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बंगाल : बांग्लादेश बॉर्डर पर तारबंदी के लिए BSF को चाहिए 127Km जमीन, कलकत्ता हाई कोर्ट की फटकार के बाद TMC सरकार ने केवल 8Km दी

             कलकत्ता हाई कोर्ट की ममता सरकार को फटकार (साभार : The Hindu & Indianexpress)
 70 के दशक में निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर की बहुचर्चित फिल्म आयी थी "आंखें" इस फिल्म की शुरुआत "उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की निग़ाहेंबान है आँखें" देशभक्ति संवाद से होती है। जो बांग्लादेश घुसपैठियों को संरक्षण देने में बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारत-बांग्लादेश सीमा को खुला रखकर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही हैं और ममता को समर्थन दे रहा समूचा विपक्ष। घुसपैठियों को भारत में घुसने का खुला रास्ता दिया हुआ है। आखिर इतने सालों बाद 127 किलोमीटर में से सिर्फ 8 किलोमीटर ही जगह देना ममता के डोलते राज की ओर इशारा भी करता है। यही वह खुला इलाका है जहाँ से बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत में घुस शेष भारत में फ़ैल रहे हैं। ममता जैसी नेताओं और इन जैसे देश विरोधी नेताओं ने देश की सुरक्षा को खतरे में डाला हुआ है।        

भारत-बांग्लादेश सीमा पर कटीले तार(फेंसिंग) लगाने के मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट इस बात से बेहद नाराज है कि उसके आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने 127 किलोमीटर जमीन में से अब तक सिर्फ 8 किलोमीटर हिस्सा ही सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपा है।

कलकत्ता HC ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए राज्य सरकार के एक अधिकारी पर 25,000 रुपए का जुर्माना भी ठोक दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि केंद्र से मुआवजा मिलने के बावजूद जमीन न सौंपना चौंकाने वाला है।

कलकत्ता HC की नाराजगी की वजह

कलकत्ता HC ने पाया कि 27 जनवरी को दिए गए आदेश के बाद से अब तक राज्य सरकार ने जमीन सौंपने की प्रक्रिया में कोई खास प्रगति नहीं की है। कोर्ट के मुताबिक, 127.327 किलोमीटर की जमीन ऐसी थी जिसके लिए अधिग्रहण पूरा हो चुका था और केंद्र सरकार ने राज्य को मुआवजा भी दे दिया था।

इसके बावजूद, बंगाल सरकार ने केवल 8 किलोमीटर जमीन ही BSF को दी। कोर्ट ने सरकार की रिपोर्ट को ‘अधूरी और गोलमोल‘ बताते हुए खारिज कर दिया क्योंकि वह शपथ पत्र (Affidavit) पर नहीं दी गई थी।

राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा

पूर्व डिप्टी आर्मी चीफ सुब्रत साहा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए HC ने कहा कि सीमा पर कटीले तार लगाना देश की रक्षा, घुसपैठ रोकने और सीमा पार आतंकवाद को खत्म करने के लिए बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार ने भी अदालत से गुहार लगाई थी कि जमीन जल्द दिलाई जाए ताकि फेंसिंग का काम पूरा हो सके।

राज्य सरकार ने भी माना था कि यह राष्ट्रीय हित का काम है, लेकिन इसके बावजूद 9 जिलों (उत्तर व दक्षिण 24 परगना, नादिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार) में जमीन सौंपने का काम लटका हुआ है।

सरकार के बहाने और HC का जुर्माना

राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण में देरी के लिए राजस्व अधिकारियों के चुनावी रोल के काम में व्यस्त होने का बहाना बनाया था, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह नकार दिया। HC ने कहा कि जब मामला राष्ट्रीय महत्व का हो, तो ऐसे बहाने नहीं चलेंगे। स्पेशल सेक्रेटरी के निर्देश के बावजूद जॉइंट डायरेक्टर ने शपथ पत्र पर रिपोर्ट दाखिल नहीं की, जिसकी वजह से कोर्ट ने उन पर 25 हजार का जुर्माना लगाया है।

अगली सुनवाई और सख्त निर्देश

कलकत्ता HC ने अब बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह 13 मई तक एक विस्तृत शपथ पत्र जमा करे। इसमें जिलेवार जानकारी देनी होगी कि 27 जनवरी के आदेश के बाद से हर दिन जमीन सौंपने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि समय सीमा बीतने के बाद अब और ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इस्लामिक धर्मातरण और जेहादी हरकतों के लिए हमारी अदालतें और पिछली सरकारें जिम्मेदार ; ‘छांगुर’ रहे ना रहे चलना चाहिए इस्लामी धर्मांतरण का काम…क्या ‘शिजर-ए-तैयबा’ किताब छपवाने का ये था मकसद: ATS रिपोर्ट में खुलासा- जलालुद्दीन कव्वाली सुनाकर करता था ब्रेनवॉश, खतने के लिए डॉक्टर भी तैयार थे

   किताब की तस्वीर (बाएँ), धर्मांतरण का साजिशकर्ता जलालुद्दीन छांगुर पीर (दाएँ), (फोटो साभार : FB_AMP News)
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में धर्मांतरण की बड़ी साजिश का पर्दाफाश हुआ, जिसमें जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर मुख्य आरोपित है। जाँच एजेंसियों का मानना है कि यह एक बड़ा धर्मांतरण गैंग है। इसका मकसद हिंदुओं का ब्रेनवॉश करके उनका धर्म परिवर्तन करना और उनके नाम पर अवैध जमीन करना था।

इस केस को दोबारा खोलने की जरुरत है 
ATS और ED छांगुर पीर के बताए ठिकानों पर लगातार छानबीन कर रही है। इसी कड़ी में ATS को ‘शिजर-ए-तैयबा’ नाम की किताब मिली है, जिसमें छांगुर पीर के सभी काले-चिट्ठे शामिल है। यह किताब धर्मांतरण की पूरी थ्योरी बयान कर रही है।
दरअसल, कांग्रेस सरकारों ने देश को आत्मसम्मान कम और विवाद ज्यादा देकर जनता को उनमे उलझाए लगा।  जिसमे साथ हमारी अदालतों ने भी दिया। सबूत मिलने के बावजूद सरकारी दबाव में फैसले कुछ और दिए जाते हैं। क्यों? सबूत छुपाने के आरोप सिद्ध होने पर अदालतों ने वकीलों के खिलाफ कार्यवाही क्यों करती?
शिया वक्फ बोर्ड पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी ने सुप्रीम कोर्ट में कुरान की 26 आयतों को हटाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने सच्चाई जानने की बजाए रिज़वी पर जुर्माना ठोक दिया। जहाँ अदालतों में सच्चाई को सामने लाने में दिक्कत हो उस अदालत से न्याय की कैसे उम्मीद की जा सकती? अक्ल से पैदल जस्टिस ने अगर 31 जुलाई 1986 को दिए तीस हज़ारी कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट Z S Lohat के साहसिक फैसले का ही संज्ञान ले लिया होता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट निचली अदालत के फैसले का संज्ञान लेने में नाक कटने का डर था शायद। 
लगता है हमारी अदालतें ढोंगी सेक्युलरिस्ट्स के चुंगल में फंसी हुई है। अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर कितने सालों तक न्याय के लिए चिल्ला रहा था लेकिन अदालतें झूठे बयानों पर तारीख पर तारीख देकर विवाद को जीवित रखे रहीं। कभी कोर्ट ने यह पूछने की हिम्मत नहीं कि कि आखिर किस आधार पर राम को काल्पनिक बता रहे हो? किस आधार पर रामसेतू को काल्पनिक बताया जा रहा है? अगर राम और रामसेतू काल्पनिक हैं फिर किस आधार पर नवरात्रों पर रामलीला मंचन होने और दशहरे पर राम मंचन स्थलों पर क्यों जाते हो? इतना ही नहीं अगर राम काल्पनिक है तो क्यों दशहरे की क्यों सरकारी छुट्टी घोषित की? यही स्थिति अन्य धार्मिक स्थलों की भी है।

  
दूसरे, अभी दिल्ली हाई कोर्ट ने कन्हैया लाल की हत्या पर निर्मित फिल्म पर किस आधार पर स्टे लगाया? क्या हाई कोर्ट सच्चाई सामने आने नहीं देना चाहती? चलो माना अगर फिल्म के प्रदर्शन से शांति भंग होने का डर था तो कन्हैया के कातिलों को अब तक क्यों नहीं फांसी हुई? क्यों तारीख पर तारीख दी जा रही है? क्या तारीख पर तारीख देकर सद्भावना हो रही है या साम्प्रदायिकता को पाला-पोसा जा रहा है? क्या नूपुर शर्मा के खिलाफ हंगामा करने वालों से किसी कोर्ट ने यह पूछने की हिम्मत की कि जो नूपुर ने कहा है वह इस्लामिक किताबों में लिखा है या नहीं, अगर लिखा हुआ है फिर विवादित क्यों? दूसरे नूपुर को उस बात को क्यों कहना पड़ा? क्यों नहीं तस्लीम रहमानी के खिलाफ आवाज़ उठाई जो शिव लिंग पर विवादित बयानबाज़ी कर रहा था? क्या वह उचित था?                

निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट और कपिल सिबल जैसे वकीलों को इन किताबों को भेंट दें 
हिन्दुओं के खिलाफ चल रही इस साज़िश पर सारे मुल्ला, मौलवी, तथाकथित इस्लामिक स्कॉलर और INDI गठबंधन में ख़ामोशी क्यों? इस साज़िश का मुंह कुचलने के लिए सारे हिन्दू संगठनों को गूगल से अनवर शेख की पुस्तकें अगर नहीं मिल पाएं तो अली सीना की Understanding Mohammad And Muslim का वितरण करना चाहिए। जिस दिन हिन्दू संगठनों ने इस शुभ काम को करना शुरू किया सारे हिन्दू विरोधी सड़क आकर चील-कौओं की चीखते हुए बाहर निकल आएंगे। अली का कहना है कि इस किताब को पढ़कर मुसलमान इस्लाम छोड़ रहे हैं बल्कि मेरा मानना है कि अनवर शेख को पढ़ इस्लाम छोड़ रहे हैं। शायद यही वजह की अब तक एक्स-मुस्लिम की आबादी लगभग 15/16 हो चुकी। 
 
जिस दिन हिन्दू संस्थाओं और शांतिप्रिय मुसलमानों ने घर-घर इन पुस्तकों का वितरण शुरू कर दिया और अगर 10,000 मुसलमानों ने भी इन किताबों को पढ़ लिया देश की दिशा और दशा में जबरदस्त बदलाव आना शुरू होगा। कोई सनातन के खिलाफ बोलना तो दूर कोई फतवा देने से पहले हज़ार बार सोंचेंगा। "सिर तन से जुदा गैंग" के खिलाफ मुसलमान ही सड़क पर आकर इनको जल्दी से जल्दी से फांसी की मांग करते सड़क पर होगा।    

सलमान रुश्दी की The Satanic Verses के खिलाफ फतवा देने वाला अयातुल्ला खोमैनी भी अनवर शेख द्वारा किताबें लिखने पर खामोश रहे। इतना ही नहीं जितने भी इस्लामिक स्कॉलर थे सबकी बोलती बंद थी। गौरतलब बात यह है कि इस्लामिक धर्मांतरण में हमारी अदालतें और पिछली सरकारें दोषी हैं। दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट Z S Lohat कुरान की 24 आयतों के खिलाफ 31 जुलाई 1986 को फैसला देने की हिम्मत कर सकते हैं लेकिन Calcutta High Court में दर्ज 124 आयतों के खिलाफ सबूतों के होते हुए क्यों नहीं फैसला दे पाए इसे जानने के लिए The Quran Petition को पढ़ना ही नहीं देशहित में इस केस को दोबारा खोलना होगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का कार्यकाल था और हिन्दू अयोध्या में रामजन्मभूमि का ताला खुलने की ख़ुशी मना रहा था। अगर जस्टिस जीवित हो उनसे पूछा जाये आखिर किस दबाब में उचित फैसला क्यों नहीं दिया? 

‘शिजर-ए-तैयबा’ किताब मिली

न्यूज़18 की रिपोर्ट के अनुसार, यूपी ATS को छांगुर पीर के ठिकाने से एक अहम किताब मिली है। इस किताब का नाम ‘शिजर-ए-तैयबा’ है। ATS का मानना है कि यह किताब लव जिहाद और अवैध धर्मांतरण को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल की जा रही थी।

यह किताब खुद छांगुर पीर ने छपवाई थी। इस किताब का मकसद लोगों का ब्रेनवॉश करना था। किताब में ऐसे लोगों का जिक्र किया गया है, जो इस्लाम के लिए अपनी जान दे सकते हैं। किताब में यह भी बताया गया है कि कैसे युवाओं को इस्लाम की तरफ आकर्षित किया जाए। यह किताब विदेशी पैसों से छपी थी।

रिपोर्ट बताती है कि किताब सोशल नेटवर्किंग और धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए युवाओं तक पहुँचाई जाती थी, जिससे वे धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर आकर्षित होते जाए। इस किताब को छपवाने का मकसद ये भी था, कि छांगुर पीर ने ना होने पर उसका गैंग इसके माध्यम से धर्मांतरण का काम जारी रखें।

‘किताब’ नहीं ‘हथियार’ है

पुलिस और ATS ‘शिजर-ए-तैयबा‘ नाम की किताब की गहराई से जाँच कर रही है। उनका मानना है कि यह कोई सामान्य धार्मिक किताब नहीं है। बल्कि, यह एक खतरनाक हथियार है।

इस किताब का इस्तेमाल लव जिहाद और जबरन धर्मांतरण के लिए किया गया। ATS अब यह पता लगा रही है कि इस किताब की कितनी कॉपियाँ बनाई गईं। यह किताबें किन-किन लोगों तक पहुँचीं और कहाँ-कहाँ भेजी गईं।

जाँच एजेंसियों का मानना है कि यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। इसका मकसद सुनियोजित तरीके से लोगों का धर्मांतरण कराना और कट्टरपंथी सोच फैलाना था।

त्रिशुल और कव्वाली से किया जाता था धर्मांतरण

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस और ED छांगुर पीर के साथियों के बैंक खातों की जाँच कर रही हैं। छांगुर पीर के 4 करीबी दोस्त पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के जिलों में अवैध तरीके से लोगों का धर्म बदलवाते थे।

यह लोग मजार (दरगाह) जैसी जगहों पर त्रिशूल लगाते थे और कव्वाली गाते थे। ऐसा करने से ये लोगों को इस्लाम की तरफ आकर्षित करते थे और हिंदू धर्म की मान्यताओं को गलत बताते थे। उनका मकसद लोगों को लालच देकर धर्म बदलवाना था।

लड़कियों को ‘प्रोजेक्ट’ कहने का कोडवर्ड

जानकारी के अनुसार, जाँच में खुलासा हुआ कि जमालुद्दीन उर्फ छांगुर अपने साथियों से बात करने के लिए कोडवर्ड का इस्तेमाल करता था। वह गरीब, विधवा और प्रेमजाल में फँसी हिंदू लड़कियों को बहला-फुसलाकर निशाना बनाता था। इन लड़कियों को कोडवर्ड में ‘प्रोजेक्ट‘ कहा जाता था।

धर्मांतरण को ‘मिट्टी पलटना‘ और मानसिक रूप से प्रभावित करने या ब्रेनवॉश करने को ‘काजल करना‘ कहा जाता था। छांगुर पीर से मिलवाने के लिए ‘दर्शन‘ शब्द का इस्तेमाल होता था।

डॉक्टर्स करते खतना

आजतक की रिपोर्ट में एक पीड़िता ने खुलासा किया है कि छांगुर पीर के गैंग के 30-40 लोग अभी भी बाहर हैं। वे बरेली और आजमगढ़ में धर्मांतरण का नेटवर्क चला रहे हैं।

इस गैंग में कई प्रभावशाली लोग और डॉक्टर भी शामिल हैं। कुछ डॉक्टर हिंदुओं का धर्म बदलकर उनका खतना भी करते थे। पीड़ितों का आरोप है कि पुलिस उनकी मदद नहीं कर रही है।

पीड़िता का खुलासा

बलरामपुर में छांगुर पीर नाम का एक व्यक्ति था। वह एक बड़ी दरगाह चलाता था। छांगुर पीर ने दावा किया था, “मैं इतना ताकतवर हूँ कि मुझे कोई छू नहीं सकता।”
जनजातीय महिला ने बयान दिया कि वह एक दिन महबूब की दुकान से कपड़े लेकर आई थी। कपड़े फटे थे और वह उन्हें बदलवाने के लिए दुकान गई। महिला को वहाँ से महबूब के घर जाने के लिए कहा गया।
महिला जब घर पहुँची तो उसे वहाँ छांगुर पीर, नीतू और महबूब था। महिला ने कपड़े वापस करवाने के लिए महबूब को बुलाने को कहा। नीतू उर्फ नसरीन ने महबूब को बुलाया और खुद छांगुर पीर के साथ नीचे चली गई।
महिला ने बताया कि महबूब और नदीम मुझे पकड़कर कमरे में ले गए और मेरे साथ रेप किया। इसकी शिकायत जब मैंने छांगुर पीर से कही तो उसने कहा ‘इसमें गलत क्या है?’
फिर छांगुर पीर ने कहा कि इस्लाम कबूल कर लो, यहाँ तुम्हें पैसा, आराम शोहरत सब कुछ मिलेगा। महिला ने छांगुर पीर की बात नहीं मानी। फिर छांगुर पीर ने कहा कि जाओ, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, ‘मैं इतना ताकतवर हूँ कि मुझे कोई छू नहीं सकता।’
पीड़ित महिला की पुकार जब स्थानीय पुलिस ने नहीं सुनी तो वे कुछ समय बाद लखनऊ गई, जिसके बाद मामला दर्ज किया गया। पीड़िता का कहना है कि इन्हें फाँसी हो जाए।
मामले में, यूपी ATS का कहना है कि छांगुर पीर धर्मांतरण का एक बड़ा रैकेट चला रहा था। यह रैकेट ₹100 करोड़ से ज़्यादा का है। इसे खाड़ी देशों से पैसा मिलता था।
यह रैकेट गरीब, दलित और विधवा हिंदू महिलाओं को निशाना बनाता था। वह लालच और धमकी देकर उनका धर्म बदलवाता था।

छांगुर पीर का धर्मांतरण मामला

बलरामपुर में एक बड़े अवैध धर्मांतरण नेटवर्क को चलाने वाला जमालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर (जिसे हाजी पीर जलालुद्दीन, पीर बाबा या हजरत बाबा भी कहा जाता है) पुलिस की गिरफ्त में हैं। छांगुर पीर पर हिंदू लड़कियों, गरीब और असहाय लोगों को बहला-फुसलाकर जबरन धर्मांतरण कराने का आरोप है।
छांगुर पीर का नेटवर्क खाड़ी देशों से ₹100 करोड़ से अधिक की विदेशी फंडिंग प्राप्त करता था। इस फंडिंग से धर्मांतरण की गतिविधियों को अंजमा देता था। गैंग के पास 40 से अधिक बैंक खाते थे, जिनमें बड़े पैमाने पर लेनदेन होता था।
छांगुर पीर इन पैसों से लग्जरी गाड़ियाँ, बंगले और अन्य संपत्तियाँ खरीदता था। गैंग जाति के आधार पर धर्मांतरण के लिए पैसा देता था। गैंग में शामिल मुस्लिम युवक हिंदू पहचान बताकर युवतियों को प्रेमजाल में फँसाते और उनका ब्रेनवॉश कर धर्मांतरण करवाते।
छांगुर पीर के साथ नीतू रोहरा उर्फ नसरीन भी पुलिस की गिरफ्त में है। ATS ने बताया कि पूरा नेटवर्क भारत में फैला है। इस गैंग के 14 अन्य सदस्य फरार हैं, जिनकी तलाश में टीमें जुटी हुई हैं।
फिलहाल छांगुर पीर की अवैध ठिकानों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है और उसके खिलाफ ATS, पुलिस और ED समेत कई एजेंसियाँ जाँच कर रही हैं।
अवलोकन करें:-
 
मीलॉर्ड और हिन्दू विरोधी कपिल सिबल जवाब दो कन्हैया लाल की हत्या से क्या मोहब्बत के फूल बरसे थे?
छांगुर पीर का मामला केवल धर्मांतरण का नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित आपराधिक गैंग का है। विदेशी फंडिंग और ‘शिजर-ए-तैयबा’ जैसी सामग्री का उपयोग करते हुए, यह रैकेट ‘लव जिहाद’ और लालच के माध्यम से कमजोर वर्गों (खासकर हिंदुओं) को निशाना बना रहा था। एटीएस और ईडी की लगातार कार्रवाई इस गहरी साजिश की परतों को खोल रही है।

पुलिस करे मस्जिद का नियंत्रण, कलकत्ता हाई कोर्ट का आदेश: अलग-अलग नमाज टाइमिंग को लेकर मस्जिद में ही लड़ गए थे नमाजी, 1 की मौत + 8 घायल

     कलकत्ता हाई कोर्ट ने चेतावनी दी है कि दोबारा हिंसा हुई तो वह मस्जिद में कोई गतिविधि बंद कर देंगे (फोटो साभार:           Leonardo AI)
कलकत्ता हाई कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि वह पूर्वी मिदनापुर की एक मस्जिद पर नियंत्रण कर ले। पुलिस को आदेश दिया गया है कि वह मस्जिद में आने-जाने वाले नमाजियों पर नजर रखे और इसे नियमित करे। यह आदेश नमाजियों के दो गुटों के बीच में हुई लड़ाई के बाद दिया गया है। इस लड़ाई में एक की मौत हो गई थी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, कलकत्ता हाई कोर्ट ने बुधवार (20 नवम्बर, 2024) को यह आदेश दिया। हाई कोर्ट ने यह आदेश एक याचिका की सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कहा गया था कि कि उसके पुराने आदेश की अवहेलना की गई है।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने 7 नवम्बर, 2024 को आदेश दिया था कि पूर्वी मिदनापुर के एगरा में स्थित एक मस्जिद में दो अलग-अलग नमाजियों के गुटों को अलग-अलग समय पर नमाज पढ़वाई जाए। हालाँकि, कोर्ट के आदेश का पालन नहीं हुआ। इसके बाद 13 नवम्बर, 2024 को दोनों गुटों के बीच भारी हिंसा हुई।

इस हिंसा में एक नमाजी की मौत हो गई जबकि 8 गंभीर रूप से घायल हो गए। इस हिंसा के बाद पुलिस ने 3 FIR दर्ज की हैं। मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हिंसा के बाद अदालत पहुँचे नमाजियों की सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा पुलिस को मस्जिद में नियंत्रण का आदेश दिया।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा, “मस्जिद को पुलिस नियंत्रण में ले और यहाँ किसी की भी एंट्री एगरा पुलिस स्टेशन के प्रभारी निरीक्षक की मंजूरी के बगैर नहीं होगी।” कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि उसने यह निर्णय बड़ा सोच समझ कर लिया है।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा, “मस्जिद को पुलिस नियंत्रण में ले और यहाँ किसी की भी एंट्री एगरा पुलिस स्टेशन के प्रभारी निरीक्षक की मंजूरी के बगैर नहीं होगी।” कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि उसने यह निर्णय बड़ा सोच समझ कर लिया है।

हाई कोर्ट ने नमाजियों को चेतावनी दी है कि अगर फिर से हिंसा हुई और कोई मरा तो वह मस्जिद में किसी के भी नमाज पढ़ने पर रोक लगा देंगे। कोर्ट ने कहा कि ‘मजहबी मामले’ के कारण किसी की भी मौत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जिला प्रशासन से एक मीटिंग करने को भी कहा है।

रिटायर होते ही हाई कोर्ट जस्टिस ने 37 साल की दूरी मिटाई: कहा- बचपन से लेकर जवानी RSS को दी

        जस्टिस चित रंजन दाश (बाएँ) ने बताय कि वह बचपन से RSS सदस्य हैं (चित्र साभार: Livelaw & Mint)
कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस चित रंजन दाश ने सोमवार (20 मई, 2024) को अपने सेवानिवृत्ति भाषण में बताया कि वह बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे हैं। उन्होंने खुद पर RSS का एहसान बताया और कहा कि इस संगठन ने उनका चरित्र निर्माण किया है। उन्होंने कहा कि अब वह संगठन का काम करने के लिए दोबारा मुक्त हैं।

जस्टिस चित रंजन दाश ने अपने सेवानिवृत्ति के उपलक्ष्य में रखे गए कार्यक्रम में कहा, “आज, मैं अपने मन की बात बताता हूँ। मैं एक संगठन का बहुत आभारी हूँ। मैं बचपन से लेकर युवा होने तक तक वहाँ रहा हूँ। मैंने साहसी, ईमानदार होना, दूसरों को बराबर मानना, देशभक्ति की भावना और सबसे ज्यादा आप जहाँ भी काम करते हैं वहाँ काम के प्रति प्रतिबद्धता सीखी है। मुझे यहाँ यह स्वीकार करना होगा कि मैं RSS का सदस्य था और अभी भी हूँ।”

जस्टिस दाश ने बताया कि उन्होंने न्यायपालिका में आने के बाद RSS से दूरी बना ली थी लेकिन अब वह वापस जाने के लिए मुक्त हैं और जिस भी तरह से संगठन की सेवा हो सकेगी, करेंगे। उन्होंने कहा, “मैंने अपने काम के कारण लगभग 37 वर्षों तक संगठन (RSS) से दूरी बना ली थी। मैंने कभी भी RSS की सदस्यता का उपयोग अपने करियर में आगे बढ़ने के लिए नहीं किया, क्योंकि यह हमारे सिद्धांतों के विरुद्ध है।”

आगे उन्होंने बताया, “अगर उन्हें (RSS) किसी भी काम के लिए मेरी जरूरत होगी तो मैं RSS में वापस जाने के लिए तैयार हूँ। मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है इसलिए मैं कह सकता हूँ कि मैं RSS से हूँ क्योंकि यह भी गलत नहीं है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में काम करने के दौरान वह सबको समान रूप से देखते रहे। उन्होंने कहा, “मैंने सभी के साथ समान व्यवहार किया है, चाहे वह कम्युनिस्ट व्यक्ति हो, चाहे वह भाजपा या कॉन्ग्रेस का व्यक्ति हो या यहाँ तक ​​कि TMC का आदमी हो।”

जस्टिस दाश बीते 37 वर्षों से न्यायपालिका में काम कर रहे थे। वह बीते 15 वर्षों से हाई कोर्ट में जज थे। वह कलकत्ता हाई कोर्ट तीसरे सबसे वरिष्ठ जज थे। वह कलकत्ता हाई कोर्ट से पहले ओडिशा हाई कोर्ट में भी जज रहे हैं। ओडिशा में वह जिला स्तर के जज भी कई जिलों में रहे हैं।

बिक गई है कलकत्ता हाई कोर्ट… एक भी वोट मत देना BJP को: ममता बनर्जी

घोटाले उजागर होने पर विपक्ष बौखला गया है। उनकी और हिटलर की कार्यशैली कोई अंतर नहीं। शिक्षक घोटाले पर कार्यवाही करने पर कलकत्ता हाई कोर्ट को कहना कि बिक गयी है। या तो घोटालेबाज़ों को घोटाले करने दो, वरना कोर्ट पर भी कीजड़ फेंकेंगे। 

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा सुनाए गए ‘शिक्षक घोटाला’ मामले में फैसले पर कहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने हाई कोर्ट को खरीद लिया है। उन्होंने घोटाले के तहत भर्ती हुए 26000 शिक्षकों की भर्ती रद्द किए जाने के मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। जनता को भड़काते हुए सीएम ममता ने अपील की कि चाहे कुछ भी हो जाए भाजपा और सीपीएम को टीचरों और सरकारी मुलाजिमों से एक भी वोट नहीं मिलना चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले पर नाराजगी जाहिर करने के दौरान कहा, “भाजपा और सीपीए या कॉन्ग्रेस को एक भी वोट नहीं मिलना चाहिए।” उन्होंने कहा कि भाजपा ने हाई कोर्ट को खरीद लिया है। अब बस उम्मीद बची है तो सुप्रीम कोर्ट से।

अपनी बात कहते हुए ममता बनर्जी बोलीं, “उन्होंने (भाजपा) हाई कोर्ट को खरीद लिया है। उन्होंने सीबीआई को खरीद लिया है। उन्होंने एनआईए को खरीद लिया है। उन्होंने बीएसएफ को खरीद लिया है। उन्होंने सीएपीएफ को खरीद लिया है। उन्होंने दूरदर्शन का रंग भगवा करवा दिया है। वो सिर्फ भाजपा और मोदी की बात करता है। उसे बिलकुल मत देखो। उसका बहिष्कार करो।”

ममता के इस बयान के बयान के बाद वरिष्ठ वकील विकास रंजन भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयानों पर स्वत: संज्ञान लेने के लिए एक याचिका दायर की। उन्होंने कह कि ये कोर्ट की अवमानना है। लोग अदालत पर हँस रहे हैं। जजों को पक्षपाती कहा जा रहा है। अपनी याचिका के साथ उन्होंने पेपर की कटिंग भी दी है। उनकी इस याचिका पर कोर्ट ने मामले को लिस्ट करते हुए इसपर हलफनामा दायर करने को कहा है।

हाई कोर्ट का फैसला और टीएमसी की राजनीति

बंगाल के शिक्षक भर्ती घोटाले में लंबे समय से जाँच चल रही थी। इस केस में पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी समेत कई तृणमूल नेता जेल जा चुके हैं। वहीं कुछ दिन पहले ही SSC भर्ती घोटाले में फैसला सुनाते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार को झटका दिया था।
स्कूल भर्ती घोटाले पर फैसला सुनाते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा था कि 2016 के पूरे पैनल को रद्द किया जाए। 9वीं से लेकर 12वीं ग्रुप C एवं D में हुई सभी नियुक्तियों को अवैध ठहराते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि 23,753 नौकरियों को रद्द किया जाए। इतना ही नहीं, इन सभी को 4 सप्ताह के भीतर पूरा वेतन लौटाना होगा, वो भी 12% ब्याज के साथ।
अब ममता बनर्जी इसी कोर्ट के फैसले के खिलाफ जनता में जो गुस्सा उमड़ा है उसका प्रयोग चुनाव जीतने के लिए कर रही हैं। कुछ समय से संदेशखाली मुद्दे पर उनकी सरकार को बहुत आलोचना झेलनी पड़ी थी लेकिन इस मुद्दे को टीएमसी इस्तेमाल करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही।

पश्चिम बंगाल में रामनवमी हिंसा पर कलकत्ता हाई कोर्ट सख्त, कहा –जहाँ त्योहार में भी शांति नहीं, वहाँ लोग चुनाव के लायक नहीं: ‘टाल दिया जाए लोकसभा चुनाव’

                                                                   कलकत्ता हाई कोर्ट
राम नवमी के मौके पर हुई हिंसा को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने कड़ा रुक अपनाया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि जहाँ दो समुदाय 8 घंटे की भी शांति नहीं बना सकते, वहाँ चुनाव की कोई जरूरत नहीं है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मंगलवार (23 अप्रैल, 2024) को इस साल रामनवमी के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ी घटनाओं का न्यायिक संज्ञान लिया और हिंसा के मामलों की सुनवाई की।

रामनवमी पर पश्चिम बंगाल में भड़की सांप्रदायिक हिंसा को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि इस साल जिन निर्वाचन क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा भड़की है, उन जगहों पर वह लोकसभा चुनाव 2024 की मंजूरी नहीं देगी। अगर लोग शांति के साथ कोई जश्न नहीं मना सकते हैं, तब चुनाव आयोग से हमारी सिफारिश है कि ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव न हों।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस टीएस शिवगणनम ने कहा, “हम चुनाव आयोग से सिफारिश करेंगे कि जब लोग कुछ घंटों के लिए शांति के साथ पर्व नहीं मना सकते हैं तब उन्हें संसदीय प्रतिनिधि चुनने का अधिकार भी नहीं दिया जाना चाहिए। ऐसे में चुनाव (वहाँ पर) टाल दिए जाने चाहिए।”

हाई कोर्ट ने आगे कहा, “कुछ छोटी घटनाओं के चलते बड़ा धमाका हो सकता है। ऐसा नहीं होता कि ये सारी घटनाएँ पहले से सुनियोजित होती हैं। त्योहार के दिन…किसी आदमी के ऊपर कोई चीज सवार हो जाती है और वह (हो सकता है बाकी लोगों को भड़काए)…लेकिन इस तरह की असिहष्णुता दोनों तरफ से है।”

कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस दौरान यह भी कहा कि वह चुनाव आयोग के सामने बहरामपुर संसदीय क्षेत्र में होने वाले चुनाव को टालने का प्रस्ताव रखेगा। हिंसा की घटनाओं के बारे में हाई कोर्ट ने राज्य से हलफनामा माँगते हुए मामले को 26 मई तक के लिए स्थगित कर दिया है। इसमें याचिकाकर्ताओं की स्वीकारोक्ति भी दर्ज है कि यह पहली बार है कि बेहरामपुर में रामनवमी पर ऐसी हिंसा हुई।

हाई कोर्ट की बेंच ने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियाँ कीं, जिसमें मुर्शिदाबाद के बेलडांगा और शक्तिपुर में हिंसा की एनआईए या सीबीआई जाँच की माँग की गई थी। शक्तिपुर इलाके में यह हिंसा रामनवमी जुलूस के एक स्थानीय मस्जिद से गुजरने के तुरंत बाद हुईं, जिसमें कई लोग घायल हो गए थे। चीफ जस्टिस ने कहा कि समाचार रिपोर्टों की मानें तो कोलकाता में रामनवमी पर लगभग 33 कार्यक्रम आयोजित किए गए, लेकिन कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। फिर मुर्शिदाबाद में ये कैसे हुआ?

देश भर में 17 अप्रैल 2024 को रामनवमी का त्योहार मनाया गया। इस दौरान पश्चिम बंगाल में कई जगहों पर हिंसा भड़की। कोलकाता पूरी तरह से शांत रहा, लेकिन अन्य हिस्सों से हिंसा की खबरें आई। यही नहीं, मुर्शिदाबाद में रामनवमी जुलूस के दौरान हिंसा के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग (ईसी) को ही जिम्मेदार ठहरा दिया था। हालाँकि चुनाव आयोग ने बंगाल में हिंसा होने पर 2 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया, जिसमें मुर्शिदाबाद जिले के शक्तिपुर और बेलडांगा थाने के प्रभारी शामिल थे। ये अधिकारी अपने संबंधित अधिकार क्षेत्र में 17अप्रैल को हुई हिंसा को रोकने में विफल रहे थे। इसी मामले में हाई कोर्ट ने सरकार से सवाल पूछा है।