मुस्लिम कट्टरपंथी गोधरा याद रखते है लेकिन 13 अगस्त भूल जाते हैं, क्यों?

मुस्लिम कट्टरपंथियों से लेकर बीजेपी विरोधी पार्टियों ने अपने पाप छुपाने के लिए गोधरा को लेकर बीजेपी और नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर फैला रखा है। आम मुसलमान को अपनी अक्ल का इस्तेमाल करते इन फिरकापरस्त लोगों से पूछना चाहिए कि मोदी से पहले गुजरात में कितने दंगे हुए, कितने दिन चले और कितने मुसलमान मरे? दूसरे, मुरादाबाद में ईदुलफित्र पर दंगे किसने करवाया? दिल्ली में भी मुसलमानों ने सुबह-सुबह ईद की नमाज पढ़ घर में बैठ गए थे। सुबह 8 बजे जामा मस्जिद क्षेत्र में सन्नाटा था। जब मुसलमान कहता है कि वह अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरता फिर इन फिरकापरस्तों से सच्चाई जानने से क्यों डर रहा है?        
13 अगस्त 1980, मुरादाबाद के एक बड़े ईदगाह में चालीस से पचास हजार मुस्लिम इकट्ठा होते है, मौका था ईदुलफित्र का। 
इसी दौरान अचानक पीछे से आवाज आने लगती है "भागो, सुअर आ गया है" सुअर किसी ने देखा नहीं था, MJ अकबर जो नेता है उन्होंने इसे देखने का दावा किया था, कितना सही कितना गलत, किसी को नहीं पता
पीछे की खबर सुनकर आगे भी हड़कंप मच गया, 50,000 की भीड़ अराजक हो जाती है, निकलने के लिए एक ही रास्ता था, पुलिस उन्हें लगातार समझा रही थी, पर तभी अचानक से एक पत्थरबाजी भीड़ में से होती है, SSP के सर में चोट लगती है और वे वहीं पर गिर कर बेहोश हो जाते है
तब पुलिस फायरिंग कर देती है, सरकारी आंकड़ों में करीब ढाई सौ लोग मारे जाते है, बाद में लापता और मृतकों को मिलाकर मुआवजा चार सौ लोगों का जारी किया जाता है,
खैर इतनी बड़ी भीड़ पूरी आक्रोशित हो चुकी थी, उसने पुलिस थानों पर हमला कर दिया और उनके पुलिस अधिकारियों को दौड़ा दौड़ा कर मार डाला गया
लेकिन मामला अगर यहीं खत्म हो जाता तो सब अच्छा होता
उस समय इनके एरिया से सटा वाल्मीकि समाज और कई दलित बस्तियां थी, जिससे विवाद पहले से चल रहा था, दरअसल एक दलित लड़की का अपहरण कर के जबरन मुसलमानों में निकाह करवा दिया गया था और छेड़छाड़ की घटनाएं आम थी
जब भीड़ पुलिस थानों को जलाते हुए निकली तो उन्हें एक बात जो पता थी वो थी सुअर कौन पालते है
उन्होंने पूरे दलित बस्तियों को जला दिया, अस्सी से सौ लोग मारे गए, हिन्दू एकजुट हुए लेकिन उनमें संगठनात्मक शक्ति नहीं थी, पुलिस मूकदर्शक बनकर बस देखती रही, पुलिस पर भी पक्षपात के आरोप लग रहे थे
ये दंगे तीन चरण में हुए थे पहले फेज में ये मुरादाबाद में हुआ, फिर इससे निकलकर दूसरे इलाकों में ये फैल गया
उस समय केंद्र से लेकर राज्य तक में कांग्रेस की सरकार थी, और केंद्र में इंदिरा गांधी थी
इन्हीं दंगों ने यूपी में कांग्रेस के अंत की नींव लिखी, क्योंकि एक तो वे अफवाहों को रोक नहीं पाए, दूसरा अराजकता फैलने पर भारी बल भेजने के बजाय फायरिंग करवाई
जब ये भीड़ वहां से निकल पूरे मुरादाबाद में फैल गई तो फिर ये पूरी तरह से मूकदर्शक बन गए और दलित बस्तियों को तबाह होने दिया, उनके लोगो को मरने दिया
लेकिन इस केस में जो सबसे बड़ा नाम आया वो था मुस्लिम लीग के डॉक्टर शमीम अहमद खान, इस घटना के बाद जस्टिस एम. पी. सक्सेना आयोग ने रिपोर्ट तैयार की जिसमें पाया गया कि वहां कोई सुअर नहीं था, शमीम अहमद ने जानबूझ कर सुअर की भ्रांतियां फैलाई
दरअसल वे मुस्लिम लीग को दोबारा से राज्य में पुनर्जीवित करना चाहते थे, और मुसलमानों का बड़ा चेहरा बनना चाहते थे, लेकिन खास सफलता न मिल पाने के कारण उन्होंने ऐसा किया 

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