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बिहार चुनाव अपराधियों और जातिगत का : 1303 में हर तीसरा दागी; लेफ्ट ने उतारे 100% दागी उम्मीदवार, RJD और कॉन्ग्रेस भी टक्कर देने में पीछे नहीं: बिहारियों को यूँ ही नहीं सता रहा ‘जंगलराज’ का खौफ

बिहार चुनाव में इंडी गठबंधन ने उतारी दागियों की फौज (साभार: Amar Ujala)
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का पहला चरण जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियों के दावे और हकीकत के बीच का फर्क साफ दिखने लगा है। हर पार्टी साफ-सुथरी सरकार, लॉ एंड ऑर्डर और भ्रष्टाचार मुक्त बिहार का वादा कर रही है, लेकिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट इन दावों पर पानी फेर रही है।

 रिपोर्ट बताती है कि चुनाव लड़ रहे कुल 1303 उम्मीदवारों में से 32 फीसदी पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें सबसे ज्यादा दागी उम्मीदवारों को टिकट देने वाली पार्टियाँ हैं- राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कम्युनिस्ट पार्टियाँ (CPI, CPI-M, CPI-ML) और कॉन्ग्रेस। वहीं, जनता दल यूनाइटेड (JDU) इस लिस्ट में सबसे नीचे है, जो दिखाता है कि एनडीए और नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू अपराधी छवि वाले उम्मीदवारों से दूर रहने की कोशिश कर रही है। भाजपा भी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

इस रिपोर्ट ने विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर दिया है, खासकर RJD को जहाँ लालू परिवार के करीबियों पर भारी-भरकम केस हैं। आइए इस रिपोर्ट को विस्तार से समझते हैं और देखते हैं कि कैसे राजनीति में दागियों का बोलबाला है।

बिहार विधानसभा चुनाव में हर तीसरा उम्मीदवार दागी

ADR और बिहार इलेक्शन वॉच ने बिहार चुनाव के पहले फेज के 121 विधानसभा सीटों पर लड़ रहे 1,314 उम्मीदवारों के एफिडेविट्स का विश्लेषण किया। ये एफिडेविट चुनाव आयोग में जमा किए गए हैं, जहाँ उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति, शिक्षा और क्रिमिनल रिकॉर्ड की जानकारी देनी पड़ती है। लेकिन 11 उम्मीदवारों के एफिडेविट स्पष्ट नहीं थे, इसलिए विश्लेषण 1,303 उम्मीदवारों पर आधारित है।

रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि 423 उम्मीदवारों (32%) ने खुद कबूला है कि उनके ऊपर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें से 354 (27%) पर तो गंभीर अपराधों के केस हैं, जैसे हत्या, हत्या का प्रयास, महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार के।

आँकड़ों के मुताबिक…

  • हत्या से जुड़े केस: 33 उम्मीदवारों पर IPC की धारा 302-303 और BNS की धारा 103(1) के तहत केस।
  • हत्या का प्रयास: 86 उम्मीदवारों पर IPC 307 और BNS 109 के केस।
  • महिलाओं पर अत्याचार: 42 उम्मीदवारों पर ऐसे केस, जिसमें 2 पर रेप (IPC 376) के आरोप।
इसके अलावा कई पर भ्रष्टाचार, चुनावी अपराध, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और हत्या-बलात्कार जैसे संगीन अपराधों के केस हैं।
ये आँकड़े बताते हैं कि बिहार की राजनीति में अपराधीकरण कितना गहरा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद, जहाँ पार्टियों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने पर सफाई देनी पड़ती है, पार्टियाँ बेझिझक ऐसे लोगों को मैदान में उतार रही हैं। रिपोर्ट में ये भी जिक्र है कि चुनाव आयोग ने पार्टियों को वेबसाइट पर दागी उम्मीदवारों की जानकारी डालने का आदेश दिया है, लेकिन कई पार्टियाँ इसका पालन नहीं कर रही हैं।

पार्टियों के हिसाब से दागी उम्मीदवारों की जानकारी

पार्टियों के हिसाब से बात करें तो RJD, कॉन्ग्रेस और लेफ्ट पार्टियों वाला विपक्षी गठबंधन दागी उम्मीदवारों को टिकट देने में सबसे आगे है। वहीं, NDA की पार्टियों (BJP और JDU) ने अपेक्षाकृत कम दागी उम्मीदवार उतारे हैं।
CPI(ML)(L): 14 उम्मीदवारों में से 13 (93%) पर क्रिमिनल केस। इनमें से 9 (64%) पर गंभीर केस। ये वामपंथी पार्टी हमेशा गरीबों और मजदूरों की बात करती है, लेकिन उसके उम्मीदवारों पर हत्या, दंगा और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के केस भरे पड़े हैं।
CPI(M): सीपीआई-एम के 3 में से 3 (100%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस और सभी पर गंभीर केस। पहले चरण में सीपीआई-एम ने सिर्फ 3 उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन 100% रेट के साथ सभी दागी हैं।
CPI: सीपीआई के 5 में से 5 (100%) पर क्रिमिनल केस और 4 (80%) पर गंभीर केस।
                                                पार्टी वाइज दागी प्रत्याशियों की संख्या
RJD: 70 उम्मीदवारों में से 53 (76%) पर क्रिमिनल केस हैं। उनमें भी 42 (60%) पर गंभीर केस हैं। RJD सबसे ज्यादा दागी टिकट देने वाली पार्टी है। खुद चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव की पार्टी को अब भी दागी नेताओं पर भरोसा है।
कॉन्ग्रेस: पार्टी के कुल 23 उम्मीदवारों में से 15 (65%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इन 15 में से भी 12 (52%) पर गंभीर केस दर्ज हैं।
जन सुराज पार्टी: प्रशांत किशोर की नई पार्टी तो ‘सुराज’ का वादा करती है। लेकिन 114 उम्मीदवारों में से 50 (44%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। उनमें भी 49 (43%) पर गंभीर केस दर्ज हैं। ये पार्टी भले ही नई है, लेकिन उम्मीदवार पुराने दागी हैं। इसे नई बोतल में पुरानी शराब भी कह सकते हैं।
LJP (राम विलास): चिराग पासवान की पार्टी भी दागी लिस्ट में है। चिरागी पार्टी के 13 में से 7 (54%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं, जिसमें से (38%) पर गंभीर केस हैं।
AAP: अरविंद केजरीवाल की पार्टी बिहार में नई है, लेकिन उसके उम्मीदवारों में भी दागी शामिल हैं। आप के 44 में से 12 (27%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस हैं, जिसमें से 9 (20%) पर गंभीर केस हैं।
BSP: बहुजन समाज पार्टी ने पहले चरण में 89 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिसमें से 18 (20%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इन 16 (18%) पर गंभीर केस हैं।
BJP: बीजेपी के 48 में से 31 (65%) पर क्रिमिनल केस हैं, जिसमें 27 (56%) पर गंभीर केस हैं। बीजेपी एनडीए की मुख्य पार्टी है, हालाँकि दागी उम्मीदवारों के मामले में वो मुख्य विपक्षी पार्टियों से पीछे नजर आती है।
JDU: जदयू के 57 में से सिर्फ 22 (39%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस हैंष इनमें से 15 (26%) पर गंभीर केस दर्ज हैं। आँकड़ों को देखेंगे तो दागियों के मामले में इंडी गठबंधन की पार्टियों की तुलना में नीतीश कुमार की पार्टी इस लिस्ट में सबसे पीछे है। ये आँकड़े बताते हैं कि JDU अपराधी छवि वालों से दूर रहने की नीति पर चल रही है।
               पार्टी के हिसाब से कितने प्रतिशत उम्मीदवारों पर केस, कितने केस गंभीर (फोटो साभार: ADR)

RJD के प्रमुख दागी नेताओं में लालू परिवार और उनके करीबी शामिल

RJD पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उसके 76% उम्मीदवार दागी हैं। लालू प्रसाद यादव खुद चारा घोटाले में सजा काट चुके हैं और उनकी पार्टी अब भी ऐसे लोगों को टिकट दे रही है।
तेजस्वी यादव (रघोपुर से): RJD के स्टार कैंडिडेट और पूर्व डिप्टी CM तेजस्वी यादव के ऊपर IRCTC घोटाले में CBI जाँच चल रही है। इसके अलावा चुनावी हिंसा और संपत्ति से जुड़े कई केस दर्ज हैं। तेजस्वी हमेशा दावे करते हैं कि ये राजनीतिक साजिश है, लेकिन कोर्ट से लेकर तमाम चार्जशीट जो दाखिल हैं, उनमें कहीं बेगुनाही की बात नहीं कही गई है। एडीआर द्वारा जारी आँकड़ों में वही जानकारियाँ हैं, जो उन्होंने अपने शपथ पत्र में दी हैं। तेजस्वी यादव पर कुच 22 केस दर्ज हैं, इसमें आईपीसी के तहत 13 और बीएनएस की तहत 4 धाराओं में केस दर्ज हैं। गंभीर मामलों की संख्या 17 है।
                                   तेजस्वी यादव के ऊपर दर्ज केस, एफिडेविट के आधार पर (स्रोत-ADR)
रवींद्र प्रसाद यादव (महनार से): वैशाली की महनार विधानसभा सीट से उतरे RJD के वरिष्ठ नेता रवींद्र प्रसाद यादव पर 26 धाराओं में केस हैं। उनके ऊपर हत्या का प्रयास (IPC 307) से लेकर महिला विरोधी अपराध तक के केस हैं।
रिपोर्ट कहती है कि RJD के 60% उम्मीदवारों पर गंभीर केस हैं, जो हत्या, बलात्कार और भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। पार्टी के मुखिया लालू हमेशा कहते हैं कि ये केंद्र की साजिश है, लेकिन वोटर अब सोच रहे हैं कि क्या RJD सच में बदलाव ला सकती है? क्योंकि जब ये सरकार यानी एनडीए की सरकार नहीं थी, तब भी तो लालू यादव के खिलाफ केस चल रहे थे।
अवलोकन करें:-
भूरा बाल- ‘भू यानि भूमिहार’, ‘रा यानि राजपूत’, ‘बा यानि ब्राह्मण’, ‘ल यानि लाला (कायस्थ)’, जिस ‘ना

अब मतदाताओं के पाले में गेंद, जंगलराज या सुशासन: 6 नवंबर को बटन से फैसला

ये रिपोर्ट बिहार चुनाव को नई दिशा दे सकती है। विपक्ष दागी उम्मीदवारों से भरा है, जबकि NDA कम दागी टिकट देकर विश्वास जीत सकता है। बहरहाल, ये तो अब बिहार के मतदाताओं को सोचना है कि क्या दागी नेता उनके जीवन में बदलाव ला पाएँगे या फिर उन्हें चाहिए साफ-सुथरी इमेज वाली सरकार। अब 6 नवंबर को पहले चरण का मतदान होना है, जिसमें बिहार के मतदाता अपनी पसंद-नापसंद ईवीएम के जरिए चुन ही लेंगे। और फिर नतीजे 14 नवंबर 2025 को सामने आ जाएँगे कि बिहार के लोगों ने क्या चुना।

कांग्रेस ने बिहार में SIR से जुड़ी 89 लाख शिकायतें देने का किया दावा: पूर्वी चंपारण-सुपौल DM ने बताया बेबुनियाद, कहा- न कोई शपथ पत्र, न आरोपों का प्रमाण मिला

पवन खेड़ा (बाएँ), चुनाव आयोग (बीच में), राहुल गाँधी (दाएँ), (साभार : lawandotherthings, bhaskarassets & tribuneindia)
बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान करीब 65 लाख नामों के हटाए जाने पर कांग्रेस ने दावा किया कि उसने चुनाव आयोग को 89 लाख शिकायतें दी हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि एक भी फॉर्म आधिकारिक रूप से जमा नहीं कराया गया है।

इसके अलावा चुनाव आयोग ने कहा कि राहुल गाँधी ने ना तो कोई शपथ पत्र दिया और ना ही अपने आरोपों का प्रमाण। ऐसे में बार-बार चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर खुद की ही फजीहत कराने में अब कांग्रेस को काफी मजा आ रहा है।

फर्जी आँकड़ों का दावा, बिना प्रक्रिया अपनाए

कॉन्ग्रेस ने जब यह कहा कि उसने 89 लाख शिकायतें दर्ज करवाई हैं, तो यह सुनकर सभी चौंक गए। पार्टी के नेता पवन खेड़ा और राजेश राम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस दावे को पूरे आत्मविश्वास से रखा। उन्होंने कहा कि पार्टी के पास शिकायतों की रसीदें भी मौजूद हैं और यह सब चुनाव आयोग को सौंपा गया है।

पवन खेड़ा ने अपने बयान में कहा कि 20,000 से अधिक बूथों पर 100 से ज्यादा नाम काटे गए। कई बूथों पर महिलाओं के नाम 70 फीसदी तक हटाए गए। पवन खेड़ा ने इसे एक ‘पैटर्न‘ बताया। पवन खेड़ा ने यह भी कहा कि BLOs के जरिए आवेदन इकट्ठा कर DEO को सौंपे गए हैं।

पूर्वी चंपारण और सुपौल DM ने दावों को झूठलाया

लेकिन अगले ही दिन पूर्वी चंपारण के DM ने खुद कांग्रेस के पोस्ट पर जवाब देते हुए बताया कि बिहार में 1 अगस्त 2025 को जो ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित हुई, उस पर कांग्रेस की ओर से न तो फॉर्म 6 (नाम जोड़ने के लिए) और न ही फॉर्म 7 (नाम हटाने पर आपत्ति) में कोई आवेदन जमा हुआ है।

इसके अलावा कांग्रेस के इसी पोस्ट पर सुपौल के DM ने भी जवाब में कहा कि अब तक बिहार में कांग्रेस पार्टी के किसी भी जिला अध्यक्ष द्वारा अधिकृत किसी बूथ लेवल एजेंट (BLA) ने 1 अगस्त 2025 को जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में किसी भी नाम को लेकर ना तो नाम जोड़ने का फॉर्म (फॉर्म 6) भरा है और न ही किसी नाम पर आपत्ति (फॉर्म 7) दर्ज कराई है और ये सब तय फॉर्मेट में होना चाहिए था।

ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि 89 लाख शिकायतों का यह आँकड़ा आखिर आया कहाँ से? और अगर वाकई शिकायतें थीं तो वो किसको दी गईं, और कैसे दी गईं?

राहुल गाँधी का आरोप भी खोखला, आयोग को नहीं मिला कोई शपथ पत्र

कांग्रेस के इस दावे की अगुवाई राहुल गाँधी खुद कर रहे थे। राहुल गाँधी ने दावा किया कि बड़े पैमाने पर विपक्षी मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और यह लोकतंत्र की हत्या है। लेकिन जब चुनाव आयोग ने उनसे शपथ पत्र और प्रमाण माँगा, तो राहुल गाँधी चुप हो गए।

निर्वाचन आयोग ने खुद कहा है कि राहुल गाँधी की तरफ से कोई शपथ पत्र नहीं दिया गया। ना तो कोई आधिकारिक दस्तावेज, ना डेटा और न ही किसी तरह का ठोस प्रमाण। यानी जो भी बातें राहुल मंच से बोलते रहे, वो सिर्फ भाषण तक सीमित रहीं। कानूनन ना तो कोई कार्रवाई की गई और न ही किसी स्तर पर कांग्रेस ने प्रक्रिया का पालन किया।

शिकायतें तो छोड़िए, अनुमति भी नहीं माँगी राहुल ने

एक और फजीहत तब हुई जब यह खबर चली कि राहुल गाँधी को पटना के गाँधी मैदान में रुकने की अनुमति नहीं दी गई। कांग्रेस ने इसे लेकर भी प्रशासन पर सवाल उठाए। लेकिन जब पटना जिला प्रशासन ने स्पष्टीकरण जारी किया, तो कांग्रेस का यह आरोप भी झूठा निकला।

प्रशासन ने साफ किया कि न राहुल गाँधी और न ही कांग्रेस की ओर से रात रुकने की कोई अनुमति माँगी गई थी। जो दो अनुमतियाँ माँगी गई थीं, वो सभा और रैली के लिए थी, जो दे दी गई थी।

‘सोरोस फंडेड गुलाम पत्रकारों’ ने बिहार की वोटर लिस्ट पर फैला रहे जहर, 67826 नाम दोहराए जाने का दावा: चुनाव आयोग ने खोली पोल

कहते है बल्कि कटु सत्य भी कि भारत 1947 में आज़ाद हुआ था, लेकिन कुछ लोग 1947 से पहले की गुलामी में आज सत्तर दशक से अधिक के बाद भी उसी गुलामी की मानसिकता में जी कर दूसरों को भी गुमराह कर देश का माहौल ख़राब करने में लगे हैं। ऐसा शक होता है कि इनके DNA में ही कुछ गड़बड़ है। जिसकी जाँच जरुरी है।   
बिहार में वोटर लिस्ट को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य में 67,826 डुप्लिकेट वोटर हैं, जिससे मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। हालाँकि, बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने इस रिपोर्ट को गलत और भ्रामक बताया है। उन्होंने साफ किया है कि अभी जारी की गई लिस्ट केवल एक ड्राफ्ट है, फाइनल नहीं। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट में अगर कोई गलती है तो उसे बाद में सुधारा जाएगा। इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने वाले समूह पर विदेशी फंडिंग से जुड़े होने का भी आरोप लगा है।

रिपोर्ट में क्या दावें किए गए

दरअसल, कुछ पत्रकारों की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 15 विधानसभा क्षेत्रों में 67,826 ऐसे नाम मिले हैं जो दो बार दर्ज हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये नाम एक जैसे दस्तावेजों के साथ रजिस्टर्ड हैं। इससे मतदाता सूची की सच्चाई पर सवाल उठने लगे हैं।

रिपोर्ट का दावा है कि यह जानकारी डेटा माइनिंग से निकाली गई है। इसमें कहा गया है कि 2025 के वोटर लिस्ट सुधार अभियान के दौरान जारी की गई लिस्ट में कई नाम दोहराए गए हैं। इस पर अब चुनाव आयोग ने जवाब दिया है।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा कि ये आरोप गलत और भ्रम फैलाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वो आखिरी नहीं है। यह सिर्फ जाँच के लिए है। अभी भी कोई गलती हो तो लोग उस पर दावा या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने सोशल मीडिया X (पहले ट्विटर) पर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो रिपोर्ट आई है, उसमें सच्चाई पूरी नहीं बताई गई है। रिपोर्ट में उस प्रक्रिया की अनदेखी की गई है जिससे वोटर लिस्ट को ठीक किया जाता है। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। इसे बाद में सही करके ही फाइनल लिस्ट बनाई जाती है।

ये केवल ड्राफ्ट, फाइनल लिस्ट नहीं

मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) ने एक रिपोर्ट पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट को लेकर जो बातें कही जा रही हैं, वो अधूरी हैं। SIR अभी खत्म नहीं हुआ है। जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। ये फाइनल नहीं है।

सीईओ ने साफ किया कि यह लिस्ट लोगों की जाँच के लिए जारी की गई है। इसमें लोग अपना नाम देख सकते हैं। अगर कोई गलती है, तो वे दावा या आपत्ति कर सकते हैं। राजनीतिक दल और बाकी लोग भी सुझाव दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर इस लिस्ट में कोई नाम दो बार है तो उसे अभी गलती या गड़बड़ी नहीं माना जा सकता। नियमों के मुताबिक लोगों को अपनी बात रखने का मौका दिया जाता है। उसके बाद ही लिस्ट को ठीक कर फाइनल किया जाएगा।

पत्रकारों की रिपोर्ट को बताया गलत, कहा- डुप्लीकेट मतदाता नहीं

चुनाव अधिकारी (CEO) ने रिपोर्ट में बताए गए 67,826 नकली वोटरों के दावे को गलत बताया। उन्होंने कहा कि यह दावा कुछ समान जानकारियों पर ही बना है। जैसे नाम, उम्र और रिश्तेदारों का नाम। इन बातों से यह साबित नहीं होता कि वोटर फर्जी हैं।

CEO ने कहा कि बिहार के गाँवों में बहुत से लोगों के नाम और उम्र एक जैसे होते हैं। माता या पिता के नाम भी मिलते-जुलते होते हैं। यह आम बात है। ऐसा होना कोई गड़बड़ी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि सिर्फ नाम और उम्र एक जैसे होने से दोहराव साबित नहीं होता।

उन्होंने कहा कि ऐसी समान जानकारी वाली एंट्रीज को जाँच के दौरान पहचाना जाता है। अगर कोई गलती होती है, तो उसे ठीक भी किया जाता है। किसी को भी अगर शक है, तो वह चुनाव अधिकारी के पास आपत्ति दर्ज करा सकता है। यह अधिकार हर वोटर और पार्टी को है।

चुनाव आयोग ने बताया, कैसे हटते हैं डुप्लीकेट नाम

CEO ने यह साफ किया कि डुप्लिकेट वोटरों की जाँच नहीं होती, यह बात पूरी तरह गलत है। उन्होंने बताया कि भारत का चुनाव आयोग इसके लिए एक खास तकनीक इस्तेमाल करता है। ECI का एक ईआरओनेट 2.0 सॉफ्टवेयर है। यह सॉफ्टवेयर एक जैसे नाम, उम्र या रिश्तेदारों के नाम वाले वोटरों की पहचान करता है। इन्हें ‘समान प्रविष्टियाँ’ या DSE कहा जाता है।

लेकिन यह सिस्टम ऐसे नामों को सीधे हटाता नहीं है। पहले इनकी पूरी जाँच की जाती है। बूथ लेवल अफसर और चुनाव अधिकारी खुद जाकर देखते हैं कि यह डुप्लिकेट है या नहीं। यह तरीका इसलिए अपनाया जाता है ताकि गलती से किसी असली वोटर का नाम न हट जाए। यानी मशीन की बजाय इंसान ही आखिरी फैसला करते हैं।

वाल्मीकिनगर की बात करते हुए CEO ने कहा कि वहाँ जिन 5,000 वोटरों को नकली बताया गया है, उस पर सबूत के साथ रिपोर्ट होनी चाहिए। बिना जानकारी और बिना जाँच के कोई भी संख्या बता देना सही नहीं है।

डुप्लीकेट मतदाताओं के उदाहरण

रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि त्रिवेणीगंज की ‘अंजलि कुमारी’ और लौकहा के ‘अंकित कुमार’ जैसे नामों के दोहराव मिले हैं। इसे दिखाकर कहा गया कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है।

इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले इक्का-दुक्का हैं। ये गलतियाँ लिखते समय हो सकती हैं। कभी-कभी लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं तो दो बार नाम जुड़ जाता है। कई बार घर पर गलत जानकारी दे दी जाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि सुधार का काम पहले से ही शुरू हो गया है। अंजलि कुमारी और अंकित कुमार दोनों के लिए फॉर्म-8 भर दिया गया है। इसका मतलब है कि गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया पहले से जारी है।

पत्रकारों के आरोप पर चुनाव आयोग का जवाब

कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट के डेटा को जानबूझकर लॉक कर दिया गया है। उनका कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि मशीन से जाँच न हो सके। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यह आरोप गलत है।

मतदाता सूची को एक तय फॉर्मेट में दिया जाता है। ऐसा कानून के मुताबिक किया जाता है ताकि डेटा की सुरक्षा बनी रहे और उसका गलत इस्तेमाल न हो। उन्होंने साफ किया कि डेटा को लॉक करना एक सुरक्षा तरीका है। इसका मकसद दोहराव छुपाना नहीं है।

सीईओ ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया। कमलनाथ बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2018) केस में अदालत ने भी इन सुरक्षा तरीकों को सही माना था।

अनुमान पर आपत्ति

कुछ लोगों ने कहा था कि 15 इलाकों में पाए गए दोहराव पूरे राज्य में हो सकते हैं। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सुझाव का कड़ा विरोध किया। सीईओ ने इसे गलत बताया। उनका कहना था कि इतने बड़े स्तर पर डुप्लिकेट होने का विचार बस कल्पना है।

उन्होंने कहा कि कानून के हिसाब से ऐसे आरोपों को सही साबित करने के लिए ठोस सबूत होना जरूरी है। सिर्फ आँकड़ों या अनुमान से ऐसे बड़े आरोप नहीं लगाए जा सकते। सीईओ ने बताया कि अदालतें भी बार-बार कह चुकी हैं कि बिना प्रमाण के आरोप स्वीकार नहीं किए जाएँगे।

कानूनी उपाय मौजूद

बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि कानून में पहले से ही डुप्लिकेट नाम हटाने के लिए कड़े नियम हैं। उन्होंने बताया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 के तहत, अगर कोई पक्का सबूत मिलता है, तो निर्वाचन अधिकारी डुप्लिकेट नाम हटाने का अधिकार रखते हैं। इसलिए दोहराव से निपटने का एक मजबूत कानून पहले से मौजूद है।

उन्होंने ट्विटर पर भी बताया कि अगर किसी मतदाता या बूथ के एजेंट को कोई डुप्लिकेट नाम दिखे तो वे मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13 के अनुसार आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। इस तरह हर कोई शिकायत कर सकता है और मामले की जाँच हो सकती है।

खंडन और निष्कर्ष

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने खंडन खत्म करते हुए कहा कि ड्राफ्ट रोल में कुछ डुप्लिकेट नाम होना सामान्य है। यह प्रक्रिया को गलत या अमान्य नहीं करता। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि रिपोर्ट का यह कहना कि SIR से धोखाधड़ी बढ़ेगी या डुप्लिकेट वोटिंग होगी, गलत है। यह सिर्फ अटकलें हैं और समय से पहले बनी राय है। मतदाता सूची के नियम और कानून ऐसा होने नहीं देते।

विदेशी फंडिंग और संदिग्ध रिपोर्ट

रिपोर्टर्स कलेक्टिव के पीछे जो संगठन काम कर रहे हैं, उन्हें समझना बहुत जरूरी है। इसका संचालन एक NGO करता है, जिसका नाम ‘नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया‘ है। यह संस्था सरकार से एफसीआरए लाइसेंस लेकर विदेशी चंदा ले सकती है।

इस फाउंडेशन को पैसा देने वालों में कुछ बड़े और विदेशी नाम शामिल हैं। जैसे– फोर्ड फाउंडेशन, जॉर्ज सोरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, और रॉकफेलर फाउंडेशन। ये सभी संगठन ऐसे नेटवर्क से जुड़े माने जाते हैं जिन्हें अमेरिका की छुपी हुई ताकत या ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है।

इन संगठनों पर पहले भी आरोप लगे हैं कि इन्होंने भारत के खिलाफ कई अभियान चलाए हैं। रिपोर्टर्स कलेक्टिव को भी इन्हीं ताकतों का हिस्सा माना जा रहा है। दिसंबर 2024 में इस ग्रुप ने जो रिपोर्टें छापीं, वे कई मामलों में झूठी और भ्रामक पाई गईं। कहा जा रहा है कि ये रिपोर्टें जॉर्ज सोरोस के एजेंडे के मुताबिक थीं। इनका मकसद लोगों की सोच को गलत दिशा में मोड़ना और देश के अंदर गलतफहमी फैलाना था।