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'कामसूत्र' कोई आम 'सेक्स बुक' नहीं, दिमाग खोलने वाली किताब है

“वो सोचते हैं कि यह एक अश्लील किताब है। जिसमें बस रति क्रिया के बारे में ही लिखा है। लेकिन लोगों को जानना चाहिए कामसूत्र एक बेहद ही आकर्षक किताब है। इसमें स्त्री और पुरुष के बीच की बातें हैं। कैसे शादी करें, कैसे शादीशुदा रहे। एक दूसरे से प्रेम कैसे करें और शारीरिक संबंध कैसे बनाएं। कामसूत्र में महिलाओं की यौन स्वच्छंदता का विचार है। आज कुछ लोगों ने पवित्रतता के जो पैमाने तय किए हैं, उनकी तो कामसूत्र धज्जियां उड़ाता है। ”

बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में अमेरिकी इंडोलॉजिस्ट वेंडी डॉनिगर ने ये सब बातें कही थी।  वे प्राचीन काल में वात्स्यायन द्वारा लिखी गई किताब कामसूत्र पर अपने विचार रख रही थीं।  अकादमिक दुनिया में डॉनिगर हिंदू धर्म पर अपने काम के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने अपनी कई किताबों में कामसूत्र का जिक्र किया है। इस संबंध में उनकी एक महत्वपूर्ण किताब ‘द मेयर्स ट्रैप’ शीर्षक से है। वेंडी डॉनिगर अपनी इस किताब में धर्म और संस्कृति के प्रति एक अलग नजरिया लेकर आती है। 

Wendy Doniger का कहना है कि लैंगिकता
 और स्त्रियों की यौन आजादी को लेकर
 वात्स्यायन के कामसूत्र में आश्चर्यजनक रूप से
आधुनिक विचार हैं. (फोटो: कॉमन सोर्स)

‘अश्लीलता नहीं, कला का पर्याय है कामसूत्र’

हाल ही में खुद को धर्म का ठेकेदार मानने वालों ने अहमदाबाद में कामसूत्र की प्रतियां जलाईं। यह कहते हुए कि किताब हिंदू देवी देवताओं को ‘अश्लील स्थितियों’ में दिखाती है और इसलिए हिंदू धर्म का अपमान करती है। 
इंडिया टुडे से जुड़ी गोपी मनियार की रिपोर्ट के मुताबिक बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने 29 अगस्त को अहदमाबाद के एक बुक स्टोर में जाकर कामसूत्र की प्रतियां जलाईं। इन कार्यकर्ताओं ने यह धमकी भी दी अगर कामसूत्र की बिक्री जारी रहती है, तो वे अगली बार बुक स्टोर को ही आग के हवाले कर देंगे। कामसूत्र की प्रतियों को आग लगाते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने जय श्री राम और हर-हर महादेव के नारे भी लगाए। इस मामले में अभी तक कोई FIR दर्ज नहीं हुई है। 
वात्स्यायन के कामसूत्र में सात खंड, छत्तीस अध्याय, चौंसठ अनुच्छेद और साढ़े बारह सौ श्लोक हैं. लेखक अविनाश मिश्र ने इसका वृहद अध्ययन किया है। ‘चौंसठ सूत्र, सोलह अभियान’ शीर्षक से उनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। इस कविता संग्रह में कामसूत्र को आधार बनकार कविता रचना की गई है। अविनाश मिश्र नहीं मानते कि वात्स्यायन का कामसूत्र हमारी सभ्यता-संस्कृति और धर्म के खिलाफ है। उन्होंने हमें बताया,
“कामसूत्र, खजुराहो या प्राचीन काल से जुड़ी ऐसी कोई भी चीज अश्लीलता के दायरे में नहीं आती। ये कलाएं हैं। इनके संदर्भ में अश्लीलता को लेकर बहस कभी नहीं हुई। पढ़े लिखे लोग करते भी नहीं है। ना तो बौद्धिक समाज के लिए यह कभी अश्लीलता का सवाल रहा है और ना ही आम जनता के लिए।  जिनका संगीत और कला से कोई मतलब नहीं है।  जिनका पढ़ने-लिखने से कोई जुड़ाव नहीं है, वही लोग इन सब बातों पर हंगामा करते है।”
लेखिका सुजाता मानती हैं कि इस हंगामे के पीछे एक कारण है। अपनी किताब ‘आलोचना का स्त्री पक्ष’ में उन्होंने वात्स्यायन के कामसूत्र का जिक्र किया है. सुजाता कहती हैं-
“धार्मिक रूप से कट्टर लोग स्त्रियों को कैद करके रखना चाहते है। आप कहीं का भी इतिहास देखिए। जहां पर भी धार्मिक शासन लागू किया गया, वहां स्त्रियां कैद कर ली गईं। वात्स्यायन के कामसूत्र में स्त्री की यौन स्वछंदता का सवाल है। उसमें बताया गया है कि एक स्त्री भी पुरुष के समान ही आनंद पाने की हकदार है। कट्टर लोग इस आनंद पर कब्जा करना चाहते हैं और उसके सहारे स्त्रियों पर। ताकि वे अपनी पसंद का समाज बना सकें।”
सुजाता की किताब ‘आलोचना का स्त्री पक्ष’.
 इसमें उन्होंने वात्स्यायन के कामसूत्र
का जिक्र किया है. (फोटो: विशेष इंतजाम)

‘धार्मिक तंत्र को चुनौती’

वेंडी डॉनिगर अपनी किताब में लिखती हैं कि वात्स्यायन ने उस समय के धार्मिक ढांचे को एक तरह से चुनौती दी।  डॉनिगर कहती हैं कि मनुस्मृति के मुताबिक यौन क्रिया का एकमात्र उद्देश्य संतान उत्पत्ति है, जबकि कामसूत्र कहता है कि यौन क्रिया केवल और केवल आनंद प्राप्ति का जरिया है। 
यही नहीं, डॉनिगर लिखती हैं कि मनुस्मृति के मुकाबले कामसूत्र स्त्रियों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को ज्यादा तवज्जो देता है। डॉनिगर के मुताबिक, वात्स्यायन कामसूत्र में लिखते हैं कि घर चलाने के लिए संसाधनों पर महिलाओं का हक होना चाहिए। वहीं मनुस्मृति इसका विरोध करती है।  दूसरी तरफ कामसूत्र में विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं के पास तलाक देने के अधिकार की भी वकालत की गई है।  डॉनिगर के मुताबिक कामसूत्र में परपुरुषगमन, समलैंगिकता इत्यादि पर भी कमोबेश आधुनिक विचार व्यक्त किए गए हैं। इन्हें पाप की तरह नहीं देखा गया है। 
डॉनिगर आगे लिखती हैं कि उस वक्त के संदर्भ में कामसूत्र में स्त्री और पुरुष को लेकर गढ़ी गईं रूढ़िवादी धारणाएं भी महीन है। महिलाओं की शिक्षा पर भी जोर दिया गया है। हालांकि, इन सब बातों के बाद भी वेंडी कामसूत्र को पूरी तरह से स्त्रियों के हक में लिखी गई किताब नहीं मानतीं. डॉनिगर कहती हैं,
“लैंगिकता और स्त्रियों की यौन स्वछंदता को लेकर कामसूत्र के विचार आश्चर्यजनक रूप में आधुनिक है। लेकिन यह कोई नारीवादी या स्त्रियों के अधिकारों के लिए लिखी गई किताब नहीं है। इसका ज्यादातर हिस्सा पुरुषों के लिए है। उन्हें सलाह दी गई है कि आखिर वे स्त्रियों को कैसे रिझायें।”
दूसरी तरफ अविनाश मिश्र वेंडी डॉनिगर के इस विचार से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है,
“यह नहीं कहा जा सकता कि कामसूत्र स्त्रियों को ध्यान में रखते हुए नहीं लिखा गया। बस एक ही बात है कि उसे किसी पुरुष ने लिखा है। इसमें प्रेमी, प्रेमिका, पति और पत्नि के एक दूसरे के प्रति दायित्व की बातें है। इसी तरह से यह किताब आगे बढ़ती है। यह स्त्री और पुरुष दोनों के नजरिए से लिखी गई किताब है।”
अविनाश मिश्र यह भी कहते हैं कि कामसूत्र केवल यौन कला की किताब नहीं है। बल्कि इसमें दूसरी बातें भी है। हालांकि, विरोध करने वाले कुछ चुनिंदा बातों को उठा लेते है। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पढ़ता कि रचनाकार का केंद्रीय उद्देश्य क्या है। अविनाश मिश्र हाल के दिनों में आई वेब सीरीज तांडव का उदाहरण देते है। वो कहते हैं कि हंगामा काटने वालों ने केवल एक सीन पर हंगामा काट दिया, उस सीरीज का केंद्रीय उद्देश्य समझने की कोशिश नहीं की। यही काम कामसूत्र के साथ होता रहा है और अभी भी हो रहा है। हंगामा करने वाले बस एक सूत्रीय कार्यक्रम के आधार पर चलते हैं। 

आज भी प्रासंगिक है कामसूत्र

अकादमिक दुनिया में कामसूत्र का जिक्र जब भी होता है, तो कहा जाता है कि वात्स्यायन ने यह किताब उस समय लिखी जब यूरोप अंधकार के युग में फंसा हुआ था। कहने का मतलब यही कि स्त्रियों की स्वतंत्रता और यौनिक स्वछंदता को लेकर जो प्रतिमान यूरोपीय समाजों ने बहुत बाद में गढ़े, वात्स्यायन ने उन्हें बहुत पहले ही जगह दे दी थी। वेंडी डॉनिंगर कहती हैं कि भारतीय समाज में वात्स्यायन के ये विचार आज भी प्रासंगिक हैं और कामसूत्र पर किसी भी तरह का प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए. डॉनिगर कहती हैं,
“कामसूत्र आज भी प्रासंगिक है। मेरे विचार से तो नारीवादियों के लिए बहुत जरूरी है।  इसमें महिलाओं और यौन आनंद में उनकी बराबरी की बात है। अपने पसंद के उस पुरुष के साथ रहने के अधिकार की बात है, जो उनकी जरूरतों को समझे।”
सुजाता कहती हैं कि कामसूत्र में यह बताया गया है कि रति क्रिया बस पुरुषों का ही कौशल है।  हालांकि, उस समय के लिहाज से यौन सुख में स्त्रियों की बराबरी की बात करना अपने आप में बड़ी बात है। सुजाता आगे कहती हैं कि आज जरूरत है कि हम वात्स्यायन के कामसूत्र से जरूरी सीख लें। इसके बाद औरतों की यौनिकता के बारे में शोध करें। यह नहीं कि कि समाज, सभ्यता और संस्कृति को बचाने के नाम पर किताबें जलाते रहे। (साभार)

दिल्ली: हनुमान मंदिर के भीतर आपत्तिजनक मूर्तियां कहां से आयीं?

मंदिर में आपत्तिजनक मूर्तियों का सच?
राजधानी दिल्ली के विवेक विहार स्थित हनुमान बालाजी मंदिर से खजुराहो जैसी मूर्तियाँ मिलने के बाद हिन्दू संगठन से जुड़े लोगों और समाजसेवियों ने हंगामा खड़ा कर दिया था। इन लोगों ने इलाके को घेर कर रोड जाम कर दिया। पुलिस ने हालात पर काबू पाने के लिए पूरे इलाके को सील कर दिया। लोगों में मंदिर के अंदर आपत्तिजनक मूर्तियों के मिलने से आक्रोश था। उनका कहना था कि यह सब हिन्दू समाज को बदनाम करने की एक कोशिश है।
क्या मंदिर पुजारी और प्रबंधकों को नहीं मालूम ब्रह्मचारी थे? क्या कहीं हनुमान या अन्य किसी मंदिर में खजुराहो मूर्तियां देखी हैं? फिर हनुमान मंदिर में क्यों? कौन लोग हैं, जो हिन्दू धर्म को बदनाम कर रहे हैं?
सच्चाई क्या है?
हालाँकि सच्चाई कुछ और है। वहाँ के एक स्थानीय कार्यकर्ता ने मंदिर के अंदर अश्लील मूर्तियों के बनने की बात को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि इस तरह से इसे आगे प्रसारित कर हिन्दू धर्म के लोगों ने बिना सच जाने अपने ही भगवान, अपने ही धर्म का मजाक बना रहे हैं।
वो कहते हैं कि लोग धड़ल्ले से इस फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि ऐसा करके वो अपने धर्म को सपोर्ट करने की बजाय उसका मजाक बनवा रहे हैं। कार्यकर्ता ने बताया कि मीडिया रिपोर्ट में जो भी चीजें बताई जा रही हैं, वो सभी गलत हैं। 
स्थानीय कार्यकर्ता ने कहा, “मंदिर में लगातार निर्माण कार्य चल रहा है। जहाँ से मंदिर के लिए मूर्तियाँ बनकर आती है, उसी फैक्ट्री में किसी फॉर्महाउस का गंदी मूर्तियाँ बनाने के ऑर्डर था। वहाँ से एक ही ट्रक पर दोनों ऑर्डर निकले। गलती से लेबर ने सारी मूर्तियाँ यहीं पर उतार ली। जब मंदिर वालों ने पैकेट खोल कर मूर्ति देखी तो तुरंत उन्हें फोन करके कहा कि गलत मूर्तियाँ यहाँ पर आ गई है। इसे तुरंत उठवाओ। उन्होंने कहा कि मेरी दूसरी गाड़ी 4-5 दिन में आ रही है, वो इसे उठाकर ले जाएगी।”
कार्यकर्ता ने आगे कहा, “इसी बीच किसी ने ये बात लीक कर दी कि मंदिर वाले मूर्तियाँ बना रहे हैं। मंदिर में मूर्तियाँ बनती नहीं है। मंदिर में मूर्तियाँ राजस्थान की फैक्ट्री से आती हैं। मंदिर वालों की सिर्फ इतनी गलती है कि उन्होंने इन मूर्तियों को 4-5 दिन अपने यहाँ पड़ी रहने दी।”