न्यायपालिका में भ्रष्टाचार कानूनी रूप से वैध हो गया; यशवंत वर्मा को बचा कर न्यायपालिका ने खुद को पूरी तरह भ्रष्ट साबित कर दिया

सुभाष चन्द्र
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे ने वकील घनश्याम उपाध्याय की याचिका 7 अगस्त को ख़ारिज कर दी जिसमें यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने या Court Monitored जांच की मांग की गई थी जजों ने कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरूपयोग करना है और चीप पब्लिसिटी करने का साधन है।  इसका मतलब साफ़ था कि जज रेनकोट पहन कर नहाते हैं और यशवंत वर्मा के खिलाफ कोई केस नहीं बनता। शायद यही वजह है कि भ्रष्टाचारी निचली अदालतों से दोषी साबित होने पर सुप्रीम कोर्ट भागते हैं कि वहां बचाने वाले माई-बाप बैठे हैं। जो बुजुर्गों की इस बात को साबित करता है कि पुलिस और अदालतों की नींव ही भ्रष्टाचार से रखी गयी है।  

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वकील घनश्याम उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट से अर्जी ख़ारिज होने के बाद न जाने क्या सोच कर दिल्ली हाई कोर्ट चले गए सितम्बर 21 को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अमित बंसल तो सुप्रीम कोर्ट से भी 4 कदम आगे निकल गए और उन्होंने कहा कि याचिका बेबुनियाद है और याचिकाकर्ता के पास कानून में दूसरे उपाय मौजूद हैं

जस्टिस अमित बंसल ने उपाध्याय से पूछा कि वो FIR दर्ज करने की अपनी मांग के लिए ट्रायल कोर्ट क्यों नहीं गए कोर्ट का रुख देख कर घनश्याम उपाध्याय ने अपनी याचिका वापस ले ली

जस्टिस अमित बंसल को क्या लगता है कि इस मामले में जब FIR दर्ज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट मना कर चुका है और वे खुद मना कर रहे हैं, तो ट्रायल कोर्ट की क्या औकात है कि वह यशवंत वर्मा पर FIR दर्ज करने के आदेश देने की हिम्मत करेगा? जस्टिस बंसल को इतना भी ज्ञान नहीं है कि किसी भी जज के खिलाफ चाहे वो हाई कोर्ट का हो या सुप्रीम कोर्ट का, FIR या कोई भी जांच की आदेश बिना सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अनुमति नहीं दिए जा सकते

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को कानूनी रूप से वैध करने का काम 1991 में के वीरास्वामी के केस में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने किया था बेंच में शामिल जज थे Justice B.C. Ray/Justice K. Jagannatha Shetty/Justice L.M. Sharma/Justice M.N. Venkatachaliah/Justice J.S. Verma.

उनकी बेंच ने आदेश दिया कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के किसी भी मौजूदा जज के खिलाफ Criminal Case/FIR रजिस्टर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अनुमति लेनी अनिवार्य (Mandatory) होगी यह आदेश  उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर दिया था उसके बाद यह व्यवस्था बना दी गई कि अगर कोई जांच होनी भी है तो वह कोर्ट की आंतरिक समिति करेगी 

बेंच के 1991 के आदेश मतलब साफ़ था कि किसी भी जज के खिलाफ कोई Criminal Case /FIR रजिस्टर नहीं होगा क्योंकि चीफ जस्टिस तो उसकी अनुमति देने वाले नहीं है और इस तरह न्यायिक भ्रष्टाचार को कानूनी रूप से वैध बना दिया गया

अब यशवंत वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित आंतरिक समिति ने गड़बड़ी तो पाई लेकिन उसका ट्रांसफर इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया और वहां वो एक साल तक मुफ्त में सैलरी लेता रहा क्योंकि उसे कोई काम नहीं दिया गया था

चीफ जस्टिस को स्वयं उसके खिलाफ Criminal Case/FIR दर्ज करने के आदेश दे देने चाहिए थे क्योंकि वो एक Sitting Judge था और आज भी है क्योंकि उसका त्यागपत्र राष्ट्रपति ने स्वीकार नहीं किया है

अब भी चीफ जस्टिस सूर्यकांत को जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देना चाहिए - उनका ऐसा न करना साबित करता है कि हकीकत में Justice is Destroyed.

यशवंत वर्मा का केस साबित करता है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार व्याप्त है और सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था ऐसी बना दी है कि किसी का कुछ नहीं बिगड़ सकता 

Power Corrupts and Absolute Power Corrupts Absolutely AND Judiciary is having Absolute Power at Present. This has completely eroded the credibility of judiciary in the eyes of public for which only Judiciary is responsible.

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