विपक्ष ताक में बैठा रहता है कि कैसे मोदी पर हमला करने और उसे बदनाम करने का मौका मिले। अगर दुर्भाग्य से स्मित मछार यात्रियों को न बचा पाता तो कांग्रेस और सारा विपक्ष उसे हिंदू आतंकी बना देता और दोष मोदी पर मढ़ देता। इसलिए ही मेरा मानना है कि भगवान भोले नाथ ने अपने भक्त नरेंद्र मोदी पर असीम कृपा की है।
इस मामले में यह भी याद रखना चाहिए कि कांग्रेस के हाथ बड़े लंबे हैं, वो कहां कैसा षड़यंत्र कर दे कह नहीं सकते क्योंकि उसका हाथ तो हमेशा आतंकियों के साथ रहता है। मोसाद और अन्य जांच एजेंसियों को राहुल गांधी की 3 मई, 2026 की ओमान यात्रा को भी खंगालना चाहिए। उसके जाने का मकसद क्या था और वह वहां किस किस से मिला? यह भी याद रहे राहुल गांधी वो शख्स है जिसने इज़राली लोगों के बचने पर और स्मित मछार पर एक शब्द नहीं बोला है।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
जो फिलिस्तीन का बैग लेकर संसद में जाती है, उसने भी एक शब्द नहीं बोला जैसे यहूदियों के बचने का बेहद अफ़सोस हो रहा हो।
राहुल ही क्या किसी सेक्युलर पार्टी के नेता ने एक शब्द नहीं बोला और जो उनका मुस्लिम वोट बैंक हैं, उसके भी किसी नेता ने घटना की निंदा नहीं की क्योंकि घटना को अंजाम देने वाला मुस्लिम था और निशाने पर यहूदी थे।
दूसरी अरफ़ा खानुम की ईरान यात्रा की भी जांच होनी चाहिए। ऐसा कैसे हुआ कि ईरान ने अकेली केवल अरफ़ा पत्रकार को खामनेई के अंतिम संस्कार में बुलाया वह भी ईरान के अपने खर्चे पर? किसी अन्य भारतीय पत्रकार को नहीं बुलाया। ऐसा क्या संबंध है अरफ़ा का ईरान के साथ?
एक राणा अय्यूब है, वो विदेश के उन अख़बारों में लिखती है जो इस घटना को केवल दो पायलटों के बीच का झगड़ा बता रहे हैं। उस पर वैसे भी शायद मनी लॉन्ड्रिंग का केस चल रहा है?
कुछ चूक UAE की तरफ से भी हुई और शायद कुछ मोसाद की तरफ से भी जो उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इज़रायल कोई ऐसा पायलट नहीं जा सकता जिसके देश के इज़रायल के साथ डिप्लोमेटिक रिश्ते न हों और ओमान के रिश्ते इज़रायल के साथ नहीं हैं। फिर UAE ने ऐसे पायलट को कैसे उड़ान में भेज दिया और मोसाद ने उस पर क्यों नहीं ध्यान दिया?
आज प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत में स्मित मछार ने कहा कि वह घटना के समय हनुमान चालीसा पढ़ रहा था, ये सुनकर तो सेक्युलर कीड़ों के दिलों में आग लग गई होगी?
अरफ़ा खानुम कहती है कि मोदी राज में मुसलमानों को कौन नौकरी देगा और उसे भी यह घटना दो पायलटों के बीच का झगड़ा लगा है। अरफ़ा पहले यह सोचे कि जब काम ऐसे करेंगे तो नौकरी कैसे मिलेगी और क्यों मिलनी चाहिए? अल फलाह यूनिवर्सिटी के तो डॉक्टर ही आतंकी बन गए। ऐसी हरकतें देख जब संस्थाएं मुसलमानों को नौकरी देना बंद कर देंगे ये ही गजवा-ए-हिन्द की वकालत करने वाले छातियां पीटते सडकों पर उतर आएंगे, अदालतों में भागेंगे। और अदालतें काली करतूतों को नज़रअंदाज कर इनकी हमदर्द बन कानून का रौब दिखायेगी।
फिर भी अरफ़ा की जानकारी के लिए बता दूं कि भारत में 26,000 रजिस्टर्ड पायलट्स में 1,700 मुस्लिम पायलट हैं और 3,500 महिला पायलटों में से 34 मुस्लिम हैं।
लेकिन अब यात्री को अपना पायलट चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और इसलिए एयरलाइन को टिकट बुक करते हुए बताना चाहिए कि प्लेन के पायलट कौन होंगे और कौन अन्य Crew Member होंगे।

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