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‘सोरोस फंडेड गुलाम पत्रकारों’ ने बिहार की वोटर लिस्ट पर फैला रहे जहर, 67826 नाम दोहराए जाने का दावा: चुनाव आयोग ने खोली पोल

कहते है बल्कि कटु सत्य भी कि भारत 1947 में आज़ाद हुआ था, लेकिन कुछ लोग 1947 से पहले की गुलामी में आज सत्तर दशक से अधिक के बाद भी उसी गुलामी की मानसिकता में जी कर दूसरों को भी गुमराह कर देश का माहौल ख़राब करने में लगे हैं। ऐसा शक होता है कि इनके DNA में ही कुछ गड़बड़ है। जिसकी जाँच जरुरी है।   
बिहार में वोटर लिस्ट को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य में 67,826 डुप्लिकेट वोटर हैं, जिससे मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। हालाँकि, बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने इस रिपोर्ट को गलत और भ्रामक बताया है। उन्होंने साफ किया है कि अभी जारी की गई लिस्ट केवल एक ड्राफ्ट है, फाइनल नहीं। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट में अगर कोई गलती है तो उसे बाद में सुधारा जाएगा। इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने वाले समूह पर विदेशी फंडिंग से जुड़े होने का भी आरोप लगा है।

रिपोर्ट में क्या दावें किए गए

दरअसल, कुछ पत्रकारों की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 15 विधानसभा क्षेत्रों में 67,826 ऐसे नाम मिले हैं जो दो बार दर्ज हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये नाम एक जैसे दस्तावेजों के साथ रजिस्टर्ड हैं। इससे मतदाता सूची की सच्चाई पर सवाल उठने लगे हैं।

रिपोर्ट का दावा है कि यह जानकारी डेटा माइनिंग से निकाली गई है। इसमें कहा गया है कि 2025 के वोटर लिस्ट सुधार अभियान के दौरान जारी की गई लिस्ट में कई नाम दोहराए गए हैं। इस पर अब चुनाव आयोग ने जवाब दिया है।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा कि ये आरोप गलत और भ्रम फैलाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वो आखिरी नहीं है। यह सिर्फ जाँच के लिए है। अभी भी कोई गलती हो तो लोग उस पर दावा या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने सोशल मीडिया X (पहले ट्विटर) पर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो रिपोर्ट आई है, उसमें सच्चाई पूरी नहीं बताई गई है। रिपोर्ट में उस प्रक्रिया की अनदेखी की गई है जिससे वोटर लिस्ट को ठीक किया जाता है। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। इसे बाद में सही करके ही फाइनल लिस्ट बनाई जाती है।

ये केवल ड्राफ्ट, फाइनल लिस्ट नहीं

मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) ने एक रिपोर्ट पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट को लेकर जो बातें कही जा रही हैं, वो अधूरी हैं। SIR अभी खत्म नहीं हुआ है। जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। ये फाइनल नहीं है।

सीईओ ने साफ किया कि यह लिस्ट लोगों की जाँच के लिए जारी की गई है। इसमें लोग अपना नाम देख सकते हैं। अगर कोई गलती है, तो वे दावा या आपत्ति कर सकते हैं। राजनीतिक दल और बाकी लोग भी सुझाव दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर इस लिस्ट में कोई नाम दो बार है तो उसे अभी गलती या गड़बड़ी नहीं माना जा सकता। नियमों के मुताबिक लोगों को अपनी बात रखने का मौका दिया जाता है। उसके बाद ही लिस्ट को ठीक कर फाइनल किया जाएगा।

पत्रकारों की रिपोर्ट को बताया गलत, कहा- डुप्लीकेट मतदाता नहीं

चुनाव अधिकारी (CEO) ने रिपोर्ट में बताए गए 67,826 नकली वोटरों के दावे को गलत बताया। उन्होंने कहा कि यह दावा कुछ समान जानकारियों पर ही बना है। जैसे नाम, उम्र और रिश्तेदारों का नाम। इन बातों से यह साबित नहीं होता कि वोटर फर्जी हैं।

CEO ने कहा कि बिहार के गाँवों में बहुत से लोगों के नाम और उम्र एक जैसे होते हैं। माता या पिता के नाम भी मिलते-जुलते होते हैं। यह आम बात है। ऐसा होना कोई गड़बड़ी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि सिर्फ नाम और उम्र एक जैसे होने से दोहराव साबित नहीं होता।

उन्होंने कहा कि ऐसी समान जानकारी वाली एंट्रीज को जाँच के दौरान पहचाना जाता है। अगर कोई गलती होती है, तो उसे ठीक भी किया जाता है। किसी को भी अगर शक है, तो वह चुनाव अधिकारी के पास आपत्ति दर्ज करा सकता है। यह अधिकार हर वोटर और पार्टी को है।

चुनाव आयोग ने बताया, कैसे हटते हैं डुप्लीकेट नाम

CEO ने यह साफ किया कि डुप्लिकेट वोटरों की जाँच नहीं होती, यह बात पूरी तरह गलत है। उन्होंने बताया कि भारत का चुनाव आयोग इसके लिए एक खास तकनीक इस्तेमाल करता है। ECI का एक ईआरओनेट 2.0 सॉफ्टवेयर है। यह सॉफ्टवेयर एक जैसे नाम, उम्र या रिश्तेदारों के नाम वाले वोटरों की पहचान करता है। इन्हें ‘समान प्रविष्टियाँ’ या DSE कहा जाता है।

लेकिन यह सिस्टम ऐसे नामों को सीधे हटाता नहीं है। पहले इनकी पूरी जाँच की जाती है। बूथ लेवल अफसर और चुनाव अधिकारी खुद जाकर देखते हैं कि यह डुप्लिकेट है या नहीं। यह तरीका इसलिए अपनाया जाता है ताकि गलती से किसी असली वोटर का नाम न हट जाए। यानी मशीन की बजाय इंसान ही आखिरी फैसला करते हैं।

वाल्मीकिनगर की बात करते हुए CEO ने कहा कि वहाँ जिन 5,000 वोटरों को नकली बताया गया है, उस पर सबूत के साथ रिपोर्ट होनी चाहिए। बिना जानकारी और बिना जाँच के कोई भी संख्या बता देना सही नहीं है।

डुप्लीकेट मतदाताओं के उदाहरण

रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि त्रिवेणीगंज की ‘अंजलि कुमारी’ और लौकहा के ‘अंकित कुमार’ जैसे नामों के दोहराव मिले हैं। इसे दिखाकर कहा गया कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है।

इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले इक्का-दुक्का हैं। ये गलतियाँ लिखते समय हो सकती हैं। कभी-कभी लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं तो दो बार नाम जुड़ जाता है। कई बार घर पर गलत जानकारी दे दी जाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि सुधार का काम पहले से ही शुरू हो गया है। अंजलि कुमारी और अंकित कुमार दोनों के लिए फॉर्म-8 भर दिया गया है। इसका मतलब है कि गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया पहले से जारी है।

पत्रकारों के आरोप पर चुनाव आयोग का जवाब

कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट के डेटा को जानबूझकर लॉक कर दिया गया है। उनका कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि मशीन से जाँच न हो सके। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यह आरोप गलत है।

मतदाता सूची को एक तय फॉर्मेट में दिया जाता है। ऐसा कानून के मुताबिक किया जाता है ताकि डेटा की सुरक्षा बनी रहे और उसका गलत इस्तेमाल न हो। उन्होंने साफ किया कि डेटा को लॉक करना एक सुरक्षा तरीका है। इसका मकसद दोहराव छुपाना नहीं है।

सीईओ ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया। कमलनाथ बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2018) केस में अदालत ने भी इन सुरक्षा तरीकों को सही माना था।

अनुमान पर आपत्ति

कुछ लोगों ने कहा था कि 15 इलाकों में पाए गए दोहराव पूरे राज्य में हो सकते हैं। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सुझाव का कड़ा विरोध किया। सीईओ ने इसे गलत बताया। उनका कहना था कि इतने बड़े स्तर पर डुप्लिकेट होने का विचार बस कल्पना है।

उन्होंने कहा कि कानून के हिसाब से ऐसे आरोपों को सही साबित करने के लिए ठोस सबूत होना जरूरी है। सिर्फ आँकड़ों या अनुमान से ऐसे बड़े आरोप नहीं लगाए जा सकते। सीईओ ने बताया कि अदालतें भी बार-बार कह चुकी हैं कि बिना प्रमाण के आरोप स्वीकार नहीं किए जाएँगे।

कानूनी उपाय मौजूद

बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि कानून में पहले से ही डुप्लिकेट नाम हटाने के लिए कड़े नियम हैं। उन्होंने बताया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 के तहत, अगर कोई पक्का सबूत मिलता है, तो निर्वाचन अधिकारी डुप्लिकेट नाम हटाने का अधिकार रखते हैं। इसलिए दोहराव से निपटने का एक मजबूत कानून पहले से मौजूद है।

उन्होंने ट्विटर पर भी बताया कि अगर किसी मतदाता या बूथ के एजेंट को कोई डुप्लिकेट नाम दिखे तो वे मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13 के अनुसार आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। इस तरह हर कोई शिकायत कर सकता है और मामले की जाँच हो सकती है।

खंडन और निष्कर्ष

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने खंडन खत्म करते हुए कहा कि ड्राफ्ट रोल में कुछ डुप्लिकेट नाम होना सामान्य है। यह प्रक्रिया को गलत या अमान्य नहीं करता। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि रिपोर्ट का यह कहना कि SIR से धोखाधड़ी बढ़ेगी या डुप्लिकेट वोटिंग होगी, गलत है। यह सिर्फ अटकलें हैं और समय से पहले बनी राय है। मतदाता सूची के नियम और कानून ऐसा होने नहीं देते।

विदेशी फंडिंग और संदिग्ध रिपोर्ट

रिपोर्टर्स कलेक्टिव के पीछे जो संगठन काम कर रहे हैं, उन्हें समझना बहुत जरूरी है। इसका संचालन एक NGO करता है, जिसका नाम ‘नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया‘ है। यह संस्था सरकार से एफसीआरए लाइसेंस लेकर विदेशी चंदा ले सकती है।

इस फाउंडेशन को पैसा देने वालों में कुछ बड़े और विदेशी नाम शामिल हैं। जैसे– फोर्ड फाउंडेशन, जॉर्ज सोरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, और रॉकफेलर फाउंडेशन। ये सभी संगठन ऐसे नेटवर्क से जुड़े माने जाते हैं जिन्हें अमेरिका की छुपी हुई ताकत या ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है।

इन संगठनों पर पहले भी आरोप लगे हैं कि इन्होंने भारत के खिलाफ कई अभियान चलाए हैं। रिपोर्टर्स कलेक्टिव को भी इन्हीं ताकतों का हिस्सा माना जा रहा है। दिसंबर 2024 में इस ग्रुप ने जो रिपोर्टें छापीं, वे कई मामलों में झूठी और भ्रामक पाई गईं। कहा जा रहा है कि ये रिपोर्टें जॉर्ज सोरोस के एजेंडे के मुताबिक थीं। इनका मकसद लोगों की सोच को गलत दिशा में मोड़ना और देश के अंदर गलतफहमी फैलाना था।