किसी आंदोलन के हिंसक होने पर पैलेट गन के प्रयोग के लिए प्रोटोकॉल बनाने से कोई लाभ नहीं होगा; सुरक्षाबलों के साथ जजों को ऐसे समय में खुद खड़ा होना चाहिए

सुभाष चन्द्र

जंतर मंतर पर चली पैलेट गन जिसे राहुल गाँधी शोर मचा रहे हैं, कोर्ट को पीड़ित से पूछना चाहिए कि पेलेट गन से एक साथ कितने छर्रे निकलते हैं? जब सारा मीडिया वहां मौजूद था तो किसी ने पेलेट गन चलते क्यों नहीं दिखाया? आदि आदि कई सवाल है जिन्हे सुनते ही राहुल और पीड़ित उल्टे पैर कोर्ट से भागेंगे। इतना ही नहीं उपद्रव करने वालों को तिलचट्टों को सपोर्ट करते INDI गठबंधन और आम आदमी पार्टी बीजेपी के गुंडे कहकर जनता को पागल बनाने वाले अब क्यों उन्ही गुंडों को बचाने में लगे हैं?      

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने जस्टिस (रिटायर्ड) सुभाष रेड्डी समेत 5 सदस्यीय समिति का गठन किया है। जिसमे अन्य सदस्य हैं, Justice Ravi Shankar Jha, Justice Shalinder Kaur, former CBI Director Rishi Kumar Shukla, and retired DGP Dr. L.R. Bishnoi.

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चीफ जस्टिस की पीठ ने कहा कि हम ऐसा प्रोटोकॉल बनाना चाहते हैं कि कब और कैसे पैलेट गन का प्रयोग किया जाए और समिति की अंतरिम रिपोर्ट ऐसा प्रोटोकॉल बनाने में मदद करेगी यानी 5 सदस्यीय टीम भी इस बारे में जांच करेगी

आंदोलन मौलिक अधिकार समझ कर शुरू किया जाता है और शांतिपूर्ण होने का ही दावा किया जाता है लेकिन वह आंदोलन कब हिंसक हो जाए कोई नहीं जानता सुरक्षाबलों को परिस्थिति के अनुसार तात्कालिक निर्णय लेने होते हैं कि कब लाठीचार्ज किया जाए, कब आंसू गैस छोड़ी जाए और कब पैलेट गन चलाई जाए 

दुश्मन आपके सामने बंदूक ताने आपको गोली मारने के लिए तैयार है तो आप उसकी गोली चलने से पहले उस पर गोली चलाने के स्वतंत्र होंगे 20 जुलाई के प्रदर्शन में दंगाइयों ने पुलिस को दुश्मन समझ कर हमला किया और प्रधानमंत्री मोदी को शत्रु समझ कर अपमानित करने वाली गालियां दी लेकिन फिर भी पुलिस ने संयम से काम लिया 

ऐसे में प्रोटोकॉल की किताब से काम चलाना है तो जजों को स्वयं सुरक्षाबलों के साथ खड़ा होकर देखना चाहिए कि लाठीचार्ज, आंसू गैस या पैलेट गन चलाने की नौबत आई या नहीं लेकिन कोई जज अदालत में बैठकर तो जांच के आदेश दे देगा कि पुलिस ने अत्यधिक बलप्रयोग किया या नहीं परंतु खुद पुलिस के साथ खड़े होने की हिम्मत नहीं करेगा

20 जुलाई को हुई हिंसा में पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2873 क्रिमिनल बैकग्राउंड के लोग घुस गए थे

समिति को इसकी भी जांच करने के लिए कहा गया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट को तो समिति से कहने की बजाय पुलिस को आदेश देने चाहिए थे कि ऐसे अपराधियों की सूची अदालत में जमा करे और अगर वो जमानत पर थे, तो उनकी जमानत सुप्रीम कोर्ट स्वतः ही रद्द कर देता

राज्यसभा के CPI(M) सांसद AA Rahim की PIL सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली जिसमें उन्होंने पुलिस द्वारा Facial Recognition Technology का इस्तेमाल किये जाने को चुनौती दी थी उनका कहना है कि biometric surveillance and the collection of protesters' data without consent गैर कानूनी है

जबकि पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा कि “the facial recognition system was used in a "legitimate state interest" to identify individuals with prior criminal records rather than conduct mass surveillance on ordinary protesters”.

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि पुलिस क्या जमानत पर छूटे हुए और अन्य दंगाइयों से पिटने और मरने के लिए बनी है? पुलिस वालों के भी मानवाधिकार हैं और जो पुलिस पर हमला करें उनके खिलाफ सबूत जुटाना पुलिस का काम है? अगर facial recognition system का उपयोग भी प्रदर्शनकारी से पूछ कर करना है तो फिर पुलिस के कंधों पर कानून व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी होनी ही नहीं चाहिए

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