भारतीय सैन्य इतिहास में 1 सितंबर 1959 का दिन एक बड़ा मोड़ था, जब राजनीतिक अहंकार और विचारहीनता के चलते देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर संकट में डाला गया। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल के.एस. थिमैया ने जब चीन के बढ़ते खतरे और सेना की कमजोर तैयारियों को लेकर रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन की मनमानी का विरोध करते हुए इस्तीफा दिया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सैन्य सलाह सुनने के बजाय अपने करीबी मंत्री का पक्ष लिया। नेहरू के इस रवैये और संसद में आर्मी चीफ के अपमान ने न केवल भारतीय सेना के मनोबल को गहरी चोट पहुंचाई, बल्कि 1962 के युद्ध में देश की पराजय की नींव भी रख दी। सैन्य नेतृत्व की अनदेखी करने, जीती हुई बाजी कूटनीति की मेज पर गंवाने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल खड़े करने की यह कांग्रेसी सोच 1947 के नेहरू से शुरू होकर आज राहुल गांधी के दौर तक लगातार देखने को मिलती है।
कांग्रेस के कारनामे – उपेक्षा, अहंकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ का इतिहास
‘सेना की जरूरत ही क्या है’ – जब नेहरू ने पहले सेना प्रमुख करियप्पा की सलाह का उड़ाया मजाक
1947 में आजादी के तुरंत बाद भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा ने जब देश की उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा और सेना के आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा, तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनकी दूरदर्शिता को खारिज करते हुए कहा था कि भारत को सेना की आवश्यकता ही नहीं है, पुलिस ही देश चलाने के लिए काफी है। देश की सुरक्षा के प्रति इस बुनियादी उपेक्षा ने शुरुआती दौर में ही सेना के विकास और रक्षा ढांचे को कमजोर कर दिया।
एकतरफा सीजफायर और यूएन की भूल – PoK का नासूर पैदा करने वाली नीति1948 में कबायली हमले के दौरान जब भारतीय सेना शौर्य का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीछे धकेल रही थी, तब नेहरू ने सेना को आगे बढ़ने से रोककर एकतरफा युद्धविराम घोषित कर दिया। सेना को अपनी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित करने का अवसर दिए बिना इस आंतरिक मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर ले जाने की ऐतिहासिक भूल की गई। इसी अदूरदर्शी फैसले के कारण पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) का विवाद पैदा हुआ, जिसका नुकसान देश आज तक उठा रहा है।
‘जीप घोटाला’ – रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की शुरुआत1948 में वी.के. कृष्ण मेनन ब्रिटेन में उच्चायुक्त रहते हुए सेना के लिए जीप खरीद के चर्चित मामले के केंद्र में थे। निष्पक्ष जांच कराने के बजाय नेहरू ने उनका बचाव किया और बाद में उन्हें देश का रक्षा मंत्री तक बना दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सौदों में बिचौलियों और राजनीतिक संरक्षण का यह पहला बड़ा उदाहरण बना, जिसने रक्षा खरीद तंत्र को प्रभावित किया।
अनुच्छेद 370 और 35A का थोपाव – कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद की नींव1949 में सरदार पटेल और डॉ. आंबेडकर की असहमतियों के बावजूद नेहरू सरकार ने संविधान में अनुच्छेद 370 और बाद में 1954 के राष्ट्रपति आदेश से 35A को जोड़कर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया। अलग संविधान, अलग झंडे और दोहरी व्यवस्था ने देश की एकता को चोट पहुंचाई और दशकों तक कश्मीर में अलगाववाद व सीमा पार आतंकवाद का आधार तैयार किया, जिसकी कीमत भारतीय सैनिकों और नागरिकों ने अपने बलिदान से चुकाई।
कोको द्वीप की अनदेखी – चीन को सामरिक जासूसी अड्डा सौंपने वाली ऐतिहासिक चूक1950 के दशक के आरंभ में बंगाल की खाड़ी में अंडमान द्वीप समूह के ठीक उत्तर में स्थित रणनीतिक कोको द्वीप समूह पर भारत का मजबूत ऐतिहासिक दावा था। लेकिन नेहरू सरकार की उदासीनता और कूटनीतिक ढिलाई के कारण यह क्षेत्र म्यांमार के नियंत्रण में चला गया। आज इसी कोको द्वीप पर चीन ने अपना इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और सैन्य निगरानी बेस बना रखा है, जहां से वह भारत के मिसाइल परीक्षणों, अंतरिक्ष अभियानों और नौसैनिक गतिविधियों पर सीधी नजर रखता है।
सरदार पटेल की चिट्ठी की उपेक्षा – जब पहले गृह मंत्री की चेतावनी को रद्दी समझा गया7 नवंबर 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को एक विस्तृत पत्र लिखकर तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भारत की सीमाओं पर मंडराते खतरे से आगाह किया था। पटेल ने स्पष्ट कहा था कि चीन शांति का मुखौटा पहनकर आक्रामकता की तैयारी कर रहा है। लेकिन नेहरू ने अपने उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की इस दूरदर्शी चेतावनी को भी यह कहकर खारिज कर दिया कि चीन कभी भारत पर हमला नहीं करेगा।
यूएन सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट पर चीन को तरजीह देने की भूल1950 के दशक में जब वैश्विक मंच पर भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के अनौपचारिक अवसर मिले, तब नेहरू ने चीन के पहले हक और एशियाई एकजुटता के नाम पर इसे ठुकरा दिया। भारत के हितों की अनदेखी कर चीन की स्थायी सदस्यता की पैरवी करने की इस भूल का नुकसान आज तक भारत उठा रहा है, जहां वही चीन वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत की राह में बाधाएं खड़ी करता है और आतंकवादियों का बचाव करता है।
पंचशील समझौता और तिब्बत सरेंडर – बफर स्टेट गंवाने की ऐतिहासिक भूल1954 में नेहरू सरकार ने चीन के साथ पंचशील समझौता करते हुए बिना किसी सीमा निर्धारण के तिब्बत पर चीन के कब्जे को आधिकारिक मान्यता दे दी। भारत ने सदियों पुराने अपने सामरिक, व्यापारिक और सैन्य अधिकार बिना किसी ठोस गारंटी के छोड़ दिए। भारत और चीन के बीच की ऐतिहासिक बफर सीमा समाप्त हो गई और चीन की सेना सीधे भारत की हिमालयी सीमाओं पर आकर तैनात हो गई।
जनरल थिमैया की अनसुनी चेतावनी और ‘नेहरू-मेनन’ की मनमानी1959 में जब सीमा पर चीनी गतिविधियां बढ़ रही थीं, तब जनरल थिमैया ने सरकार को सेना की स्थिति, हथियारों की कमी और चीन के आक्रामक इरादों को लेकर आगाह किया था। लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने पेशेवर सैन्य सलाह को दरकिनार करते हुए रक्षा नीतियों में दखलंदाजी शुरू कर दी। सेना की जरूरतों को पूरा करने के बजाय आयुध कारखानों की प्राथमिकताओं को भटकाया गया और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर पसंदीदा अफसरों को पदोन्नत किया गया। जब थिमैया ने इसके विरोध में इस्तीफा दिया, तो नेहरू सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय मानने के बजाय अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई बना लिया।
अक्साई चिन पर चीनी कब्जा – ‘घास का तिनका नहीं उगता’ कहकर 38,000 वर्ग किमी जमीन गंवाना𝐖𝐡𝐞𝐧 𝐉𝐚𝐰𝐚𝐡𝐚𝐫𝐥𝐚𝐥 𝐍𝐞𝐡𝐫𝐮 𝐬𝐢𝐝𝐞𝐥𝐢𝐧𝐞𝐝 𝐭𝐡𝐞 𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚𝐧 𝐀𝐫𝐦𝐲 𝐂𝐡𝐢𝐞𝐟
— BJP (@BJP4India) September 1, 2026
𝐓𝐡𝐢𝐬 𝐃𝐚𝐲, 𝐓𝐡𝐚𝐭 𝐘𝐞𝐚𝐫 | September 1, 1959
On September 1, 1959, Army Chief General K.S. Thimayya resigned amid serious differences with Defence Minister V.K. Krishna… pic.twitter.com/yWkK9kAzOI
1950 के दशक के मध्य में जब चीन ने भारत के लद्दाख स्थित अक्साई चिन क्षेत्र में गुपचुप तरीके से शिनजियांग-तिब्बत राजमार्ग (Highway 179) बना लिया, तब नेहरू सरकार वर्षों तक देश और संसद से इस घुसपैठ को छिपाए रही। जब 1959 में यह सच सामने आया, तो संसद में भारतीय सीमा की रक्षा का संकल्प लेने के बजाय प्रधानमंत्री नेहरू ने यह कहकर अपनी लाचारी पर पर्दा डाला कि ‘अक्साई चिन में तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता, वह बंजर इलाका है।’ इस गैर-जिम्मेदाराना रुख के कारण भारत ने अपनी 38,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक संप्रभु भूमि हमेशा के लिए गंवा दी।
संसद में सेना प्रमुख का सार्वजनिक अपमान – सैन्य मनोबल पर गहरी चोट
1959 में नेहरू ने जनरल थिमैया को इस्तीफा वापस लेने के लिए मना तो लिया, लेकिन इसके तुरंत बाद संसद के पटल पर दिए अपने बयान में आर्मी चीफ के रुख को मामूली और तुच्छ कहकर खारिज कर दिया। देश की संसद में सेना प्रमुख के स्वाभिमान को आहत करने की इस घटना ने पूरी सैन्य कमान का मनोबल तोड़ दिया। यह संदेश गया कि तत्कालीन सरकार के लिए राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक हठ था।1963 में 1962 की पराजय के कारणों की जांच के लिए सेना ने लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर पी.एस. भगत की समिति बनाई थी। इस रिपोर्ट में साफ दर्ज था कि विफलता के लिए सेना नहीं, बल्कि अपरिपक्व फॉरवर्ड पॉलिसी, सैन्य सलाह की अनदेखी और राजनीतिक दखलंदाजी जिम्मेदार थी। कांग्रेस सरकारों ने दशकों तक इस रिपोर्ट को गोपनीय बनाकर दबाए रखा, ताकि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की कमियां सामने न आ सकें।
1963 में 1962 के युद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने भारत के PoK क्षेत्र की 5,180 वर्ग किलोमीटर की सामरिक शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी। 1948 में PoK का मुद्दा अधूरा छोड़ने और 1962 की पराजय के कारण उपजी दुर्बलता के चलते नेहरू सरकार चीन और पाकिस्तान के इस गठजोड़ और भारतीय भूमि के बंटवारे को रोकने में पूरी तरह विफल रही।
आयरन लेडी इंदिरा गांधी जी
— Dr Nishikant Dubey (@nishikant_dubey) May 27, 2025
अमेरिकी दबाव में 1971 का युद्ध तत्कालीन रक्षामंत्री जगजीवन राम जी व सेनाध्यक्ष सैम मॉनेकशॉ के विरोध के बावजूद भारत ने खुद ही रोक दिया ।बाबू जगजीवन राम चाहते थे कि कश्मीर का हमारा हिस्सा जो पाकिस्तान ने ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा कर रखा है उसको लेकर ही युद्ध बंद… pic.twitter.com/8Z4guqatvx