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‘नीतीश कुमार के खाने में मिलाई जा रही दवा, इसीलिए हो रहा मेमोरी लॉस’: ललन सिंह पर आरोप

                                   नीतीश कुमार और अरुण कुमार (साभार-आउटलुक और ABP न्यूज़)
बिहार में लोकसभा चुनावों से पहले ही आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। इसी क्रम में अब पूर्व सांसद और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अरुण कुमार ने जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को खाने में मेमोरी लॉस की दवा मिलाकर दी जा रही है। कुछ ऐसा ही बयान प्रशांत किशोर ने भी दिया है। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हाजीपुर में शनिवार (14 अक्टूबर, 2023) को मीडिया से बात करते हुए अरुण कुमार ने नितीश कुमार के मेमोरी लॉस का दावा किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चीजें भूल जा रहे हैं। उन्हें खाने में मेमोरी लॉस की दवा मिलाकर खिलाई जा रही है। अरुण कुमार ने कहा कि इसकी जाँच कराई जानी चाहिए।

दरअसल, नितीश कुमार के मेमोरी लॉस का मुद्दा प्रशांत किशोर ने उठाया। उन्होंने मुख्यमंत्री के कुछ समय के बात-व्यवहार का हवाला देते हुए कहा कि मानसिक रूप से कमजोर करने के लिए उन्हें ऐसी दवा ललन सिंह के कहने पर दी जा रही है।  

जदयू अध्यक्ष ललन सिंह पर गंभीर आरोप

नीतीश कुमार के भूलने की बीमारी की तरफ इशारा करते हुए चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अरुण कुमार ने इसके लिए जदयू अध्यक्ष ललन सिंह और कुछ अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया।
पूर्व सांसद अरुण कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति खराब हो गई है। वह जनता दरबार में गृह मंत्री खोजने लगते हैं। इसके बाद कोई और उन्हें बताता है कि वह खुद ही प्रदेश के गृह मंत्री भी हैं।
अरुण कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री कभी नेताओं के सिर पकड़कर एक-दूसरे से टकराने लगते हैं। उन्होंने ललन सिंह पर हमला बोलते हुए कहा कि जो लोग लालू यादव के लिए चारा घोटाला मामले में मुंशी की तरह पैरवी करते थे।
आज वही लालू यादव को मुंशी की तरह समझा दिए हैं कि हम बचा भी सकते हैं। हम फँसाए हैं तो बचा भी सकते हैं। हम नीतीश कुमार को किनारे कर देंगे, आप हमारे नेता हैं, निश्चिंत रहिए। हम जेडीयू को भी खा जाएँगे, आप निश्चिंत रहिए।
उन्होंने कहा कि इन लोगों ने पार्टी को बर्बाद किया। जदयू के कई लोग जो हमसे जुड़े हुए हैं, हमारे पास आ रहे हैं। ऐसी अराजक स्थिति में अब एक ही उम्मीद है चिराग पासवान। जाति, धर्म, पार्टी से ऊपर उठकर सब लोग चिराग को खोज रहे हैं। चाहे खेल का मैदान हो, स्कूल का मैदान हो, कॉलेज हो, गाँव हो, खेत या खलिहान हो।

नीतीश कुमार पर हो रहा उम्र का असर

जनसुराज पदयात्रा के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने भी नितीश कुमार के भूलने की बीमारी का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को अगर ध्यान से देखिएगा तो पता चलेगा कि उनपर उम्र का असर हो गया है। पिछले एक साल की उनकी पुरानी स्पीच उठाकर देख लीजिए आपको पता चल जाएगा कि वो हर बात को जलेबी की तरह घुमाते रहते हैं। बोलना कुछ चाहते हैं बोल कुछ और जाते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि आपने कभी नीतीश कुमार को किसी फैक्ट्री बनाने को लेकर चर्चा करते सुना? नीतीश कुमार के लिए आज चर्चा का विषय क्या है? उनके लिए आज चर्चा का विषय है कि धरती का नाश होने वाला है। मोबाइल का उपयोग करने से लोग पागल हो रहे हैं। क्या यही नीतीश कुमार का काम है? नीतीश कुमार क्या साइकोलोजिस्ट हैं या मनोवैज्ञानिक हैं? बिहार की जनता ने जो काम नीतीश कुमार को दिया है वो तो ये कर नहीं रहे बाकी बेकार की चीजों में इनका ध्यान रहता है। दुनिया कितने दिनों तक रहेगी कब खत्म हो जाएगी इस पर बात करते हैं।

 

तमिलनाडु : ‘मैं हिंदी भाषियों को पीटूँगा, जल्दी ही ये सामान पैक कर भागेंगे’: प्रशांत किशोर ने वीडियो शेयर कर मुख्यमंत्री से पूछा- इन लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई


राज ठाकरे द्वारा बिहारी को निकाले जाने पर सांप्रदायिक एकता के नाम पर हंगामा करने वाले छद्दम धर्म-निरपेक्ष तमिलनाडु में हिंदी भाषियों के विरुद्ध हंगामा करने पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? क्या तमिलनाडु में हिंदी भाषियों के विरुद्ध हिंसा करने से अनेकता में एकता हो रही है? जब संविधान की कसम खाने वाले ही चुप रहेंगे, फिर कसम न खाने वाले हिंसा को बढ़ावा दे तो कोई हैरानी की बात नहीं। 

तमिलनाडु (Tamil Nadu) में हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ हिंसा (Violence against Hindi Speaking People) की बात को वहाँ की स्टालिन सरकार (MK Stalin Government) दबाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है। इस मुद्दे को उठाने वाले सोशल मीडिया यूजर से लेकर मीडिया संस्थानों एवं पत्रकारों के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई करते हुए उन पर मुकदमा दर्ज कर रही है। अब तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) ने इस मामले को उठाया है।

बिहार में राजनीतिक जमीन तलाश रहे प्रशांत किशोर ने इस मामले में शुक्रवार (10 मार्च 2023) को एक ट्वीट किया। ट्वीट में उन्होंने स्टालिन सरकार पर सवाल उठाया और पूछा कि तमिलनाडु में हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ जहर उगलने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

प्रशांत किशोर ने ट्वीट किया, “नफरत और हिंसा भड़काने के लिए फर्जी वीडियो का इस्तेमाल करने वाले लोगों से कानून के मुताबिक निपटा जाना चाहिए, लेकिन यह उन लोगों को दोषमुक्त नहीं करता है जो खुले तौर पर तमिलनाडु में हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ हिंसा का आह्वान कर रहे हैं। सेंथामिजन सीमन जैसे उकसाने वाले लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?”

प्रशांत किशोर ने अपने ट्वीट के साथ सीमन का एक वीडियो भी शेयर किया है, जिसमें वह हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ विष उगल रहे हैं। ट्विटर प्रोफाइल के मुताबिक, सीमन ‘नाम तमिलार काटची (NTK)’ के मुख्य समन्वयक हैं। यह तमिलनाडु की एक प्रमुख पार्टी है। इसमें वे इस वीडियो में लोगों को भड़काने का काम कर रहे हैं।

प्रशांत किशोर द्वारा शेयर किए गए वीडियो में सेंथामिजन सीमन तमिल लोगों के एक समूह को संबोधित करते हुए कह रहे हैं, “हिंदी भाषी लोग बदहवासी में अपना सामान पैक करके यहाँ से भागेंगे। मुझे नहीं पता कि मैं कितनों को पीटूँगा। एक हफ्ते के अंदर वे अपना सामान बाँध लेंगे।”

तमिलनाडु में हिंदी भाषी मजदूरों के खिलाफ हिंसा की बात वहाँ से लौट कर आए मजदूरों ने खुद सुनाई है। वे डरे हुए हैं। इन लोगों का कहना है कि तमिलनाडु में स्थानीय लोगों दूसरे राज्यों से आए लोगों का नाम-पता पूछ-पूछकर पीट रहे हैं। इतना ही नहीं, वहाँ कुछ लोगों की हत्या की भी बात कही जा रही है। हालाँकि, तमिलनाडु की पुलिस हिंसा या हत्या की किसी भी बात को पूरी तरह नकार रही है।

तमिलनाडु पुलिस द्वारा हिंसा की बात नकारे जाने के बावजूद वहाँ से चोरी-छिपे लौटकर आ रहे लोग समस्या की भयावहता के बारे में बता रहे हैं। इस खबर को प्रकाशित करने के बाद तमिलनाडु पुलिस ने कई पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। बिहार के नेता पप्पू यादव ने पत्रकारों पर केस का विरोध किया था।

चिंतन शिविर को लेकर प्रशांत किशोर ने आखिर क्यों कहा- कांग्रेस गुजरात और हिमाचल में भी हारेगी पार्टी?

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने बेटे राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति में मजबूत करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं। सोनिया गांधी की हरसंभव कोशिश पार्टी पर परिवार की पकड़ बनाए रखने की होती है। इस क्रम में राजस्थान के उदयपुर में हाल ही में संपन्न चिंतन शिविर में राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाने के लिए माहौल बनाने की कोशिश की कई। इसी चिंतन शिविर को लेकर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर- पीके ने तंज कसते हुए कहा कि यह कुछ भी सार्थक हासिल करने में विफल रहा है, जिससे गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होने वाले चुनावों में भी पार्टी हारेगी। पीके ने ट्वीट करते लिखा, “मेरे खयाल से ये चिंतन शिविर कुछ भी सार्थक हासिल करने में विफल रहा है। ये सिर्फ यथास्थिति को लंबा खींचने और कांग्रेस नेतृत्व को समय देने के अलावा कुछ और नहीं है… कम से कम गुजरात और हिमाचल प्रदेश में मिलने वाली हार तक…”

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में ये भविष्यवाणी कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पडेगा। सोशल मीडिया पर इसी की चर्चा हो रही है।

इसके अनेक कारण हैं, जिनकी एक लम्बी सूची है। वास्तविकता यह है कि प्रारम्भ से लेकर आज तक कांग्रेस अपनी कुर्सी की खातिर लोकतान्त्रिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति को लेकर ढुलमुल और "फूट डालो और राज करो" नीति पर चल जनता को मूर्ख बनाती रही, हिन्दू मुसलमानों के बीच गंगा-जमुनी तहजीब जैसे धूर्तपूर्ण नारों से खाई बना दी, हिन्दुओं को अपमानित करती रही। फिर जो पार्टी अपनी ही संस्कृति को धूमिल कर दे, अपने गौरवशाली इतिहास को दरकिनार कर विदेशी आक्रांताओं को महान बताए, उससे देशहित की कल्पना करना ही मूर्खता है। 

पाकिस्तानी न्यूज़ चैनलों पर काशी विश्वनाथ और बड़ी ईमानदारी से बहस चल रही है 

मैंने कई चैनलों के बाहर फेसबुक पर और यूट्यूब पर देखें कई लोगों ने पाकिस्तान के चैनल पर कहा यह तो सच्चाई है औरंगजेब ने लाखों मंदिर तोड़े और प्रतियोगियों डिबेट में शामिल एक व्यक्ति ने पाकिस्तान में ही स्थित 6 बड़ी मस्जिदों के नाम गिनाए जो कभी मंदिर थे लेकिन औरंगजेब के जमाने में उसे मस्जिद में तब्दील कर दिया गया 

एक प्रतियोगी ने कहा भारत के मुस्लिम नेता क्यों सच्चाई से मुंह चुराते हैं क्यों नहीं स्वीकार करते कि हमारे आलमगीर औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ा 

यह तो हमारे इस्लाम में हमारा कर्तव्य है हमारे पैगंबर साहब ने मदीना में जब कब्जा किया तब यजीदी जो हिंदुओं की तरह बुत परस्ती में यकीन करते हैं और मदीना में यजिदीयो  ने कई मंदिर बना रखे थे जिसमें अग्निदेव और उनके दूसरे देवताओं की मूर्तियां थी  तो हमारे पैगंबर ने अपने हाथों से उन मूर्तियों को तोड़ा और हमें हुक्म दिया बुत परस्ती ना सिर्फ हराम है बल्कि जब तुम किसी राज्य पर काबिज हो जाओ तब वहां के सभी बुतों को नष्ट कर दो और यही कारण है कि तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर पहली बार कब्जा किया था तब उसने बामियान में स्थित गौतम बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाओं को जिन्हें एक ही पहाड़ी को काटकर बनाया गया था उन्हें नष्ट कर दिया

और जब is is ने  इराक पर कब्जा किया तब मेसोपोटामिया दौर की बेहद बहुमूल्य आर्टीफैक्ट्स जिसमें तमाम मूर्तियां थी उन मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया हम मुस्लिम लोग ऐसे लोगों को जिन्होंने तमाम मूर्तियों को तोड़ा उन्हें गर्व से बुतशिकन कहते हैं महमूद गजनवी को बुतशिकन की उपाधि से नवाजा गया अभी इस्लामाबाद कॉरपोरेशन ने जब हिंदू मंदिर के लिए जमीन अलॉट किया तब हमारे उलेमाओं ने यही कहकर विरोध किया कि इस्लाम की जमीन पर कोई बूत नहीं बन सकता और मंदिर की नींव उखाड़ दी गई

एक प्रतियोगी ने ईमानदारी से कहा यह तो हमारा इतिहास है सिर्फ अभिभाजित हिंदुस्तान ही नहीं जब हमारे खलीफाओं ने स्पेन होते हुए यूरोप पर हमला किया तब हमने हजारों चर्चों को मस्जिदों में तब्दील कर दिया लेकिन इस पर स्पेन ऑस्ट्रिया सर्बिया के ईसाईयों ने हिंदुओं की तरह या वहां के शासकों ने कोर्ट कचहरी के चक्कर में नहीं पड़ा बल्कि एक झटके में ऐसे 800 चर्च जो करीब 400 सालों तक मस्जिद थे उन्हें तुरंत चर्च में वापस तब्दील कर दिया 

आप इन हिंदुओं की बेचारी और लाचारी देखिए किए अपनी ही मंदिरों को पाने के लिए अदालतों में कई सदी से चप्पल घिस रहे हैं। 

आखिर रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने एक और चुनाव में कांग्रेस के हार की भविष्यवाणी क्यों की?

कांग्रेस का तुरुप का आखिरी पत्ता भी फेल
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अब तक के सबसे खराब नतीजों का सामना करना पड़ा है। अपने बेटे राहुल गांधी को राजनीति में जमाने में नाकाम रहने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी पर परिवार का नियंत्रण बनाए रखने के लिए बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा के रूप में अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। लेकिन उत्तर प्रदेश में सोनिया का ब्रह्मास्त्र फुस्स रह गया। राहुल गांधी के नेतृत्व में साल 2012 से ही कांग्रेस को मिल रही लगातार हार के बाद गांधी परिवार की आखिरी उम्मीद प्रियंका गांधी वाड्रा पर आ टिकी थी। पार्टी के चाटुकारों ने दादी इंदिरा गांधी से तुलना कर प्रियंका को झाड़ पर चढ़ा दिया। पर्दे के पीछे से परिवार की राजनीति करने वाली प्रियंका वाड्रा साल 2019 में राष्ट्रीय महासचिव बना दी गईं। पार्टी के बिना जनाधार वाले नेताओं और पक्षकारों ने ये माहौल बनाने की कोशिश की कि प्रियंका कांग्रेस के डूबते हुए जहाज को किनारे लगा देंगी, लेकिन 2022 के चुनाव ने सोनिया गांधी के साथ सभी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया। कांग्रेस का तुरुप का पत्ता पहले ही दांव में बेकार चला गया। राहुल के बाद लोगों में प्रियंका वाड्रा को लेकर जो भ्रम बना हुआ था वो टूट गया।

प्रियंका को चुनाव में मिली पूरी छूट, पर रही नाकाम
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सब कुछ प्रियंका गांधी वाड्रा के मन मुताबिक हुआ। चुनाव अभियान का पूरा नियंत्रण प्रियंका के हाथों में था। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक किसी नेता का कोई दखल नहीं था। टिकट बंटवारे से लेकर रोड शो और रैली तक सब कुछ प्रियंका के निर्देश पर हुआ। सोनिया गांधी ने भी अपने सारे सितारे प्रियंका के साथ लगा दिए थे। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल और सचिन पायलट सहित कई बड़े नेताओं ने यूपी में आकर रैलियां की। कांग्रेस के पक्ष में हवा बनाने की कोशिश की गई। खुद प्रियंका ने राज्य में 167 रैलियां और 42 रोड शो किए। कुल 209 रैलियां और रोड शो के बाद भी प्रियंका का जादू नहीं चला। कांग्रेस के 403 उम्मीदवारों में से सिर्फ दो ही जीत पाने में कामयाब रहे। 
चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 6.2 प्रतिशत से घटकर 2.3 प्रतिशत पर आ गया।

सिर्फ दो राज्यो में सिमट कर रह गई कांग्रेस
सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के भरोसे रहने वाली कांग्रेस अब सिर्फ दो राज्यों में सिमट कर रह गई है। अब सिर्फ राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ सरकार में भागीदार है। पार्टी पर परिवार की पकड़ के कारण जनाधार वाले नेताओं की पूछ नहीं हो रही है। उत्तर प्रदेश में ही प्रियंका वाड्रा के कारण कई पुराने और जनाधार वाले नेता पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर हो गए। आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, ललितेश त्रिपाठी सहित करीब 40 नेताओं ने पार्टी को बॉय बोल दिया।

राहुल-प्रियंका के सियासी भविष्यपर सवाल
साफ है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की परिवार के बल पर पार्टी चलाने की कोशिश सफल नहीं हो पा रही है। राहुल गांधी को वर्ष 2012 के बाद से ही भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन चुनावों में लगातार खराब प्रदर्शन के कारण यूपीए के नेताओं ने राहुल को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में खारिज करना शुरू कर दिया। ऐसे में प्रियंका को आगे बढ़ाया गया, लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव के बाद प्रियंका गांधी को ये दूसरी बड़ी हार मिली है। पंचायत चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन काफी खराब रहा है। यहां तक की पारंपरिक गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी वोटरों ने परिवार को नकार दिया। प्रियंका के आने के बाद भी पार्टी के कुछ खास ना कर पाने से उसके सियासी भविष्य ही सवाल उठने लगे हैं।

परिवारवाद के साये में पार्टी
सोनिया गांधी ने भले ही कांग्रेस पर अपनी लगाम कस दी हो, लेकिन आज स्थिति ये है कि पार्टी परिवारवाद के साये में पूरी तरह घिर चुकी है। अवसर की तलाश में युवा नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। वंशवाद की राजनीति के इस ढांचे में कांग्रेस के अनुभवी नेता भी सरेंडर कर चुके हैं। नेहरू-गांधी परिवार इनके दिमाग पर राज करे, इसे शायद ये अपनी नियति मानकर चलते हैं। क्योंकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता अतीत में नेहरू-गांधी परिवार के कदम के विरोध में आवाज उठाने वाले नेताओं का हश्र देख चुके हैं।

2022: विधानसभा चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ। पांच राज्यों के कुल 690 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस 54 सीटों पर सिमट गई है। इन राज्यों के चुनावों में केवल 7.8 प्रतिशत सीटें ही कांग्रेस को मिलीं। कांग्रेस को पंजाब में आम आदमी पार्टी ने जबरदस्त तरीके से हराया। उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भी पार्टी का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा। उत्तर प्रदेश में 2.3 प्रतिशत के वोट शेयर के साथ सिर्फ दो सीटें जीतने में सफल रही।

2019: 52 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस
मतदाताओं का कांग्रेस से विश्वास उठ चला रहा है। कांग्रेस लोकसभा में नेता विपक्ष बनने लायक पार्टी भी नहीं बची है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ 52 सीटों पर संतोष करना पड़ा। आज पार्टी की हालत ये हो गई है कि पुराने नेता भी किनारा करने लगे हैं। लगातार मिल रही हार के बाद अब तो पार्टी की अस्मिता पर सवाल उठने लगा है।

2018: हार से नए साल का स्वागत
साल 2018 भी कांग्रेस के लिए शुभ साबित नहीं हुआ। नए साल में पूर्वोत्तर में भी पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए राहुल गांधी ने पूर्वोत्तर में ताबड़तोड़ कई रैलियां की, लेकिन यहां कामयाब नहीं हो सके। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ा।

2017 में सात में से छह राज्यों में शिकस्त
वर्ष 2017 में सात राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों ने भी राहुल गांधी की पोल खोल दी। यूपी, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को भारी हार मिली। पंजाब में जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह की विश्वसनीयता और मेहनत की हुई। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चमत्कारिक जीत और कांग्रेस की अब तक की सबसे करारी हार के रूप में हमारे सामने है। सवा सौ साल से भी किसी पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि देश के उस प्रदेश में जहां कभी उसका सबसे बड़ा जनाधार रहा हो, वहीं पर, उसे 403 में से सिर्फ 7 सीटें मिलती हों। दूसरी ओर इन चुनावों में भी राहुल के मुकाबले अखिलेश एक युवा नेता के तौर पर जनता के सामने उभरकर आए। अखिलेश में लोगों ने राहुल के मुकाबले अधिक उम्मीद देखी जबकि राहुल अपने भाषण की शैली आज भी पुराने ढर्रे की अपनाए हुए हैं। न तो उनके भाषण में कोई तीखापन है और नही वे जनता को कोई विजन ही दे पाए हैं।

2015-16 में मिली जबरदस्त हार
2015 में महागठबंधन के चलते बिहार में जीत मिली, लेकिन दिल्ली में तो सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बनी। इस स्थिति में अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस पार्टी कोमा में चली गई है। दरअसल कांग्रेस ने सिर्फ बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही सबसे बड़ा काम मान लिया है। इस कारण देश की जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस ने कोई खास सबक नहीं सीखा। उल्टे राहुल गांधी अपने फटे कुर्ते के प्रदर्शन की बचकानी हरकतें करते रहें, लेकिन उन्हें कोई रोकने तो दूर, टोकनेवाला भी नहीं मिला।

2014 में 44 सीटों पर सिमट गई
दरअसल कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है, लेकिन वह वंशवाद और परिवारवाद के चक्कर में इस विश्लेषण की ओर जाना ही नहीं चाहती है। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित कर दी गई है और युवा नेतृत्व के नाम पर राहुल को थोप दिया गया है। 2014 में पार्टी की किरकिरी हर किसी को याद है। जब 44 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही पार्टी प्रमुख विपक्षी दल तक नहीं बन पाई। इसी तरह महाराष्ट्र व हरियाणा से सत्ता गंवा दी। यही स्थिति झारखंड और जम्मू-कश्मीर में रही जहां करारी हार मिलने से पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। पिछले पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में असफल रहे हैं।

2012 में कांग्रेस की जबरदस्त हार
कांग्रेस की हालत खराब होती जा रही है। लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। दरअसल वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत बनकर उभरी तो यूपी से 21 सांसदों के जीतने का श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी खुले शब्दों में कहा कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं, लेकिन राहुल को नेतृत्व दिये जाने की बात ही चली कि पार्टी के बुरे दिन शुरू हो गए। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के खाते में महज 28 सीटें आई। वहीं पंजाब में अकाली-भाजपा का गठबंधन होने से वहां दोबारा सरकार बन गई। ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ा गया। दूसरी ओर गोवा भी हाथ से निकल गया। हालांकि हिमाचल और उत्तराखंड में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बन तो गई, लेकिन वह भी हिचकोले खाती रही। इसी साल गुजरात में भी हार मिली और त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार हुई।

'बीजेपी दशकों तक रहेगी मजबूत, मोदी की ताकत का अंदाजा नहीं लगा पा रहे राहुल गाँधी': प्रशांत किशोर

2024 में होने वाले लोक सभा चुनाव से पहले ही चुनावी रणनीतिकार और इंडियन पालिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) के प्रमुख प्रशांत किशोर के एक बयान ने सियासी गलियों में बड़ा धमाका किया है। प्रशांत किशोर ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी का दबदबा बना रहेगा, बीजेपी आने वाले कई दशकों तक राजनीति में मजबूत ताकत बनी रहेगी। जिस तरह से 40 साल पहले तक कांग्रेस सत्ता का केंद्र रही, उसी तरह भाजपा भी सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी। चाहे चुनाव हारे या जीते।

अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए प्रशांत किशोर ने ये बात गोवा में तृणमूल कांग्रेस के एक चुनाव कार्यक्रम के दौरान कहीं। गोवा संग्रहालय में किशोर ने कहा, “इस जाल में बिलकुल मत फँसिए कि लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज हैं और उन्हें सत्ता से बाहर कर देंगे। हो सकता है लोग मोदी को सत्ता से बाहर कर भी दें, लेकिन भाजपा अभी कहीं नहीं जा रही है। आपको इससे अगले कई दशकों तक लड़ना होगा। जिस तरह से 40 साल पहले तक कांग्रेस  सत्ता का केंद्र रही, उसी तरह भाजपा भी चाहे हारे या जीते, वह सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी। एक बार जब कोई राष्ट्रीय स्तर पर 30 फीसदी वोट हासिल कर लेता है तो इतने जल्दी राजनीतिक तस्वीर से नहीं हटता।”

प्रशांत किशोर ने राहुल गाँधी की समझ पर कमेंट करते हुए कहा, “इस मामले में राहुल गाँधी के साथ दिक्कत है। शायद उन्हें लगता है कि बस कुछ समय में लोग उन्हें (नरेंद्र मोदी) को सत्ता से हटा देंगे लेकिन ऐसा नहीं होगा। जब तक आप मोदी की ताकत का अंदाजा नहीं लगा लेते, आप उन्हें हराने के लिए कभी भी काउंटर नहीं कर पाएँगे। ज्यादातर लोग उनकी ताकत को समझने में समय नहीं लगा रहे हैं। जब तक आप यह ना समझ जाएँ कि ऐसी कौन सी चीज है जो उन्हें लोकप्रिय बना रही है तब तक आप उनको काउंटर नहीं कर पाएँगे।

किशोर ने कहा, “आप किसी भी कांग्रेस नेता या किसी भी क्षेत्रीय नेता से जाकर बात करें, वे कहेंगे, “बस कुछ समय की बात है। लोग इनसे नाराज हैं। सत्ता विरोधी लहर आएगी और लोग उन्हें सत्ता से बाहर कर देंगे लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा नहीं होगा।”

किशोर ने कहा, “वोटर बेस देखें तो लड़ाई एक-तिहाई और दो-तिहाई के बीच की है। केवल एक तिहाई लोग भाजपा को वोट दे रहे हैं या भाजपा का समर्थन करना चाहते हैं। समस्या यह है कि दो-तिहाई हिस्सा इतना बिखरा हुआ है कि यह 10, 12 या 15 राजनीतिक दलों में विभाजित है और यह मुख्य रूप से कांग्रेस के पतन का कारण है। उन्होंने आगे कहा, “यह इसलिए है क्योंकि कांग्रेस का समर्थन कम हो गया है। 65% जनाधार बिखर गया है। जिससे बहुत सारे लोग और छोटे-छोटे दल बन गए हैं।”

‘सरकारी खजाने से प्रशांत किशोर को वेतन’: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार से माँगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत किशोर को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का ‘प्रधान सलाहकार’ नियुक्त किए जाने के विरोध में दायर याचिका को लेकर मई 6, 2021 को पंजाब सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में प्रशांत किशोर की नियुक्ति और उन्हें सरकारी खजाने से वेतन तथा सुविधाएँ दिए जाने पर आपत्ति जताई गई है।

कुछ समय पहले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने प्रमुख सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया था। पंजाब सरकार की ओर से जारी आदेश में बताया गया था कि प्रशांत किशोर अपनी सैलरी के तौर पर सिर्फ एक रुपया लेंगे। इसके अलावा उन्हें प्राइवेट सेक्रेटरी, पर्सनल असिस्टेंट, डाटा एंट्री ऑपरेटर, एक क्लर्क और दो चपरासी दिए जाएँगे। किशोर को राज्य ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की ओर से वाहन मुहैया कराया जाएगा और उनके आतिथ्य के लिए प्रति माह 5000 रुपए खर्च किए जाएँगे।

कुछ दिन पहले इसी याचिका को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि सीएम को पूरा अधिकार है कि वे जिसे चाहें उसे अपना सलाहकार चुने। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। 

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनाई जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने की। पंजाब सरकार समेत सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब माँगा गया है। याचिकाकर्ता के वकील ने अपनी दलील में कहा कि पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने उनके केस में तथ्यों को ठीक से नहीं सुना और उनकी याचिका खारिज कर दी गई।

इस केस में लभ सिंह और सतिंदर सिंह ने पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में प्रशांत किशोर की प्रधान सलाहकार पद पर नियुक्ति को निरस्त करने की अपील की गई थी।

अपनी याचिका में याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 16(1) का हवाला देते हुए कहा था कि राज्य सरकार के कार्यालय में कोई भी अपॉइंटमेंट, इससे (अनुच्छेद में निहित प्रावधानों) अलग नहीं हो सकता। इस आर्टिकल में हर नागरिक को रोजगार में अवसर की समानता और नियुक्ति का अधिकार है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि राज्य सरकार के लिए ये जरूरी है कि वो ऐसी नियुक्ति के लिए कोई विज्ञापन निकाले, क्योंकि याचिकार्ता समेत भारी तादाद में पढ़े-लिखे समझदार लोग राज्य में बैठे हैं।

याचिका में ये भी कहा गया था कि किशोर की नियुक्ति मुख्यमंत्री के प्रधान सलाहकार पद पर होगी। इस तरह उन्हें कैबिनेट मंत्री का पद मिल जाएगा। उन्हें वेतन और अन्य सुविधाएँ राज्य के खजाने से दिया जाएगा।

बंगाल चुनाव : नंदीग्राम में हार रहीं ममता बनर्जी, खुद प्रशांत किशोर का सर्वे हुआ लीक

                 नंदीग्राम में हार रही ममता बनर्जी, सर्वे हुआ लीक (इसी स्क्रीनशॉट के साथ दावा किया जा रहा)

ममता बनर्जी नंदीग्राम में हारने वाली हैं। खुद प्रशांत किशोर का सर्वे लीक हो गया है। – ये दोनों लाइन लीक हुए सर्वे के स्क्रीनशॉट के साथ सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है।

I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी) के सर्वे का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है। नंदीग्राम में ममता बनर्जी के हारने के अलावा बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे फेज में भाजपा के आगे बढ़ने (30 में से 23 सीटों पर BJP की जीत) को लेकर भी दावे किए जा रहे हैं। यह सब कुछ उसी लीक हुए स्क्रीनशॉट में दिख रहे आँकड़ों को आधार पर किया जा रहा है।

नंदीग्राम में ममता की हार: दावे और प्रतिक्रिया

ममता बनर्जी नंदीग्राम में हारने वाली हैं – इसको लेकर सोशल मीडिया पर जो स्क्रीनशॉट शेयर किया जा रहा है, उससे एकदम अलग एक स्क्रीनशॉट को फेक बताते हुए 29 मार्च को तृणमूल कॉन्ग्रेस ने एक ट्वीट किया था।

तृणमूल के अनुसार भाजपा के लोग फेक खबरों को फैला रहा हैं। तब उन्होंने उस दिन के स्क्रीनशॉट को फेक बताया था। प्रशांत किशोर की I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी) ने तृणमूल के इस ट्वीट को रिट्वीट किया था।

ममता की नंदीग्राम में हार, नए दावे का क्या?

सबसे ऊपर जो दो ट्वीट में ममता बनर्जी के नंदीग्राम हारने और बंगाल चुनाव के दूसरे फेज में भाजपा के आगे बढ़ने को लेकर दावे किए जा रहे हैं, उस पर अभी तक TMC या I-PAC की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। जिस पर प्रतिक्रिया आई थी, वो स्क्रीनशॉट भी अलग है।
जब तक तृणमूल कॉन्ग्रेस या खुद प्रशांत किशोर की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आती है, तब तक इस दावे को झुठलाना आसान नहीं – यह पूरी तरह सच भी हो सकता है और पूरी तरह झूठ भी।

लॉकडाउन के बीच कार्गो विमान से कोलकाता पहुॅंचे प्रशांत किशोर

ममता बनर्जी- प्रशांत किशोर
पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर कोरोना से जुड़े तथ्यों में हेरफेर करने और लॉकडाउन के कायदों का पालन नहीं करवाने के आरोप लग रहे हैं। अब ममता बनर्जी पर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को चोरी-छिपे कार्गो विमान के जरिए कोलकाता लाने के आरोप लगे हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार लॉकडाउन के बीच प्रशांत किशोर कार्गो प्लेन से कोलकाता पहुँचे हैं। इसे लेकर विपक्षी पार्टियों ने प्रशांत किशोर के साथ ममता सरकार पर निशाना साधा है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत किशोर कार्गो फ्लाइट से उसी वक़्त कोलकाता पहुँचे जब मोदी सरकार की ओर से राज्य में लॉकडाउन की स्थिति का जायजा लेने के लिए इंटर-मिनिस्ट्रियल सेंट्रल टीम (IMCT) पहुँची। बताया जा रहा है कि टीएमसी सांसद और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का मैसेज मिलते ही प्रशांत किशोर दिल्ली से पश्चिम बंगाल के लिए रवाना हो गए थे।
आधी रात को कोलकाता पहुँचे प्रशांत का अभिषेक ने अपने दफ्तर में स्वागत किया और फिर केन्द्र सरकार द्वारा पूछे जा रहे सवालों को लेकर चर्चा भी की। जानकारी के मुताबिक ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर को सोशल मीडिया, विपक्षी पार्टी और मीडिया चैनल्स के आरोपों पर जवाबी रणनीति बनाने की जिम्मेदारी दी है।
इस बात की जानकारी मिलते ही विपक्षी पार्टियों ने ममता के साथ प्रशांत किशोर को भी घेरना शुरू कर दिया है। जेडीयू नेता अजय आलोक ने कहा कि प्रशांत किशोर को शर्म आनी चाहिए। लॉकडाउन का ऐसा उल्लंघन नहीं देखा गया। कार्गो प्लेन से जरूरी सामान जाते हैं, अब पीके कैसे कार्गो में चले गए।
अजय आलोक ने इस लेकर ट्विटर पर एक ट्वीट भी किया और कटाक्ष करते हुए कहा कि पीके अब ब्यूटीशियन भी बन गए है, जो कि शायद ममता बनर्जी का चेहरा चमकाने कोलकाता गए हैं।

बीजेपी प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा कि प्रशांत किशोर लॉकडाउन में कार्गो फ्लाइट में छुपकर कोलकाता गए। बंगाल में लॉकडाउन की स्थिति सॅंभालने के लिए उन्हें बुलाया गया। निखिल आनंद ने बंगाल सरकार को फेल बताते हुए कहा कि ये समय विशेषज्ञ को बुलाने का है, झूठा इमेज मेकओवर करने वाले को नहीं।
देश में जारी लॉकडाउन के बीच पश्चिम बंगाल में लॉकडाउन का पूरी तरह से पालन न होना, राशन वितरण में अनियमितताओं के आरोप लगना, पर्याप्त जाँच न होना आदि बातों को लेकर इन दिनों ममता सरकार और केन्द्र के बीच ठनी हुई है। केन्द्र द्वारा पश्चिम बंगाल में भेजी गई टीम के साथ राज्य सरकार द्वारा सहयोग न करने पर यह विवाद और भी गहरा गया है।
अवलोकन करें:-

इससे पहले पश्चिम बंगाल में लगातार हो रहे लॉकडाउन के खुलेआम उल्लंघन पर केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा एक पत्र लिखे जाने की बात सामने आई थी। राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को लिखे गए इस पत्र में लॉकडाउन का पालन नहीं होने पर सख्त आपत्ति जताई गई थी। साथ ही कहा गया था कि पश्चिम बंगाल में गैर जरूरी चीजों की दुकानें खोलने और मजहबी जमावड़े के लिए इजाजत दिए जाने की सूचना मिली है और राशन प्रशासन की बजाए नेता बॉंट रहे हैं।