दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत ने एक बार कहा था कि भारत को 2 मोर्चों पर नहीं ढाई मोर्च पर लड़ाई लड़नी है। 2 मोर्चे यानी पाकिस्तान और चीन हमारे सामने हैं और आधा मोर्चा देश के भीतर ही छिपा बैठा है। इसकी कोई तय सूरत नहीं है लेकिन उसकी सीरत भारत विरोध ही है। भारत के खिलाफ बयानबाजी और आतंकी व भारत विरोधी तत्वों को कवर फायर देना, यही काम इस आधे मोर्चे का है। इसका जिक्र क्यों? जब तक देश में इन बहरूपी नेताओं पर कार्यवाही नहीं होगी देश में छिपे गद्दारों, आतंकवादियों से निजात नहीं मिलेगी। पत्थरबाजों और दंगाइयों पर भी ऐसी ही कार्यवाही होनी चाहिए।
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के एक बयान के कुछ हिस्से पढ़िए। उन्होंने लाल किले के सामने विस्फोट पर कहा है, “कश्मीर की मुसीबत लाल किले के सामने बोल पड़ी है।” जनसत्ता में छपे एक बयान के मुताबिक, उन्होंने कहा, “जो युवा डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए तैयार थे, वे अब खुद को विस्फोट करने के लिए तैयार हैं, यह सोचने की जरूरत है।”
मुफ्ती ने कहा आगे है, “हमसे कहाँ गलती हुई। केंद्र सरकार को सोचना होगा। आपने यहाँ के युवाओं से वादा किया था कि आप उनके हाथों से पत्थर और बंदूकें लेकर उन्हें लैपटॉप देंगे। लेकिन आज आपने उसी युवा को आत्मघाती हमलावर बना दिया है।”
आतंकियों के लिए महबूबा का दर्द कोई पहली बार या नया नही हैं। आतंकी बुरहान वानी से लेकर अफजल गुरु और यासीन मलिक तक उनकी नजरों में हालात के मारे लोग रहे हैं। वो इनको मिली सजा के लिए न्याय व्यवस्था तक पर सवाल खड़े कर चुकी हैं और अब आतंक की पौध को तैयार करने का ठीकरा भी केंद्र सरकार के सिर मढ़ देना चाहती हैं।
द वायर में महबूबा का अफजल और यासीन के लिए लेखअब आते हैं महबूबा के बयान पर और समझने की कोशिश करते हैं कि वो केंद्र को निशाना बना रही हैं लेकिन क्यों? हो सकता है कि केंद्र की योजनाओं को लेकर सवाल हों, कई लोगों में नाराजगी पर भी हो सकती है लेकिन क्या इतनी नाराजगी कि लोग आतंकी बन जाएँ? जाहिर है ऐसा कतई नहीं है, तो बात साफ है कि महबूूबा मुफ्ती अपने इस बयान के सहारे किसी को तो बचाने की कोशिश कर रही हैं।
महबूबा मुफ्ती ने दोष बेशक केंद्र पर मढ़ दिया लेकिन शायद इसकी आड़ में जहर बोने वालों को बचाने की भी कोशिश चल रही है। वह उन्हें कवर फायर देने पर आमादा हैं जिनकी वजह से नौजवान किताबों और लैपटॉप से खीचकर बम-बारूद की ओर जा रहे हैं। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन क्या दिल्ली से चलाए जाते हैं? कल को कहीं महबूबा यह सवाल ना उठा दें कि इन आतंकी संगठनों की विचारधाराएँ संसद में बैठकर लिख जा रही हैं?
महबूबा का सवाल आतंकी कैंपों में दी जाने वाली ट्रेनिंग पर नहीं है, वहाँ फैलाई जाने वाली नफरत पर नहीं है और पाकिस्तान से आने वाली फंडिंग पर भी नहीं है। वो बस केंद्र सरकार और उसकी नीतियों को ही आतंकवाद का जिम्मेदार बताना चाहती हैं। वो उस मजहबी कट्टरता को नहीं देखती हैं जो युवाओं के मन में भरी जा रही है।
भारत 140 करोड़ लोगों का देश है। तरह की परेशानियाँ यहाँ हैं, रोजगार की दिक्कतें हैं, असमानता और संघर्ष भी है लेकिन क्या देश के लोग बारूद बनकर फट गए हैं? क्या देश के युवा अपनी समस्याओं का समाधान टिफिन या जूते में बम बाँधकर निकालता है? यह कहना कि किसी युवा के हाथ में बंदूक इसलिए आई क्योंकि सरकार ने लैपटॉप नहीं दिया, आतंकियों की विचारधारा को एक राजनीतिक तर्क में बदलने की कोशिश है।
सरकार ने कश्मीर के विकास के लिए लगातार काम किया है। शिक्षा से लेकर पर्यटन और रोजगार के अवसर बनाए गए हैं लेकिन कुछ राजनीतिक दल और अलगाववादी समूह हर समस्या के पीछे एक ही कहानी बताते हैं- नाराजगी।
इसी कथित नाराजगी का इस्तेमाल आतंकी संगठन अपने रिक्रूटमेंट के लिए करते रहते हैं। गुमराह करने वाली किताबें, उकसाने वाले भाषण, मजहबी लोगों और स्थानों से फैलाए गए कट्टर संदेश और बॉर्डर के उस पार से आने वाले हथियार-पैसे, ये जिस आतंकी इकोसिस्टम की देन है उस पर महबूबा जैसे लोग सवाल नहीं उठाते हैं।
महबूबा का तर्क है कि केंद्र ने युवाओं को पत्थर और बंदूकें छुड़ाकर लैपटॉप देने का वादा किया था। हाँ, वादा किया था और बड़े पैमाने पर दिया भी गया। जम्मू-कश्मीर में स्कूल-कॉलेजों के लिए नई इमारतें बनीं, मेडिकल कॉलेजों की सीटें बढ़ीं, पर्यटन के रिकॉर्ड टूटे, खेल के मैदान भरे, उद्योग ने दस्तक दी और युवाओं ने स्टार्टअप शुरू किए।
महबूबा कभी यह नहीं पूछतीं कि इतने सकारात्मक बदलावों के बीच भी आतंकी संगठन क्यों सक्रिय हैं, कौन उन्हें बनाए रखता है, कौन उनके लिए भर्ती करने का माहौल तैयार करता है। यह सवाल भी तो उठना चाहिए कि जो युवा पढ़ाई के लिए तैयार थे उन्हें ‘शहादत’ के नाम पर कौन तैयार करता है?
केंद्र सरकार को दोष देना आसान है। आतंकी विचारधारा से सवाल पूछना और उसके कटघरे में खड़ा करना मुश्किल हैं। कश्मीर के युवाओं के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रही महबूबा मुफ्ती को इन चालबाजियों से बाहर आने की जरूरत है। जनता ने आपको नकार दिया है और आपके इन विचारों को अपने वोट से नकार दिया है।
कश्मीर के युवाओं ने बार-बार दिखाया है कि वे खेल, शिक्षा, कला और व्यापार अन्य क्षेत्रों में भी कमाल का काम कर सकते हैं। कुछ नेता जो चाहते हैं कि उनका दर्द के बहाने वो अपनी राजनीतिक दवाई तलाश कर सकें उनसे युवाओं को बचना ही होगा।
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