जुडिशरी को NJAC में केंद्र का कानून मंत्री भी स्वीकार नहीं था लेकिन कार्यपालिका की नियुक्तियों में अपनी मुंडी घुसाना चाहते है

सुभाष चन्द्र

यह कैसा मजाक हो रहा है, जजों की नियुक्ति की सिफारिश खुद कॉलेजियम करता है, कुछ को छोड़ कर अधिकतर इस आधार पर ही सरकार करती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कल कहा कि जजों की नियुक्ति जज ही करते हैं, यह मिथक है, क्योंकि कॉलेजियम की प्रक्रिया में कार्यपालिका भी शामिल होती है और अंत में नियुक्ति राष्ट्रपति करते है। 

जस्टिस दत्ता ने कॉलेजियम पर यह भी कहा कि इसमें समय समय पर कमियां रही हैं और इसका कामकाज त्रुटियों से मुक्त नहीं है। लेकिन जस्टिस दत्ता उन कमियों को दूर करने के लिए क्या कभी कदम उठाया गया है, शायद नहीं। एक केस में तो जस्टिस संजय किशन कौल ने यहाँ तक कह दिया था कि अगर निश्चित समय सीमा में नियुक्ति नहीं की गई तो हम Contempt of court  शुरू कर देंगे।

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जस्टिस दत्ता कॉलेजियम पर कुछ कहने से पहले यह बताएं कि कॉलेजियम संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत लागू किया गया और क्या इसे संसद से मंजूरी मिली है। इसलिए यह सिस्टम ही देश पर थोपा हुआ गैर संवैधानिक और गैर कानूनी है।

जस्टिस दत्ता को यह भी पता होना चाहिए कि 2 मार्च, 2023 के चुनाव आयुक्तों का फैसला देने के बाद जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट कानून नहीं बना सकता, यह मिथक आज टूट गया। मतलब सुप्रीम कोर्ट संसद के अधिकार क्षेत्र में भी अतिक्रमण कर गया। उनकी बेंच ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम बना दिया जिसमें पीएम, LoP और CJI को रखा और कहा कि कानून बनने तक यह कॉलेजियम काम करेगा।

बाद में सरकार ने कानून बना दिया जिसके अनुसार चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक मंत्री और LoP को शामिल किया गया और CJI को हटा दिया गया। यह कानून संसद ने पास किया। इस कानून की वैधानिकता को परखना आपका काम था लेकिन आपने तो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर ही प्रश्न उठा दिए जबकि यह विषय आपके लिए था ही नहीं। 

जस्टिस दत्ता ने कहा कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए बल्कि दिखना भी चाहिए। चयन समिति में प्रधानमंत्री द्वारा शामिल मंत्री से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि अपने ही नामितकर्ता की अवहेलना करें, क्योंकि सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत उसे पीएम का विरोध करने से रोकता है।

फिर आप क्या चाहते हैं प्रधानमंत्री सभी समितियों में किसी मंत्री को न रखे और जजों को बिठा दे? CCS में क्या रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री और विदेश मंत्री नहीं होगा।

अगर आप इस सिद्धांत की बात करते हैं तो कोई भी जज जिसकी नियुक्ति की सिफारिश कॉलेजियम ने की है, उसे तो चीफ जस्टिस के सामने हाथ बांध कर खड़े रहना चाहिए। 

सवाल इस चीज़ का उठता है कि आप अपनी (न्यायपालिका) की स्वतंत्रता के लिए किसी मंत्री को नहीं चाहते लेकिन कार्यपालिका की सभी नियुक्तियों में घुसना चाहते हैं। अगर आप चुनाव आयोग को स्वतंत्र देखना चाहते हैं तो सुप्रीम कोर्ट को भी निष्पक्ष होना ही नहीं बल्कि दिखना भी चाहिए जो नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट गांधी परिवार के प्रति अत्यधिक उदार रहता है। 

जस्टिस दत्ता आप स्वयं को ही देख लीजिये, आपने राहुल गांधी के लिए कहा कि “अगर आप सच्चे भारतीय होते तो सेना के बारे में ऐसा बयान न देते”। फिर क्या हुआ, आपको बेंच से ही हटा दिया गया।

बेहतर होगा सुप्रीम कोर्ट संविधान में प्रदत्त अधिकारों का निर्वहन संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से करने दें। एक दूसरे के काम में टांग न अड़ाएं। यह टांग अड़ाने का काम सबसे ज्यादा न्यायपालिका कर रही है। 

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