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इस्लाम, ईसाई और पश्चिम की हीन भावना पर टिका है नेहरूवाद: जवाहर लाल नेहरू को सीता राम गोयल की ‘श्रद्धांजलि’

In fond memory of Sita Ram Goel: A pagan warrior in a world of ...
सीता राम गोयल ने अपनी आत्मकथा ‘How I became a Hindu’(अपनी इस आत्मकथा को सर्वप्रथम Organiser weekly में श्रृंखला रूप में प्रकाशित करने उपरान्त पुस्तक के रूप में समायोजन किया गया।) में स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक अध्याय समर्पित किया है। ‘Nightmare of Nehruism’ नामक अध्याय में वह जवाहरलाल नेहरू के बारे में बात करते हैं। यह चैप्टर तीसरे पुनर्मुद्रण के दौरान जोड़ा गया था। चैप्टर संख्या 9 के पुनर्प्रकाशित अंश नीचे हैं;
यह सभी जानते हैं कि पंडित नेहरू किसी भी तरह से एक अद्वितीय चरित्र नहीं थे। न ही नेहरूवाद एक अनोखी घटना है। इस तरह के कमजोर दिमाग वाले व्यक्ति और इस तरह की विचारशील प्रक्रियाएँ उन सभी समाजों में देखा गया है, जो कुछ समय के लिए विदेशी शासन के अधीन होने का दुर्भाग्य झेल चुके हैं।
सभी समाजों में हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो संस्कृति की श्रेष्ठता के साथ सशस्त्र की श्रेष्ठता को भ्रमित करते हैं। जो स्वयं को एक निम्न वंश का समझने लगते हैं और आत्मविश्वास हासिल करने के लिए विजेता के तरीकों को अपनाते हुए समाप्त हो जाते हैं। जो अपने पूर्वजों से विरासत में मिली चीजों से दोष ढूँढना शुरू करते हैं,और जो अंत में हर उस ताकत और फैक्टर के साथ हाथ मिलाते हैं, जो उनके पैतृक समाज को खत्म करने के लिए तत्पर होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो पंडित नेहरू एक स्वजातीय हिंदू से अधिक नहीं थे और नेहरूवाद, हिंदुत्व से पैदा नहीं हुआ है, बल्कि यह इस्लाम, ईसाई और आधुनिक पश्चिम में बैठी गहरीहीन भावना पर टिका हुआ है।
Sita Ram Goel - WikiMili, The Best Wikipedia Reader
मध्ययुगीन भारत में मुस्लिम शासन ने ऐसे स्वजातीय हिंदुओं के एक पूरे वर्ग का निर्माण किया था। उन्होंने मुस्लिम बाहुल्य की श्रेष्ठता को मुस्लिम संस्कृति की श्रेष्ठता का प्रतीक बताया था। समय के साथ वे विजेता की तरह सोचने और व्यवहार करने लगे थे। वे उस समय बहुत खुश होते थे, जब उन्हें मुस्लिम संस्था में नौकरी मिलती थी, जिससे कि वो सत्ताधारी कुलीन वर्ग के सदस्यों के रूप में जाने जा सकें। उनके पक्ष में एक ही बात कही जा सकती थी कि कारण चाहे जो भी रहा हो, वो इस्लाम में परिवर्तित नहीं हुए और खुद को पूरी तरह से मुस्लिम समाज में मिला लिया। इसी कारण से वे इस्लामी साम्राज्यवाद के ‘ट्रोजन हॉर्सेस’ बन गए थे और अपने लोगों की सांस्कृतिक सुरक्षा को नीचे गिराने की दिशा में काम किया।
जब ब्रिटिश सेना विजयी हुए, तो उसी वर्ग ने ब्रिटिश की ओर अपना कदम बढ़ाया। उन्होंने उन अधिकांश हिंदू पूर्वाग्रहों को बरकरार रखा, जो उन्होंने अपने मुस्लिम आकाओं से उधार लिए थे। इसके अलावा ब्रिटिश प्रतिष्ठान और ईसाई मिशनों द्वारा योगदान की गई सभ्यताओं का भी उन्होंने विस्तार किया। इस तरह ब्रिटिश शासन उनके लिए एक दैवीय व्यवस्था बन गया। इस दोहरी प्रक्रिया का सबसे विशिष्ट परिणाम राजा राम मोहन रॉय थे।
सरदार पटेल की मृत्यु के बाद कुछ वर्षों के भीतर पंडित नेहरू ने जो शक्ति और प्रतिष्ठा हासिल की, उसका अपने गुणों से कोई लेना-देना नहीं था। न तो एक व्यक्ति या एक राजनीतिक नेता के रूप में और न ही एक विचारक के रूप में। वे एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणाम थे, जो एक अलग वर्ग के स्व-पृथक हिंदुओं की वजह से आए थे। यदि यह वर्ग न होता तो पंडित नेहरू कभी शीर्ष पर नहीं आते।
यह कोई अप्रत्याशित घटना या फिर इत्तफाक नहीं है कि नेहरूवादी शासन ने ज्यादातर मामलों में ब्रिटिश राज की तरह व्यवहार किया है। नेहरूवादियों ने भारत को एक हिंदू देश के रूप में नहीं बल्कि एक बहुनस्लीय, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक कॉकपिट के रूप में देखा है। उन्होंने अंग्रेजों की तरह अल्पसंख्यकों की मदद से मुख्यधारा के समाज और संस्कृति को दबाने की अपनी पूरी कोशिश की। यही कारण है कि उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद द्वारा क्रिस्टलीकृत है।
उन्होंने हिंदू समाज को खंडित करने का भी प्रयास किया। वास्तव में, यह हिंदू संस्कृति की हर अभिव्यक्ति को खत्म करने, हिंदू गौरव के हर प्रतीक को खत्म करने और अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर हर हिंदू संगठन को सताए जाने के लिए उनके पूरे समय का व्यवसाय है। हिंदुओं को उन राक्षसों के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें अगर सत्ता में आने की अनुमति दिया जाए, तो वो सांस्कृतिक नरसंहार करेंगे।
देश का विभाजन इस्लामी साम्राज्यवाद की वजह से हुआ था, मगर नेहरूवादियों ने इसे बड़े ही बेशर्मी से इसे हिंदू सांप्रदायिकता के रूप में कलंकित किया। सोवियत साम्राज्यवाद के हितों में कम्युनिस्टों द्वारा भारत के नवजात गणतंत्र पर युद्ध छेड़ा गया था। लेकिन नेहरूवादी इन गद्दारों के लिए माफी माँगने में व्यस्त थे और RSS के सामने हथौड़ा और चिमटा चला रहे थे।
मैं विवरण में नहीं जा रहा हूँ क्योंकि मुझे यकीन है कि जो कोई भी इस विषय पर गौर करेगा, समानताएँ उसके लिए खुद ब खुद स्पष्ट हो जाएँगी। नेहरूवादी फॉर्मूला यह है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि असली अपराधी कौन है, हिंदुओं को हर हाल में अभियुक्त बनाया जाना चाहिए।
यह मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य था कि पंडित नेहरू कभी मेरे हीरो नहीं बने। हीरो के पास एक कला होती है कि वो अपने चाहने वालों के विचार और मीमांसा का समाधान करता है, मगर मेरे विचार और मीमांसा को हर बार निस्तेजता का सामना करना पड़ा है। लेकिन बहुत लम्बे समय के लिए नहीं। पंडित नेहरू के सम्मोहन के तहत एक पल के लिए भी नहीं।
एकमात्र नेता, जिनके बारे में मुझे पता था, वे पंडित नेहरू थे। उनके बारे में काफी लोककथाएँ थीं। वह इलाहाबाद में एक महल में रहने वाले एक अमीर आदमी के इकलौते बेटे के रूप में प्रतिष्ठित थे। जो लंदन में अपने कपड़े सिलाता था और पेरिस में लॉन्ड्री कराता था। जब वायसराय उनसे मिलने आए थे, तो उन्होंने चाय बनाने के लिए ईंधन के रूप में उच्च मूल्यवर्ग के करेंसी नोटों का इस्तेमाल किया था।
जब उन्होंने पहली बार खादी के कपड़े पहने थे, तो उनकी कोमल त्वचा पर फफोले पड़ गए थे। बेटे को इंग्लैंड में उनकी स्कूल और कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाना जाता था, उन्होंने वेल्स के राजकुमार की दोस्ती को कलंकित किया, जो उनका सहपाठी था। उन्होंने अपने ही लोगों के खिलाफ विश्वासघात करके बेताज बादशाह होना चुना।
पंडित नेहरू के मंच पर आते ही तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया। फिर औपचारिक रूप से एक स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता द्वारा उनका परिचय दिया गया। लेकिन जो अगली चीजें मैंने देखी उसे देख अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, मुझे अपनी आँखें मिंचनी पड़ी। महान व्यक्ति का चेहरा लाल हो गया था, वो बाईं ओर मुड़ गया और उसी नेता के चेहरे पर एक जोरदार थप्पड़ लगाया, जो माइक के पास ही खड़ा था। माइक ने काम करना बंद कर दिया था। पंडित नेहरू तेज आवाज में चिल्ला रहे थे जैसे कि कुछ भयानक हुआ हो।
इस बीच माइक ने फिर से काम करना शुरू कर दिया। इसके बाद उनकी आवाज सुनी जा सकती थी। वो कह रहे थे, “दिल्ली की कॉन्ग्रेस के नेता कमीने हैं, जाहिल हैं, नामाकूल हैं। मैंने कितनी बार इनसे कहा है कि इंतजाम नहीं कर सकते तो मुझे मत बुलाया करो, पर ये सुनते ही नहीं।” एक पल के लिए पिन ड्रॉप साइलेंस था और फिर अगले ही पल एक और तालियों की गड़गड़ाहट गूँजी। गाँधी ने मेरे बगल में बैठे आदमी से कहा, “पंडित जी अपने मिजाज (temper) के कारण प्रसिद्ध हैं और लोग उसे इसी तरह से पसंद करते हैं।”  मैं मंच की ओर बढ़ा। थप्पड़ खाने वाले कॉन्ग्रेसी नेता का चेहरा मुस्कुराहट में नहाया हुआ था, जैसे कि उन्होंने कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार जीता हो।
इसके बाद जो भाषण हुआ वह और भी निराशाजनक था। मुझे विषय याद नहीं है। यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के बारे में रहा होगा। अब मैं याद कर सकता हूँ कि पंडित नेहरू जिस भाषा में बात कर रहे थे। यह न तो हिंदी थी और न ही उर्दू।
उनके अधिकांश वाक्य व्याकरण या वाक्य-विन्यास के संदर्भ से कोसों दूर थे। कभी-कभी, वह बोलते हुए लड़खड़ा भी रहे थे। मुझे लगा कि वह बहुत खराब वक्ता थे। मैंने कई अन्य लोगों को सुना था, जो इतने प्रसिद्ध नहीं थे, फिर भी बेहतर और अधिक सुसंगत थे। मैंने उनकी भाषा पर गौर नहीं किया होता अगर मुझे नहीं पता होता कि वह एक ऐसे प्रांत से ताल्लुक रखते हैं जो हिंदी और उर्दू दोनों के लिए प्रसिद्ध था।
लेकिन जैसे-जैसे मैं स्टेज की तरफ बढ़ा, यह और भी ज्यादा अशोभनीय था। पंडित नेहरू कॉन्ग्रेस नेताओं की पकड़ से मुक्त होना चाहते थे। उन्हें नीचे कूदने से रोका जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि वो इस बात से अंजान हैं कि सामने भीड़ बैठी हुई है। एक पल वह आगे बढ़ रहा था, और अगले ही पल उसे वापस खींचा जा रहा था। और हर समय, वह तेज आवाज में चिल्ला रहे थे।
तभी माइक पर उन्हें कहते हुए सुना गया, “देखना चाहता हूँ इन कमीनों को मैं। बता देना चाहता हूँ इनको कि मैं कौन हूँ। इनकी ये गंदी हरकतें मैं कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता।” हंगामा मच गया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने उन्हें पकड़ा हुआ था। तभी उन्होंने अपना दाहिना हाथ ऊपर करके चिल्लाते हुए कहा, “मैं एक शानदार आदमी हूँ।” भीड़ बेतहाशा, लगातार तालियाँ बजा रही थी।
यह घटना 1947 के अंत में या फिर 1948 के शुरू में हुआ। मैं अमेरिका से आए मेरे पत्रकार मित्र से मिलने दिल्ली गया था। मैं कॉफी हाउस में उनके साथ बैठा था, तभी उन्होंने कहा, “सीता, ये आदमी अपने बारे में क्या समझता है कि ये कौन है? सर्वशक्तिमान ईश्वर?” हे ईश्वर?” मैंने उनसे पूछा, “कौन? क्या हुआ है?” उन्होंने मुझे कुछ साधुओं की कहानी सुनाई, जो नई दिल्ली में पंडित नेहरू के निवास के पास अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठे थे, और उनसे आश्वासन माँग रहे थे कि गोहत्या बंद कर दी जाएगी।
मेरे दोस्त ने कहा, “मैं कुछ तस्वीरें लेने, और रिपोर्ट इकट्ठा करने के लिए वहाँ गया था। अमेरिकी पाठक भारत की ऐसी कहानियों को काफी पसंद करते हैं। लेकिन जो मैंने देखा वह मेरे लिए एक डरावनी घटना थी। मैं कुछ अंग्रेजी जानने वाले साधुओं में से एक से बात कर रहा था, यह आदमी अपनी बहन पंडित के साथ घर से निकला। ये दोनों हिंदी में कुछ चिल्ला रहे थे। बेचारे साधु अचरज में पड़ गए और खड़े हो गए। इस आदमी ने साधु को थप्पड़ मारा जो हाथ जोड़कर आगे बढ़ा था। उसकी बहन ने भी ऐसा ही किया। वे कुछ कह रहे थे जो बहुत कठोर लग रहा था। फिर वे दोनों वापस चले गए। जितनी तेजी से वे आए थे, उतनी ही तेजी से गायब भी हो गए। साधु ने विरोध में एक शब्द भी नहीं बोला, न ही उनके सामने और न ही उन दोनों के जाने के बाद। उन्होंने यह सब मान लिया था जैसे कि यह सामान्य बात थी।”
मैंने कहा, “लेकिन पंडित नेहरू के मामले में यह सामान्य बात है। वह सारी जिंदगी लोगों को थप्पड़ और लात मारते रहे हैं।” उन्होंने निष्कर्ष निकाला, “मुझे आपके देश के कायदे-कानून की जानकारी नहीं है। लेकिन मेरे देश में, यदि राष्ट्रपति किसी नागरिक पर इतना चिल्लाता है, तो उसे भी पद से जाना होगा। हम इस बदतमीजी को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो।” मैं खामोश रहा।
पंडित नेहरू को हर वक्त इस्तीफा देने की धमकी देने की आदत थी। यह उनका पेटेंट तरीका था कि लोग इसका विरोध करें, कि वह देश के लिए अतिआवश्यक हैं, उनके बिना देश बर्बाद हो जाएगा। वह हर बार अपने पक्ष में एक तूफान उठाने में सफल रहे और जिसने भी उन्हें बाहर निकालने की कोशिश की, उसे उन्होंने बदनाम कर दिया। इस तरह वो घोंघा की तरह सिंहासन से चिपके रहे। ब्रिगेडियर दलवी के शब्दों में, इस्तीफा देने की मंशा से गुजरने के लिए भी उनके पास शालीनता नहीं थी।