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शरिया की पढ़ाई, आपत्तिजनक सिलेबस, कट्टरपंथियों से वास्ता, NCPCR ने सुप्रीम कोर्ट को बताया मदरसा तालीम का हाल: कहा- संविधान का उठा रहे हैं गलत फायदा

NCPCR ने मदरसा शिक्षा पर प्रश्न उठाए हैं (चित्र साभार: ऑपइंडिया द्वारा Dall-E का उपयोग करके बनाया गया प्रतीकात्मक चित्र)
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सुप्रीम कोर्ट के सामने मदरसा तालीम पर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट मदरसा तालीम को लेकर चिंताजनक तथ्य बताए हैं। आयोग ने कहा कि मदरसे भारत के संविधान द्वारा निर्धारित बच्चों के शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। NCPCR के अनुसार, “मदरसा तालीम भारत में बच्चों के शिक्षा के अधिकार में अड़ंगा डाल रही है। शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम या संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है।” 

दारुल उलूम देवबंद का प्रभाव: चरमपंथ का रास्ता?

NCPCR ने अपनी रिपोर्ट में मदरसों पर दारुल उलूम देवबंद के गहरे प्रभाव की बात कही है। NCPCR ने बताया है कि दारूल उलूम देवबंद को ‘शरिया की सख्त और रूढ़िवादी व्याख्या करने वाली विचारधारा’ बताया है। NCPCR ने आगे कहा कि तालिबान जैसे इस्लामी कट्टरपंथी समूह दारूल उलूम देवबंद की धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित रहे हैं। तालिबान पर इनका प्रभाव उनके मदरसों से जुड़ाव के चलते है क्योंकि मदरसों में दारूल उलूम देवबंद का काफी असर है। NCPCR ने छात्रों पर इस कारण इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ जाने का खतरा जताया है।

बच्चों को नहीं मिल रही औपचारिक शिक्षा, अधिकारों से भी हो रहे वंचित

NCPCR ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि मदरसा में पढ़ने वाले बच्चे शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 के तहत मिलने वाले अधिकारों से भी वंचित हैं। मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों को उच्च मानक वाली शिक्षा, मिड डे मील और अच्छे शिक्षकों तक पहुँच नहीं मिल रही।
NCPCR ने कहा कि RTE मानदंड पूरे ना होने के कारण मदरसे में पढ़ने वाले बच्चे बाक़ी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बराबर अधिकार नहीं पा रहे। NCPCR ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मदरसों के भीतर बच्चों को शारीरिक तौर पर दंड दिया जाता है। बच्चों को इन मदरसों के भीतर बताया जाता है कि इस्लाम ही सर्वोच्च है।
बच्चों का शारीरिक शोषण भी इन मदरसा में एक समस्या है, इसके कई मामले सामने आए हैं, आयोग ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चिंता जताई है। NCPCR ने कहा कि मदरसे अल्पसंख्यक संस्थान की श्रेणी में आते हैं और उन्हें संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) से छूट प्राप्त है। यह दोनों कानून बच्चों में समानता और और उनके स्वस्थ तरीके से और स्वतंत्रता और सम्मान की स्थिति में विकसित होने के अवसर और सुविधाएँ देना सुनिश्चित करते हैं।

मदरसों में गैर-मुस्लिम छात्र

NCPCR ने यह भी खुलासा किया है कि इन मदरसा में बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम छात्र भी पढ़ते हैं। यह देश के संविधान के अनुच्छेद 28(3) का उल्लंघन है। इस्लामी शिक्षा देने वाले यह मदरसे किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 75 का उल्लंघन भी करते हैं। NCPCR ने तर्क दिया है कि यहाँ बच्चों को इस्लाम के अलावा भी और धर्म को मानने से रोका जाता है, इसीलिए यह किशोर न्याय अधिनियम की धरा 75 का उल्लंघन है।

मदरसों का सिलेबस भी चिंताजनक

NCPCR ने उन पुस्तकों का भी संज्ञान लिया है जिन्हें दारुल-उलूम-देवबंद द्वारा जारी किए गए फतवों के आधार पर बनाया गया है और मदरसों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया गया है। ऐसे ही एक फतवे में तक़्वियत-उल-ईमान नाम की एक किताब को प्रामाणिक स्रोत बताया गया है। चिंता की बात यह है कि इस किताब में इस्लाम पर काफी कट्टर विचार लिखे हुए हैं।
आयोग ने यह भी पाया है कि मदरसों में पढ़ाई जाने वाली कई किताबों में बताया जाता है कि इस्लाम ही सर्वोच्च है। इससे यह चिंताएँ बढ़ गई हैं कि मदरसों में बच्चों को एक विचार की तरफ झुकाया जा सकता है। इसके अलावा, NCPCR ने पाया कि मदरसों की कुछ किताबों में नाबालिगों के साथ अवैध संबंधों के बारे में भी बात की गई है। इससे चिंताएँ और गहरी हो गई हैं।
NCPCR ने कहा, “आयोग को दारुल उलूम देवबंद द्वारा जारी किए गए फतवों के बारे में शिकायतें मिली हैं, जिसमें ‘बहिश्ती ज़ेवर’ नामक पुस्तक के संदर्भ शामिल हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि उक्त पुस्तक में बच्चों के संबंध में आपत्तिजनक और अवैध बाते लिखी गई हैं, इसमें नाबालिग बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने सम्बन्धित बाते तक हैं। यह पुस्तक मदरसों में बच्चों को पढ़ाई जाती है और इस तरह की आपत्तिजनक जानकारी वाले अन्य फतवे भी उपलब्ध हैं।”
इस किताब को 2023 में NCPCR के नोटिस के बाद दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट से हटा दिया गया था। NCPCR को दारुल उलूम की वेबसाइट पर ‘गजवा-ए-हिन्द’ से सम्बन्धित भी फतवा मिला था। NCPCR ने कहा, “आयोग ने दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट पर मौजूद एक फतवे का संज्ञान लिया है जिसमें भारत पर आक्रमण (गजवा-ए-हिंद) के बारे में बात की गई है और कहा गया है कि जो कोई भी इसमें मारा जाएगा वह एक महान शहीद कहा जाएगा।”

संविधान का हो रहा दुरुपयोग

NCPCR ने बताया कि मदरसों द्वारा अपने कारनामों को सही ठहराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 29(2) का दुरुपयोग किया जा रहा है। आयोग ने कहा, “इस्लामिक शिक्षा देने के लिए पढ़ाने के लिए मदरसे प्राथमिक संस्थान हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।” NCPCR ने कहा कि संविधान में मदरसों को मिली छूट बच्चों को संतुलित और औपचारिक शिक्षा प्रदान करने के व्यापक संवैधानिक दायित्व के अनुरूप नहीं है। NCPCR ने कहा कि मदरसे संविधान में दी गई छूट का नाजायज फायदा उठा रहे हैं।

कोर्ट करे मदरसों की निगरानी

NCPCR ने अंजुम कादरी की याचिका को चुनौती दी है। कादरी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमे उसने जिसमें उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2004 को रद्द कर दिया था। आयोग ने कहा कि यह अधिनियम धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों और अनुच्छेद 14, 21 और 21ए के संवैधानिक जनादेश के खिलाफ है। गौरतलब है कि हाई कोर्ट के इस निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए लेकिन लेकिन उपाय अधिनियम को रद्द करना नहीं है।