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डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से भारत में Deep State की फंडिंग पर हंगामा करने वालों में हड़कंप; क्या एनसन फंड के फाउंडर की बीवी के साथ TMC सांसद महुआ मोइत्रा का है लिंक? हिंडनबर्ग के साथ मिलकर शॉर्ट सेलिंग का चलाया अभियान, अमेरिका में चल रही जाँच

रिपोर्टों से पता चलता है कि महुआ मोइत्रा और एनसन के सह-संस्थापक मोएज कासम की पत्नी मारिसा सीगल कासम के बीच संबंध हो सकते हैं, जो हिंडनबर्ग-एन्सन विवाद के सामने आने के बाद कई सवाल खड़े करता है। (साभार: टोरोंटोमू/हिंदू)
अमेरिका में जब चुनाव चल रहे थे भारत में स्वाभिमानी देशभक्त डोनाल्ड ट्रम्प के जीतने के लिए हवन आदि कर रहे थे। जबकि कमला हैरिस भारत मूल की थी। डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के बने हैं लेकिन उनके फैसलों से भारत में Deep State की फंडिंग पर हंगामा करने वालों में हड़कंप मचनी शुरू हो गयी है। यही असली वजह थी ट्रम्प की जीत के लिए धार्मिक आयोजन करने की। अगर बदकिस्मती से कमला जीत गयी होती, 
Deep State की फंडिंग पर हंगामा करने वाले शेर हो गए होते। भारत को बांग्लादेश और अफगानिस्तान बनाने कमर कस चुके होते। देखना है कि ऊंट किस करवट बैठता है। 

हेज फंड कम्पनी एनसन फंड्स और हिंडनबर्ग रिसर्च के फाउंडर नाथन एंडरसन पर शेयर बाजार में गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। अब उनके खिलाफ अमेरिकी एजेंसियाँ जाँच कर रही है। इस मामले में सामने आए कोर्ट के कागजों से खुलासा हुआ है कि एंडरसन ने एनसन फंड्स के साथ मिलकर शॉर्ट सेलिंग का एक पूरा अभियान चलाया और मोटा पैसा कमाया।

यह सब मिलीभगत से किया गया। यह भी सामने आया है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में दिए जाने वाले तथ्य एनसन ने दिए। हिंडनबर्ग लगातार दावा करती रहती थी कि उसकी रिपोर्ट एकदम स्वतंत्र है और इसमें कोई भी बाहरी एजेंसी दखल नहीं देती है। जबकि जाँच में पता चला कि हिंडनबर्ग को एनसन बता रही थी कि उसे अपनी रिपोर्ट में क्या लिखना है।

अमेरिका की सिक्यूरिटी एक्सचेंज एजेंसी (SEC) समेत कई और एजेंसियाँ अब इन दोनों के गठजोड़ की जाँच कर रहे हैं। इस मामले में आगे दोनों कम्पनियों पर मुकदमा भी चल सकता है। इस मामले में TMC सांसद महुआ मोइत्रा का एंगल भी सामने आ रहा है।

कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि सांसद महुआ मोइत्रा और एनसन फंड्स के सह-संस्थापक मोएज कासम की पत्नी मारिसा सीगल कासम के बीच कनेक्शन हो सकते हैं। कयास है कि दोनों की अच्छी पहचान हो सकती हैं क्योंकि यह दोनों ही जेपी मॉर्गन के लिए काम कर चुकी हैं।

राजनीति में आने से पहले मोइत्रा ने लगभग 12 साल तक जेपी VP के रूप में काम किया था तो वहीं मारिसा ने लंदन, हांगकांग और न्यूयॉर्क में जेपी मॉर्गन में विभिन्न पदों पर काम किया। इस पैटर्न के सामने आने के बाद अडानी समूह पर लगाए गए आरोपों को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं।

महुआ मोइत्रा ने लगातार अडानी समूह के खिलाफ संसद में प्रश्न पूछे थे। आरोप था कि यह प्रश्न महुआ मोइत्रा ने कारोबारी दर्शन हीरानंदानी से गिफ्ट और बाकी फायदे लेकर पूछे थे। प्रश्न भी इस तरीके के थे जिनसे हीरानंदानी को कारोबारी फायदा पहुँचे।

एनसन फंड्स के खिलाफ यह आरोप भी है कि उसने शेयरों के भाव में गड़बड़ी की और मुनाफा कमाया। इसके लिए पहले स्टॉक के जानबूझकर दाम गिराए गए और बड़ा पैसा बनाया। अदालत में दायर किए गए कागजों में भी यह बताया गया है।

इन सब जाँच के बीच अगर यह साबित हो जाता है कि मोइत्रा के मारिसा कासम एनसन फंड्स के सह-संस्थापक के साथ रिश्ते हैं, तो मामले में और भी कई कड़ियाँ जुड़ जाएँगी। गौरतलब है कि हाल ही में हिंडनबर्ग को इसके संस्थापक एंडरसन ने बंद कर दिया था।

महुआ मोइत्रा ने अडानी समूह को बनाया था निशाना

अक्टूबर 2023 में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने तृणमूल TMC महुआ मोइत्रा पर व्यवसायी दर्शन हीरानंदानी से नकद और गिफ्ट लेने का आरोप लगाया था। आरोप था कि इसके बदले में महुआ मोइत्रा ने अडानी समूह को लेकर संसद में प्रश्न पूछे।
इस रिपोर्ट में लोकसभा के भीतर मोइत्रा द्वारा पूछे गए प्रश्नों की जानकारी दी गई थी। महुआ ने पारादीप पोर्ट और अडानी समूह को निशाना बनाया था। इन प्रश्नों से हीरानंदानी को कथित तौर पर फायदा होना था। यह प्रश्न बंदरगाह समझौतों, टेलिकॉम सेवाओं और गैस के प्रोजेक्ट को लेकर थे।
यह भी आरोप था कि महुआ के प्रश्नों से अडानी से मुकाबले में हीरानंदानी का पक्ष लिया गया। मोइत्रा ने बाद में कुछ भी गलत करने से इनकार किया था। हालाँकि, ऑपइंडिया की रिपोर्ट के बाद उनके खिलाफ जाँच तेज हो गई थी। यह जाँच उनके प्रश्नों और हीरानंदानी के व्यापारिक हितों से सम्बन्धित थी।
अब जबकि एनसन फंड्स के सह संस्थापक की पत्नी के साथ उनके संबंध तलाशे जा रहे हैं, तब उनके अडानी समूह पर प्रश्न पूछने के पीछे के उद्देश्य पर भी सवाल उठ रहे हैं।

हिंडनबर्ग के साथ मिलकर देश में आर्थिक अराजकता फैलाना चाहती है कांग्रेस

हिंडनबर्ग रिपोर्ट को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस पर करारा प्रहार किया है। कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए बीजेपी ने कहा है कि हिंडनबर्ग के साथ मिलकर कांग्रेस देश में आर्थिक अराजकता फैलाना चाहती है। बीजेपी के सीनियर लीडर रविशंकर प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट देश में आर्थिक अराजकता और आर्थिक अस्थिरता फैलाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस हिंडनबर्ग के साथ मिलकर काम कर रही है और वो देश को आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिश में शामिल हैं।

उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि तीसरी बार हारने के बाद कांग्रेस पार्टी, इंडी गठबंधन के लोग और उनको प्रमोट करने वाले टूलकिट के लोग भारत को आर्थिक रूप से अस्थिर करने के षड्यंत्र में जुटे हुए हैं। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट शनिवार को रिलीज होती है, रविवार को हल्ला मचता है ताकि सोमवार को पूरे कैपिटल मार्केट को अस्थिर कर दिया जाए। इसके पीछे क्या वजह रही इसे समझना जरूरी है।

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हिंडनबर्ग में जॉर्ज सोरोस ने निवेश किया है, जो भारत के खिलाफ नियमित प्रोपेगेंडा चलाते हैं और मोदी सरकार को बदलना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत तेज गति से बढ़ रही है। सभी रेटिंग एजेंसियां भारत के ग्रोथ रेट को बेहतर आंक रही हैं। निवेशक अपने रिटर्न से बहुत खुश हैं। लेकिन कुछ लोगों को यह बात पच नहीं रही है।

बीजेपी सांसद ने कहा कि मोदी से नफरत करते करते वह आज हिंदुस्तान से नफरत करने लगी है। राहुल गांधी और उनका टूलकिट गैंग देश से नफरत करने लगा है। अगर भारत का स्टॉक मार्केट गड़बड़ होगा तो यहां के छोटे निवेशक परेशान होंगे। आज भारत में करोड़ों की संख्या में छोटे निवेशक हैं। क्या कांग्रेस पार्टी चाहती है​ कि देश को फिर से कंट्रोल राज में ले आया जाए, जब भारत को दाने-दाने के लिए परेशान होना पड़ा था।

उन्होंने कहा कि टूलकिट वालों को भारत के विकास से कोई मतलब नहीं है, लेकिन कांग्रेस पार्टी को क्या हो गया है? जिसने 55 साल तक देश में राज किया है। उन्होंने कहा कि राजनीति में एक है टूलकिट पॉलिटिक्स और दूसरी है चिट पॉलिटिक्स। कांग्रेस चिट पॉलिटिक्स कर रही है। कोई से कहीं चिट मिल जाए, कांग्रेस पार्टी की टूलकिट और चिट पालिटिक्स शुरू हो जाती है।

बीजेपी नेता ने कहा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट में जो आरोप लगाए गए सेबी प्रमुख ने उसका जवाब दे दिया है। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के देखरेख में अपनी जांच पूरी करने के बाद सेबी ने हिंडनबर्ग के खिलाफ जुलाई में एक नोटिस दिया था। अपने बचाव में जवाब देने की बजाय हिंडनबर्ग ने ये रिपोर्ट पेश की है, जो पूरी तरह आधारहीन है।

रविशंकर प्रसाद ने सवाल उठाते हुए कहा कि मनमोहन सिंह के 10 साल के शासन के दौरान खूब स्कैम हुए। 2G स्कैम, अगस्ता वेस्टलैंड स्कैम, कोयला स्कैम, कॉमनवेल्थ स्कैम उस समय ऐसी रिपोर्ट क्यों नहीं आती थी? ये दिखाता है कि कांग्रेस और टूलकिट गैंग की मंशा क्या है। जिसे हम सफल नहीं होने देंगे।

बीजेपी सांसद ने कहा कि मुझे गर्व है कि आज भी भारत का स्टॉक मार्केट स्टेबल है। पिछली बार जब यह हुआ तो, दो दिन में रिकवर कर गया। सुप्रीम कोर्ट की जांच के बाद और रिकवर कर गया। लगता है भारत के निवेशक कांग्रेस और हिंडनबर्ग की मिलिभगत को समझ गए हैं। इसीलिए बाजार पर इस साजिश का असर नहीं पड़ा है।

राहुल गाँधी के संसद में नकारात्मक भाषण ने गौतम अडानी के शेयरों में लगवाई 102% की छलांग! एक दिन में 42000 करोड़ रूपए का फायदा

कहते हैं कि ज्यादा होशियारी नुक्सानदेही होती है। जिसे राहुल गाँधी द्वारा संसद में झूठ की पोटली खोलने ने साबित कर दिया। जिस अडानी विवाद को लेकर संसद नहीं चलने देना और जब बोलने की नौबत आने पर पासे ही पलट गए, यानि दूसरे शब्दों में कहा जाये कि जिस गौतम अडानी के व्यापार को  टूलकिट समाप्त करने जा रही थी और अक्ल से पैदल हमारे नेता खुशी मनाने में लगे थे, उधर उसी अडानी के शेयरों ने जबरदस्त छलांग लगा कर हिंडनबर्ग के साथ-साथ मोदी-योगी विरोधियों को भी चारों खाने चित कर दिया। 
अमेरिकी रिसर्च कंपनी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद से अडानी ग्रुप के शेयरों में काफी गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन अब अडानी एंटरप्राइजेज के शेयरों ने धमाकेदार वापसी की है। गौतम अडानी के नेतृत्व वाले ग्रुप के शेयर इस सप्ताह के उच्च स्तर पर हैं। हालाँकि, इसके बाद लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि संसद में राहुल गाँधी के नकारात्मक भाषण के बाद अडानी के शेयर्स बढ़ने शुरू हो गए हैं। बता दें कि संसद में भाषण देते हुए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने न सिर्फ अडानी पर तरह-तरह के आरोप लगाए, बल्कि झूठ भी बोला।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अडानी एंटरप्राइजेज के शेयर बुधवार (8 फरवरी, 2023) को 102 फीसदी बढ़ गए हैं। बीएसई पर, अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर 13.07 प्रतिशत बढ़कर 2038 रुपए पर पहुँच गया है और इसका बाजार मूल्य बढ़कर 2.32 लाख करोड़ रुपए हो गया है।

अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन 7.24 प्रतिशत बढ़कर 593.35 रुपए प्रति शेयर हो गया है, जिसका बाजार मूल्य 1.28 लाख करोड़ रुपए है। वहीं, अडानी ट्रांसमिशन 5 फीसदी बढ़कर 1314.25 रुपए, अडानी पावर 4.99 फीसदी बढ़कर 182 रुपए और अडानी विल्मर 4.99 फीसदी बढ़कर 419.35 रुपए हो गया। ये शेयर अपने अपर प्राइस बैंड पर पहुँच गए हैं। इनके अलावा एनडीटीवी के शेयर 3.94 प्रतिशत बढ़कर 225.50 रुपए, अंबुजा सीमेंट्स के शेयर 1.15 प्रतिशत बढ़कर 388.10 रुपए और एसीसी के शेयर 0.43 प्रतिशत बढ़कर 2004 रुपए हो गए हैं।

अडानी एंटरप्राइजेज के शेयर शुक्रवार (3 फरवरी 2023) को 35 फीसदी तक गिर गए थे। इस शेयर ने अपने लोअर सर्किट 1017.10 को छुआ था। लेकिन सोमवार (6 फरवरी 2023) से अडानी ग्रुप के शेयरों में काफी तेजी देखी जा रही है। यह तीसरे दिन भी जारी है। इसने पैसा लगाने वाले निवेशकों को मालामाल कर दिया है। आज सुबह 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 350.16 अंक बढ़ा यानी यह 0.58 प्रतिशत बढ़कर 60,636.20 अंक पर पहुँच गया है।

हिंडेनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में अडानी समूह पर कई आरोप लगाए थे। इनमें मनी लॉन्ड्रिंग, अनऑथोराइज्ड ट्रेडिंग, वित्तीय गड़बड़ी, भारी-भरकम लोन सहित कई गंभीर आरोप थे, जो किसी कंपनी के लिए घातक बताए गए थे। बाद में अडानी समूह ने अमेरिकी रिसर्च कंपनी द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब दिया था। कंपनी ने 413 पन्नों के जवाब में हिंडनबर्ग द्वारा लगाए गए आरोपों को झूठ करार दिया था। कंपनी ने कहा था कि ये आरोप भारत और यहाँ की कंपनियों तथा देश के विकास पर सुनियोजित हमला है।

अडानी ग्रुप की कंपनी अडानी टोटल गैस के शेयर 24 जनवरी को 3891 रुपए पर बंद हुए थे। लेकिन गुरुवार (2 फरवरी, 2023) को इन शेयरों की कीमत 1707 रुपए रह गई। इसी तरह, अडानी पावर के शेयर 24 जनवरी को 274 रुपए पर ट्रेड हो रहे थे। लेकिन लगातार 6 शार्ट सर्किट के बाद शेयर की कीमत गुरुवार को घटकर 202 रुपए पहुँच गई थी।

अडानी विवाद : विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचा रहे भारत के तथाकथित देशप्रेमी नेता


सोशल मीडिया पर वायरल 
जिस विदेशी हिंडनबर्ग की रपट पर अपने आपको देशहितैषी कहने वाले नेता और उनकी पार्टियां विदेशी दान या कहे भीख पर गौतम अडानी पर कर रहे हंगामें से ये लोग देश का हित कर रहे हैं अथवा अहित? इस कटु सच्चाई को हर देशप्रेमी को समझनी होगी। जबसे बिकाऊ नेताओं ने अडानी पर हंगामा बरपाया है, विदेशी उद्योगपतियों के शेयर में बढ़ोतरी देखी जा सकती है यानि ये उपद्रवी नेता किसकी सहायता कर रहे हैं? क्या है इन नेताओं का चरित्र, चुनाव लड़ते किसी पार्टी से और सत्ताभोग के लिए दूसरी पार्टी में जा मिलते हैं। देश को खोखला करते नेता और उनकी पार्टियों को भी चुनावी मैदान में धूल चटाकर इनकी असलियत दिखाने का समय आ गया है।   भारत वैश्विक मंच पर एक ताकत बन गया है। कोराना महामारी से लेकर यूक्रेन-रूस संकट के बावजूद भारत की विकास रफ्तार से विश्व के ताकतवर देशों में खलबली मची हुई है। बहुत सारे ताकतवर देश अब तक भारत को बहुत सारे सामान बेचा करते थे यानी निर्यात किया करते थे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत जैसे-जैसे आत्मनिर्भर हो रहा है उनकी दुकानदारी पर संकट के बादल छाने लगे हैं। इससे घबराए पश्चिम के देश भारत और पीएम मोदी के खिलाफ षडयंत्र में जुट गए हैं। और हमारे तथाकथित देशप्रेमी नेता उनके हाथ की कठपुतली बन देश का अहित कर रहे हैं। 

देश में होने हैं 10 चुनाव, इसीलिए रची जा रही साजिशें

देश में इस साल 9 विधानसभा चुनाव होने हैं और 2024 में लोकसभा चुनाव भी है। ऐसे में विदेशी ताकतें अपनी पूरी शक्ति झोंककर पीएम मोदी को सत्ता से बाहर करना चाहती हैं। इसीलिए बीबीसी डाक्यूमेंट्री लाई गई और उसके बाद भारत के विकास में योगदान देने वाली प्रमुख कंपनी अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट। लेकिन ऐसी साजिश करने वालों को समझनी चाहिए भारत का मतलब अडानी नहीं है। भारत में विकास की रफ्तार अब थमने वाली नहीं है।

मोदी की लोकप्रियता साजिशकर्ताओं के लिए चिंता

मोदी लगातार तीन साल से लोकप्रियता में वैश्विक स्तर पर सबसे ऊपर बने हुए हैं। यह केवल देश की बात नहीं है विदेशों में भी पीएम मोदी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि देश में। भारत के खिलाफ साजिशकर्ताओं के लिए यह भी एक चिंता का सबब है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि भारत को बदनाम कैसे किया जाए जिससे निवेशक दूरी बना लें और पीएम मोदी के विकास के संकल्प पर ब्रेक लगाया जा सके। पद्म विभूषण से सम्मानित आनंद महिंद्रा ने सही ही कहा है कि भारत ने भूकंप, सूखा, मंदी, युद्ध और आतंकवादी हमलों के कई दौर देखे हैं। इसीलिए भारत के खिलाफ कभी शर्त मत लगाना।

अडानी ग्रुप के वैश्विक विस्तार मिशन से डरी विदेशी कंपनियां

पिछले कुछ सालों में अडानी ग्रुप ने अपना प्रभाव जमाया है। गौतम अडानी ने अडानी ग्रुप के वैश्विक विस्तार मिशन को आगे बढ़ाया। ऐसे में वैश्विक रूप से अडानी ग्रुप का बढ़ना भला विदेशी कंपनियों को कैसे रास आ सकता है। तब तो और नहीं जब अडानी ग्रुप भारत की पहचान को दिनोदिन और सुदृढ़ करने में आगे की ओर बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी दुनिया में जिस गति से भारत विरोधी नैरेटिव को फैलाया जा रहा है उसमें काफी वृद्धि हुई है।

सोरोस, फोर्ड फाउंडेशन, बिल गेट्स के फंड से आस्ट्रेलिया में हुआ अडानी का विरोध

एनजीओ http://350.org को Tides Foundation द्वारा अत्यधिक वित्त पोषित किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि टाइड्स फाउंडेशन को फंड कौन देता है? सिर्फ एक साल के लिए नाम और रकम देखें! इसमें सोरोस, फोर्ड फाउंडेशन, रॉकफेलर, ओमिडयार और बिल गेट्स के नाम हैं।

वालस्ट्रीट जनरल की प्रोपेगेंडा रिपोर्ट, अडानी को ही भारत बता दिया

बीबीसी डाक्यूमेंट्री और हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद विदेशी प्रोपेगेंडा मीडिया के साथ ही भारत के विपक्षी दलों और लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम को सरकार पर हमला करने का टूल मिल गया। अडानी का मतलब भारत नहीं है लेकिन वालस्ट्रीट जनरल ने अपनी रिपोर्ट में कुछ ऐसा ही लिखकर प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश की। उसने लिखा- हिंडनबर्ग ने “हिंदू राष्ट्रवादी पीएम” मोदी के आर्थिक विकास के गुजरात मॉडल से भरोसा हिला दिया है और “यह कॉर्पोरेट भारत के बारे में बहुत कुछ कहता है”।

भारत की छवि खराब करने का षड्यंत्र

ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी बीबीसी (BBC) ने अपनी डॉक्टूमेंट्री के माध्यम से पीएम नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने की कोशिश की और अब उसके बाद हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के जरिये अडानी ग्रुप पर हमला कर अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंचाने की साजिश रची गई। इन सभी का एक साथ आना संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछ इन विरोधियों का अपना लाभ तो है ही साथ ही साथ भारत की छवि खराब करने का षड्यंत्र भी है। हिंडनबर्ग जैसे रिपोर्ट भी ऐसे ही षड्यंत्र रच रहे हैं। अब फिच रेटिंग्स ने भी कह दिया है कि फिलहाल अडानी ग्रुप की कंपनियों के रेटिंग्स पर असर नहीं है।

आनंद महिंद्रा ने कहा- भारत के खिलाफ कभी शर्त मत लगाना

पद्म विभूषण से सम्मानित आनंद महिंद्रा ने अडानी संकट के जरिए भारत की आर्थिक ताकत पर सवाल उठा रहे लोगों को करारा जवाब दिया है। बेबाकी के साथ अपनी बात कहने वाले महिंद्रा ने एक ट्वीट में कहा, ‘ग्लोबल मीडिया में अटकलें लगाई जा रही है कि क्या बिजनस सेक्टर की मौजूदा चुनौतियां भारत की आर्थिक ताकत बनने का सपना पूरा कर सकेगा। मैंने भूकंप, सूखा, मंदी, युद्ध और आतंकवादी हमलों के कई दौर देखे हैं। मैं केवल यही कहूंगा कि भारत के खिलाफ कभी शर्त मत लगाना।’ इस तरह महिंद्रा ने विदेश ही नहीं बल्कि देश में भी ऐसे लोगों को जवाब दिया है जो अडानी संकट के बहाने सरकार की इकॉनमिक पॉलिसीज पर सवाल खड़े कर रहे हैं। ट्विटर पर उनके एक करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हैं।

हिंडनबर्ग रिसर्च के साथ शेयर शार्ट-शेलिंग भी करती है, इसीलिए उसकी भूमिका पर संदेह

हिंडनबर्ग अमेरिका की इनवेस्टमेंट रिसर्च कंपनी है। 2017 में इसे ‘नाथन एंडरसन’ नाम के एक अमेरिकी व्यक्ति ने स्थापित किया था। इस कंपनी का मुख्य काम शेयर मार्केट, इक्विटी, क्रेडिट और डेरिवेटिव्स पर रिसर्च करना है यानी कि शेयर मार्केट में कंपनियां पैसों की हेरा-फेरी तो नहीं कर रही हैं या फिर बड़ी कंपनियां अपने फायदे के लिए अकाउंट मिसमैनेजमेंट तो नहीं कर रही हैं। लेकिन इनवेस्टमेंट रिसर्च करने के साथ-साथ यह एक शार्ट-शेलर कंपनी भी है जोकि शेयर मार्केट में अलग-अलग कंपनियों के शेयर खरीदती और बेचती है और उससे मुनाफा कमाती है। इससे यह साफ हो जाती है कि हिंडनबर्ग ने शेयर के जरिये अपने मुनाफे के साथ-साथ इस रिसर्च के जरिये विदेशी मीडिया और भारत के विपक्षी दल को सरकार पर हमला करने का एक टूल दिया है।

अडानी के शेयरों में गिरावट से विदेशी कंपनियों को फायदा

अडानी के शेयरो में गिरावट और निवेशकों के नकारात्मक रुझान से इस सेक्टर की विदेशी कंपनियों को फायदा होगा। हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कुछ छिपाना और कुछ बताना वाली नीति को अपनाया है यानी उसने अडानी ग्रुप के बारे में उन्हीं चीजों को बताया है जो उसके हित में हैं और जो शेयर बाजार में अडानी ग्रुप के शेयरों की कीमत को घटाने का काम करे। अडानी पर हमला करने से बहुत से समूहों को कई गुना लाभ होता है। अडानी साम्राज्य सोलर मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, इंडस्ट्रियल लैंड, डिफेंस, एयरोस्पेस, फ्रूट्स, डेटा सेंटर्स, रोड, रेल, रियल एस्टेट लेंडिंग, कोल और कई अन्य क्षेत्रों में मौजूद है।

वैश्विक रूप से आगे बढ़ रहा है अडानी ग्रुप

अडानी ग्रुप पिछले 12 साल से ऑस्ट्रेलिया में मौजूद है। ग्रुप ने कई विरोधों के बाद भी कारमाइकल कोयला खदान का विकास किया। 2017 में अडानी ने चीनी बेल्ट एंड रोड पहल में सेंधमारी की। उस वर्ष, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (लिमिटेड) ने कुआलालंपुर से 50 किमी दूर स्थित कैरी द्वीप में कंटेनरों को संभालने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। यह सभी अपेक्षाओं के विपरीत था इससे भी अधिक, यह मलेशिया में भारत की स्थिति को बढ़ावा देने वाला था।फिर श्रीलंका में चीनी उपस्थिति के बीच अडानी समूह को कोलंबो बंदरगाह पर एक पश्चिमी कंटेनर टर्मिनल के विकास और संचालन का ठेका मिला है। कुछ महीनों के भीतर, समूह ने द्वीप राष्ट्र में दो पवन ऊर्जा परियोजनाओं को समाप्त कर दिया। अडानी की उपस्थिति से बांग्लादेश के बिजली क्षेत्र को भी बढ़ावा मिल रहा है।

इज़राइल ने हाइफा बंदरगाह अडानी समूह को सौंपा

एशिया के बाहर भी अडानी ग्रुप भारत की मौजूदगी बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. पिछले साल, अडानी समूह ने इज़राइल के हाइफा बंदरगाह में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने के लिए 1.18 अरब डॉलर खर्च किए। अडानी अब इज़राइल में चीनी राज्य के स्वामित्व वाले शंघाई इंटरनेशनल पोर्ट ग्रुप के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा में है। राष्ट्रवाद के संदर्भ में यह चीनी राज्य के व्यापारिक हितों पर सीधा हमला है। तंजानिया में, अडानी ने पूर्ववर्ती प्रीमियम बीआरआई परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके चीन को भारी झटका दिया। देखना होगा कि समूह तेजी से यूरोप और यहां तक ​​कि अजरबैजान जैसे भौगोलिक क्षेत्रों में अपने पैर फैला रहा है।

यह सच है कि अडानी से पहले टाटा, रिलायंस और कई अन्य कंपनियों ने भी अन्य देशों में विस्तार किया। लेकिन उनके विस्तार के बीच उल्लेखनीय अंतर हैं। एक तो ये कि इन औद्योगिक समूहों ने भारत के बढ़ते दबदबे के समानांतर विस्तार नहीं किया। दूसरा अंतर यह है कि अडानी को पीएम मोदी का करीबी माना जाता है, जो सच न भी हो तो भी विदेशी ताकतों को झटका देना तय है।

फिच रेटिंग्स ने कहा- फिलहाल अडानी ग्रुप की कंपनियों के रेटिंग्स पर असर नहीं

अडानी समूह के स्टॉक्स में भारी गिरावट के बीच रेटिंग एजेंसी फिच की तरफ से बड़ा बयान आया है। फिच रेटिंग्स ने कहा है कि शार्ट सेलर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का अडानी समूह की कंपनियों के रेटिंग्स और उनके सिक्योरिटिज पर फिलहाल कोई असर नहीं पड़ने वाला है जिसे उसने पहले से रेटिंग दी हुई है। साथ ही फिच ने कहा कि कंपनी के कैश फ्लो के उसके अनुमान में भी कोई बदलाव नहीं आया है। फिच रेटिंग्स के इस बयान से अडानी समूह को राहत मिली है।

फिच रेटिंग्स ने मौजूदा समय में अडानी समूह के 8 कंपनियों को रेटिंग दी हुई है। जिसमें अडानी ट्रांसमिशन को BBB-/Stable, अडानी इलेक्ट्रिसिटी मुंबई लिमिटेड के सीनियर सिक्योर्ड डॉलर नोट्स को BBB- रेटिंग हासिल है। अडानी इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल प्राइवेट लिमिटेड को सीनियर सिक्योर्ड डॉलर नोट्स को BBB-/Stable, अडानी ट्रांसमिशन को BBB-/Stable, अडानी ग्रीन एनर्जी के सीनियर सिक्योर्ड डॉलर नोट्स को BBB-/Stable, मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड को सीनियर सिक्योर्ड डॉलर नोट्स BB+/Stable रेटिंग्स हासिल है।

अडानी पर हमला 2017 में ही शुरू हो गया था

यह हमला हिंडनबर्ग शोध रिपोर्ट के बाद 25 जनवरी 2023 को शुरू नहीं हुआ है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया से 2016/17 में शुरू हुआ था। अडानी को 2010 में ऑस्ट्रेलिया में कारमाइकल कोल माइन का प्रोजेक्ट मिला था। 2017 में http://350.org एनजीओ के नेतृत्व में कुछ एनजीओ द्वारा अडानी के खिलाफ विरोध शुरू किया गया था। उन्होंने इस प्रोजेक्ट को रोकने के लिए एक ग्रुप #StopAdani बनाया।

भारतीय एनजीओ NFI को भी सोरोस, फोर्ड फाउंडेशन देती है फंड

सीमा चिश्ती एनएफआई में मीडिया फेलोशिप सलाहकार

भारत में एक एनजीओ नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया (NFI) है। अब एनएफआई के दानदाताओं की एक सूची देखिए। इसमें सोरोस, फोर्ड फाउंडेशन, रॉकफेलर, ओमिड्यार, बिल गेट्स और अजीम प्रेमजी के नाम भी हैं। सीमा चिश्ती एनएफआई में मीडिया फेलोशिप सलाहकार हैं। वह द वायर में संपादक हैं। वह कारवां के लिए लिखती हैं और वह माकपा नेता सीताराम येचुरी की पत्नी हैं!

अजीम प्रेमजी के नेतृत्व में एनजीओ IPSMF शुरू हुआ

अजीम प्रेमजी के नेतृत्व में एक एनजीओ IPSMF शुरू हुआ, जो Altnews, The Wire, The Caravan, The News Minute, आदि प्रचार समाचार वेबसाइटों को फंड करता है। अब IPSMF के संस्थापक सदस्यों की सूची में नाम देखें। अगर आप प्रोपगंडा वेबसाइटों से जुड़े लोगों की टाइमलाइन चेक करेंगे, तो आपको अडानी के खिलाफ लगभग वही प्रॉपेगैंडा ट्वीट और समन्वित हमले मिलेंगे। इस कार्टेल ने अडानी के खिलाफ अपने प्रचार लेख और ट्वीट के साथ सोशल मीडिया और उनकी वेबसाइटों पर समन्वित हमले की शुरुआत की है।

बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री के किरदार अलीशान जाफरी को एक विदेशी फंडेड NFI में फेलोशिप मिली। उन्हीं के साथ शुरू हुई थी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री! सीमा चिश्ती ने उनकी मदद की और उनका मार्गदर्शन किया। सीमा चिश्ती दस साल तक बीबीसी की संपादक रहीं और अब वह द वायर की संपादक हैं।