15 अगस्त को जिस तरह सोनिया गांधी, राहुल विंची और खड़गे ने वंदे मातरम का कांग्रेस कार्यालय में अपमान किया, उसे देख कर लगता है कांग्रेस एक बार फिर भारत को विभाजित करना चाहती है। उसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लालकिले में भाषण का खड़गे और राहुल विंची ने बहिष्कार किया और यह दूसरा मौका था जब वे वहां नहीं गए। पिछले साल भी बहिष्कार किया था। हकीकत यह कि इस परिवार को लगता है कि हमें किसी भी सरकारी कार्यक्रम में पहली पंक्ति में जगह मिले जिस तरह यूपीए के समय मिलती थी।
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उसके बाद कांग्रेस कार्यालय में वंदे मातरम के दौरान राहुल, खड़गे और सोनिया गांधी आपस में बातचीत कर रहे थे और सोनिया गांधी वंदे मातरम का तीसरा छंद शुरू होने पर नाराज़ दिखाई दे रही थी, वह राष्ट्रगीत का घोर अपमान था।
जयराम रमेश सफाई दे रहे हैं कि सोनिया जी खड़गे के लिए कुर्सी का प्रबंध करने की कोशिश कर रही थीं क्योंकि उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। ऐसे प्रबंध समारोह से पहले ही कर लिए जाते हैं लेकिन नहीं किए गए।
पवन खेड़ा अपना राग अलाप रहा है कि 1937 में कांग्रेस अधिवेशन में निर्णय हो गया था कि गीत के पहले 2 छंद ही गाए जाएंगे। अरे भाई 90 साल पुराना राग क्यों सुना रहे हो, जो संसद का पास किया हुआ कानून राष्ट्रपति ने 4 दिन पहले साइन किया है, उसकी बात करो।
असली भांडा तो कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष ने फोड़ दिया जिसने माना कि उनकी नेता वंदे मातरम रोकने के लिए कह रही थी लेकिन फिर भी हमने पूरा गीत गाया और इस तरह हमने राष्ट्रगीत का कोई अपमान नहीं किया।
भाजपा के सदस्य विग्नेश शिशिर ने सोनिया गांधी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं पर केस दर्ज करने की बात कही है।
वंदे मातरम पर विवाद मुस्लिमों ने 1937 कांग्रेस अधिवेशन में उठाया। उसके पहले क्या मुस्लिमों को इस्लाम का ज्ञान नहीं था जो वंदे मातरम गाते थे। गूगल पर दिया गया है इस्लाम क्या कहता है?
इस्लाम में अपने वतन (मादरे वतन) से प्रेम करना और उसका सम्मान करना एक स्वाभाविक भावना है। इसे ईमान (विश्वास) का हिस्सा माना गया है। हदीस में पैगंबर मुहम्मद साहब के मदीना प्रेम का उल्लेख मिलता है।
वतन प्रेम के मुख्य बिंदु
वतन से मोहब्बत: पैगंबर मुहम्मद ने अपने जन्म स्थान मक्का और कर्मभूमि मदीना से गहरा प्रेम दिखाया;
ईमान का हिस्सा: अपनी जन्मभूमि के प्रति वफादारी और उसकी रक्षा करना अच्छे चरित्र की निशानी है;
सुरक्षा और भलाई: देश की शांति, सुरक्षा और उन्नति के लिए प्रयास करना हर नागरिक का कर्तव्य माना गया है।
फिर वो कौन से मुसलमान थे जो 1937 के पहले वंदे मातरम गाते रहे। 1920 के खिलाफत और Non Cooperation में (खिलाफत का भारत से कुछ लेना देना नहीं था) प्रख्यात मुस्लिम नेता कांग्रेस के अधिवेशनों में भाग लेते थे जहां वंदे मातरम गाया जाता था एक देश भक्ति की भावना को लेकर और धार्मिक सोच को अलग रख कर (Theological Concerns)
1937 के अधिवेशन में नेहरू मुस्लिमों के आगे नतमस्तक हो गए और गीत के केवल 2 छंद गाने पर राजी हो गए। झुकना था तो पूरा ही झुक जाते और वंदे मातरम के गाने को पूरी तरह रोक देते। नेहरू ने तो एक देश में दो विधान और दो निशान दे दिए और लगता है अब कांग्रेस फिर से देश को तोडना चाहती है जिसके लिए मुस्लिमों को भड़का रही है।
नेहरू के तुष्टिकरण की नीति पर कांग्रेस आज दो कदम आगे चल रही है। वंदे मातरम एक तरफ है, मुस्लिम तो आज हर चीज़ का विरोध करते हैं। मोदी सरकार की योजनाओं--BPL, आयुष्मान, प्रधानमंत्री आवास, उज्जवला आदि-- का लाभ लेने के अलावा मोदी का कौन सा कार्य है जो मुस्लिमों को पसंद है।

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