अगस्त 22 को जस्टिस संजय करोल ने अपनी रिटायरमेंट के विदाई समारोह में कहा कि “जज कोई भगवान नहीं होते, उनसे भी गलतियां हो सकती हैं, उनसे हर फैसला सही नहीं हो सकता लेकिन न्याय करने के लिए विनम्रता और मानवीय संवेदना का होना सबसे ज्यादा जरूरी है, संविधान हमसे सिर्फ कानून को सही ढंग से लागू करने के लिए नहीं कहता, बल्कि वह उसे न्यायपूर्ण ढंग से लागू करने के लिए कहता है; न्याय केवल शब्दों और वकीलों का खेल नहीं है बल्कि वह न्याय की उस पुकार को सुनने का नाम है जो अक्सर शब्दों के बीच की ख़ामोशी में छिपी होती है”।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
क्या किसी जज ने आज तक अपने किसी फैसले को गलत मानकर उसे वापस लिया है या गलती भी मानी है? आप कह रहे हैं कि न्याय केवल शब्दों और वकीलों का खेल नहीं है जबकि सच यही है कि आज न्याय शब्दों और वकीलों का खेल बनकर रह गया है।
संविधान तो एक ही है लेकिन यह शब्दों का ही तो खेल है वकीलों की बहसबाजी से अनेक कानूनों की व्याख्या ही बदल दी जाती है। कानूनों में सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों ने इतने बदलाव किए हैं कि उन बदलावों को अगर संग्रहित किया जाए कई संविधान लिखे जा सकते हैं। कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है। समाज के प्रति संवेदनहीन अगर कोर्ट फैसला करे कि महिला को शादी के बाहर “sexual autonomy” का अधिकार है तो क्या समाज में बिखराव नहीं होगा।
महिलाओं को sex worker के रूप में काम करना जब व्यवसाय बता दिया तो समाज कहां जाएगा?
सुप्रीम कोर्ट के जज को यह शक्ति संविधान नहीं देता कि वह राष्ट्रपति को आदेश दे फिर भी ऐसे आदेश दिए गए लेकिन न जजों ने कोई माफ़ी मांगी और न फैसला वापस लिया। नूपुर शर्मा को भरी कोर्ट में ऐसा अपमानित किया गया कि वो वकील होने के बाद भी आज घर बैठी है। क्या किसी जज ने अपनी गलती स्वीकार की?
जब तक जज कुर्सी पर होते हैं कॉलेजियम सिस्टम बहुत अच्छा लगता है लेकिन रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के कई जज इस सिस्टम में कमियां निकाल चुके हैं। फिर क्यों नहीं हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति UPSC परीक्षा प्रणाली से शुरू क्यों नहीं की जा सकती? वकीलों को सीधे हाई कोर्ट का जज बनाने में भ्रष्टाचार की दुर्गंध आती है।
यशवंत वर्मा के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक आंतरिक समिति बनाने के सिवाय कुछ नहीं किया। कौन सा कानून कहता है कि लालू यादव को 32 साल की सजा होने पर भी जमानत पर मौज करने दी जाए। राहुल गांधी का जो केस सुप्रीम कोर्ट जाता है लटका दिया जाता है - “सारे मोदी चोर हैं” मामले में जस्टिस गवई ने उसकी दोषसिद्धि पर रोक लगाते हुए शब्दों की ही जादूगरी दिखाई थी और पूछा था कि सजा दो साल तक की दी जा सकती है तो अधिकतम सजा क्यों दी गई?
CJI को सरकार जो जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले देती है, उन पर क्या कार्रवाई की जाती है किसी को पता नहीं चलता क्योंकि न्यायपालिका ने सब कुछ अपने अधिकार क्षेत्र में लिया हुआ है।
आज 4 साल बाद सुप्रीम कोर्ट अपने ही PML एक्ट पर दिए गए फैसले की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई को तैयार हो गया है जबकि ED की शक्तियां पहले ही हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट ने क्षीण कर दी हैं।
“पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे”।

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