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सनातन है तो भारत है, उसकी छाया में ही सब सुरक्षित हैं… जहाँ कम हुआ सनातन का प्रभाव वहाँ बँध गया सेकुलरिज्म का बोरिया-बिस्तर


डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र,

सनातन धर्म के विरुद्ध विपक्षी नेताओं के बयानों की गाली-गलौज भरी बौछारें देखकर पुरानी हिन्दी फिल्म का चर्चित गीत ‘अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है’ याद आता है। दुनिया की यह आदत रही होगी किन्तु भारतवर्ष की सनातन संस्कृति में उसकी मूलभूत विशेषता सहिष्णुता के कारण यह आदत कभी नहीं रही।

गुलामी के काले दिनों में अंग्रेजों ने भारतवर्ष के धर्म, संस्कृति, शिक्षा आदि समस्त अस्मिता सूचक महान संदर्भों के विरुद्ध षड्यन्त्रपूर्वक विष उगलना प्रारम्भ किया। उनके इसी विष को यहाँ के कम्युनिस्टों ने शिक्षा, साहित्य और कला के धरातल पर स्वतंत्र भारत में निरन्तर फैलाया और आज यही जहर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए विपक्ष के कुछ नेता उगल रहे हैं।

सनातन धर्म, समानता के खिलाफ है, वह कुष्ठ रोग की तरह है, उसे डेंगू-मलेरिया और कोरोना की तरह मिटाना होगा- आदि अपमान सूचक वाक्य देश की फिजा में गूँजकर देश-विदेश में बसे एक अरब से अधिक सनातनी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करके उनकी सहिष्णुता का खुला मजाक उड़ा रहे हैं। उन्हें समर्थन देने वाले इसे अभिव्यक्ति की आजादी कह रहे हैं और इसका समर्थन कर रहे हैं।

यदि स्वयं को चर्चा में लाने और मीडिया में छाने के लिए ऐसी अनर्गल बयानबाजी अभिव्यक्ति की आजादी है तो इस पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाने पर विचार करना आज की बड़ी आवश्यकता बन गई है, क्योंकि ऐसे बयानों से विपक्ष को सत्ता मिले या न मिले किन्तु सामाजिक समन्वय, सद्भाव और सहयोग अवश्य क्षत-विक्षत होगा। समाज में संघर्ष बढ़ेगा। इसलिए ऐसे नफरत भरे बयानों पर नियंत्रण अनिवार्य है।

सनातन भारतवर्ष का अपना धर्म है। उसके सिद्धान्त शाश्वत हैं और न केवल भारतवर्ष के लिए अपितु समस्त विश्व के कल्याण के लिए संकल्पित हैं। हजारों वर्ष पूर्व सनातन धर्म ने ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का उदार भाव व्यक्त किया और आज भी वह अपने धार्मिक अनुष्ठानों की समापन वेला में ‘विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सद्भावना हो‘ – जैसे उद्घोष गुंजित कर अपनी मूल्य चेतना को स्वर देता है। प्रकृति के साथ उसकी गहरी रागात्मकता है जो नदी, सागर, पर्वत, वन, बादल, भूमि, वायु आदि में देवत्व का दर्शन कराती है और प्राकृतिक पर्यावरण की शुद्धता के लिए आवश्यक वातावरण का निर्माण करती है।

सनातन धर्म के अद्वैत दर्शन ने मनुष्य के साथ-साथ जीवमात्र में परम सत्ता का दर्शन देकर पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों तक की रक्षा का प्रावधान किया है। सनातन धर्म का प्रतिनिधि ग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता ब्राह्मण, गाय हाथी, कुत्ता, चाण्डाल सब में एक ही ईश्वर की उपस्थिति निर्देशित कर जीवमात्र की समानता का शंखनाद करता है। वैदिक युग से लेकर आज तक उसका प्रवाह निर्बाध रहा है।

शास्त्र और शस्त्र सनातन धर्म की दो सशक्त भुजाएँ हैं। राम, कृष्ण और शिव उसके प्रतीक आदर्श हैं। भारत में हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक फैले छोटे-बड़े करोड़ों मंदिर, चैरे, चबूतरे उसके ऊर्जा केन्द्र हैं और असंख्य साधु-संन्यासी उसके संरक्षक हैं। उसे मिटाने की बात करना दिन में सपने देखने जैसा है।

सनातनी धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगाने में अग्रणी हैं। शकों और हूणों जैसे बर्बर आक्रान्ताओं पर विजय प्राप्त करने वाला सनातन धर्म गजनवी, गोरी, तैमूर, औरंगजेब, नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे आक्रान्ताओं से टकराकर भी नहीं टूटा। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ आए पादरियों के कुचक्र और प्रलोभन उसे लुभा न सके। हजारों वर्ष के संघर्ष के बाद भी उसकी विजय-पताका सबसे ऊँची है। शिकागो के सर्वधर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द के व्याख्यान की सर्वस्वीकृति उसकी साक्षी है।

सनातन दूर्वा है। उसमें दूर्वा की तरह झुककर पैरों तले रौंदे जाने पर भी अपने अस्तित्व को बचा ले जाने की अद्भुत क्षमता है। विधर्मी आक्रमणों और कुटिल षड्यंत्रों की कड़ी धूप में सूख जाने पर भी वह अवसर पाकर हरी हो उठती है।

सनातन अमरवेल है। उसे अपने विस्तार के लिए कभी राजसिंहासन का सहारा नहीं लेना पड़ा। वह राजपुत्रों और राजवंशों से पोषण पाकर नहीं फैली। उसे अपने प्रसार के लिए आक्रमणकारी सैनिकों और सेवा का आडम्बर रचते प्रलोभनकारी व्यापारियों का सहारा नहीं लेना पड़ा। सनातन धर्म की अमरवेल अपने उदार चिन्तन और मानवीय मूल्यों के कारण बिना आश्रय के ही फल-फूल रही है। विश्व में प्रतिष्ठित हो रहे नए मंदिर इसके प्रमाण हैं। सऊदी अरब जैसे इस्लामिक देश में मंदिर निर्माण सनातन की नई प्रतिष्ठा है। इस्कॉन द्वारा स्थापित कृष्ण मंदिरों की बढ़ती संख्या सनातन धर्म की अमर बेल का नूतन विकास है।

सनातन धर्म अक्षयवट है, जिसकी छाया में मनुष्यता सुरक्षित है। उसकी जड़ें जितनी गहरी हैं, उसका विस्तार आकाश में भी उतना ही अपार है। उसके आदर्श काल्पनिक नहीं, यथार्थपरक हैं। वह जड़ अथवा स्थिर नहीं है, गतिमान और परिवर्तनशील है। उसमें अपने अंदर समय के साथ आने वाली विकृतियों को स्वयं दूर करने की अद्भुत क्षमता है। गति, परिवर्तन, परिष्करण, संशोधन उसके मूलतत्व हैं। इसलिए वह चिर पुरातन और नित नवीन है। उसकी पृष्ठभूमि में विराट इतिहास है और उसके समक्ष अनन्त भविष्य। सनातन मनुष्य की रचनात्मक प्रज्ञा का अक्षय प्रवाह है। नकारात्मक नारों का भ्रामक प्रचार उसे रोक नहीं सकता।

विगत शताब्दियों में परतंत्रता जनित प्रभावों के कारण सनातन में आई छुआछूत, पर्दा, बालविवाह, आदि विकृतियों पर विजय पाने की ओर सनातन का विजय-रथ निरन्तर अग्रसर है। सनातन को कोसकर समाज में जहर घोलने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों, समाज सुधारकों और नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि अब से लगभग पंद्रह सौ वर्ष पूर्व सम्राट हर्षवर्धन के समय में भारत भ्रमण पर आने वाले विदेशी चीनी यात्री हवेनसांग ने भारतीय समाज की जिस सुख, शान्ति, समृद्धि का उल्लेख किया है, वह सनातन चिन्तन परम्परा की ही देन है।

भारत सोने की चिड़िया सनातन व्यवस्था की छाया में ही रहा। अयोध्या नरेश सत्यवादी हरिश्चन्द्र को काशी के डोम ने खरीदा था, इस संदर्भ से भी प्राचीन भारत में सनातन व्यवस्था में दलित समझे जाने वाले वर्ग की आर्थिक स्थिति का अनुमान करना चाहिए। लगभग सौ वर्ष पूर्व सवर्ण वर्ग में जन्मे महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना कर सनातन धर्म में संशोधन करते हुए अस्पृश्यता के अभिशाप को दूर करने की दिशा में देशव्यापी सार्थक प्रयत्न किए।

कथित ऊँची जातियों में जन्म लेने वाले वीर सावरकर, महात्मा गाँधी, डॉ. हेडगेवार, प. श्रीराम शर्मा आचार्य आदि ने सनातन में आए सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए गंभीर प्रयत्न किए, जिनका शुभ परिणाम स्वतंत्र भारत में धार्मिक, सामाजिक और संवैधानिक धरातल पर आज सबके सामने हैं। मंदिरों के द्वार सबके लिए खुले हैं। आज चाय की गुमठियों, होटलों और चाट के ठेलों पर खाने-पीने का सामान बनाने वालों की जाति नहीं पूछी जाती। सामाजिक समरसता के इन प्रयत्नजनित सकारात्मक परिवर्तनों ने सनातन को नई शक्ति दी है। जिन गाँवों-कस्बों में अभी भी हठपूर्वक छुआछूत जैसे अपराध यदि कुछ लोग कर रहे हैं तो उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाहियाँ हो रही हैं। जितना घना अँधेरा कल तक था, उतना आज नहीं है। जो आज बचा है वह कल नहीं रहेगा।

किंतु सामाजिक समरसता के इस राजघाट का निर्माण दलित और सवर्ण की राजनीति करने वाले कुछ नेताओं को रास नहीं आ रहा है। वह उनकी आँख की किरकिरी बन रहा है, क्योंकि इसके कारण उन्हें सत्ता स्वयं से छिटकती दिख रही है। उनकी बौखलाहट बढ़ रही है और वे वाणी का विवेक और संयम खोकर स्वयं को ही कोस रहे हैं। सनातन को कोसने वालों का मूल भी सनातन में ही है, क्योंकि सनातन ही भारत की पहचान है। संसार के अन्य देश भारत की सनातन सांस्कृतिक विरासत यहाँ के मठों, मंदिरों, धर्म ग्रंथों, पर्व-उत्सवों, राम-कृष्ण आदि महापुरुषों से ही जानते हैं।

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सनातन है तो भारत है। सनातन नहीं तो भारत नहीं, भारत की पहचान नहीं। सनातन की छाया में ही भारत में अन्य धर्म सुरक्षित रह सकते हैं। विगत सात दशकों का इतिहास साक्षी है कि पाकिस्तान और बंगलादेश में सनातन के अल्पमत में आते ही वहाँ अन्य धर्मों के अनुयायी सुरक्षित नहीं रहे। अफगानिस्तान में सनातन पूरी तरह निर्मूल हुआ है तो वहाँ बौद्ध, जैन और सिख आदि भी नहीं बचे हैं। जिस धर्म-निरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव की दुहाई हमारे विपक्षी नेता देते हैं उसकी सुरक्षा सनातन की पुष्टि में ही है, उसके निर्मूलन में नहीं।

(लेखक शासकीय नर्मदा महाविद्यालय, नर्मदापुरम्, मध्य प्रदेश में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं)

                                                                                            (साभार)

अल्लाह और ओम : मौलाना मदनी ने फैलाया प्रपंच, अल्ला का संस्कृत कनेक्शन बता शंकराचार्य ने दी धोबी पछाड़

                                              अल्ला पर शंकराचार्य निश्चलानंद ने दिया ज्ञान (फोटो साभार दैनिक भास्कर)
दिल्ली में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अधिवेशन में मौलाना अरशद मदनी ने अल्लाह और ओम को एक बताकर जो विवाद कुछ दिन पहले खड़ा किया, वह अभी भी थमा नहीं है। 22 फरवरी, 2023 को वाराणसी में अल्लाह और ओम को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि अल्ला (Alla) संस्कृत भाषा का शब्द है। उन्होंने संदर्भ सहित इसकी व्याख्या की। इस विवाद से पहले भी स्वामी निश्चलानंद सरस्वती इस बारे में विस्तार से समझा चुके हैं। 

दिल्ली के रामलीला मैदान में मौलाना अरशद मदनी द्वारा अल्लाह और ओम में समानता बता क्या सच्चाई को उजागर करने की रौशनी को कट्टरपंथियों के भय से समझने और पहचानने की कोशिश नहीं की जा रही। मदनी ने कोई हैरान करने वाली बात नहीं बोली है, फेसबुक पर सोशल मीडिया पर प्रचलित चित्र जिसे मेरे एक मित्र ने प्रेषित किया। अब संलग्न इस चित्र में अंकित शब्दों की गूढ़ता को समझिये यानि महंत धीरेन्द्र शास्त्री के बढ़ते प्रभाव की बौखलाहट ने ही उस सत्य को बोलने को विवश कर दिया, जिसे कट्टरपंथी सामने नहीं आने दे रहे थे, यानि उन्हीं के श्रीमुख से कहलवा दिया। यही तो श्री बजरंगबली का चमत्कार है। यही कारण है कि छद्दम धर्म-निरपेक्षों ने संस्कृत को ज्यादा महत्व नहीं दिया। अक्सर अपने लेखों में अल्लाह और 786 का हिंदुत्व यानि सनातन से सम्बंधित होने का उल्लेख करता रहा हूँ। लेकिन मदनी को लेकर टीवी पर होती चर्चाओं ने मेरी जानकारी में नमाज और नमस्ते के बीच समानता होने का ज्ञानवर्धन कर दिया। मदनी ने जिस Pandora Box को खोला है, अक्ल से पैदल कट्टरपंथियों की समझ से शायद बाहर है।

खैर, प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब पत्रकारों ने शंकराचार्य से मौलाना मदनी के दावों को लेकर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि अल्ला शब्द संस्कृत का है। उनके अनुसार जो लोग संस्कृत व्याकरण के जानने वाले हैं, उन्हें यह ज्ञात होगा। उन्होंने लघुकौमुदी (लघुसिद्धान्तकौमुदी) नामक संस्कृत व्याकरण पुस्तक पढ़ने की सलाह देते हुए कहा कि अल्ला शब्द संस्कृत का है, शक्ति और मातृ शक्ति के लिए इसका प्रयोग होता रहा है।

नीचे जो वीडियो है, उसमें यह प्रश्न और उत्तर 3 मिनट 33 सेकेंड से सुना जा सकता है। इसमें आगे स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने जोर देते हुए कहा कि सभी के पूर्वज सनातनी वैदिक आर्य हिंदू ही थे। उन्होंने बृहदारण्यक उपनिषद् का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्यों की उत्पत्ति मनु-शतरूपा द्वारा हुई है।

अल्लाह (Allah) और अल्ला (Alla) शब्द का विवाद नया नहीं है। इस विवाद के पहले भी लोग शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती से अल्ला शब्द और अल्लोपनिषद (अल्ला उपनिषद) को लेकर सवाल पूछ चुके हैं। उन्होंने तब भी उसका जवाब दिया था। नीचे के वीडियो में 40 वें सेकेंड से शंकराचार्य अमरकोष और लघुसिद्धान्तकौमुदी का जिक्र करते हुए कह रहे हैं कि व्याकरण के इन पुस्तकों में अल्ला शब्द शक्ति के पर्यायवाची के लिए उपयोग किया गया है।

वहीं 1 मिनट के आगे शंकराचार्य निश्चलानंद उपनिषदों पर बात करते हैं। यहाँ शंकराचार्य बताते हैं कि मुख्य उपनिषदों के अलावा चौखम्बा प्रकाशन ने उपनिषद संग्रह में अल्लोपनिषद नाम से एक उपनिषद का प्रकाशन किया है, जिसमें नमाज ज्यों का त्यों है। शंकराचार्य जब यह कह रहे होते हैं तो उनके मुख पर भाव परिवर्तित हो जाते हैं, चेहरे पर स्पष्ट तौर से हल्की मुस्कान देखी जा सकती है। अल्लोपनिषद और नमाज का जिक्र सुनते ही सभा में बैठी भीड़ की ओर से एक हल्की हँसी भी सुनी जा सकती है।

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मान्यता प्राप्त 108 उपनिषदों और 13 प्रमुख उपनिषदों में अल्लोपनिषद शामिल नहीं है। स्पष्ट है कि शंकराचार्य ने अल्लोपनिषद और उसमें नमाज का जिक्र करते समय व्यंग्यात्मक भाव में जवाब दिए थे। वीडियो में आगे उन्होंने अल्ला (Alla) शब्द की वही व्याख्या की, जो व्याख्या उन्होंने दो दिन पहले 22 फरवरी 2023 को की। जाहिर है शंकराचार्य झूठ और प्रपंच का जवाब उसी शैली में दिए। मीडिया और सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसे अल्लाह (Allah) से जोड़ कर देखा, भ्रमित होकर प्रतिक्रिया भी दी।

मुस्लिम टीचर ने गीता कचरे में फेंका, शिकायत पर SP ने कहा था – किसी और स्कूल में नाम लिखवा लो… अब दबाव में FIR दर्ज

बिहार के गया जिले में चौथी कक्षा में पढ़ने वाले एक बच्चे के बैग से श्रीमगभगवद्गीता को डस्टबिन में फेंकने और हिंदू देवी-देवताओं को गाली देने वाली मुस्लिम टीचर सदफ पर कार्रवाई करते हुए उसे स्कूल से निकाल दिया गया है। इस मामले में पीड़ित छात्र के पिता राहुल सिंह ने डेलहा थाने में आरोपित शिक्षिका के खिलाफ FIR दर्ज करवाई है। पीड़ित के पिता ने शिक्षिका के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

एफआईआर कॉपी के मुताबिक, चौथी कक्षा के पीड़ित छात्र के पिता राहुल सिंह ने शिकायत में पुलिस को बताया है कि उनका पुत्र हमेशा अपने बैग में श्रीमदभगवद गीता और साथ में जाप माला रखता है। दोपहर में मध्यांतर के वक्त वो उसका पाठ करता है। 9 दिसंबर 2021 को उसके स्कूल की हिंदी की शिक्षिका सदफ ने बैग की जाँच की और जबरदस्ती श्रीमदभागवद गीता और जाप माला को निकाल कर डस्टबिन में फेंक दिया। शिक्षिका ने ये भी कहा कि तुम्हारे (हिंदुओं के) सभी ‘देवी-देवता कुत्ते-कुतिया’ की तरह हैं।

                                                   पीड़ित बच्चे के पिता द्वारा दर्ज करवाई गई FIR

बच्चे के पिता ने आगे आरोप लगाया कि शिक्षिका ने उनके बच्चे को गाली देते हुए धमकी दी कि अगर उसने किसी को ये बात बताई तो उसकी खाल उधेड़ देगी। उन्होंने शिक्षिका सदफ पर जानबूझ कर हिंदुओं की पवित्र ग्रंथ का अपमान करने का आरोप लगाया है। और इसके खिलाफ कार्रवाई करने का अनुरोध किया है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए डेलहा थाने के एसएचओ ने बताया कि पुलिस ने इस संबंध में केस दर्ज कर लिया है। लेकिन अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं की गई है। पुलिस अधिकारी ने कहा कि अभी तक उन्हें शिक्षा विभाग की रिपोर्ट नहीं मिली है। अब पुलिस और शिक्षा विभाग की जाँच साथ-साथ चलेगी। एसएचओ ने यह भी बताया कि आरोपित टीचर सदफ कॉन्ट्रैक्ट पर थी और उसे स्कूल से निकाल दिया गया है।

इससे पहले छात्र के पिता राहुल सिंह ने ऑपइंडिया को बताया था, “पहले भी मेरे बेटे को स्कूल में चिढ़ाया जाता था। इसकी मैंने मौखिक शिकायत की थी। मेरे बेटे के साथ जो कुछ किया गया, उसकी शिकायत मैंने उसी रात स्थानीय डेलहा थाना प्रभारी से की। उन्होंने मेरी शिकायत भी लेने से मना कर दी थी। अगले दिन मैं गया के पुलिस अधीक्षक से मिला। उन्होंने कहा कि अगर इतनी दिक्कत है तो आप अपने बेटे का नाम किसी और स्कूल में क्यों नहीं लिखवा लेते? इसी के साथ उन्होंने मुझ से ही सवाल किया कि स्कूल में गीता और माला ले जाने की क्या जरूरत है? पुलिस अधीक्षक गया ने मेरी एप्लिकेशन ले ली और कहा कि हम 4-5 दिन बाद जाँच कर के बताएँगे कि क्या हुआ।”

गंभीर बात यह है कि केंद्रीय विद्यालय-1 में पीड़ित छात्र को कलमा पढ़ने के लिए भी मजबूर करने के आरोप लगाया गया है। यह भी कहा गया है कि ये सब चीज स्कूल में अमीना खातून को प्रभारी प्राचार्य बनाए जाने के बाद शुरू हुआ है।