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बंगाल : स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले में ममता सरकार फिर एक्सपोज, शिक्षा मंत्री के बाद अब एक और TMC विधायक लपेटे में आया

                                                                                                                                          साभार 
पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी के पाप एक के बाद एक सामने आ रहे हैं। स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने ममता बनर्जी के करीबी शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के बाद अब एक और टीएमसी जीवन कृष्ण साहा को गिरफ्तार किया है। इससे पहले टीएमसी विधायक माणिक भट्टाचार्य भी ईडी के फंदे में फंस चुके हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने स्कूल भर्ती घोटाले मामले में TMC विधायक जीवन कृष्ण साहा को गिरफ्तार कर लिया। ED की टीम रेड के लिए पहुंची थी, लेकिन विधायक को इसकी जानकारी मिल गई। वे रेड के पहले दीवार फांदकर भागने की कोशिश करने लगे। इस दौरान साहा ने मोबाइल फोन भी नाले में फेंक दिया, जिसे ED ने बरामद कर लिया है। विधायक की गिरफ्तारी के समय की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं। एक फोटो में कीचड़ में सने नजर आ रहे हैं। जीवन कृष्ण साहा मुर्शिदाबाद के बुरवान से विधायक हैं।

ममता बनर्जी की घोटालों की सरकार की कलई खुलने लगी

पश्चिम बंगाल में घोटाले का यह कोई पहला मामला नहीं है। ममता बनर्जी की घोटालों की सरकार की कलई खुलने लगी है। बंगाल में बनर्जी के सीएम रहते शारदा स्कैम, रोज वैली स्कैम, नारदा स्कैम, पोंजी स्कैम और रिक्रूटमेंट स्कैम जैसे कई घोटाले हुए हैं। हाला यह हैं कि एक भी रिक्रूटमेंट प्रोसेस भ्रष्टाचार के बिना पूरी नहीं हुआ। ताजा रिक्रूटमेंट घोटाले में पश्चिम बंगाल के उद्योग और वाणिज्य मंत्री रहे पार्थ चटर्जी, उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी, शिक्षा राज्य मंत्री परेश सी अधिकारी, विधायक और पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य के नाम सामने आए हैं। मंत्री और अर्पिता जेल में बंद हैं और दूसरे घोटालों की हाईकोर्ट जांच कर रहा है।
एजेंसियां पता लगा रहीं कि ममता बनर्जी ने किन-किन पर अपनी ‘ममता’ लुटाई
ममता के करीबी मंत्री के बाद अब सीएम के भाइयों पर करोड़ों कमाने और आय से अधिक संपत्ति के आरोप लगे हैं। ममता के बेहद खास कहे जाने वाले और कभी तृणमूल कांग्रेस में नंबर-2 की हैसियत रखने वाले पार्थ चटर्जी की सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के घर से 51 करोड़ रुपए बरामद हो चुके हैं। टीचर्स रिक्रूटमेंट स्कैम में पार्थ और अर्पिता जेल में बंद हैं। अब कोलकाता हाईकोर्ट में लगी पिटीशन में साफ-साफ कहा गया है कि तृणमूल कांग्रेस के 2011 में सत्ता में आने के बाद से बनर्जी परिवार की संपत्ति बेहिसाब बढ़ी। सीएम ममता बनर्जी के पांच भाइयों और एक भाभी पर आय से ज्यादा संपत्ति जमा करने के आरोप लगे हैं। हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को 11 नवंबर तक एफिडेविट जमा करने के आदेश दिए हैं।
तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से बनर्जी परिवार की संपत्ति में बेशुमार इजाफा
कोलकाता हाईकोर्ट में लगी एक नई पिटीशन में अब सीएम ममद बनर्जी का परिवार ही निशाने पर है। पिटीशन में ममता के भाइयों पर आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से बनर्जी परिवार की संपत्ति में बेशुमार इजाफा होकर यह कई गुना बढ़ी है। पिटीशन में कहा गया है कि कोलकाता की हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर ज्यादातर प्रॉपर्टी बनर्जी परिवार की हैं। ममता की भाभी कजरी बनर्जी पर कई प्रॉपर्टी मार्केट रेट से कम कीमत में खरीदने का आरोप है। भतीजे अभिषेक बनर्जी कई कंपनियों में डायरेक्टर हैं।
ममता बनर्जी के CM बनने के बाद बंगाल में स्कैम की बाढ़ 
पिटीशन में ममता और उनके परिवार पर लगे आरोप लगे हैं कि 2011 से ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। इस दौरान शारदा स्कैम, रोज वैली स्कैम, नारदा स्कैम, पोंजी स्कैम और रिक्रूटमेंट स्कैम हुए। एक भी रिक्रूटमेंट प्रोसेस भ्रष्टाचार के बिना पूरी नहीं हुआ। इन घोटालों में तृणमूल कांग्रेस के कई नेता अरेस्ट भी हुए। पॉलिटिकल लीडर्स और मीडिया ने ममता बनर्जी के फैमिली मेंबर्स की बेहिसाब संपत्ति पर खुलासे किए। गनाशक्ति नाम के बांग्ला अखबार ने दावा किया कि कोलकाता की हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर ज्यादातर प्रॉपर्टी बनर्जी परिवार की हैं।
पार्थ ने भ्रष्टाचार के पैसे से अर्पिता को थाइलैंड और फुकेट घुमाकर खूब ऐश कराई

पश्चिम बंगाल के रिक्रूटमेंट घोटाले के मास्टरमाइंड ममता के मंत्री और अर्पिता के बारे में जांच एजेंसी ईडी ने नए खुलासे किए हैं। पार्थ ने सारे नियम-कानूनों को किनारे रखकर अपनी करीबी अर्पिता पर करोड़ों रुपये न्यौछावर कर दिए। इतना ही नहीं पार्थ ने अपनी.पत्नी के करोड़ों के शेयर भी अर्पिता को अर्पित कर दिए। उसे भ्रष्टाचार के पैसे से थाइलैंड और फुकेट घुमाकर खूब ऐश कराई। विदेश यात्रा से वापस आकर उसने अर्पिता को दो लग्जरी गाड़ियां भी दीं। घोटालेबाज मंत्री अर्पिता पर इतना मेहरबान था कि उसकी बहन को सरकारी नौकरी तक दिला दी।

 तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी घोटाले का मास्टरमाइंड

कई घोटालों में लिप्त पश्चिम बंगाल सरकार का यह करोड़ों रूपये का घोटाला है। इसकी जांच कर रही प्रवर्तन निदेशालय की टीम ने पुख्ता इनपुट मिलने के बाद ममता बनर्जी सरकार में शिक्षा मंत्री और तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार किया। तब घोटाले के मास्टरमाइंड पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के दो घरों से करीब 50 करोड़ रपये कैश बरामद किए गए थे। छापे में उस समय इसके साथ ही 5 किलो से ज्यादा सोना और दस्तावेज भी मिले थे। इतनी बड़ी धनराशि कहां से आई, इसके सोर्स के बारे में पार्थ और अर्पिता कुछ भी सही-सही नहीं बता पाए थे। उनसे पूछताछ के बाद ईडी ने टीएमसी विधायक माणिक भट्टाचार्य से गिरफ्तार कर लिया। माणिक भट्टाचार्य स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले के मामले में गिरफ्तार होने वाले ममता बनर्जी की पार्टी के दूसरे नेता हैं।
मनी लॉन्ड्रिंग केस में भी TMC विधायक साहा व रिश्तेदार आरोपी
अब ईडी की जांच से रडार पर टीएमसी के एक और विधायक जीवन कृष्ण साहा भी आ गए। ईडी की तरफ से दर्ज किए गए मनी लॉन्ड्रिंग केस में TMC विधायक साहा, उनके रिश्तेदार और सहयोगी आरोपी हैं। ईडी की टीम एक व्यक्ति को लेकर साहा के घर पहुंची थी। स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़े बीरभूम के एक व्यक्ति ने पैसों की लेन-देन की सूचना मिलने के बाद साहा के परिसरों की तलाशी ली। ED की टीम ने बीरभूम के उस व्यक्ति के साथ साहा के घर पर छापा मारा। इससे पहले, ED ने साहा की पत्नी से भी पूछताछ की थी। साहा को विशेष अदालत में पेश किया जाएगा और आगे की जांच के लिए उनकी हिरासत मांगी जाएगी।
शिक्षक भर्ती घोटाला केस में ED दायर कर चुकी 4 चार्जशीट
साहा को CBI ने भी 2023 में इसी घोटाले से जुड़े आरोप में गिरफ्तार किया था और बाद में रिहा कर दिया गया था। यह मामला CBI की उस FIR से उठा, जिसे कलकत्ता हाईकोर्ट ने 9वीं से 12वीं के सहायक शिक्षकों और प्राइमरी टीचर्स की भर्ती में अनियमितताओं की जांच करने का निर्देश दिया था। ED ने इससे पहले पश्चिम बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी, टीएमसी विधायक और पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी इस मामले में गिरफ्तार किया था।
नौकरी के बदले रिश्वत लेकर घोटालेबाजों ने करोड़ों कमाए
गिरफ्तारी के बाद चटर्जी को टीएमसी ने निलंबित कर दिया था। इस मामले में अब तक ईडी 4 चार्जशीट दाखिल कर चुके हैं। ईडी ने पहली चार्जशीट 19 सितंबर 2022 को दाखिल की थी। इसमें पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी का नाम शामिल था। चार्जशीट के अनुसार, इन दोनों के पास 103.10 करोड़ रुपए की नकदी, गहने और अचल संपत्ति (जमीन-जायदाद) का पता लगा था। कहा गया कि यह राशि इन्होंने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से बनाई गई थी। जांच में नौकरी के बदले रिश्वत लेने की बात भी सामने आई थी।


ममता राज के 14 साल में बड़े ब्रांड छोड़ रहे बंगाल: मीडिया और विपक्ष में पसरा मातम किसी की आवाज़ नहीं निकल रही; 6600+ कंपनियों ने बंगाल को कहा ‘बाय’, UP-दिल्ली जैसे राज्यों में बनाया ठिकाना: उद्योग-धंधों का कब्रिस्तान बन रहा ‘शोनार बांग्ला’

जिस विनाश की ओर आज बंगाल जा रहा है सारा मीडिया और विपक्ष ऐसे खामोश है मानों ये सब किसी मातम में डूबे हुए हैं। कल तक जो बंगाल एक व्यवसायिक राज्य से जाना जाता था, आज वहां से बड़े-बड़े उद्योग और कंपनियां पलायन करने को मजबूर हो चुकी है। जब जो राज्य उद्योग विहीन हो जाएगा उस राज्य की आर्थिक स्थिति क्या होगी? फिर केंद्र के आगे हाथ पसारे जायेंगे। और जब केंद्र एक निश्चित सीमा से बाहर सहायता नहीं देगा तब ये दोगली मीडिया और विपक्ष देखना कितना छातियां पीट मातम मनाएंगे कि देखों केंद्र को बंगाल की चिंता नहीं, क्यों नहीं अपने बीमार राज्य की मदद नहीं कर रहा? ममता है उसको बंगाल की बिगड़ती कानून व्यवस्था की बिलकुल भी फ़िक्र नहीं। ममता को बस दिख रही मुस्लिम तुष्टीकण कर अपनी कुर्सी बचाना। फिर कहा जाता हैं कि सेकुलरिज्म के रास्ते चलने वाले हैं। जबकि हकीकत यह है की इनको Secularism का मतलब तक नहीं मालूम।         

केंद्र सरकार ने हाल ही में बताया है कि बीते डेढ़ दशक में पश्चिम बंगाल से 6 हजार से अधिक कंपनियों ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा है। इनमें से 2 हजार से अधिक कंपनियाँ बीते 5 वर्षों में राज्य छोड़ कर गई हैं। यह भी सामने आया है कि इस दौरान यह कंपनियाँ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को गई हैं। 

पश्चिम बंगाल से उद्योग धंधों का यह पलायन तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के राज में हुआ है। पश्चिम बंगाल में जहाँ एक ओर कंपनियाँ राज्य छोड़ कर जा रही हैं, वहीं नए निवेश भी नाममात्र को हो रहे हैं। देश के चौथे सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के लिए यह स्थिति गंभीर और चिंताजनक है।

यह आँकड़े भले ही चौंकाने वाले हों, लेकिन उद्योग-धंधों का पलायन और पश्चिम बंगाल का पुराना रिश्ता है। देश के बड़े कारोबारी घरानों के अपना मुख्यालय शिफ्ट करने से बड़े ब्रांड्स के फैक्ट्री बंद करने तक यही हाल बीते कई सालों से है। इसमें एक कारण ममता बनर्जी सरकार का उद्योग विरोधी रुख और राज्य की खस्ताहाल कानून-व्यवस्था है।

कभी एशिया की बड़ी औद्योगिक ताकतों में से एक गिने जाने वाले कोलकाता के अवसान की यह पटकथा ममता बनर्जी के राज से पहले वामपंथियों ने लिख दी थी। लेकिन ममता बनर्जी ने इस पटकथा को अंतिम रूप दिया है और उद्योग-धंधों में इजाफा करने के बजाय उनके ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की कसर पूरी कर दी है।

 कितनी कंपनियों ने बंगाल को कहा बाय-बाय

राज्यसभा में मानसून सत्र के दौरान भाजपा के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल पर एक प्रश्न पूछा। उनके उत्तर में केन्द्र सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने बताया है कि वर्ष 2011-12 से वर्ष 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल से 6688 कंपनियाँ राज्य छोड़ कर गई हैं।

मंत्रलाय के उत्तर के अनुसार, इनमें से एक तिहाई यानी 2200 से अधिक कंपनियाँ वर्ष 2019 के बाद से राज्य छोड़ कर गई हैं। यह ट्रेंड 2011 में TMC के सत्ता में आने के बाद से लगातार जारी है। मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली 6688 कंपनियों में से 110 कंपनियाँ ऐसी थीं जो शेयर बाजार में भी सूचीबद्ध थीं।

मंत्रालय का डाटा बताता है कि 2017-18 के दौरान सबसे अधिक 1027 कंपनियों ने पश्चिम बंगाल छोड़ा है। 2015-16 और और 2016-17 के दौरान क्रमशः 869 और 918 कंपनियों ने पश्चिम बंगाल से कारोबार समेटा है।

कहाँ गईं यह कंपनियाँ

कॉर्पोरेट मंत्रालय के उत्तर के अनुसार, पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली कंपनियाँ दूसरे राज्यों में जा रही हैं। इनका पलायन ऐसे राज्यों में हो रहा है, जहाँ उद्योग को लेकर नीतियाँ सरल हैं और उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है। 2011-25 के बीच पश्चिम बंगाल छोड़ कर सर्वाधिक कंपनियाँ महाराष्ट्र गईं हैं।
इसके अलावा दिल्ली और उत्तर प्रदेश उनकी पसंदीदा लोकेशन में शामिल हुए हैं। कॉर्पोरेट मंत्रालय का उत्तर बताता है कि पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली 1300 से अधिक कंपनियाँ 2011-25 के बीच महाराष्ट्र गईं हैं। वहीं 1297 ने दिल्ली को चुना है। इसके अलावा 879 कंपनियाँ पश्चिम बंगाल छोड़ कर उत्तर प्रदेश में गई हैं।
छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान भी 1000+ कंपनियाँ पश्चिम बंगाल से छीनने में सफल रहे हैं। हालाँकि, इस सबका तृणमूल सरकार पर कोई असर नहीं दिखाई पड़ता है। वह उद्योग धंधों को राज्य में लाने के बजाय उन्हें और राज्य निकाला देने पर तुली दिखाई पड़ती है।

उद्योग-धंधों पर नीति भी बदली

पश्चिम बंगाल में दशकों से व्यापार करने वाली कंपनियाँ एक ओर राज्य छोड़ रही हैं तो वहीं हाल ही में बनर्जी की सरकार ने कुछ ऐसा किया है, जिससे यह पलायन और तेज हो सकता है। अप्रैल, 2025 में राज्य की ममता सरकार ने उद्योगों को लाभ पहुँचाने वाली सभी सरकारी योजनाओं को बंद कर दिया था।
उद्योग-धंधों को लुभाने के लिए 1993 से लेकर 2021 तक बनाई गई सभी नीतियाँ एक झटके में राज्य सरकार ने खत्म कर दी थीं। इसका असर यह होगा कि राज्य में कोई भी उद्योग स्थापित करने पर किसी कारोबारी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। चाहे वह जमीन से जुड़ा हो, बिजली से जुड़ा हो या फिर अन्य किसी एंगल से।
एक रिपोर्ट बताती है कि ममता सरकार ने उद्योग धंधों को यह फायदे देने इसलिए बंद किए थे, ताकि वह ‘सामाजिक कार्यों’ के लिए और पैसा सरकारी खजाने से मुक्त कर सके। इसका अर्थ है कि ममता सरकार उद्योग धंधों को बंद करके लोगों को और खुद पर निर्भर करना चाहती है।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल के इस कदम से कई सीमेंट कंपनियाँ बड़ा झटका झेलेंगी। इनमें डालमिया जैसे देश के पुराने और विशाल कारोबारी घराने भी शामिल हैं। यह नुकसान ₹500 करोड़ तक का बताया गया था।
उद्योग धंधों को कोई भी लाभ ना देने का यह कदम पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसे समय में उठाया है जब बाकी राज्य उनके लिए बाँहें खोल कर खड़े हैं। कहीं ₹1 में जमीन दी जा रही है तो कहीं पूरे-पूरे नए शहर बनाए जा रहे हैं, ताकि उद्योग-धंधे उनके यहाँ आ सकें।

ऐलान बड़े, निवेश नहीं

पश्चिम बंगाल में पुरानी कंपनियाँ तो बाहर जा रही हैं, नया निवेश भी सिर्फ घोषणाओं और कागजों में ही आ रहा है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया था कि जनवरी-नवम्बर 2024 में पश्चिम बंगाल में ₹39 हजार करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव आए थे। उन्होंने दावा किया था कि यह देश में तीसरा सर्वाधिक है।
केंद्र सरकार के एक और विभाग की एक रिपोर्ट इस दावे की सच्चाई खोलती है। भले ही राज्य में बड़े-बड़े निवेश के वादे किए गए हो लेकिन असल में यह वादों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। DPIIT की IEM रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 2024 में नवम्बर माह तक ₹3735 करोड़ के निवेश ही हुए थे जबकि वादा कहीं अधिक था।
पश्चिम बंगाल औद्योगिक निवेश के मामले में भी बाक़ी राज्यों के सामने कहीं नहीं ठहरता। यही रिपोर्ट बताती है कि 2020-24 के बीच जहाँ उत्तर प्रदेश में ₹71 हजार करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है तो वहीं इस दौरान पश्चिम बंगाल मात्र ₹15 हजार करोड़ का ही निवेश आकर्षित करने में सक्षम रहा। निवेश आकर्षित करने के मामले में वह झारखंड तक से पीछे है।

बड़े ब्रांड छोड़ रहे बंगाल

पश्चिम बंगाल छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी ही रहा है। 2024 में राज्य में ब्रिटानिया ने अपनी दशकों पुरानी बिस्किट फैक्ट्री को ताला लगा दिया था। यह फैक्ट्री कोलकाता के पास स्थापित थी। इसी तरह कई जूट मिलें भी राज्य में बंद हो चुकी हैं, या फिर अंतिम साँसे गिन रही हैं।
ब्रांड्स के बंगाल छोड़ने का सिलसिला कोई नया नहीं है। असल में ममता बनर्जी के राजनैतिक करियर का सबसे बड़ा मोड़ यही एक कारण रहा है। 2008 में राज्य को टाटा मोटर्स ने छोड़ा था, वह सिंगूर में में नैनो की फैक्ट्री लगा रहा था। लेकिन ममता बनर्जी के लगातार विरोध के चलते उसे बनी-बनाई फैक्ट्री उखाड़नी पड़ी और गुजरात भागना पड़ा।
ममता बनर्जी इसी सिंगूर के आंदोलन के बाद ही राज्य में बड़ी जीत हासिल कर पाईं और सत्ता में तीन दशक से अधिक से जमे बैठे कम्युनिस्टों की जगह ली। हालाँकि, जिस नेता के सत्ता में आने का कारण ही किसी उद्योग का विरोध रहा हो, उससे उद्योग समर्थक नीति की उम्मीद करना बेईमानी है।
बताते हैं कि इसी बंगाल में कभी आदित्य बिरला को उनकी गाड़ी से खींच कर सड़क पर पीटा गया था और नंगा कर बेईज्जत किया गया था। इसके बाद उन्होंने अपना कारोबार समेट लिया। यही हाल और भी उद्योग घरानों का हुआ।

क्यों चिंता की बात है बंगाल से उद्योग का पलायन

पश्चिम बंगाल से उद्योग धंधों का पलायन राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल देश में चौथा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है लेकिन इसका देश के औद्योगिक आउटपुट में मात्र 3.5% हिस्सा है। इसमें पीछे होने के चलते राज्य में भारी बेरोजगारी की समस्या है।
अवैध घुसपैठियों का पश्चिम बंगाल में आना इस समस्या को और भीषण बनाता है। राज्य में आए दिन होते दंगे और बहुसंख्यक आबादी पर हमले भी ब्रांड्स के घटते विश्वास का कारण बने हैं। राज्य में कानून-व्यवस्था की दयनीय स्थिति के चलते कोई बड़ी कम्पनी निवेश नहीं करना चाहती।
यही कारण है कि 1960 के दशक में जिस पश्चिम बंगाल का देश की जीडीपी में 10% से अधिक योगदान था, वह अब मात्र 5% तक आकर टिक गया है। उससे छोटे राज्य उससे आगे निकलने वाले हैं। यदि पश्चिम बंगाल की ममता सरकार का यही रवैया रहा तो इससे बाकी देश भी प्रभावित होगा।
उसकी धीमी आर्थिक विकास की गति देश को पीछे खींचेगी।