राहुल गांधी का फरमान आया है कि मैं 30 सेकंड में रामलीला मैदान का प्रोटेस्ट वापस बुला लूंगा। बस एक छोटी-सी शर्त है, मोदी जी को बोलिए कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हमारे हाथ में पकड़ा दें।थोड़ा धमकी देने जैसा नहीं लग रहा? और टाइमिंग भी देखिए, दिवाली से ठीक पहले। इन्हें सब कुछ पता है। इनका ट्वीट किसके लिए है? व्यापारियों और दुकानदारों के लिए।
लेकिन राहुल, सिर्फ व्यापारी ही होली-दिवाली जैसे त्योहारों से नहीं जुड़े होते। त्योहारों से एक पूरी इकोनॉमी चलती है। लाखों-करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी इन त्योहारों से जुड़ी होती है।
जगह भी देखिए, रामलीला मैदान, जिसके पास चांदनी चौक और दिल्ली के वो सारे बाजार हैं, जहां दिवाली पर सबसे ज्यादा खरीदारी होती है। ग्राहक को बाजार तक ले जाने वाला रिक्शेवाला कमाता है, टैक्सी चलाने वाला कमाता है। सिर्फ लाखों रुपये के लहंगे नहीं बिकते, छोटे-छोटे मिट्टी के दीये भी बिकते हैं। कोई मजदूर सामान उठाकर लाता है, कोई उसे पैकेट में बंद करता है और कोई उसे चमकाने का काम करता है। हर छोटे-बड़े काम से किसी न किसी इंसान की रोजी-रोटी और उम्मीद जुड़ी हुई है।
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और इलेक्शन कमीशन अपने फैसलों और पूरी प्रक्रिया से जुड़े सबूत दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये लोग आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। अब आप ही बताइए, क्या इन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कोई फर्क पड़ता है? अगर पड़ता, तो ये लोग पहले कोर्ट के फैसले का इंतजार करते।
मोहब्बत की दुकान के नाम पर हमारी दुकान खराब मत करो!
सदर बाजार के व्यापारियों ने राहुल गांधी की प्रस्तावित रैली का किया विरोध, रैली स्थगित करने की उठाई मांग!
दिल्ली के सदर बाजार में व्यापारियों ने पोस्टर लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। व्यापारियों का कहना है कि त्योहारों के समय बाजारों में राजनीतिक रैलियों के आयोजन से कारोबार प्रभावित होता है और आम जनता को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
व्यापारियों की मांग है कि त्योहारों के दौरान बाजारों में रैलियों और बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर पुनर्विचार किया जाए, ताकि दुकानदारों की रोजी-रोटी और ग्राहकों की सुविधाएं प्रभावित न हों।
व्यापारियों का कहना है कि त्योहार उनके लिए पूरे साल की कमाई का महत्वपूर्ण अवसर होते हैं। ऐसे में बाजारों में भीड़, यातायात बाधित होने और ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होने से कारोबार को नुकसान पहुंच सकता है।
अब सवाल यह है कि राजनीति जरूरी है या व्यापारियों की रोजी-रोटी?
लोकतंत्र में राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करना सभी का अधिकार है, लेकिन व्यापारियों की समस्याओं और आम जनता की सुविधाओं का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।
जन जागरण प्रेस का सवाल:
क्या राजनीतिक दलों को त्योहारों के दौरान व्यापारियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए रैलियों के समय और स्थान पर विचार नहीं करना चाहिए?
मुझे एक बात का जवाब दीजिए, वह महिला कहां है, जिसकी वजह से यह पूरा मामला शुरू हुआ था? अब उसका कहीं कोई नामोनिशान दिखाई नहीं दे रहा है। जिस महिला के मामले को लेकर इन लोगों ने पूरे भारत में आग लगाने की योजना बना ली थी, वह महिला अब कहां है? इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह महिला नहीं होती, तो ये किसी और को मुद्दा बना लेते। कोई दूसरा नहीं मिलता, तो किसी और मुद्दे को लेकर खड़े हो जाते।
असल में, इन लोगों ने बहुत पहले से ही यह योजना बना रखी थी कि सही समय पर भारत पर दबाव बनाना है और देश में अशांति फैलानी है। जिस दिन से भारत ने दुनिया की बड़ी-बड़ी ताकतों की आंखों में आंखें डालकर बात करनी शुरू की, उसी दिन से भारत कई लोगों को खटकने लगा था।
अब आप देखिए कि धीरे-धीरे कितने लोग और कितने मुद्दे सामने आ रहे हैं। पहले आईटीबीपी पर सवाल उठाए गए, उसके बाद कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री का भाषण सामने आया। नेहा को देख लीजिए, सीजेआई को देख लीजिए, विपक्ष के नेताओं को देख लीजिए और उस आदमी को भी देख लीजिए, जो चिकन नेक को काटने की बात करता है। दिल्ली की यूनिवर्सिटीज में भी इस तरह की बातें दीवारों पर लिखी जा रही हैं।
और आप उन्हीं लोगों की उम्मीदों को हथियार बनाकर सरकार पर दबाव डालना चाहती हैं?
लेकिन हिंदुओं के साथ ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इतिहास में पहले भी हुआ जब हिंदुओं पर जजिया टैक्स लगाया गया था। क्यों? ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके, उन्हें मजबूर किया जा सके। और अब ये दिवाली से ठीक पहले प्रोटेस्ट की धमकी देकर एक बार फिर हिंदुओं को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं।
वैसे, जैसे ही दिवाली आने लगती है ना, इन लोगों को परेशानी होने लगती है। पिछली बार राम मंदिर पर जब दीये जलाए गए थे, तो यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी नाराज हो गई थी। उन्हें परेशानी थी कि हम दिवाली क्रिश्चियनों की तरह क्यों नहीं मनाते, छोटे-छोटे दीये क्यों जलाते हैं, इतना पैसा क्यों खर्च करते हैं और इतना तेल क्यों जलाते हैं।
उस एक दीये को बनाने के लिए कुम्हार महीनों तक मेहनत करता है। उस दीये में डालने के लिए सरसों का तेल पैदा करने वाला किसान अपने खेतों में दिन-रात मेहनत करता है। और आपलोग, जो मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए राजकुमार हैं, उन मेहनत करने वाले लोगों की छोटी-छोटी खुशियों पर भी राजनीति करके उन्हें ब्लैकमेल करना चाहते हैं?
वैसे, एक छोटी-सी बात पूछूं?
ईद से पहले जामा मस्जिद के सामने या क्रिसमस से पहले कनॉट प्लेस में ऐसा ही कोई प्रोटेस्ट करके दिखा दोगे?
नहीं ना?



No comments:
Post a Comment