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सिलेबस बदले, किताबें नहीं मिलने पर PDF से पढ़ाई: बच्चों का दुख- दर्द कब समझेगा NCERT

साभार 
NCERT के किताब का झोल बच्चों पर भारी पड़ रहा है। किताबों का ठिकाना नहीं और नया सेशन शुरू हुए करीब दो महीने बीत गए हैं। इतना ही नहीं, गर्मी की छुट्टियाँ भी जारी हैं, लेकिन अब तक खासकर क्लास 9 के छात्र-छात्राओं की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं।

किताबें पीडीएफ फाइल के रूप में डिजिटल फॉर्म में मौजूद है। सिलेबस में बड़े बदलाव किए गए हैं, ऐसे में पढ़ाई जो अप्रैल में शुरू हो जानी चाहिए थी, वो अब तक नहीं हो पाई है। यहाँ तक की स्कूलों के बुक शॉप से ये भी नहीं पता चल पा रहा है कि किताबें अब तक मिलेंगी। केन्द्रीय विद्यालय और दूसरे सरकारी स्कूलों का तो और भी बुरा हाल है। बच्चे परेशान, टीचर परेशान और पैरेंट्स बिचारे सारी बातें जानकर पूरे सिस्टम को कोस रहे हैं।

पैरेंट्स जानना चाहते हैं कि आखिर सिलेबस बदले, तो किताबें पहले क्यों नहीं छपी। अगर किताबों की छपाई न कर पाए तो इस साल नया सिलेबस लागू करने की जरूरत क्या थी। तीन भाषा की जानकारी देने वाला फॉर्मूला क्लास 9 में क्यों इस तरह से थोपा गया। बच्चे पहले से परेशान हैं, वो पूरी चीजों को कैसे मैनेज करेंगे।

किताबों की अनिश्चितता को लेकर टीचर चिंतित

 आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के एक बड़े स्कूल में साइंस टीचर मिस शिवानी ( बदला हुआ नाम) ने बदले हुए क्लास 9 सिलेबस में बदलाव के बाद टेक्स्टबुक्स की देरी से चिंता जताई। उनका कहना है कि स्कूलों को इस बारे में साफ जानकारी नहीं मिली है कि किताबें कब तक मिल पाएँगी।

टीचर के मुताबिक, “बदकिस्मती से यह बार-बार होने वाली दिक्कत बन गई है। एकेडमिक सेशन अप्रैल में शुरू होता है, फिर भी टेक्स्टबुक्स अक्सर कई महीनों तक अवेलेबल नहीं रहतीं। थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला लागू होने के साथ क्लास 9 के स्टूडेंट्स से अब तीसरी भाषा पढ़ने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इन कोर्स के लिए जरूरी टेक्स्टबुक्स भी मौजूद नहीं हैं।”

उन्होंने कहा कि एक टीचर और CBSE स्टूडेंट के पेरेंट्स के तौर पर पूरी परिस्थिति चिंताजनक है। इस तरह की देरी स्कूलों, टीचरों, स्टूडेंट्स और पेरेंट्स, सभी के लिए अनिश्चितता वाली है। सबसे अहम बात यह है कि इससे पूरे सिस्टम की लापरवाही, निरंतरता और तैयारी की कमी का पता चलता है। एजुकेशनल रिफॉर्म्स और करिकुलम में बदलावों को समय पर प्लानिंग, सही रिसोर्स और लागू करने के लिए सही रणनीति की जरूरत होती है, ताकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर न पड़े।

दिल्ली-एनसीआर की एक केन्द्रीय विद्यालय में टीचर सीमा (बदला हुआ नाम) सोशल साइंस पढ़ाती हैं। इनका कहना है कि क्लास 9 के सोशल साइंस में काफी बदलाव आए हैं। छात्रों को पीडीएफ से पढ़ाना पड़ता है। क्लास में बच्चों के पास किताब नहीं है, इसलिए उन्हें समझाना अपने आप में बड़ा चैलेंज है। बच्चों को पीडीएफ फाइल की कॉपी निकालने के लिए कहा, ताकि उन्हें जो बताया जा रहा है, वह समझ सकें। इस बीच गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई है, किताबों का कोई अता-पता नहीं है। बच्चों की परीक्षा भी शुरू हो जाएगी, आखिर शिक्षक क्या करे?

एडवांस मैथ्स के बाद एडवांस साइंस की एंट्री

क्लास 9 में इस साल से एडवांस मैथ्स के साथ एडवांस साइंस भी शुरू हो गया है। 2024 में सीबीएसई के स्कूलों में एडवांस मैथ्स की शुरुआत हुई थी। आज तक इसके लिए एनसीईआरटी ने कोई किताब नहीं छापा है। अगर छापा भी होगा तो बच्चों के हाथों तक नहीं पहुँचा। ऐसे में टीचर जो किताब मौजूद है, उससे ही मैथ्स करवाते हैं। जो थोड़ा टफ होता है, उसे एडवांस मैथ्स का सवाल बता दिया जाता है और जो आसान होते हैं उसे बेसिक मैथ्स का। अब सोचा जा सकता है कि एक ही क्लासरूम में जो बच्चा एडवांस मैथ्स वाला सवाल कर रहा होगा, उस वक्त बेसिक मैथ्स लिया बच्चा क्या कर रहा होगा।

ऐसी स्थिति में अब एडवांस साइंस की पढ़ाई शुरू हो रही है। आगे जो बच्चे साइंस पढ़ना चाहते हैं, उन्हें एडवांस मैथ्स और एडवांस साइंस लेना है। ह्यूमेनिटी और कॉमर्स लेने वाले बच्चों को अभी से साइंस पर ज्यादा मेहनत नहीं करना है। आखिर क्लास 11 में ये अंतर आ ही जाता है, तो क्लास 9 में इसकी जरूरत क्या थी।

किताब जिसे मिले, वे छात्र भी परेशान

डीपीएस नोएडा में पढ़ने वाली क्लास 9 की छात्रा अक्षरा का कहना है कि उन्हें दो-तीन दिन पहले किताब मिल गई है। लेकिन अभी भी सोशल साइंस की किताब नहीं मिली है। वैसे भी मैथ्स की तो अलग किताब स्कूल पहले से ही पढ़ाता रहा है। साइंस के लिए एनसीईआरटी की किताब मिल गई है। उसका कहना है कि साइंस की किताब पूरी तरह बदल गई है। मैथ्स का पहला चैप्टर पहले नंबर सिस्टम हुआ करता था, लेकिन अब ज्योमेट्री का है। पहले बच्चे के लिए कैलकुलेशन वाले सवाल ज्यादा आते थे, लेकिन अब लैंग्वेज बेस सवाल ज्यादा हैं। गणित में भी ऐसा लगता है कि लैंग्वेज समझना पड़ेगा। काफी मुश्किल लग रहा है इसे समझना।

उसने कहा कि साइंस की किताब भी काफी मुश्किल लग रही है। बहुत ज्यादा गहराई से समझना पड़ेगा। इसे वही छात्र खुद से कर पाएगा, जिसे साइंस पढ़ना काफी पसंद हो। समरबिल स्कूल, दिल्ली में पढ़ने वाली छात्रा रियाना का कहना है कि उसे तो अभी तक किताब भी नहीं मिली है। स्कूल के अंदर जो बुक शॉप हैं, वहाँ पूछने पर बोला जाता है कि अभी तक उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि किताब कब तक मिलेगा। टीचर ने बच्चों को पीडीएफ भेज कर उसकी कॉपी करवा कर लाने के लिए कहा था। अप्रैल में जैसे-तैसे उनलोगों ने पढ़ा है। मैम भी परेशान रहती हैं। बच्चे भी किताब नहीं मिलने से परेशान हैं। उनकी तो टर्म 1 की परीक्षा भी हो गई है, लेकिन किताब का ठिकाना नहीं है।

जब स्कूल में मौजूद किताब के दुकानदार से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा कि अभी तक तो किताबें नहीं आई हैं। कब तक आएगी उन्हें भी नहीं पता। अब तो गर्मी की छुट्टियाँ चल रही है। अब बच्चों को जुलाई में स्कूल खुलने के बाद ही पता चलेगा कि किताब मिल पाएगी या नहीं। हालाँकि स्कूल से अलग कोंडली के ‘उत्तराखंड बुक शॉप’ के दुकानदार का कहना है कि उनके यहाँ सारी किताबें मिल रही हैं, सिर्फ क्लास 9 की सोशल साइंस की किताब अब तक नहीं आई है। उन्होंने जानकारी दी कि जल्द ही एडवांस मैथ्स के साथ-साथ एडवांस साइंस की किताब बाजार में आने वाली है।

तीन लैंग्वेज पढ़ने की अनिवार्यता से सभी परेशान

बच्चे जब किताब नहीं मिलने से परेशान हैं, वहीं इस साल तीन लैंग्वेज पढ़ना भी क्लास 9 में अनिवार्य कर दिया गया है। एक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और एक विदेशी भाषा। ज्यादातर स्कूलों में इसके लिए हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है। ऐसे में जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश जैसी विदेशी भाषा अब नहीं पढ़ाई जा रही है। इससे जुड़े शिक्षकों को भी स्कूलों ने बाय-बाय कर दिया है।

डीएवी स्कूल गाजियाबाद में क्लास 10 में पढ़ने वाली छात्रा की माँ अल्पना राय, जो माँ के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाती भी हैं, उनका कहना है कि बच्चों को दो-तीन दिन पहले किताबें मिली है। उन्होंने किताबों में कई कमियाँ पाई हैं। साइंस में बहुत ज्यादा सिलेबस है, उसे इस तरह से बनाया गया है कि बच्चों के लिए खुद से समझना काफी मुश्किल है। टीचर को भी पढ़ना पड़ेगा। मैथ्स का भी वही हाल है। सोशल साइंस की किताब मिली नहीं है। अप्रैल से अब तक बच्चों के पास किताबें नहीं थी, सिलेबस बदल दिया गया और किताब भी न मिले, तो बच्चा क्या करे। क्लास 9 बच्चे का आधार होता है। इस क्लास में लापरवाही काफी गंभीर बात है। ऐसी स्थिति में तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता बच्चों पर भारी पड़ रही है।

समरविल स्कूल नोएडा में पढ़ने वाली एक छात्रा की माँ जैस्मिन तिर्की का कहना है कि उन्होंने तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता के खिलाफ स्कूल प्रबंधन से विरोध जताया है। उनका कहना है कि उन्होंने अप्रैल में स्कूल से पुरानी किताबें खरीद ली थी। तभी वही किताबें बेची जा रही थी। अब सिलेबस बदल गया है, तो फिर खरीदना पड़ रहा है। ये दोहरा खर्च भी उन्हें परेशान कर रहा है।

हालाँकि, उनका कहना है कि सिलेबस को वक्त-वक्त पर परखा जाना चाहिए, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। आज के परिवेश में बदलाव होना चाहिए। लेकिन सिलेबस में बदलाव के बाद वक्त पर किताबों का मिलना भी जरूरी है। अगर किताब नहीं मिलेंगे तो पीडीएफ फाइल से बच्चे पढ़ते हैं। मोबाइल से दूर रखने की हमारी सारी कोशिश बेकार हो जाती है, इसलिए बदलाव से पहले सही रणनीति बनाना जरूरी है। बदलाव करिए, लेकिन बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता को तोड़ कर नहीं। अगर अगले साल इसे लागू किया जाता, तो किताबें भी मार्केट में आ जाती और बच्चों को सहूलियत भी होती।

ये हाल सिर्फ क्लास 9 के बच्चों का नहीं हुआ है। साल 2025 में क्लास 4 से क्लास 8 तक का सिलेबस बदल गया था। उस वक्त भी कई महीनों तक बच्चों को किताबें नहीं मिल पाई। क्लास 5 और क्लास 8 के बच्चों ने तो जून तक इंतजार किया था। इसके बावजूद एनसीईआरटी ने कोई सबक नहीं लिया और साल 2026 में क्लास 9 का सिलेबस बदल कर किताब उपलब्ध कराने में असफल रहे। फिर वही पीडीएफ फाइल और टीचर्स के नोट्स पर बच्चों की निर्भरता। गाँवों-कस्बों के बच्चे क्या पीडीएफ फाइल खोल पाएँगे? क्या इंटरनेट की ऐसी सुविधा उन्हें मिलती है, ये भी बड़ा सवाल है। कई बार अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पहले छप जाती हैं, हिन्दी में बाद में आती है। इसको लेकर भी असमानता का आरोप एनसीईआरटी पर लगता है।

नकली किताबों से सावधान रहें

एक बात और है कि प्राइवेट स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महँगी किताबें स्कूल में पढ़ाते हैं, इसे खरीदने का दबाव अभिभावकों पर होता है। इसको लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है और पूछा है कि जब एनसीईआरटी की किताबें कम पैसों में उपलब्ध है, तो स्कूल क्यों महँगी किताबों से पढ़ाती है। लेकिन, एनसीईआरटी की किताबें उपलब्धता पर भी बड़ा सवाल है।

एनसीईआरटी की किताबों में कमी की वजह से कई जगहों पर नकली किताबें मिल रही हैं। इन किताबों की भारी माँग रहती है। उसके अनुपात में आपूर्ति नहीं हो पाती। इसके कारण बाजार में नकली और पायरेटेड किताबों का बड़ा गिरोह सक्रिय है। ये किताबें घटिया कागज, हल्की स्याही और बिना लोगो के छपती हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और आँखों पर बुरा असर पड़ता है।

2020 में सिर्फ मेरठ और आसपास के इलाकों में करीब 5.64 करोड़ रुपये की नकली किताबें खपाने की बात सामने आई थी। 2025 में दिल्ली के शाहदरा में नकली किताबों का एक रैकेट पकड़ा गया था जिसके पास से 1.7 लाख से अधिक नकली किताबें जब्त की गई थी, जिसकी कीमत करीब 2.4 करोड़ बताई गई थी। कहने का मतलब यह है कि एनसीईआरटी की नकली किताबों से भी सावधान रहने की जरूरत है। किताबों की कमी की वजह से ‘नकली का धँधा’ भी जोरों से चल रहा है।

NCERT की किताबों में संशोधन और विवाद

एनसीईआरटी की किताबों में हाल ही में कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के मुद्दे पर जमकर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला बताया। इसके बाद एनसीईआरटी को माफी माँगनी पड़ी और किताब को बाजार से हटाना पड़ा।

कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में राजपूत राजघरानों के मराठा साम्राज्य में दिखाए जाने पर जमकर बवाल मचा। दरअसल किताब में संस्थान ने 1759 का एक मैप प्रकाशित किया, जिसमें राजस्थान के स्वतंत्र राजघरानों जैसे- जैसलमेर, बीकानेर, बूंदी को मराठा साम्राज्य में दिखाया गया। सवाल उठने के बाद NCERT को बदलाव करना पड़ा। उसने एक कमेटी बनाई और समीक्षा के बाद संस्थान ने माना कि उससे बड़ी गलती हुई थी और इस मैप का कोई सोर्स नहीं था।

कक्षा 7वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े अध्याय हटाने पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने को लेकर एनसीईआरटी ने खेद जताया और इसे आगामी शैक्षणिक सत्र में संशोधित कर पेश करने की बात कही।

कक्षा 7वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े अध्याय हटाने पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने को लेकर एनसीईआरटी ने खेद जताया और इसे आगामी शैक्षणिक सत्र में संशोधित कर पेश करने की बात कही।

कुल मिलाकर एनसीईआरटी को किताबों में संशोधन से लेकर नई किताब बाजार में लाने के लिए सही रणनीति की जरूरत है। सालों से किताबों की कमी का सामना बच्चे कर रहे हैं। आखिर किताबें कम क्यों छापी जाती है? यह जानते हुए कि इससे कालाबाजारी होती है और नकली किताबों के ढेर में से असली को छाँटना छात्रों के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में अगर किताब बाजार में ही उपलब्ध न हो तो बच्चे क्या करें? उनकी पढ़ाई में गैप आता है। मन नहीं करता पढ़ने का। स्कूल भी हाथ खड़े कर देते हैं। जरा सोचिए ऐसे स्टूडेंट्स का क्या हाल होगा, जो गाँव में बगैर सिलेबस और किताब के पढ़ने की कोशिश करते होंगे।

हिंदू नववर्ष : सूर्य, चंद्र, पृथ्वी की गति पर आधारित गणना: वो विज्ञान, जिसके दम पर फली-फूली कृषि-सभ्यता

         हिन्दू नव वर्ष गणितीय गणनाओं और विज्ञान पर आधारित है (Image Generated By Leonardo AI)
भारतीय संस्कृति के हिसाब से नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाते हैं और इस बार मंगलवार (9 अप्रैल, 2024) से नए हिन्दू नवसंवत्सर 2081 की शुरुआत भी हो रही है। भारतीय काल गणना में ‘विक्रम संवत’ का बड़ा महत्व है और शादी-विवाह से लेकर अन्य शुभ मुहूर्त व पर्व-त्यौहार इसी से तय होते हैं। हिन्दू नववर्ष के साथ ही सारे मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएँगे। हिन्दू ग्रंथों में 60 संवत्सरों के हिसाब से हर संवत्सर का नाम तय किया जाता है। 

भारतीय कालगणना का विवेचन अनेक ग्रंथों में किया गया है। मय के सूर्यसिद्धांत आदि प्रत्यक्ष ज्योतिष ग्रंथों से लेकर मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों तथा भागवत जैसे आख्यान माने जाने वाले पुराणों तक में कालगणना के विज्ञान की विवेचना और विश्लेषण प्राप्त होता है। भारतीय विज्ञान की यह विशेषता है कि वह हमेशा प्रत्यक्ष और प्रकृति से समन्वय बनाकर चलता है। इसलिए काल की गणनाएँ भी इससे ही जुड़ी हुई हैं।

हमारे शास्त्रों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि ब्रह्मांड में भिन्न-भिन्न लोकों में काल की गति भी भिन्न-भिन्न होती है। आप देखेंगे कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने भी ‘टाइम एंड स्पेस’ की थ्योरी में यही पाया। यहाँ हम देखेंगे कि पृथ्वी पर हमने काल की कैसी और कितनी सूक्ष्म गणनाएँ की थीं। काल की सबसे छोटी ईकाई भारतीय शास्त्रों में परमाणु की मानी गई है। दो परमाणु के बराबर एक अणु होता है और तीन अणु काल के बराबर एक त्रसरेणु काल होता है।

एक त्रसरेणु काल की माप बताते हुए भारतीय मनीषियों ने लिखा है कि किसी द्वार के सूक्ष्म छेद में से आ रहे सूर्य के प्रकाश में जो कण उड़ते हुए दिखते हैं, उसे ही त्रसरेणु कहते हैं। प्रकाश को इसे पार करने में जितना समय लगता है, उसे ही एक त्रसरेणु काल कहते हैं। तीन त्रसरेणु काल को एक त्रुटि कहा गया है। त्रुटि से काल की गणना को बढ़ाते हुए परार्ध तक ले जाया गया है। इसकी गणनाएँ कुछ इस प्रकार हैं:

1 लघु अक्षर उच्चारण1 निमेष
2 निमेष1 त्रुटि
10 त्रुटि1 प्राण
6 प्राण1 विनाडिका
60 विनाडिका1 नाडिका
60 नाडिका1 मुहूर्त
30 मुहूर्त1 अहोरात्र

श्रीमद्भागवतपुराण में लिखा है कि जिसका और विभाजन नहीं हो सकता तथा जो कार्यरुप में प्राप्त नहीं हुआ है और जिसका अन्य परमाणुओं के साथ संयोग नहीं हुआ है, उसे परमाणु कहते हैं। वर्ष की गणना को आगे बढ़ाते हुए भारतीय मनीषियों ने पूरे ब्रह्मांड की आयु की भी गणना की। उन्होंने सौर वर्ष के बाद दिव्य वर्ष से लेकर परार्ध तक की गणना की है। कलियुग चारों में सबसे छोटा युग है। ये कुछ इस तरह से किया गया:.

कलि युग4,32,000 वर्ष
द्वापर युग8,64,000 वर्ष (2 कलि)
त्रेता युग12,96,000 वर्ष (3 कलि)
कृत युग17,28,000 वर्ष (4 कलि)

1 चतुर्युग = 43,20,000 वर्ष (10 कलि। इसे ही धर्म भी कहा है।) दशलक्षणयुक्त होने के कारण धर्म दश संख्या का भी द्योतक है। इसीलिए सूर्यसिद्धान्त में कहा गया है कि कृत् या सत् युग में धर्म के चार चरण होते हैं, त्रेता में तीन, द्वापर में दो और कलि में केवल एक। उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी छोड़ते समय माँ गंगा से कहा था कि पहले 10,000 वर्षों के बाद कलियुग में स्थिति एकदम खराब होने लगेगी।

71.42857143 चतुर्युग (x 43,20,000)= 1 मन्वन्तर (30,85,71,428.5776 वर्ष)  
14 मन्वन्तर (x 30.85.71,428.5776)  = 1 कल्प अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस (4,32,00,00,000 वर्ष  
ब्रह्मा के सौ वर्ष= दो परार्ध (31,10,40,00,00,00,000 वर्ष )  

अर्थात, 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष की एक संपूर्ण प्रक्रिया होती है। ब्रह्मा के इस सौ वर्ष की आयु को दो परार्धों में बाँटा गया है। इसमें से वर्तमान ब्रह्मांड का पहला परार्ध बीत चुका है। भारतीय पंचांग में मासों, सप्ताहों और दिनों का निर्धारण एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत किया गया है, ग्रिगोरियन कैलेंडर की तरह किसी मनमाने तरीके से नहीं। सर्वप्रथम वेदों में ही बारह मासों के नाम आते हैं। यानी, भारतीय परंपरा के अनुसार संवत्सर का बारह मासों में विभाजन मानवी कार्य नहीं है।

यह एक प्रकार से पूर्वनिर्धारित नियम है कि पृथ्वी के सूर्य की ओर लगाए गए एक चक्र को कुल बारह भागों में ही बाँटा जाएगा। इसके लिए वेदों में दो स्थानों पर निर्देश प्राप्त होते हैं। भारतीय ज्योतिषियों ने इन मंत्रों के आधार पर ही गणनाएँ कीं। ऋग्वेद में वर्णित है:

दादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य।
आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानी विंशतिश्च तस्थुः॥ (ऋग्वेद 1/164/11)
द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत।
तस्मिन्त्साकं त्रिंशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलास: ॥ (ऋग्वेद 1/164/48)

इन दो मंत्रों में यह स्पष्ट किया गया है कि संवत्सर में बारह प्रविधियाँ हैं। 360 शंकु यानी दिन अथवा 729 जोड़े रात-दिन हैं। यहाँ इसे एक चक्र के रूप में निरूपित किया गया है, जो कि पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर की चक्राकार गति तथा काल की चक्रीय होने दोनों का ही प्रतीक है। इससे स्पष्ट है कि संवत्सर यानी एक वर्ष में 360 दिन और बारह मास होने की संकल्पना भारत में एकदम प्रारंभ से ही है। परंतु इस सामान्य आधार को आगे बढ़ाते हुए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने पृथ्वी की गति को जाना और इसके बाद उन्होंने वर्ष की वास्तविक गणना की।

मासों की गणना या निर्माण पृथ्वी की अपनी कक्षा से नहीं की गई, इसका निर्धारण चंद्रमा के पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा से किया गया। इसलिए इसे चांद्रमास भी कहते हैं। चंद्रमा का एक मास 30 चंद्र तिथियों का होता है, परंतु वह सौर मास से लगभग आधा दिन छोटा होता है। दोनों मासों में सामंजस्य बैठाने के लिए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मलमास या अधिमास का विधान किया। अब प्रश्न उठता है, जो आज के ग्रिगोरियन कैलेंडर के सभी समर्थक अधिक जोर-शोर से उठाते भी हैं कि सौर मास की उपस्थिति और उसकी गणना की सरलता के बाद भी चांद्र मासों की गणना क्यों की जाए?

वास्तव में चंद्रमा से मासों का निर्धारण केवल गणना का एक प्रकार मात्र नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार भी है। यह आज हमें ठीक से ज्ञात हो चुका है कि चंद्रमा ही पृथ्वी पर वातावरण संबंधी अनेक बदलावों को लाने का कारण है। वेदों में इस सृष्टि को अग्निसोमात्मकं यानी अग्नि तथा सोम से निर्मित तथा संचालित कहा गया है। सूर्य अग्नि है और चंद्रमा सोम है। कृषि में हम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देख सकते हैं।

चंद्रमा के कारण पौधों की बालियों में रस भरता है, सूर्य के कारण वे पकती हैं। मानव की पूरी सभ्यता आदि काल से कृषि आधारित रही है और चांद्र मास की गणना कृषिकार्य में सहायक है। यही कारण है कि सौर मासों की गणना करने के बाद भी भारतीय आचार्यों ने चांद्रमासों की भी गणना की। ‘विक्रम संवत्’ विश्व का सर्वश्रेष्ठ सौर-चांद्र सामंजस्य वाला संवत् है। आज उस गणना को भुलाने के कारण ही कृषि में इतनी बाधाएँ आ रही हैं।

वैज्ञानिक शोध में पता चला है कि चन्द्रमा का प्रकाश पेड़-पौधों के लिए न सिर्फ सूर्य की किरणों की तरह महत्वपूर्ण है, बल्कि स्टार्च स्टोरेज और उनके प्रयोग पर भी असर डालता है। पेड़-पौधों को इससे जो न्यूट्रिशन मिलता है, वो बायो-इलेक्ट्रिक एक्टिविटी होती है। दिन में फोटोसिंथसिस होता है। प्राकृतिक उपग्रह के बिना पृथ्वी पर जीवन एकदम से बदल जाएगा। पेड़-पौधों में जल के संचार पर भी चन्द्रमा का असर पड़ता है।

भारतीयों ने मासों का नाम यूरोपीयों की तरह मनमाने ढंग से नहीं रखा। वेदों तथा उनके ब्राह्मणों में 12 मासों के नाम दिए गए थे। लेकिन, हमारे ज्योतिषाचार्यों ने सिर्फ उनसे संतोष नहीं किया। वैदिक नामों में भी एक सार्थक मिलती है। उदाहरण के लिए मधु नामक मास में ही वसंत ऋतु होती है। वसंत ऋतु का मादकता से कितना संबंध है, ये छिपा नहीं है। इसी प्रकार अन्या नाम भी सार्थक हैं। परंतु बाद में इन मासों का नाम उन नक्षत्रों के नाम पर रखा गया, जिनसे इनका प्रारंभ होता है।

चित्रा नक्षत्र में प्रारंभ होने वाले मास का नाम चैत्र, विशाखा नक्षत्र में प्रारंभ होने वाले मास का नाम वैशाख… और इसी क्रम में सभी मासों के नाम निर्धारित किए गए। किस मास में कितनी तिथियाँ होंगी, यह चंद्रमा और सूर्य की चाल से निर्धारित किया गया और आज भी किया जाता है, मनमाने ढंग से नहीं। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने प्रत्येक अहोरात्र को 24 होराओं में बाँटा और हरेक का नामकरण भी किया।

यहाँ तक कि भारत में सप्ताह के 7 दिन की गणना और नामकरण भी प्राचीन काल से होता आ रहा था। आर्यभट्ट ने तभी सातों दिन के नाम और महत्ता पर प्रकाश डाला था। इसका विश्लेषण बड़े विद्वानों ने भी किया है। “सप्तैते होरेशा: शनैश्चराद्या यथाक्रमं शीघ्रा:| शीघ्रक्रमाच्च्तुर्था भवन्ति सूर्योदयाद् दिनपा:।।” नामक श्लोक इसका साक्ष्य है। इतना ही नहीं, ‘सूर्य सिद्धांत’ में भी इसका जिक्र आता है। संभव है कि बाद में इसे अन्य जगहों पर कॉपी किया गया हो।

(साभार: अनुपम कुमार सिंह; http://anupamkrsin.wordpress.com; चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक)