जस्टिस सूर्यकांत देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार, 24 नवंबर को राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस महत्वपूर्ण संवैधानिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, पूर्व सीजेआई बीआर गवई सहित देश के कई गणमान्य लोग मौजूद थे। लेकिन इस पूरे भव्य और महत्वपूर्ण समारोह में जो चेहरा साफ तौर पर नजर नहीं आया, वह था विपक्ष के नेता राहुल गांधी का। यह भारतीय लोकतंत्र के शिष्टाचार और मर्यादा पर लगा एक ऐसा दाग है, जिसे व्यस्तता के पर्दे में नहीं छिपाया जा सकता।
जब से राहुल गाँधी Leader of Opposition बने बराबर इस पद की गरिमा को कलंकित किया जा रहा है। लगता है राहुल की उस बिगड़ैल बच्चे के सामान है जो सोने के चम्मच को लेकर पैदा होता है और उसके हर कदम को खुशामदीद वाह वाह करते रहते हैं। ऐसे नेता खुद तो डूबते अपनी पार्टी और पार्टी को समर्थन देने वालों को भी ले डूबते हैं। क्या राहुल और कांग्रेस को वोट देने वाले आत्मचिंतन करेंगे? बिहार में कांग्रेस की हुई दुर्गति से भी कांग्रेस कुछ नहीं सीख रही, फिर रोते हैं वोट चोरी हो गयी। हकीकत यह है कि वोट चोरी चुनाव आयोग द्वारा नहीं बल्कि राहुल की हरकतें करवा रही है। संविधान को हाथ में लेकर ऐसे घुमा जाता है जैसे संविधान संविधान नहीं बल्कि एक झुनझुना है। INDI गठबंधन को इस मुद्दे पर कांग्रेस को समझाना होगा या फिर कांग्रेस से किनारा करना होगा।
जस्टिस सूर्यकांत के शपथ लेने के ऐतिहासिक अवसर पर राहुल गांधी की गैर मौजूदगी ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या राहुल गांधी के लिए संवैधानिक समारोह मात्र एक औपचारिकता हैं, जिन्हें वे अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं? क्या वे राजनीति और संवैधानिक मर्यादाओं को गंभीरता से नहीं लेते?
ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि लोकतंत्र में प्रतीकों और उपस्थिति की भाषा शब्दों से कहीं अधिक मुखर होती है। जब देश का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री एक छत के नीचे न्यायपालिका के सर्वोच्च प्रमुख भारत के मुख्य न्यायाधीश के शपथ ग्रहण के लिए उपस्थित हों, तो वहां विपक्ष के नेता की कुर्सी खाली रहना सिर्फ एक ‘अनुपस्थिति’ नहीं, बल्कि एक ‘वक्तव्य’ बन जाता है।
राजनीति में एक बार की अनुपस्थिति को ‘संयोग’ कहा जा सकता है और दो बार को ‘परिस्थिति’, लेकिन जब यह बार-बार हो, तो इसे ‘पैटर्न’ कहा जाता है। राहुल गांधी की अनुपस्थिति की टाइमलाइन देखें तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है-
- स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त लाल किला समारोह: लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव, लेकिन विपक्ष के नेता नदारद।
- उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का शपथ ग्रहण समारोह: एक और संवैधानिक पद, एक और गैर-हाजिरी।
- भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का शपथ ग्रहण समारोह: न्यायपालिका के शीर्ष नेतृत्व का सम्मान, फिर वही शून्यता।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी सिर्फ एक सांसद नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता हैं। यह पद कैबिनेट मंत्री का दर्जा रखता है और संसदीय लोकतंत्र में इसे ‘शैडो प्राइम मिनिस्टर’ तक के रूप में देखा जाता है। ऐसे समारोहों में सत्ता पक्ष और विपक्ष की एक साथ उपस्थिति यह संदेश देती है कि दल अलग हो सकते हैं, लेकिन संस्थाओं के सम्मान में देश एक है। ऐसे में पूर्व सीजेआई बीआर गवई और पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जैसे दिग्गजों की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा बढ़ाई, लेकिन राहुल की अनुपस्थिति ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या वे अपनी भूमिका को गंभीरता से नहीं ले रहे?
राहुल गांधी के बार-बार अनुपस्थित रहने से सवाल उठता है कि क्या संविधान का सम्मान केवल चुनावी रैलियों में भाषण देने तक सीमित है? या फिर संवैधानिक प्रक्रियाओं और परंपराओं का पालन करना भी उसी सम्मान का हिस्सा है? कांग्रेस की ओर से दिए जाने वाले तर्क जैसे ‘बैठने की व्यवस्था सही नहीं थी’ या ‘निमंत्रण देर से मिला’ एक राष्ट्रीय नेता के कद के अनुरूप नहीं लगते। जब विपक्ष का नेता ऐसे मौकों से दूर रहता है, तो वह सत्ता पक्ष को बिना लड़े ही नैतिक जीत सौंप देता है। इससे ये कहने को मिलता है कि विपक्ष न तो गंभीर है और न ही मर्यादाओं का पालन करने वाला। साथ ही जनता के बीच यह संदेश भी जाता है कि राहुल गांधी अपनी व्यक्तिगत राजनीति को राष्ट्रीय दायित्वों से ऊपर रखते हैं।
राहुल गांधी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में असहमति और अवमानना के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है। सरकार की नीतियों से असहमति जताना उनका अधिकार है, लेकिन संवैधानिक पदों के शपथ ग्रहण का बहिष्कार करना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं की अवमानना है। जस्टिस सूर्यकांत के शपथ ग्रहण समारोह में खाली पड़ी वह कुर्सी सिर्फ राहुल गांधी की अनुपस्थिति नहीं बता रही थी, बल्कि यह चीख रही थी कि भारत का मुख्य विपक्षी दल संवैधानिक मर्यादाओं को निभाने में विफल रहा है। यदि यह पैटर्न नहीं बदला, तो राहुल गांधी इतिहास में एक ऐसे नेता के रूप में याद किए जाएंगे जो ‘संविधान की किताब’ तो साथ रखते थे, लेकिन उसके ‘मूल्यों’ को कभी आत्मसात नहीं कर पाए।
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