन संसद ही नहीं चलने देंगे तो फिर जनता पूछेगी।
आपको संसद में बहस करने का जनादेश मिला है या संसद को बंधक बनाने का?
दिलचस्प बात यह है कि जो लोग हर वक्त लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देते हैं, वही संसद की कार्यवाही रोकने को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि समझ रहे हैं।
शायद उन्हें लगता है कि जनता कुछ देखती-सुनती नहीं है और उसे आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है।
लेकिन अब जनता पहले वाली जनता नहीं है। वह देख रही है कि कौन काम करना चाहता है, कौन सवाल पूछना चाहता है और कौन सिर्फ हंगामा करके कैमरे में दिखना चाहता है।
अगली बार चुनाव में जनता जब हिसाब-किताब करेगी, तब शायद समझ आएगा कि संसद को ठप करना विपक्ष की जीत नहीं, जनता के भरोसे की हार है।
राहुल गांधी के अहितकारी कार्यों की लंबी फेहरिस्त
पिछले दस वर्षों में देश ने विकास के कई नए आयाम देखे हैं, लेकिन विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे राहुल गांधी की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके समर्थक एक भी ठोस कार्य गिनाने में असमर्थ रहते हैं जो देशहित में किया गया हो, लेकिन अहित की सूची इतनी लंबी है कि एक लेख कम पड़ जाए।
पहली फेहरिस्त है - सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा पर अविश्वास। जब देश की सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके दुश्मन को सबक सिखाया, तब राहुल गांधी ने सबसे पहले सबूत मांग कर सेना के शौर्य का अपमान किया। गलवान में हमारे वीर जवानों के बलिदान के बाद भी उन्होंने सेना के बजाय चीन के नैरेटिव को मजबूत करने वाले बयान दिए। यह देश की सुरक्षा के साथ सीधा अहित है।
दूसरा बड़ा अहित है - विदेशी धरती पर भारत को बदनाम करना। लंदन, अमेरिका और यूरोप के मंचों से उन्होंने बार-बार कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, संसद में बोलने नहीं दिया जाता, अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश का वे सांसद हैं, उसी देश की छवि को विदेशों में धूमिल करना किस श्रेणी का देशहित है?
तीसरा है - हर जनहितकारी योजना का बिना वजह विरोध। चाहे वह धारा 370 हटाना हो, राम मंदिर निर्माण हो, जीएसटी हो, नोटबंदी हो, तीन तलाक पर कानून हो या CAA हो - उन्होंने हर फैसले का विरोध केवल विरोध के लिए किया, समाज में भ्रम और विभाजन फैलाया। धारा 370 हटने से जम्मू-कश्मीर में शांति आई, लेकिन कांग्रेस ने आज तक उसका समर्थन नहीं किया।
चौथा है - झूठ और भ्रम की राजनीति। राफेल जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर उन्होंने "चौकीदार चोर है" जैसा नारा दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया। बाद में उन्हें माफी तक मांगनी पड़ी। ऐसे झूठे प्रचार से देश की रक्षा सौदों की विश्वसनीयता को चोट पहुंचती है।
पांचवां है - टुकड़े-टुकड़े गैंग और अराजक तत्वों को समर्थन। JNU में देश-विरोधी नारे लगने पर वहां पहुंच कर समर्थन देना, किसानों के नाम पर हुए आंदोलन में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप पर चुप रहना, यह सब उनके राजनीतिक एजेंडे को दिखाता है।
दस साल में देश आगे बढ़ा है, पर राहुल गांधी की राजनीति वहीं अटकी है - नकारात्मकता, वंशवाद, और केवल मोदी विरोध। देशहित में एक कार्य पूछो तो सन्नाटा है, और अहित की गिनती करो तो फेहरिस्त खत्म होने का नाम नहीं लेती।
वही आंदोलन है, वही जेनजी, वही मांगे... ऊपर के आदेश से बंधे वही पुलिसवाले... लाठी भी वही, पानी की बौछारें भी वही, अश्रुगैस के गोले भी वैसे ही... अटल जी ने कहा था, "सत्ता का चरित्र लगभग एक सा ही होता है।" ठीक ही तो कहा था। पर इन सब के बीच कुछ है जो अलग है...
लाठी खाने के बाद भी बच्चे मुख्यमंत्री की मां को गाली नहीं दे रहे। पुलिस के जवानों का भद्दा मजाक नहीं उड़ाया जा रहा है। उन्हें घेर कर मारा पीटा नहीं जा रहा है। इंस्टा की रील के लिए नंगे नाचने वाले कथित इन्फ्लुएंसर अपने बाप से अधिक उम्र के किसी पुलिस वाले के ऊपर अभद्र टिप्पणियां नहीं कर रहे। क्यों? क्योंकि लड़कों ने आंदोलन में बामी अभद्रों का प्रवेश नहीं होने दिया।
आधी रात को हुए लाठी चार्ज में अनेक बच्चों की हड्डियां टूटी हैं। रांची के अस्पतालों में छात्रों की कराह गूंज रही है। उसके बाद भी कहीं गाली गलौज नहीं है, अश्लील पोस्टर नहीं हैं।
पिछले दिनों पटना में लड़कों पर पानी की बौछार हुई थी, तब वे नाच रहे थे। झारखंड वाले बच्चे भी पानी की बौछारों पर नाचने लगे थे। यह खुश होने की बात तो नहीं है पर एक हल्की मुस्कुराहट तैर गई थी। जवानी का उत्साही मन, पीड़ा में आनंद ढूंढ लेने वाला भारत भाव... सरकारों को इन बच्चों की बात सुन लेनी चाहिए। वैसे भी ये न किसी का इस्तीफा मांग रहे हैं, न मुख्यमंत्री को हटा कर खुद गद्दी पर बैठने का ख्वाब लेकर गए हैं। परीक्षा की गड़बड़ी का मामला है, बात इतनी भी बड़ी नहीं कि न सुनी जा सके।
जंतर मंतर के आंदोलन के समय उग्र हो गए वामी झारखंड के बच्चों के लिए नहीं बोलेंगे। बोलते, पर आंदोलन की डोर उनके हाथ में होती तब बोलते... आंदोलन शिक्षा से हट कर LGBTQ के विशेषाधिकारों पर, आजादी मांगने पर, पाकिस्तानी प्रेम पर, देश तोड़ने के नारे लगाने वालों के समर्थन पर, सनातन परम्पराओं को गाली देने पर होता तब बोलते... लेकिन झारखंड के बच्चों ने उनके एजेंट को खदेड़ दिया, वे अड़ गए कि यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं को केंद्र में रख कर ही होगा, फिर वे क्यों ही बोलें। उनका भी दोष नहीं, यह उनका मामला ही नहीं है।
एक प्रश्न हम जैसों से भी हो सकता है कि हम जंतर मंतर वालों के साथ नहीं थे तो इनके साथ क्यों है? इसका उत्तर बहुत सहज है। ये बच्चे भी कल उसी अभद्र भाषा पर उतर जाएं, वैसी ही गालीबाजी करने लगें तो इनके साथ भी कोई संवेदना नहीं रहेगी। वैसी भाषा जब हम अपने बच्चों की नहीं चाहते, अपने छात्रों से नहीं चाहते, तो दूसरे बच्चों की अभद्र भाषा का समर्थन कैसे कर सकते हैं?
झारखंड के बच्चों पर कल खूब लाठियां चली हैं। चलवाने वाले प्रसन्न ही होंगे। राहुल जी मंचो पर छात्रों से संवाद की नौटंकी कर रहे हैं, उनकी पुलिस निहत्थे बच्चों को लाठी से तोड़ रही है। यही राजनीति है...
केंद्र हो या राज्य, पेपर लीक और परिक्षाओं की अनियमितता माथे के कलंक जैसा है। इसका हल निकालना ही होगा... बाकी झारखंड के जेनजी को धन्यवाद कि उन्होंने विश्वास दिलाया, "देश का युवा अभद्र, अश्लील, फूहड़ नहीं है... जो थे, वे अपवाद थे।"

जनता को मूर्ख समझने की भूल मत कीजिए।  

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