2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से विपक्ष का परेशान होना तो समझ आता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट क्यों? सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के अधीन है या सरकार सुप्रीम कोर्ट के अधीन? क्यों उल्टी नदी बहाने की कोशिश कर रही है सुप्रीम कोर्ट? यह वह ज्वलंत प्रश्न है जिसका सुप्रीम कोर्ट को जवाब देना चाहिए या फिर आत्मचिंतन कर अपनी सीमाओं में रहकर कानून के दायरे में रहकर निर्णय देने होंगे। सुप्रीम कोर्ट को जनता की नब्ज पढ़ने की आदत डालनी होगी। किसी भी पार्टी का समर्थक होना अलग बात है लेकिन फैसले में भेदभाव करना शर्म की बात है। राहुल गाँधी को जमानत देने का अंजाम देख रहे हो कि किस तरह जनता को भड़काने की कोशिश कर रहा है। इतना ही नहीं नेताओं को जमानत देकर उनकी फाइलों पर कुंडली मार बैठ जाते हो, ये कौन-सा कानून है? देर रात भ्रष्टाचारियों और आतंकवादियों के लिए अदालत लगाने वाले जजों पर क्यों नहीं कार्यवाही की जाती? नूपुर शर्म केस में जिस तरह टिप्पणी की क्या सुप्रीम कोर्ट में ऐसी ही टिप्पणी किसी मजहब के लिए करने की हिम्मत है? कन्हैया के कातिल क्यों आज़ाद घूम रहे हैं?
20 नवंबर को राष्ट्रपति के 14 प्रश्नों के उत्तर सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने देने की कोशिश की है लेकिन फिर भी कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए। राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से प्रश्नों के उत्तर मांगने के पीछे जस्टिस परदीवाला और जस्टिस आर महादेवन का वह “आतंकी आदेश” था जो उन्होंने एक तानाशाह की तरह राष्ट्रपति की गरिमा को कलंकित करते हुए दिया था कि उन्हें राज्य सरकार के विधेयकों पर 3 महीने में फैसला लेना होगा अन्यथा वह विधेयक स्वतः ही पारित माने जाएंगे और लंबित विधेयक दोनों जजों ने पारित कर दिए थे।
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परंतु बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि “Governors and President cannot be subjected to judicially prescribed timelines for their decisions on Bills under Article 200 / 201- Timelines cannot be fixed for Governors/President for Bills’ Assent; No concept of deemed Assent. लेकिन Judicial Timeline के है यह नहीं बताया, और अगर है तो वह न्यायपालिका पर भी लागू होनी चाहिए जिससे 10-10 केस लटके न रहें।
सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण साफ़ कह रहा है कि जस्टिस परदीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने राष्ट्रपति को एक आतंकी आदेश दिया था क्योंकि आतंकी आदेश वह होता है जो सामने वाले के लिए उसे मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ता और यही काम दोनों जजों ने किया। उनके राष्ट्रपति को दिए गए आदेश और सुप्रीम कोर्ट के उत्तर से स्पष्ट होता है कि परदीवाला और महादेवन को कानून की elementary knowledge भी नहीं थी खासकर ऐसे विषय पर कि क्या उन्हें राष्ट्रपति को आदेश देने का अधिकार है भी या नहीं जबकि राष्ट्रपति संविधान प्रमुख होता है (Constitutional Head)।
राष्ट्रपति को आदेश देना दोनों जजों की निर्लज्जता की पराकाष्ठा थी क्योंकि वे आदेश उन्हें नियुक्त करने वाली संवैधानिक संस्था (राष्ट्रपति) को थे। परदीवाला तो अपनी न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए कुख्यात है। नूपुर शर्मा के प्रति उनका व्यवहार मर्यादाहीन था और कुछ दिन पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज को अपमानित करते हुए उनके खिलाफ ऐसे आदेश दिए थे कि हाई कोर्ट बार के विरोध के बाद वो आदेश वापस लेने पड़े।
अभी भी कुछ शर्म परदीवाला और महादेवन में बची है तो वे राष्ट्रपति को दिए गए आदेश का निर्णय वापस लें और त्यागपत्र दें। वैसे उनके फैसले को चीफ जस्टिस के पास याचिका दायर करके बड़ी बेंच से सुनवाई करने का अनुरोध भी किया जा सकता है लेकिन उसमे बहुत समय लगेगा और इसलिए उन्हें ही अपना फैसला वापस ले लेना चाहिए। Pardiwala has proved be habitual offender in the legal field और इसलिए अगर वो त्यागपत्र नहीं देते तो राष्ट्रपति उन दोनों को बुलाएं और त्यागपत्रों पर हस्ताक्षर करने के लिए कहें। “अति का अंत होना ही चाहिए”।
सुप्रीम कोर्ट को अपने पर स्वयं लगाम लगानी चाहिए। 2 दिन पहले एक अन्य फैसले में Tribunals Act 2021 को ख़ारिज करते हुए एक और आतंकी फैसला देते हुए कॉलेजियम का दायरा बढ़ाते हुए ट्रिब्यूनल्स के हेड की नियुक्ति भी सरकार से छीन ली है। सरकार से टकराव पर न्यायपालिका को भारी पड़ेगा क्योंकि मोदी की सहनशीलता की भी एक सीमा है, उसे उकसाने की कोशिश न करे सुप्रीम कोर्ट।

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