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राहुल LoP हैं या Leader of Propaganda या Leader of Dictator? अमित शाह की संसद में बहस की चुनौती, राहुल गाँधी ने ठुकराया प्रस्ताव बोले- हमें नहीं सुनना, इस्तीफा दो

                                                     साभार : NDTV & Indiatoday
एक समय था जब रिकी पोंटिंग की अजेय ऑस्ट्रेलियाई टीम को हराने के लिए ICC ने दुनिया भर के धुरंधरों को मिलाकर एक 'ICC टीम' बनाई, लेकिन आश्चर्य देखिए...
वहाँ भी ऑस्ट्रेलिया ही जीती! तब विरोधी टीमें गिलक्रिस्ट या हेडन का विकेट लेने में ही अपनी जीत मान लेती थीं या "बैट में स्प्रिंग" होने की अफ़वाहें उड़ाकर दिल बहलाती थीं।
भारतीय राजनीति में आज ठीक यही हो रहा है!
अपना पैमाना इतना ऊँचा कर लो कि लोग आपकी एक खरोंच को भी अपनी महाविजय मान लें। आज सत्ता पक्ष को 240 सीटें मिलीं, लेकिन विपक्ष ने ऐसे जश्न मनाया मानो 40 पर रोक दिया हो। संसद में थोड़े से हंगामे या एक मंत्री के इस्तीफे को वो ऐसे सेलिब्रेट कर रहे हैं जैसे कोई 'गृहयुद्ध' जीत लिया हो।
यह मानवीय प्रवृत्ति है जैसे डिस्कवरी चैनल पर जब कोई खरगोश शेर से बच निकलता है, तो दर्शक खुश होते हैं। यह खरगोश से हमदर्दी नहीं, बल्कि शेर से ईर्ष्या और खौफ है। विपक्ष की हालत भी आज उसी खरगोश जैसी है।
याद रहे, 240 सांसदों के साथ मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव ने भी सरकार चलाई है, और अटल जी ने तो 200 से कम में!
एक दौर था जब 2013 में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जी की सदन में गर्जना मात्र से सरकार बिल वापस लेने पर मजबूर हो जाती थी। आज विपक्ष संसद न चलने देने को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान बैठा है। पहले जो नॉर्मल था, आज वह उपलब्धि है।
सच कहूँ तो सत्ता पक्ष का इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा, जिसे शत्रु मिला भी... तो शस्त्र और बुद्धि दोनों से शून्य!
दिल्ली के जंतर-मंतर में सीजेपी प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और उत्पात को लेकर अभी भी चर्चा जारी है। कुछ समय से संसद में अमित शाह के ना आने से विपक्ष बार-बार उनसे इस्तीफे और जवाब की माँग कर रहा था। लेकिन अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में इस मुद्दे पर चर्चा करने की खुली चुनौती दे डाली है।

राहुल के नितरोज मांगों में बदलाव से साबित करता है कि राहुल राहुल LoP हैं या Leader of Propaganda या Leader of Dictator? यह कटु सत्य है कि राहुल की तानाशाही को INDI गठबंधन को समझना होगा कि राहुल कांग्रेस को तो डुबो ही रहे हैं साथ में समस्त विपक्ष को भी डुबो रहे हैं। कभी तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र का इस्तीफा और अब गृह मंत्री का। क्या है ये सब तमाशा? राहुल और विपक्ष को समझना होगा कि देश संविधान से चलेगा तानाशाही से नहीं। अब UPA की सरकार नहीं, और यही रवैया रहा तो दूर भविष्य तक नहीं आने वाली।   

अमित शाह ने कहा है कि संसद में आज ही इस पर बहस शुरू की जाए और वह हर सवाल का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हालाँकि, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने गृह मंत्री के इस प्रस्ताव को तुरंत ठुकरा दिया है। राहुल गाँधी का कहना है कि देश का युवा गृह मंत्री को सुनना नहीं चाहता है और उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

संसद में चर्चा के लिए अमित शाह का प्रस्ताव

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस पूरे विवाद पर पहली बार खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने विपक्ष पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि विपक्ष संसद की कार्यवाही को जानबूझकर बाधित कर रहा है और महत्वपूर्ण मुद्दों पर होने वाली बहस से भाग रहा है।

अमित शाह ने दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है और वह सदन के भीतर हर एक सवाल का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने विपक्ष को चुनौती दी कि वे अपनी राजनीति छोड़कर संसद को शांति से चलने दें।

अमित शाह ने समय और तारीख तय करते हुए विपक्ष को खुली चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि संसद में इस मुद्दे पर आज दोपहर 3 बजे से ही बहस की शुरुआत कर दी जानी चाहिए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह खुद सदन के अंदर मौजूद रहेंगे और पूरी बात सुनेंगे।

इसके बाद, अगले दिन यानी गुरुवार (13 अगस्त) को दोपहर तीन बजे वह इस पूरी चर्चा का एक विस्तृत और स्पष्ट जवाब सदन के पटल पर रखेंगे। उन्होंने विपक्ष से कहा कि अब यह फैसला उन्हें ही करना है कि वे सदन में चर्चा करना चाहते हैं या फिर सिर्फ हंगामा करके भागना चाहते हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष की उस माँग को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें सिर्फ उनके एकतरफा बयान की माँग की जा रही थी। अमित शाह का तर्क था कि संसद में किसी भी बड़े और महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने के लिए पहले से ही नियम और कायदे तय होते हैं।

इतने गंभीर मामलों पर केवल एक बयान देकर खानापूर्ति नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि नियम के अनुसार ही सदन में पूरी चर्चा होनी चाहिए और उसके बाद ही वह हर सवाल का विस्तार से जवाब देंगे। जरूरत पड़ने पर सरकार स्पीकर की अनुमति से प्रश्नकाल को भी स्थगित करने के लिए तैयार है।

‘लापता’ होने पर अमित शाह का जवाब

विपक्ष के नेताओं द्वारा खुद पर ‘लापता’ होने और भागने जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह संसद सत्र के दौरान रोज संसद आते हैं और अपने कार्यालय में मौजूद रहते हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने आरोप लगाया कि वे सदन के अंदर इसलिए नहीं जा पा रहे हैं क्योंकि विपक्षी दल लगातार सदन में हंगामा कर रहे हैं और कार्यवाही को चलने नहीं दे रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के हर जरूरी मुद्दे पर जनता और सदन के प्रति जवाबदेह है।

छात्रों पर लाठीचार्ज और राहुल गाँधी के तीखे सवाल

यह पूरा विवाद पिछले दिनों दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज, गोलीबारी और पैलेट गन के इस्तेमाल के बाद शुरू हुआ है। विपक्ष लगातार केंद्र सरकार और गृह मंत्री को इस बात के लिए घेर रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इस पूरे विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं।

राहुल गाँधी ने सरकार से सीधा और कड़ा सवाल पूछा है कि आखिर प्रदर्शन कर रहे मासूम छात्रों पर गोलियां चलाने और लाठियाँ बरसाने का आदेश किसने दिया था। गृह मंत्री अमित शाह की तरफ से बहस की चुनौती मिलने के कुछ ही मिनटों के बाद राहुल गाँधी ने मीडिया के सामने आकर उसे सिरे से खारिज कर दिया।

राहुल गाँधी ने कहा कि देश की युवा पीढ़ी और छात्र अब गृह मंत्री की कोई भी सफाई, कल्पना या भाषण सुनने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रखते हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स सीधे तौर पर देश के गृह मंत्रालय के अधीन काम करते हैं।

उन्होंने तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि क्या छात्रों पर गोली चलाने का आदेश खुद अमित शाह ने दिया था। राहुल गाँधी ने कहा कि अगर यह आदेश अमित शाह ने दिया है, तो वह इसके लिए पूरी तरह से दोषी हैं। अगर यह आदेश उन्होंने नहीं दिया है, तो वह अपने पद के काबिल नहीं हैं और पूरी तरह से अक्षम हैं।

दोनों ही स्थितियों में गृह मंत्री को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। राहुल गाँधी ने अंत में यह भी आरोप लगाया कि सरकार के पास उनके किसी भी सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं बचा है और अब सरकार पूरी तरह से डर चुकी है।

पप्पू यादव के खिलाफ दिल्ली में दर्ज हुई FIR, संसद में राम मंदिर चंदा चोरी को लेकर किया था गंदा नाटक: लोकसभा अध्यक्ष ने दी गरिमा बनाए रखने की चेतावनी

                             राम मंदिर प्रदर्शन पर पप्पू यादव FIR। (फोटो साभार - जागरण/एनडीटीवी)
संसद परिसर में विपक्षी दलों ने शुक्रवार (31 जुलाई) को राम मंदिर चंदा चोरी मामले को लेकर नाटक किया था। इस नाटक में पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव पुजारी बनकर चंदा लूटते हुए नजर आए थे। Video वायरल होने के बाद अब विवाद बढ़ गया है। नाटक कर रहे पप्पू यादव के खिलाफ FIR दर्ज हुई है।

पप्पू यादव ने संसद भवन में भगवा वस्त्र पहनकर और पुजारी का भेष धारण कर चंदा चोरी करने का नाटक किया। इसमें पप्पू यादव ये दर्शाने की कोशिश कर रहे थे, कि हिंदू पुजारी ही राम मंदिर से चंदा चोरी कर रहे हैं। इसके बाद देशभर से संतों ने इस नाटक पर विरोध जताया था। अब दिल्ली के जहाँगीरपुरी थाने में सूर्य मैथिल नामक व्यक्ति ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है। 

संसद के बाहर किए गए नाटक में विपक्ष के अन्य सांसद और राहुल गाँधी भी श्रद्धालु बनकर दानपेटी में पैसे डालते दिखे और पप्पू यादव उन पैसों को उठाकर अपनी जेब में रखने का अभिनय कर रहे थे। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेताओं के खिलाफ FIR पर DCP काशी जोन गौरव बंसवाल ने बताया है कि संतों की तहरीर पर तीनों नेताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर अग्रिम कार्रवाई की जा रही है।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के दौरान धार्मिक प्रतीकों का गलत इस्तेमाल हुआ और भगवान रामलला की तस्वीर के अनादर से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। इसी आधार पर पुलिस में मामला दर्ज कराया गया है।

संसद में इस तरह वेश बदलकर प्रदर्शन करने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने संसद में कहा कि कुछ सदस्य जिस तरह से भेष बदल-बदलकर आ रहे हैं, वह सदन की मर्यादा और परंपराओं के खिलाफ है। ओम बिरला ने चेतावनी देते हुए कहा कि संसद भवन परिसर की पवित्रता और गरिमा बनी रहनी चाहिए और इस तरह के प्रदर्शनों पर सख्त रुख अपनाया जाएगा।

राहुल गाँधी, डिंपल यादव समेत अन्य विपक्षी नेताओं ने भी लिया नाटक में भाग

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी समेत कई विपक्षी सांसद भी इस सांकेतिक प्रदर्शन में शामिल हुए और दान पेटी में पैसे डालकर अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शन के दौरान चंदा चोर, गद्दी छोड़, जवाब तुमको देना होगा और अमित शाह, सदन में आओ जैसे नारे भी लगाए गए।
शिकायतकर्ता का यह भी दावा है कि इस प्रदर्शन को राहुल गाँधी, डिंपल यादव, अवधेश प्रसाद समेत INDIA गठबंधन के कई सांसदों का समर्थन प्राप्त था। शिकायत मिलने के बाद दिल्ली पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया के तहत पप्पू यादव के खिलाफ FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।
पुलिस का कहना है कि मामले से जुड़े वीडियो, शिकायत और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच की जा रही है। जाँच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई कानून के अनुसार की जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ी नाराजगी जताई।
उन्होंने कहा कि संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है और उसकी गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कुछ सांसद अलग-अलग भेष बदलकर संसद परिसर में आ रहे हैं, जो संसद की परंपराओं और मर्यादा के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि संसद परिसर की पवित्रता और गरिमा को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने दिया जाएगा।

पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु बालक दास के नेतृत्व में संतों के प्रतिनिधिमंडल ने गौरव बंसवाल से मुलाकात की थी। जगद्गुरु बालक दास ने बताया कि संसद में जिस तरह से पप्पू यादव ने भगवान राम का और सनातन का अपमान किया वह अक्षम्य है। वहीं, महंत जगदीश्वरनाथ ने कहा, “संत समाज शांत है तो कुछ भी करोगे। हिम्मत है तो कभी सिर पर टोपी पहनकर कुछ करो तो जानें। सिर तन से जुदा न हो जाए तो कहना।”

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने भी पप्पू यादव के इस कृत्य की घोर निंदा की है। संतों ने उनसे सार्वजनिक रूप से माफी माँगने को कहा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी महाराज ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए साधु-संतों की छवि धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है और इसे संत-समाज कभी सफल नहीं होने देगा। उन्होंने कहा कि बिहार में उनके संसदीय क्षेत्र तक जाकर संत समाज लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराएगा।

मथुरा में भी साधु-संतों ने एकजुट होकर पप्पू यादव का कड़ा विरोध किया है। संतों ने गोवर्धन क्षेत्र के ग्राम जुल्हेदी स्थित एक आश्रम पर यादव को ‘कंस’ का रूप बताते हुए उनके पोस्टर लगाए और पुतले का दहन किया और उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी की है। चित्रगुप्त पीठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने कहा कि भगवा, सनातन धर्म और लोगों की आस्था का मजाक उड़ाने वाले जनप्रतिनिधियों को संसद में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। साथ ही, उनकी संसद सदस्यता रद्द करने की माँग की गई है। संतों ने उनकी तस्वीर पर चप्पलें तक बरसाईं हैं।

इसके अलावा दिल्ली में भी पप्पू यादव के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। दिल्ली के जहाँगीरपुरी थाने में सूर्य मैथिल नामक व्यक्ति ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के दौरान धार्मिक प्रतीकों का गलत इस्तेमाल हुआ और भगवान रामलला की तस्वीर के अनादर से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। इसी आधार पर पुलिस में मामला दर्ज कराया गया है।

AI वीडियो-अप्रकाशित किताब के प्रोपेगेंडा को निशिकांत दुबे ने किताबों के सत्य से धोया, नेहरू-इंदिरा-सोनिया सबकी एक साथ पोल खुलने से बौखलाई कांग्रेस

बिना छपी किताब से सरकार को बदनाम करने की साजिश करने वाले राहुल गाँधी को निशिकांत दुबे की छपी हुई किताबों से क्यों दिक्कत? (साभार: SansadTV)
लोकसभा में बहस होनी थी महामहिम राष्ट्रपति के भाषण और बजट पर, लेकिन LoP राहुल गाँधी ने उन मुद्दों पर न बोलकर लोकतंत्र को तार-तार कर दिया। राहुल जब भी विदेश जाकर अपने आकाओं से मिलकर आते कोई न कोई बिनसिर पैर के विवाद खड़ा कर माहौल ख़राब करते हैं। फरवरी 4 को जिस तरह प्रधानमंत्री की कुर्सी को महिला सांसदों द्वारा घेरा गया लोकतंत्र के लिए कलंक है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन में होते और कोई अप्रिय घटना हो गयी होती कौन जिम्मेदार होता?     

पिछले चार दिनों से संसद में राहुल गाँधी और उनके कांग्रेसी नेता बवाल मचाए हुए हैं। मुद्दा है चीन का। राहुल गाँधी संसद के भीतर एक ऐसी किताब के अंशों का हवाला दे रहे हैं, जो अभी तक छपी ही नहीं है। उसी किताब के आधार पर सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि चीन के मुद्दे पर सच्चाई छुपाई जा रही है।

लेकिन बुधवार (04 फरवरी 2027) को तस्वीर अचानक बदल गई। बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने राहुल गाँधी की पूरी हवाबाजी महज एक मिनट में धराशायी कर दी। उन्होंने सदन में पहले से छपी हुई किताब के कुछ अंश पढ़कर सुनाए। इसके बाद न सिर्फ राहुल गाँधी, बल्कि कांग्रेस के बाकी नेता भी सन्न रह गए।

बिना छपी किताब और AI वीडियो के सहारे सरकार को बदनाम करने की कोशिश

मामले की शुरुआत 02 फरवरी 2026 को हुई, जब राहुल गाँधी अचानक संसद में कुछ पन्ने निकालकर पढ़ने लगे। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जुड़ा मुद्दा बताया। राहुल गाँधी ने दावा किया कि ये अंश पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब से हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि इस किताब में लिखा है कि चीन के साथ युद्ध जैसे हालात में सरकार ने कोई आदेश नहीं दिया। राहुल गाँधी का दावा है कि नरवणे उस वक्त अकेले पड़ गए थे और सरकार ने जानबूझकर पीछे हटने का फैसला लिया।
राहुल गाँधी के इस दावे पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत सवाल उठाए। उन्होंने साफ पूछा कि ये कहानी आखिर आ कहाँ से रही है? राजनाथ सिंह ने कहा कि जिस किताब के अंश संसद में पढ़े जा रहे हैं, वह किताब अब तक छपी ही नहीं है। जब किताब छपी ही नहीं, तो उसके अंशों के आधार पर सरकार पर सवाल कैसे खड़े किए जा सकते हैं?
इसके बाद संसद में जोरदार हंगामा शुरू हो गया, जो अगले दिन के सत्र तक चलता रहा। विपक्ष के नेता टेबल पर चढ़े, स्पीकर की ओर कागज उछाले गए और नारेबाजी से सदन का कामकाज ठप हो गया।
लेकिन सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश संसद तक ही सीमित नहीं रही। कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल से एक AI वीडियो जारी किया, जिसमें उसी बिना छपी किताब की कहानी को विजुअल के रूप में दिखाया गया। इस वीडियो के सहारे से सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश की गई।

कांग्रेस की साजिश, निशिकांत दुबे ने की धराशायी

कांग्रेस की सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की साजिश का जवाब देने संसद में बीजेपी नेता निशिकांत दुबे मैदान में उतरे। 04 फरवरी 2027 को उन्होंने राहुल गाँधी को सीधे-सीधे जवाब देते हुए जवाहर लाल नेहरू, सोनिया गँधी और इंदिरा गाँधी समेत गाँधी परिवार के अतीत को सदन के सामने खोलकर रख दिया, वह भी सारी छपी हुई किताबों से।

निशिकांत दुबे हाथ में छपी हुई किताबें लेकर आए और कहा कि अगर बिना छपी किताब के पन्ने लहराकर तीन दिन तक संसद ठप की जा सकती है, तो फिर उन किताबों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो छप चुकी है और जिनमें कांग्रेस और नेहरू के कारनामें दर्ज हैं। उन्होंने ‘नेहरू: ए बायोग्राफी’, ‘एडविना एंड नेहरू’ और दूसरी पुस्तकों के अंश पढ़ते हुए नेहरू पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और निजी जीवन की अय्याशियों की पोल खोली।

निशिकांत दुबे ने कहा कि देश को गुमराह करने की कांग्रेस की आदत पुरानी है और आज वही पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी झूठे नैरेटिव के सहारे प्रधानमंत्री और सरकार को बदनाम करने में लगी है। निशिकांत दुबे का हमाल यही नहीं रुका। उन्होंने राहुल गाँधी से सीधा सवाल किया क्या कांग्रेस इन किताबों को भी फर्जी बताएगी या फिर सच सामने आने पर चुप्पी साध लेगी?

इस पर कांग्रेस बौखला गई। प्रियंका गाँधी ने दुबे के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संसद में इस तरह कि किताबें पढ़ना नियमों के खिलाफ है और बीजेपी जानबूझकर नेहरू का नाम उछालकर ध्यान भटकाना चाहती है। कांग्रेस नेताओं ने इसे निजी हमला बताया और हंगामा शुरू कर दिया।

कांग्रेस का असली चेहरा

इससे पता चलता है कि कांग्रेस अब हर उस हद तक जाने को तैयार दिख रही है, जहाँ से सरकार और प्रधानमंत्री को नीचा दिखाया जा सके। पहले संसद में बिना छपी किताब के पन्ने लहराए गए, फिर उसी झूठी कहानी को सच साबित करने के लिए कांग्रेस ने AI वीडिया बनाकर चलाया। सवाल साफ है, जिस किताब का अस्तित्व ही सार्वजनिक तौर पर नहीं है, उसके सहारे कांग्रेस ने सरकार और प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की पूरी कोशिश की। यह सोची-समझी साजिश नजर आती है।

लेकिन जैसे ही बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में छपी हुई किताबों का जिक्र कर दिया, कांग्रेस घबरा गई। जिन किताबों को कोई नकार नहीं सकता, जिनका रिकॉर्ड मौजूद है, जिनके लेखक और पन्ने सबके सामने हैं। उन्हीं से कांग्रेस को सबसे ज्यादा डर लगने लगा। साफ है, जो पार्टी अप्रकाशित किताब और AI वीडियो के सहारे झूठ गढ़ सकती है, वही पार्टी सच सामने आते ही बौखला जाती है। यही कांग्रेस का असली चेहरा है।

लोकसभा में TMC सांसद द्वारा E-Ciggrette पीने पर हुआ बवाल: भारत समेत 37 देशों में है बैन, फूँकने से सिर्फ फेफड़े नहीं दिमाग भी होता है खराब

प्रतिकात्मक तस्वीर ( साभार- chatgpt )
ई सिगरेट पर प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन सदन में टीएमसी के सांसद पर इसे पीने का आरोप लगा है। बताया जा रहा है कि टीएमसी के 3 सांसद हैं, जो सदन में ई सिगरेट पी रहे थे। हालाँकि इनका नाम उजागर नहीं किया गया है। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में स्पीकर के सामने ये मुद्दा उठाया है। हालाँकि इस दौरान उन्होंने टीएमसी सांसद के ई सिगरेट पीने की बात कही। किसी का नाम नहीं लिया। स्पीकर ने लिखित शिकायत देने के बाद कार्रवाई का भरोसा दिया है।

लोकसभा में गूँजा ई-सिगरेट पीने का मामला

टीएमसी के सांसद पर संसद परिसर में ई सिगरेट पीने का सांसद अनुराग ठाकुर ने आरोप लगाया। लोकसभा में ई-सिगरेट पीने का मुद्दा उठाते हुए सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि “देशभर में ई सिगरेट बैन है, क्या संसद में सिगरेट पीना अलाउ कर दिया गया है।” इस पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने ‘ना’ कहा। तब अनुराग ठाकुर ने कहा कि टीएमसी के सांसद कई दिनों से बैठकर पी रहे हैं। सदन में ई-सिगरेट पी जा रही है। इसकी जाँच करवाएँ।’ उन्होंने कहा कि लाखों लोग संसद की सीधी कार्रवाई देखते हैं, ये संसद की गरिमा के खिलाफ है।

पूरे मामले पर स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि ‘हमें संसदीय परंपराओं और संसदीय नियमों का अनुपालन करना चाहिए। ऐसा कोई विषय मेरे पास आएगा तो कार्रवाई करेंगे।’

न्यूज 18 के मुताबिक, पिछले कई दिनों में सांसदों के बीच ये मुद्दा गरम है। बीजेपी का कहना है कि टीएमसी के 3 सांसद संसद भवन के भीतर ई-सिगरेट का सेवन कर रहे थे। सांसद अनुराग ठाकुर ने सांसद शब्द का जिक्र किया, उनकी संख्या नहीं बताई और न ही नाम उजागर किया।

क्या होता है ई सिगरेट

ई-सिगरेट यानी वेप पेन या वेप्स, बैटरी से चलने वाला डिवाइस है जो एक लिक्विड को गर्म करके भाप बनाता है। इसे इस्तेमाल करने वाला यूजर साँस के जरिए शरीर के अंदर लेता है। इस लिक्विड में आमतौर पर निकोटीन, फ्लेवरिंग और दूसरे केमिकल होते हैं।

शुरुआत में इन्हें आमतौर पर सिगरेट पीने वाले लोग ‘सुरक्षित’ विकल्प के तौर पर देख रहे थे। इसके बनाने की प्रक्रिया में निकोटीन, फ्लेवरिंग, प्रोपलीन ग्लाइकॉल और दूसरे पदार्थ डाले जाते हैं और गर्म करने पर ये एरोसोल में बदल जाता है। इससे साँस लेने में समस्या पैदा होती है।

फेफड़ों समेत शरीर के दूसरे अंगों को नुकसान पहुँचता है। ये सिगरेट पीने जैसा ही है। बस तम्बाकु को जलाने के बजाए यहाँ लिक्विड को गर्म किया जाता है और उसके भाप का सेवन किया जाता है।

दुनियाभर में इससे होने वाले नुकसान को देखते हुए जागरुकता फैलाया जा रहा है। लोगों से इसे नहीं पीने की अपील की जा रही है। दुनिया के 37 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है, उनमें भारत भी एक है।

भारत सरकार ने 2019 में ई-सिगरेट की बिक्री, इसे बनाने, बाँटने या आयात करने पर रोक लगा दी थी। सरकार को चिंता थी कि ये युवा पीढ़ी को नुकसान पहुँचा रही हैं और नशे का आदी बना रही है।

क्यों लगा है बैन

ई-सिगरेट से तंबाकू नहीं जलता, लेकिन फिर भी इसके इस्तेमाल से गंभीर खतरे हैं। ज्यादातर वेपिंग लिक्विड में निकोटीन होता है, जो बहुत ज़्यादा एडिक्टिव होता है और टीनएजर्स और युवा पीढ़ी के ब्रेन डेवलपमेंट पर असर डालता है। वेपर में ऐसे केमिकल भी होते हैं, जो फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं। सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं और शायद लंबे समय तक सांस की समस्या का कारण बन सकते हैं।

कई स्टडीज़ से पता चला है कि वेपिंग से दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, नसों को नुकसान पहुँचता है और फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं। विदेशों में, ई-सिगरेट के इस्तेमाल से फेफड़ों को नुकसान पहुँचने के कई मामले सामने आए हैं, यानी वेपिंग से खतरा है इस पर पूरी दुनिया सहमत है।

ई सिगरेट के प्रकार

ई सिगरेट कई तरह की होती है। वेप्स, वेप पेन या स्टिक, हुक्का, ई-हुक्का, मॉड्स, पर्सनल वेपोराइजर यानी पीवी। पूरे को मिलाकर इलेक्ट्रॉनिक निकोटीन डिलीवरी सिस्टम यानी ईएनडी कहते हैं।

किसी भी ई सिगरेट में एक टैंक या पॉड होता है, जिसमें लिक्विड भरा जाता है।

लिक्विड को गरम करने के लिए उपकरण लगा होता है। उसे चलाने के लिए बैटरी लगी होती है। साथ में एक कंट्रोल बटन होता है।

इसमें इस्तेमाल होने वाले लिक्विड को ई जूस या वेप जूस भी कहते हैं। लेकिन ये कोई ‘जूस’ नहीं होता। इसमें पानी भी नहीं होता है। भाप पैदान करने के लिए प्रोपिलीन ग्लाइकॉल और ग्लिसरीन का इस्तेमाल किया जाता है। फ्लेवरिंग के लिए अलग अलग सामग्री इस्तेमाल की जाती है।

ई सिगरेट से होने वाली बीमारियाँ

इससे सांस की तकलीफें, अस्थमा, फेफड़े में सूजन, जकड़न और सिकुड़न हो सकता है। फेफड़े में हमेशा के लिए निशान पड़ सकता है या छोटे कण गहराई से घुस सकते हैं, जिससे कैंसर हो सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलिना की एक स्टडी के अनुसार ई-सिगरेट में पाए जाने वाले दो मुख्य इंग्रीडिएंट्स- प्रोपलीन ग्लाइकॉल और वेजिटेबल ग्लिसरीन शरीर के लिए घातक होते हैं।
इनका सबसे बुरा प्रभाव कोशिकाओं पर पड़ता है। ब्रेन के विकास पर असर डालता है। इसलिए टीनएजर्स और जेनजी के लिए खास तौर पर खतरनाक है। ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है। भारी धातु जैसे निकेल, लेड कैडमियन खून में घुलकर नसों को नुकसान पहुँचा सकता है।
इतने नुकसान और प्रतिबंध के बावजूद लोकतंत्र के मंदिर संसद में सांसदों द्वारा ई सिगरेट का सेवन करना काफी आश्चर्यजनक है। टीएमसी के सांसदों के खिलाफ लिखित शिकायत के बाद कार्रवाई का आश्वासन लोकसभा स्पीकर ने दिया है। लेकिन ये सिर्फ अनुशासनहीनता का मामला नही है। जनता के प्रतिनिधि का आचरण अनुसरणीय होनी चाहिए। जनता संसद की सीधी कार्रवाई देखती है। ऐसे में ये सांसद जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं।
सांसदों पर संसदीय मर्यादा को भंग करने का आरोप भी है। संसद तो इसके लिए कार्रवाई करेगी ही। अच्छा होता, अगर टीएमसी भी अपने सांसदों की जाँच के बाद आरोप साबित होने पर कार्रवाई करती। ये दूसरे सांसदों के लिए सीख होती और पार्टियों के लिए अनुकरणीय होता। आखिर जनता का नुमाइंदा इस तरह से सार्वजनिक तौर पर अनुशासनहीनता और अमर्यादित काम करे, तो जनता को ये क्या शिक्षा देंगे।

कांग्रेस का ‘युवराज’ राहुल गांधी झूठों का सरताज; आज की युवा पीढ़ी कांग्रेस की जिन काली करतूतों से अनजान थी आज देख रही है

सोनिया गाँधी से लेकर प्रियंका वाड्रा तक सब इस ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं कि "हम सत्ता में रहते हुए भी किसी शहंशाह से कम नहीं।" जबकि हकीकत यह है कि 2014 के बाद से होने वाले चुनाव परिवार तो क्या कांग्रेस पार्टी को ही सत्ता से दूर हो रहा है। उसका जिम्मेदार कोई और नहीं सिर्फ और सिर्फ सोनिया और उनका परिवार है। काठ की हांड़ी एक बार चढ़ती है बार-बार नहीं। आखिर झूठ पर झूठ बोलकर कब पार्टी और देश को गुमराह किया जाता रहेगा? बार-बार झूठ बोलने का ही अंजाम है कि गढ़े मुर्दे उठने शुरू हो चुके हैं, जो कांग्रेस के साथ-साथ अपनी सहयोगी पार्टियों को भी डुबो रही है। आज की युवा पीढ़ी कांग्रेस की जिन काली करतूतों से अनजान थी आज देख, सुन और पढ़ रही है।
भारत और मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए विदेशी ताकतें तरह-तरह के नैरेटिव बनाती हैं। इनको आगे बढ़ाने का काम बिना किसी तथ्य के कांग्रेस के युवराज और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी करते हैं। इसलिए उनके झूठ की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। लोकसभा में बुधवार (10 दिसंबर) राहुल के झूठों का पर्दाफाश करने वाला ऐतिहासिक दिन बन गया। गृह मंत्री अमित शाह के धारदार, तथ्यपरक और आक्रामक भाषण ने एक बात स्पष्ट कर दी कि झूठ चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, जब सच्चाई के फैक्ट्स सामने आते हैं, तो हर आरोप की परतें खुद-ब-खुद खुलने लगती हैं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी महीनों से जिस तरह देश भर में घूम-घूमकर वोट चोरी, आयोग के पक्षपात, अल्पसंख्यकों के वोट काटे जाने के आरोपों की झड़ी लगा रहे थे, उनकी धज्जियां अमित शाह ने सदन में उड़ाकर रख दीं। राहुल गांधी ने जिन झूठों के सहारे चुनावी कहानी गढ़ने की कोशिश की, वे बुरी तरह धराशायी हो गए। जिस गंभीरता और तथ्यों से शाह ने राहुल के आरोपों की चीरफाड़ की, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि चुनावी पराजय से बौखलाया इंडी गठबंधन अब संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाकर से पहले अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में जरूर सोचेगा। संसद में इस निर्मम पराजय का प्रभाव सिर्फ राहुल गांधी पर नहीं, बल्कि कांग्रेस और पूरे इंडी गठबंधन की राजनीतिक साख पर पड़ा है। देश अब समझ चुका है कि जो नेता झूठ के करीब और सच से दूर रहता है, जनता भी उससे और दूर चली जाती है।

EVM से लेकर आयोग तक, शाह ने एक-एक झूठ को ध्वस्त किया
अमित शाह ने राहुल गांधी के हर आरोप का तथ्यात्मक खंडन किया। उन्होंने EVM की सुरक्षा प्रक्रिया, उसके तीन-स्तरीय वेरिफिकेशन, बीते वर्षों की अदालतों के फैसले, चुनाव आयोग की रिपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के आकलन का हवाला दिया। उनके तर्क ने सिद्ध कर दिया कि कांग्रेस का मुद्दा प्रक्रिया नहीं, बल्कि पराजय है। यदि परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आते, तब यह पूरी प्रक्रिया अचानक विश्वसनीय बन जाती। यही दोहरा मापदंड कांग्रेस की राजनीति की पहचान बन चुका है। मोदी सरकार ने चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी सुधार किए और अनियमितताओं की संभावना लगभग खत्म कर दी। राहुल गांधी के लिए यह सुधार जीत को और कठिन बनाते गए। इसलिए अब उनके आरोप सुधारों पर नहीं, बल्कि संस्थाओं को बदनाम करने पर आधारित हैं। शाह का यह कहना कि “हार का ठीकरा संस्थाओं पर फोड़ना कांग्रेस का नया नहीं पुराना शौक है।”

मुस्लिम वोटों के काटने के भ्रम पर शाह ने नंबरों की भाषा में जवाब दिया
अमित शाह ने बताया कि राहुल गांधी सिर्फ अल्पसंख्यक मतदाताओं को बरगलाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने वोटिंग डेटा रखा कि यदि किसी समुदाय के वोट कटे तो वह हर समुदाय के वोटों में समान रूप से हुआ। कोई सांप्रदायिक पैटर्न नहीं है। लेकिन राहुल गांधी, जो हर बात को “हिंदू–मुस्लिम” के चश्मे से देखते हैं। राहुल गांधी ने फिर अल्पसंख्यक वोटों के कटने का मुद्दा उठाकर अपने ही पुराने सांप्रदायिक नैरेटिव को हवा देने की कोशिश की। अमित शाह ने सीधे आंकड़ों से जवाब दिया कि वोटिंग पैटर्न में ऐसा कोई अलगाव दिखाई नहीं देता जैसा राहुल देश को समझाना चाहते हैं। हर समुदाय में जहां वोट घटे, वह समान रूप से और तकनीकी कारणों से हुआ। उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे पर भी समाज को बांटने की कोशिश की। अमित शाह का एक वाक्य पूरे सदन में गूंजा—“देश को जाति–धर्म में बांटने की आदत कांग्रेस छोड़ ही नहीं सकती।” यह राहुल गांधी की राजनीतिक शैली का स्थायी ट्रेंड बन गया है- सबूत शून्य, शोर अधिक।

आरोप लगाओ, सनसनी फैलाओ और पकड़े जाओ तो नया आरोप लाओ
अमित शाह ने यह स्पष्ट किया कि आयोग हर चरण में स्वतन्त्र और संरक्षित होता है। उन्होंने कई संवैधानिक उदाहरण रखे, रिकॉर्ड का हवाला दिया, और कहा कि 2024 के चुनाव में न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया ने भारत के चुनाव तंत्र की मजबूती को सराहा। इसके बाद कांग्रेस की चुप्पी और वॉकआइट यह साबित करने के लिए काफी था कि उनके आरोप सिर्फ “राजनीतिक हथियार” थे, वास्तविकता से उनका कोई लेना-देना नहीं था। अमित शाह ने अपनी स्पीच में राहुल गांधी की राजनीतिक शैली पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि राहुल का पूरा करियर इसी पर टिका है कि आरोप लगाओ, सनसनी फैलाओ, और जब झूठ पकड़ा जाए तो अगली सुबह नया आरोप लेकर आ जाओ। यह शैली देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में अविश्वास भरने की कोशिश है। और यह वही राजनीति है जिसके कारण राहुल गांधी भारत के मतदाताओं के भरोसे से ज्यादा दूर होते जा रहे हैं।

विदेशी नेताओं से मिलने ना देने का दावा भी झूठा निकला

प्रियंका वाड्रा किस हैसियत से बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना से मिली? 

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी को शायद लगा कि उनका कद इतना बड़ा हो गया है कि अब हर विदेशी मेहमान को उन्हें ‘सलाम’ ठोकना चाहिए। और जब कुछ विदेशी राष्ट्राध्यक्षों ने उनसे मुलाकात नहीं की, तो उन्होंने सीधे मोदी सरकार पर ‘मिलने ना देने’ का आरोप लगा दिया। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत पहुंचने से ठीक पहले राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर एक गंभीर और बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार विदेश से आने वाले राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधिमंडलों को नेता प्रतिपक्ष से न मिलने की ‘सलाह’ देती है। राहुल गांधी ने कहा कि यह एक पुरानी परंपरा है कि विदेशी मेहमान विपक्ष के नेता से मिलते हैं, लेकिन मोदी सरकार इस परंपरा को तोड़ रही है और चाहती है कि विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नजरअंदाज किया जाए।

उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि तब ऐसा कभी नहीं हुआ। राहुल गांधी की बहन और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी बयान का सपोर्ट करते हुए कहा कि सरकार प्रोटोकॉल फॉलो नहीं कर रही।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के दावा से ऐसा लगता है जैसे विदेश मंत्रालय बाहर से आने वाले डेलिगेट्स के कान में फुसफुसा कर कहता है कि देखो, उस LoP से मत मिलना! यह इल्जाम किसी राजनीतिक नौसिखिए की तरह था, लेकिन जब सरकारी सूत्र और बीजेपी ने हकीकत सामने रखी, तो राहुल गांधी का सारा ड्रामा और ज्ञान धड़ाम हो गया। सरकारी सूत्रों के अनुसार विदेशी डेलिगेशन अक्सर व्यस्त एजेंडे के साथ भारत आते हैं। वे किससे मिलना चाहते हैं और किसे नजरअंदाज करते हैं, यह उनका निजी फैसला होता है। ऐसे में बीजेपी प्रवक्ता ने जो तंज कसा है, वह राहुल गांधी के राजनीतिक कद पर सीधा वार है कि “अगर कोई विदेशी मेहमान राहुल गांधी से नहीं मिलना चाहता, तो इसमें सरकार क्या कर सकती है?”

चर्चा में बने रहने और अपनी वैल्यू बढ़ाने के लिए राहुल गांधी अक्सर सरकार पर झूठा इल्जाम लगाते रहते हैं। लेकिन उनके दावों पर एक नजर डाली जाए तो एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। हकीकत एकदम उलट है और राहुल का रोना-धोना बिल्कुल बेबुनियाद है। मजे की बात यह कि LOP बनने के बाद खुद राहुल गांधी से कई बड़े विदेशी नेता मिल चुके हैं. फिर भी कहते घूम रहे हैं कि ‘मिलने नहीं देते’।

जापान में तेजी से बढ़ती मुस्लिम आबादी से मुस्लिमों को दफनाने की जगह नहीं, 40 वर्ष में 38 गुना बढ़ी मस्जिदों की संख्या

                                     जापानी में बढ़ रही मुस्लिम आबादी ( फोटो साभार- waseda.jp)
जापान में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा वृद्धि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यहाँ बड़े-बड़े मस्जिद बन गए हैं। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद देखा जा सकता है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

जापान में हजार से लाखों में पहुँची मुस्लिम आबादी

दुनियाभर में मुस्लिम आबादी बेहताशा बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सदी के अंत तक ईसाइयों को पीछे छोड़ते हुए इस्लाम मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी।
दुनिया में 200 से ज्यादा देशों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन देशों में इस्लामी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। 2013 में विश्व जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 1.6 अरब थी और 2050 तक 2.9 अरब यानी विश्व जनसंख्या का करीब 26% तक पहुँचने का अनुमान है। यही वजह से की विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी इनकी संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

छोटा सा एशियाई देश जापान भी इससे अछूता नहीं है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी है। मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.18 फीसदी से 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं।

 ये लोग ज्यादातर प्रवासी कामगार हैं, जो टेक्नोलॉजी, बिजनेस और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे के मुताबिक, इनकी संख्या 200,000 से ज़्यादा होने का अनुमान है। मार्च 2021 तक, देश भर में मस्जिदों, यानी पूजा की जगहों की संख्या 1999 में 15 से बढ़कर 113 हो गई है।

जापानी की अधिकांश मुस्लिम आबादी (लगभग 80%) ग्रेटर टोक्यो क्षेत्र, चुक्यो महानगरीय क्षेत्र और किन्ही क्षेत्र में रहते हैं। अब इनका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हो रहा है।

जापान में तेजी से बन रहे हैं बहुमंजिला मस्जिद

ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से मजदूरों के बढ़ते इमिग्रेशन और धर्मांतरण की वजह से जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बन गई हैं। यानी इनकी संख्या 10 गुणा बढ़ गई हैं। कई मस्जिदों को बड़ा बनाया गया है।
टोक्यो में टोक्यो कैमी मस्जिद को हाल ही में बहुमंजिला बनाया गया है और समय-समय पर आम जनता को लुभाने के लिए इस्लामिक गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। दिसंबर 2012 के मध्य में एक शुक्रवार को दोपहर के आसपास, टोक्यो के शिबुया वार्ड में टोक्यो कैमी मस्जिद में एक खास आवाज में आदमी ने अज़ान दिया और नमाज का समय बताया। उसने कहा, “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।”
यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद बन चुकी है। जैसे- वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर के पास एक इमारत बनी थी, जिसे मस्जिद के रूप में उपयोग करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।

90 के दशक में बनी बेतहाशा मस्जिदें

1990 के दशक में यहाँ मस्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1980 में जहाँ सिर्फ 4 मस्जिदें थी, वहीं 1990 के दशक में ये बढ़ कर 90 से ज्यादा हो गई। इन वर्षों में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बाहरी देशों से कई लोग आए और मस्जिदों में कार्यक्रम आयोजित कर जापानियों को लुभाने की कोशिश की गई यानी जापानियों के धर्मांतरण में इन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही।
अब हालात ये हैं कि न सिर्फ प्रवासी मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, बल्कि जापान की मूल आबादी का धर्मांतरण तेजी से हुआ है। जापान में प्रवासी मुस्लिमों के बसने और परिवार बसाने की वजह से एक ‘हाइब्रिड मुस्लिम’ आबादी तैयार हो गई है। नमाज पढ़ना और रोजा रखना जैसे रीति रिवाज का पालन बड़ी आबादी करती है। इनमें कट्टरता भी देखी जाती है।

सांसद मिजुहो ने कब्रिस्तान बनाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की

जापान में हाल ही में ये खबर भी सामने आई कि सरकार ने शव दफनाने के लिए कब्रिस्तान बनाने के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया है और प्रवासी मुस्लिमों को शव अपने देश लेकर दफनाने को कहा है। हालाँकि सरकार ने जापानी संसद में इसको लेकर स्पष्टीकरण दिया है।
दरअसल हाउस ऑफ काउंसिलर्स की प्रतिनिधि उमेमुरा मिजुहो ने कहा कि जापान में छोटा भू भाग है। प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ होती रहती हैं, ऐसे में किसी बड़ी आपदा की स्थिति में दफनाने पर शवों के बाहर निकलने की संभावना है। साथ ही 99 फीसदी आबादी यहाँ दाह संस्कार करती है, इसलिए जापान की स्थिति को देखते हुए दफनाने से जुड़े नियम कड़े किए जाने चाहिए।
इसको लेकर सरकार ने स्थानीय सरकार को इसके बारे में विचार करने को कहा है। साथ ही स्थानीय रीति रिवाजों, नियमों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखने को कहा है। क्योडो न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद जापानी मुस्लिमों को दफनाने के लिए नई जगहों की जरूरत है।
एजेंसी का कहना है कि कुछ लोकल सरकारें बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन अलग रखने को तैयार हैं, जबकि दूसरी सरकारें इतनी मदद नहीं कर रही हैं।
जापान में दाह संस्कार आम बात है और 99.9% शवों का दाह संस्कार किया जाता है। इससे मुसलमान अपने दफ़नाने के तरीकों को लेकर परेशान हैं।
उत्तर-पूर्वी जापान में मौजूद मियागी प्रांत के गवर्नर ने दिसंबर में कहा था कि 2023 में इंडोनेशिया के साथ लोकल इलाकों के लिए मज़दूर देने के लिए मेमोरेंडम साइन करने के बाद एक नए कब्रिस्तान पर जापान शांति पसंद देश माना जाता है। अनुशासन प्रिय इस देश की बड़ी आबादी बुजुर्ग हो चुकी है। ऐसे में कामगार की जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशों से लोग यहाँ आकर बस रहे हैं। इनमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। खासकर ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देशों से कामगार आकर यहाँ स्थायी रूप से बस रहे हैं। इसका असर जापान में दिखने लगा है।विचार किया जा रहा है।

क्या कुत्ता लेकर संसद पहुँचीं कांग्रेस सासंद रेणुका चौधरी ने साबित कर दिया विपक्ष की मनोस्थिति कुत्ते जैसी हो गयी है?

                      कुत्ते के साथ संसद पहुँची रेणुका चौधरी (फोटो: नवभारत टाइम्स / वन इंडिया)
आज सांसद रेणुका चौधरी ने जनता को यह सोंचने के मजबूर कर दिया है कि वह किसी समझदार उम्मीदवार को वोट देने जा रहे हैं या मनुष्य के रूप में किसी कुत्ते को? आज विपक्ष नरेंद्र मोदी विरोध में इतना नीचे गिर जायेगा, शायद ही किसी ने कल्पना की हो। विपक्ष इतना ज्यादा पगला गया कि सुप्रीम कोर्ट में भी मात खाने के बाद भी SIR के मुद्दे पर संसद रोक जनता के पैसे को बर्बाद कर रहा है। क्या ऐसा विपक्ष एक भी एक भी वोट के काबिल है जो घुसपैठियों और बोगस वोट बचाने जनता के पैसे को बर्बाद करे?    

संसद के शीतकालीन सत्र का पहला दिन बेहद हंगामेदार रहा। SIR समेत अलग-अलग मुद्दों को लेकर विपक्ष और सत्तापक्ष आमने-सामने आते दिखाई दिए। लोकसभा हो या राज्यसभा, दोनों ही सदनों में बहस और हंगामा देखने को मिला। हालांकि, सदन के अंदर ही नहीं बाहर भी घमासान कम नहीं था। इसी बीच सत्र के पहले ही दिन एक नया विवाद सामने आया जब कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी एक डॉगी को साथ लेकर संसद परिसर में पहुंच गईं। इसे लेकर बवाल उस समय बढ़ गया जब बीजेपी के दिग्गज नेता और सांसद जगदंबिका पाल ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग कर दी।

कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी सोमवार (1 दिसंबर 2025) को शीतकालीन सत्र के पहले दिन कुत्ते को गाड़ी में लेकर संसद भवन पहुँची जिसे लेकर हंगामा हो गया है। बीजेपी ने इसे संसद का अपमान बताते हुए रेणुका के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने की माँग की है।

सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में रेणुका की गाड़ी में एक कुत्ता बैठा नजर आ रहा है। इस पर हुए विवाद पर सफाई देते हुए रेणुका ने कहा कि उन्हें यह कुत्ता सड़क पर मिला था। उन्होंने कहा, “मैं रास्ते में आ रही थी। वहाँ पर एक स्कूटर और एक कार की टक्कर हो गई थी और उसके आगे ये पिल्ला सड़क पर घूम रहा था। मुझे लगा कि इसे टक्कर लग जाएगी। तो मैंने इसे उठाया, कार में रखा, संसद आई और वापस भेज दिया।”

जगदंबिका पाल ने कांग्रेस सांसद के रवैये पर उठाए सवाल

डुमरियागंज से बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल ने कहा कि कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी का ये कदम, सांसद के तौर पर दिए गए विशेषाधिकार का दुरुपयोग है। ऐसे में कार्रवाई की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि सांसदों के कुछ विशेष अधिकार होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे अमर्यादित आचरण करें।

सांसद के विशेषाधिकार का दुरुपयोग- बीजेपी सांसद

बीजेपी नेता ने जोर देकर कहा कि संसद देश की नीतियों पर चर्चा करने के लिए है। यह जनता की ओर से चुने गए जनप्रतिनिधियों का सदन है। कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी को शायद यह एहसास नहीं है कि लोकसभा और राज्यसभा देश की जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कांग्रेस सांसद का अपने कुत्ते को संसद परिसर में लाना और फिर सवाल उठाए जाने पर सफाई देना देश को शर्मसार करने वाला कृत्य है। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर कुठाराघात और संसद का अपमान करार दिया।

रेणुका ने आगे विवादित बयान देते हुए कहा, “असली काटने वाले तो संसद में बैठे हैं। वे सरकार चलाते हैं। क्या सरकार के पास और कुछ करने को नहीं है? हम उन लोगों के बारे में बात नहीं करते जो संसद में बैठकर हमें रोज काटते हैं।” रेणुका चौधरी ने तंज भरे लहजे में कहा कि अगर कुत्ते के लिए भी कोई पास बनता है तो बना दिया जाए।

कुत्ता विवाद पर रेणुका चौधरी ने क्या कहा

संसद में कुत्ता लाने पर हुए विवाद पर कांग्रेस MP रेणुका चौधरी ने कहा कि 'कोई कानून बना है क्या? मैं रास्ते में आ रही थी। वहां पर एक स्कूटर और एक कार का टकर हुआ। उसके आगे ये पिल्ला सड़क पर घूम रहा था। मुझे लगा कि इसे टक्कर लग जाएगी। तो मैंने इसे उठाया, कार में रखा, संसद आई और वापस भेज दिया। कार चली गई, और कुत्ता भी गया। तो इस पर चर्चा का क्या मतलब है? असली काटने वाले तो संसद में बैठे हैं। वे सरकार चलाते हैं। हम एक बेजुबान जानवर की देखभाल करते हैं, और यह एक बड़ा मुद्दा और चर्चा का विषय बन गया है। क्या सरकार के पास और कुछ करने को नहीं है? मैंने कुत्ते को घर भेज दिया और उनसे कहा कि इसे घर पर ही रखो... हम उन लोगों के बारे में बात नहीं करते जो संसद में बैठकर हमें रोज़ काटते हैं।'

बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने रेणुका चौधरी के खिलाफ कार्रवाई की माँग करते हुए कहा कि अगर सांसद को कुछ विशेषाधिकार मिलते हैं तो उनका गलत तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

पाल ने कहा, “संसद देश की नीतियों पर चर्चा करने की जगह है। वहाँ पर अपने कुत्ते को लेकर आना और उस पर इस तरह का बयान देना। वह देश को शर्मसार कर रही हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।” 

मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट संविधान का क्यों नहीं पालन कर रहे? जज को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग का प्रावधान : कौन थे जस्टिस रामास्वामी जिन पर सबसे पहले चला महाभियोग?

                          सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस वी. रामास्वामी (साभार: सुप्रीम कोर्ट/ट्रिब्यून)
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली बड़ी मात्रा में अघोषित नकदी को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मामला सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने तीन जजों का एक एक कमिटी बनाई है, जो इस मामले की जाँच कर रही है। वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की माँग लगातार तेज होने लगी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने की एक लंबी प्रक्रिया है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया।

हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। इसके बाद CJI की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लाया गया था।

CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक जाँच’ कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने माँग की है कि इस मामले स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद को आपराधिक आरोप तय करना चाहिए या फिर उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर उन्हें हटाना चाहिए। इसी तरह कई पूर्व जज और वरिष्ठ वकील भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की है।

क्या होता है महाभियोग? कैसे हटाए जाते हैं जज?

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की शक्तियों एवं उन्हें हटाने के बारे में बताया गया है। इसके साथ ही संसद के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट को हटाने के लिए महाभियोग चलाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 218 में कहा गया है कि हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए भी यही प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
संविधान का अनुच्छेद 124(4) कहता है कि किसी जज को ‘प्रमाणित कदाचार’ और ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद द्वारा कार्यवाही शुरू की जाती है और इसके दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति संबंधित जज को हटाने का आदेश देते हैं। दरअसल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महाभियोग का आधार और प्रक्रिया को उच्च स्तर का रखा गया है।
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया ‘न्यायाधीश जाँच अधिनियम 1968’ में विस्तृत रूप से बताई गई है। इस अधिनियम में जज को पद से हटाने के उद्देश्य से कार्यवाही आरंभ करने के लिए सबसे पहला चरण सदस्यों की संख्या बताई गई। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे।
अध्यक्ष या सभापति सांसदों या संबंधित लोगों से परामर्श कर सकते हैं और नोटिस से संबंधित प्रासंगिक आरोपों की जाँच करते हैं। इसके आधार पर वे प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो अध्यक्ष या सभापति (जो भी इसे प्राप्त करते हैं) संबंधित जज के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे।
इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देता है। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देती है। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाता है।
रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाता है और सदन में बहस होती है। प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होना चाहिए। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या के का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए।
यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस दौरान अगर संसद भंग हो जाती है या उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तो महाभियोग प्रस्ताव विफल हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की ‘आंतरिक जाँच प्रक्रिया’ क्या होती है?

किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ संसद के अलावा भी शिकायत की जा सकती हैं। इसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) को चिट्ठी लिखकर या अन्य माध्यमों से संपर्क करके जाँच की माँग की जा सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के सीजे एएम भट्टाचार्जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोपों के बाद 1995 में एक आंतरिक तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई।
सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 124 के तहत ‘बुरे व्यवहार’ और ‘महाभियोग योग्य दुर्व्यवहार’ के बीच अंतर को स्पष्ट किया। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक कदाचार की जाँच के लिए एक ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 1997 में अपनी रिपोर्ट दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1999 में इसे अपनाया।
साल 2014 में इसमें सुप्रीम कोर्ट में इसमें संशोधन किया। साल 2014 में मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके गंगेले बनाम रजिस्ट्रार जनरल हाई कोर्ट मध्य प्रदेश मामले में आंतरिक प्रक्रिया में संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अरुण मिश्रा ने सात चरण वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की।
इसके तहत, किसी जज के खिलाफ शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जा सकती है। अगर शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जाती है तो वे उस शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजते हैं। CJI को लगता है कि शिकायत गंभीर नहीं है तो वे उसे खारिज कर सकते हैं।
अगर शिकायत गंभीर लगती तो वे आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर मामला हाई कोर्ट के किसी जज का होता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट की माँग करते हैं। तमाम जाँच और आरोपित जज के बयान लेने के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यदि गहन जाँच की सिफारिश करते हैं तो CJI रिपोर्ट और बयान की समीक्षा करते हैं।
समीक्षा के बाद CJI एक जाँच समिति का गठन करते हैं। यह समिति तीन सदस्यीय होगी, जिसमें दो अलग-अलग हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश शामिल होंगे। यह समिति न्यायाधीश से स्पष्टीकरण माँगती है। तमाम जाँच के बाद यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट देती है। इसमें बताया जाता है कि आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही कदाचार के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं।
यदि कदाचार गंभीर नहीं हैतो CJI न्यायाधीश को सलाह दे सकते हैं और रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। यदि कदाचार गंभीर है तो CJI संबंधित न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देते हैं। यदि आरोपित न्यायाधीश इससे इनकार करता है तो CJI संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देते हैं कि आरोपित जज को न्यायिक कार्य सौंपना बंद दें।
यदि आरोपित न्यायाधीश फिर भी इस्तीफा नहीं देता हैं तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करते हैं तथा उन्हें हटाने की कार्यवाही की सिफारिश करते हैं। इसके बाद संसद में उस न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाती है। हालाँकि, यह तमाम आंतरिक प्रक्रिया का जिक्र संविधान में नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए खुद ही विकसित कर दिया गया है।

वो जज, जिस पर चला था पहली बार महाभियोग

भारत में आज तक 6 बार जजों को हटाने का प्रयास किया गया है। हालाँकि, इनमें से किसी को हटाया नहीं जा सका। सभी ने या तो खुद त्याग-पत्र दे दिया या फिर आरोप खारिज हो गए। इन 6 में से सिर्फ जस्टिस रामास्वामी और जस्टिस सेन के मामले में ही जाँच समिति ने आरोपों को सही पाया था। इनमें से 5 जजों पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे, जबकि एक में यौन कदाचार के आरोप लगे थे।
जस्टिस वीरा रामास्वामी (जी. रामास्वामी) भारत के पहले न्यायाधीश थे, जिन्हें महाभियोग के जरिए हटाने का प्रयास किया गया था। रामास्वामी का निधन 8 मार्च 2025 को 96 साल की उम्र में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया। वी. रामास्वामी का के खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालाँकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। रामास्वामी को सन 1971 में मद्रास हाई कोर्ट में जज बनाया गया था। इस असामान्य कदम के कारण काफी बवाल हुआ था। यह विवाद उनके कार्यकाल में आगे भी चलता रहा।
रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उचित प्रक्रियाओं का पालन किया। उन्होंने अपने फायदे के लिए सरकारी वाहनों एवं संसाधनों का जमकर दुरुपयोग किया। उन्होंने सरकारी पैसे से अपने आधिकारिक आवास में महंगे फर्नीचर, कालीन, एयरकंडिशन सिस्टम सहित अन्य विलासिता वाले सामान खरीदे।
इसको लेकर सन 1993 में जमकर राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था। उनके खिलाफ महाभियोग की माँग उठने लगी। इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी अपनी मंजूरी दी थी। हालाँकि, रामास्वामी को बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत कर दिया गया। आरोपों की समीक्षा करने के बाद तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने उन्हें मामले के सुलझने तक सेवा से दूर रहने की सलाह दी।
उन्हें 18 जुलाई 1990 को आधिकारिक पत्र मिला और उन्होंने तुरंत 23 जुलाई 1990 से छह सप्ताह की छुट्टी माँग ली। तथ्यों का सत्यापन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों वाली एक कमिटी गठित की। इस कमिटी ने कहा कि उसे अनुचित व्यवहार का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के 108 सदस्यों ने 9वीं लोकसभा के अध्यक्ष से रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की।
तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के सहयोगी भाजपा और वामपंथी दलों के सदस्यों ने लोकसभा में इस महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस नोटिस को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद तत्कालीन स्पीकर रबि राय ने 12 मार्च 1991 को समिति गठित की। समिति ने पाया कि रामास्वामी ने सार्वजनिक धन का उपयोग निजी फायदे के लिए किया और वैधानिक नियमों की अवहेलना की।
इस समिति ने रामास्वामी को 14 में से 11 आरोपों में दोषी ठहराया। वहीं, रामास्वामी ने स्पीकर द्वारा गठित समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया। 10 मई 1993 को समिति द्वारा यह निर्धारित किए जाने के बाद कि आरोपों में दम है, प्रस्ताव को चर्चा के लिए लोकसभा में लाया गया। हालाँकि, उस समय की विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस के कई नेता रामास्वामी के समर्थन में आ गए।
इस महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में 401 सांसदों में से सिर्फ 196 ने मतदान किया। कॉन्ग्रेस और कुछ अन्य दलों के 205 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में हुए मतदान में भाग ही नहीं लिया। इस तरह यह प्रस्ताव गिर गया और वे हटाए जाने से बच गए। इस तरह वे अपना कार्यकाल पूरा होने तक आगे भी काम जज के रूप में काम करते रहे। आखिरकार 8 मार्च 2025 को उनका निधन हो गया।
कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।
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वो जज, जिनके खिलाफ CBI कोर्ट में लंबित है मामला

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी लगा था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा था। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय में सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।
उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।
बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने बालाकृष्णन के फैसले को पलट दिया और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। साल 2011 में जस्टिस यादव जिस दिन सेवानिवृत्त हो रहे थे, उसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। आज 14 साल बाद भी यह मामला स्पेशल CBI कोर्ट में लंबित है।