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उत्तराखंड : मंगलौर से समझिए मुस्लिमों का वोटिंग पैटर्न: इस विधानसभा से आज तक कोई हिन्दू नहीं जीता ; जबकि मोदी सरकार की योजनाओं का फायदा उठाने वाले अधिकांश मुस्लिम ही हैं

चुनावी रैलियों से लेकर टीवी पर परिचर्चाओं में मीडिया से लेकर मुस्लिम समर्थक बीजेपी पर आरोप लगाते नज़र आते हैं कि बीजेपी मुस्लिम को टिकट नहीं देती, मंत्री नहीं बनाती। लेकिन कोई यह नहीं कहता कि मुसलमान बीजेपी उम्मीदवार को वोट क्यों नहीं देता? हकीकत यह है कि 2014 में मोदी सरकार बनने से आज तक मोदी सरकार ने जितनी भी योजनाएं लागु की हैं, उनके अधिकांश लाभार्थी मुसलमान ही हैं। मुसलमानों के इस रवैये को देख अब चर्चा है कि इन लाभार्थियों की आर्थिक जाँच करवानी चाहिए। दुरूपयोग करने वालों से ब्याज सहित वसूली की जाए, और victim card खेलने वालों पर और अधिक सख्ती से पेश आया जाए। 
13 जुलाई, 2024 को देश भर में हुए विधानसभा उपचुनावों के नतीजे आए। इसमें उत्तराखंड की दो सीटें भी शामिल थी। एक सीट हरिद्वार जिले की मुस्लिम बहुल मंगलौर सीट थी जबकि दूसरी चमोली सीट की बद्रीनाथ सीट थी। इन दोंनो सीट पर कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की। इस जीत को राहुल गाँधी की रणनीति का चमत्कार बना कर प्रचारित किया जा रहा है। हालाँकि, इस बीच मंगलौर सीट पर भाजपा की हार मुस्लिमों के विशेष वोटिंग पैटर्न की ओर ध्यान दिलाती है।

2011 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार, मंगलौर लगभग 90% मुस्लिम आबादी वाला शहर है। मंगलौर विधानसभा क्षेत्र में लगबग 45% मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि 20% अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। इंडिया टुडे के अनुसार, मंगलौर विधानसभा में 52,000 मुस्लिम जबकि 18,000 दलित, 14,000 जाट और 8,000 गुज्जर मतदाता हैं।

यह सीट अक्टूबर, 2023 में इसके BSP विधायक सरवत करीम अंसारी के निधन के बाद खाली हो गई थी। मंगलौर 10वीं शताब्दी की शुरुआत से ही अस्तित्व में रहा है। इसका नाम चौहान वंश के मंगल सिंह के नाम पर पड़ा था, उन्होंने यहाँ एक मंगल किला बनवाया था। अब यह एक मुस्लिम बहुल शहर है।

हालिया उपचुनाव में, इस सीट पर जीतने वाले कॉन्ग्रेस के काजी मोहम्मद निजामुद्दीन को 37.91% वोट मिले। वहीं दूसरे नंबर पर भाजपा के करतार सिंह भड़ाना रहे, उन्हें 37.4% वोट मिले। इस चुनाव में तीसरे नंबर पर BSP के ओबेदुर रहमान थे, उन्हने 23.4% वोट हासिल हुए।

मंगलौर एक मुस्लिम बहुल सीट है। इसलिए काजी मोहम्मद निजामुद्दीन का जीतना कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है। हालाँकि, अगर यहाँ से सामने आए आँकड़ों पर नजर डाली जाए तो मुस्लिम समुदाय के मतदान पैटर्न के बारे में काफी दिलचस्प जानकारी सामने आती है।

मंगलौर से कभी नहीं हुई गैर मुस्लिम की जीत

2002 से लगातार मंगलौर सीट से कॉन्ग्रेस और बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते आ रहे हैं। 2024 में इस सीट से कॉन्ग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज करने वाले निजामुदीन 2002 में बसपा के उम्मीदवार थे। 2002 में भी काजी निजामुद्दीन ने 40% वोट पाकर जीत दर्ज की थी।
इस चुनाव में दूसरे नम्बर पर कॉन्ग्रेस के सरवत करीम अंसारी रहे थे। उन्हें 27.5% वोट मिले थे। 2007 में भी यही सिलसिला दोहराया गया था और निजामुद्दीन ने अंसारी को पटखनी दी थी। इस बार निजामुद्दीन को 37% वोट मिले थे। इस चुनाव में दूसरे नंबर पर रालोद के कुलवीर सिंह रहे थे।
2012 में काजी निजामुद्दीन ने बसपा छोड़ दी और कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। सरवत करीम अंसारी बसपा में आ गए और उन्होंने 2012 चुनाव में निजामुद्दीन को पटखनी दे दी। सरवत करीम अंसारी को इस चुनाव में 34.3% वोट मिले जबकि काजी निजामुद्दीन 33.07% वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे।
2017 में काजी निजामुद्दीन ने अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा। इस बार उन्हें 38.5% वोट मिले जबकि उनके प्रतिद्वंदी सरवत करीम अंसारी 35.2% के साथ दूसरे नम्बर पर रहे। 2022 में सरवत करीम अंसारी ने जोरदार वापसी की और निजामुद्दीन को पटखनी दे दी। लेकिन 2023 में अंसारी का निधन हो गया और यह सीट खाली हो गई।
इसके बाद हुए 2024 उपचुनाव में भाजपा ने यहाँ से करतार सिंह भड़ाना को जबकि कॉन्ग्रेस ने निजामुद्दीन को उतारा। बसपा ने इस सीट से उबैदुर रहमान को टिकट दिया। इस चुनाव में निजामुद्दीन को 37.9% जबकि भडाना को 37.4% वोट मिले। यानी कुल मिलाकर कहा जाए तो यहाँ से आज तक गैर मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीत पाया।

कॉन्ग्रेस को मिली जीत, भाजपा को बढ़त

मुस्लिम वोटर की बहुलता वाली इस सीट पर ऐतिहासिल रूप से हमेशा मुस्लिम उम्मीदवार ही जीते हैं। लेकिन इस बार एक बड़ा बदलाव यहाँ देखने को मिल रहा है। भाजपा ने इस बार के उपचुनाव में यहाँ हिंदू उम्मीदवार करतार सिंह भड़ाना को मैदान में उतारा था, जो काजी मोहम्मद निजामुद्दीन से केवल 422 वोटों से हारे।
वहीं BSP के से मैदान में उतारे गए ओबेदुर रहमान को 23.37% वोट मिले। इस प्रकार 2022 के मुकाबले 2024 में BSP वोट प्रतिशत में 13.8% की गिरावट हुई। वहीं दूसरी ओर, भाजपा का वोट प्रतिशत 16.04% बढ़ा। वोटों के इस हस्तांतरण से यह प्रतीत हो सकता है कि BSP का वोट भाजपा को ट्रांसफर हुआ।
इससे पहले मंगलौर में BSP के मतदाता पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट दे रहे थे, इस बार BSP का हिन्दू वोटबैंक भाजपा में ट्रांसफर हुआ। इस वोटबैंक में जाट, गुज्जर और SC जातियाँ शामिल थी। 2024 में ऐसा दूसरी बार हुआ है जब कोई हिन्दू उम्मीदवार दूसरे स्थान पर आया है और उसे अच्छे प्रतिशत में वोट मिले हैं।
इससे पहले किसी हिंदू उम्मीदवार को विधानसभा क्षेत्र में काफी वोट 2007 में मिले थे। 2007 में RLD के चौधरी कुलवीर सिंह को 32.01% वोट मिले थे और वह दूसरे नम्बर पर रहे थे। फिर भी सिंह का वोट प्रतिशत 2024 में भाजपा प्रत्याशी को मिले वोट की तुलना में कम था। भाजपा प्रत्याशी को इस बार जिन्हें 37.4% वोट मिले हैं।
2007 चुनाव में, RLD के कुलवीर सिंह 3393 वोटों से हार गए थे, जबकि 2024 में, भाजपा के हिंदू उम्मीदवार केवल 422 वोटों के अंतर से हारे। वोट प्रतिशत में यह बदलावमंगलौर विधानसभा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बदलाव का संकेत देता है। स्पष्ट है कि यहाँ हिंदू वोट 2007 के बाद पहली बार एकत्रित हो पाया है।

भाजपा ने भी उतारा था मुस्लिम उम्मीदवार, हुई थी करारी हार

मंगलौर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने सिर्फ एक बार ही मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कलीम को अपना उम्मीदवार बनाया था। 2012 के इस विधानसभा चुनाव में, भाजपा उम्मीदवार कलीम को केवल 2,061 वोट मिले थे।
इसी चुनाव में BSP के सरवत करीम अंसारी को 24,706 वोट मिले और वह जीत गए, कॉन्ग्रेस के काजी मोहम्मद निजामुद्दीन 24,008 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे। RLD द्वारा मैदान में उतारे गए हिंदू उम्मीदवार गौरीश चौधरी 19,354 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव में अकेला हिन्दू उम्मीदवार RLD की तरफ से था लेकिन इस दौरान हिन्दू एकजुटता देखने को नहीं मिली थी जो 2024 में देखने को मिली।

मंगलौर के नतीजे से मुस्लिमों के वोटिंग के तरीके भी स्पष्ट हुए

मंगलौर के इस चुनाव से उन लिबरल आलोचकों के मुंह पर ताला लग जाना चाहिए जो लगातार मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बातें करते हैं। मंगलौर के नतीजों ने यह साफ़ कर दिया है कि जब सीट पर मुस्लिम आबादी 40% के निशान को पार कर जाती है, तो यहाँ से हमेशा लगभग मुस्लिम को ही जीत मिलती है। यह मुस्लिमों के उस वोटिंग पैटर्न को स्पष्ट करता है जिसमें वह अपने समुदाय के उम्मीदवार को जिताने के लिए एकजुट हो जाते हैं।
ऐसे में जब मुस्लिम हमेशा मुस्लिम उम्मीदवार को ही वोट करते हैं तो फिर लिबरल और वामपंथी इस बात पर नहीं रो सकते कि हिन्दू समुदाय मुस्लिमों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं देता। यदि मुस्लिम अपने समुदाय के उम्मीदवार के पीछे इकट्ठा हो सकते हैं, तो हिन्दू भी बिलकुल ऐसा ही कर सकते हैं। इसी मामले में उन पार्टियों पर भी मुस्लिम उम्मीदवार ना उतारने का आरोप नहीं लगाया जा सकता जो वोटबैंक के सामने नतमस्तक ना होती हों।
इसके अलावा लगातार इस बात पर प्रश्न उठते हैं कि भाजपा मुस्लिम उम्मीदवार क्यों नहीं देती। भाजपा ने 2012 में इस सीट से मुस्लिम उम्मीदवार को मौक़ा दिया था लेकिन तब उसकी बुरी गत हुई और मुस्लिमों ने ही अपने समाज के उम्मीदवार को वोट नहीं दिया। ऐसे में इससे साफ़ होता है कि मुस्लिम वोटर केवल अपने समुदाय से उम्मीदवार ही नहीं बल्कि वो उम्मीदवार चाहते हैं जो हमेशा उनके ही पक्ष में बोले। ऐसे में यदि कोई पार्टी बिना तुष्टिकरण की राजनीति के मुस्लिम उम्मीदवार उतारती भी है, तो वह भी हार जाएगा।
यह पैटर्न निश्चित रूप से भाजपा के लिए भी सबक है। उनके 2012 के प्रदर्शन और 2024 के प्रदर्शन में अंतर स्पष्ट रूप से इस बात का संकेत है कि हिंदू समुदाय से बनाया गया उम्मीदवार उन्हें अच्छे नतीजे दे देगा लेकिन मुस्लिमों को आगे करने से उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला।
भाजपा ने 2012 में मुस्लिम बहुल सीट पर जीत के लिए मुस्लिम वोट बटोरने की सोची। लेकिन इसका नतीजा सामने आ गया। ना उसे मुस्लिम वोट ही मिले और हिन्दू वोट भी उससे छिटक गया। वहीं जब उन्होंने एक हिंदू उम्मीदवार को मैदान में उतारा, तभी सीट पर में भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों का अभूतपूर्व एकीकरण हुआ।
स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि जनसांख्यिकी परिवर्तन का खतरा मंगलौर के हिंदुओं पर भारी पड़ रहा है और इसीलिए वह इन उपचुनावों में भाजपा के पक्ष में एकजुट हो गए। इसके अलावा, भाजपा ने इस बार करतार सिंह भड़ाना को मैदान में उतारकर अपने जातिगत समीकरणों को भी साध लिया।
मंगलौर उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित है इसलिए, हरियाणा के एक उम्मीदवार ने मंगलौर के हिंदुओं को आकर्षित किया। इसी कारण से उसका हार का अंतर घट कर मात्र 422 वोट रह गया। मंगलौर के परिणामों से यह साफ़ है कि हिंदू एकीकरण के साथ-साथ अगर जाति का मामला सही ढंग से समझा गया तो भाजपा मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति को पटखनी दे सकती है।

सरकार ने दलितों को दी जमीन, मुस्लिमों ने कर लिया कब्जा: कोर्ट में जीत के बाद भी झारखंड में नहीं हो रही सुनवाई, पुलिस आती है तो भगा देती हैं औरतें

झारखंड के गिरडीह में मुस्लिमों पर दलितों की जमीन जबरन कब्ज़ाने का आरोप (साभार: Youtube/ Raftaar Media)
झारखंड के गिरडीह जिले में दलित समुदाय के लोगों ने अपनी जमीन पर अवैध कब्ज़े का आरोप लगाया है। प्रशासन को दिए प्रार्थना पत्र में दलितों ने मुस्लिम पक्ष पर अपनी जमीनें हड़पने की शिकायत की है। अपनी जमीनों को वापस पाने के लिए पीड़ित परिवार 12 सितंबर से DC (जिला उपयुक्त) ऑफिस पर धरना दे रहे हैं जो अब तक जारी है। इन सभी पर अब रोजी-रोटी का भी संकट आ गया है। भाजपा ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार की आलोचना की है। ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय भाजपा नेता ने बताया कि धरना अभी भी जारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला गिरडीह जिले के जमुआ प्रखंड का है। यहाँ डीसी ऑफिस पर धरना दे रहीं सावित्री भारती, जीरा देवी, गुलाबी देवी आदि ने बताया कि साल 1986-87 में तत्कालीन बिहार सरकार द्वारा नावाडीह के कुछ दलित परिवारों को को जमुआ अंचल में 11 हजार एकड़ भूमि रहने के लिए आधिकारिक तौर पर दी गई थी। शुरुआत में पीड़ितों ने वहाँ पेड़-पौधे लगाए। नियमित तौर पर जमीन की रसीद भी कटवाई।

गिरिडीह: दलितों की जमीन पर मुस्लिमों का कब्ज़ा

इस बीच अब्दुल, मशरफ़, खलील, हामिद, अलीबख्श आदि ने उस जमीन पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। आरोपितों ने पीड़ितों को मारा-पीटा और गालियाँ दे कर भगा दिया। इसकी शिकायत पीड़ितों ने कई बार पुलिस से की लेकिन उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
पीड़ितों का कहना है कि लगभग 37 वर्ष बीत जाने के बाद भी अब तक उनको वहाँ बसाया नहीं जा सका है। आखिरकार सभी पीड़ित कोर्ट की शरण में गए। साल 2016 में यह जमीनी विवाद गिरडीह के उपायुक्त की अदालत तक पहुँच गया। इस मुक़दमे में दलित पक्ष की तरफ से मोहन तुरी थे जबकि मुस्लिम पक्ष का नेतृत्व खलील मियाँ कर रहे थे। 3 साल तक चले मुकदमे में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें दीं और अपने कागजात पेश किए। आखिरकार 3 साल के बाद 2019 में उपायुक्त की अदालत ने मोहन तुरी के पक्ष में फैसला सुनाया और खलील मियाँ के दावे को अवैध घोषित कर दिया।
पीड़ितों का आरोप है कि साल 2019 में उन्हें मुकदमे में जीत हासिल होने के बावजूद 4 साल बाद तक प्रशासन उनको उनकी जमीन पर कब्ज़ा नहीं दिला पाया है। मुकदमे में जीती गई जमीन पर कब्ज़े से वंचित दलित परिवारों ने आखिरकार एक बार फिर से गिरडीह उपायुक्त से 12 सितंबर, 2023 को गुहार लगाई। उनकी माँग थी कि पुलिस बल लगा कर जमीन की पैमाइश करवाई जाए और अवैध कब्जेदारों को हटा कर उन सभी को मालिकाना हक दिया जाए। जब पीड़ितों की सुनवाई नहीं हुई तब पीड़ितों ने उपयुक्त कार्यालय पर ही धरना शुरू कर दिया।
पीड़ित परिवारों की सँख्या 11 है। 12 सितंबर से धरने के बाद जब लगभग 1 माह तक उनकी कोई सुध लेने नहीं आया तो पीड़ित परिवारों ने धरनास्थल पर ही अपनी रोजी-रोटी के काम शुरू कर दिए। पीड़ित परिवारों का कहना है कि जल्द ही उनके दीपावली और छठ जैसे त्योहार आ रहे हैं। ऐसे में उन सभी के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। परिवार का गुजरा करने के लिए मंगलवार (10 अक्टूबर, 2023) से पीड़ित परिवार DC ऑफिस पर ही सूप और टोकरी बनाने लगा है। पीड़ितों का कहना है कि वो अपनी रोजी-रोटी कमाते हुए धरना जारी रखेगें।
भाजपा के चंदनक्यारी से विधायक अरुण कुमार ने ऐसी घटनाओं को अस्वीकार्य बताया है। उन्होंने जिला प्रशासन से दोषियों को चिह्नित कर के कार्रवाई की माँग की है। भाजपा MLA के अनुसार इससे पहले भी पलामू में विशेष समुदाय के द्वारा महादलित परिवारों को उनके घर से बेघर करने की घटना हो चुकी है।

दी जाती है हत्या की धमकी

ऑपइंडिया ने इस मामले में स्थानीय भाजपा नेता कामेश्वर पासवान से बात की। कामेश्वर ने हमें बताया कि जिस स्थान पर मुस्लिम पक्ष ने अवैध कब्ज़ा किया है, वहाँ से कई बार पुलिस को भगाया जा चुका है। पुलिस को भगाने में मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। बकौल कामेश्वर उस जगह पर मुस्लिमों ने अवैध तौर पर मकान भी बनवा लिए हैं जिसे हटाने की बात करने पर खुलेआम मर्डर होने की धमकी दी जाती है।
29 अगस्त, 2022 को झारखंड के पलामू में 50 महादलित परिवारों ने मुस्लिम भीड़ पर अपनी पिटाई कर के जमीन को जबरन कब्ज़ाने का आरोप लगाया था। तब जिस जगह पीड़ित परिवार 40 वर्षों से रहने का दावा कर रहे थे, उसे मुस्लिम पक्ष अपने मदरसे की जमीन बता रहा था। उस समय पीड़ित परिवारों ने पुलिस पर कार्रवाई में ढिलाई का आरोप लगाया था।

क्या किसी ‘अवतार’ की प्रतीक्षा में हैं हिंदू? आखिर कब तक सरकार को ही मानते रहेंगे ‘कर्म’?


2022। भारत की स्वतंत्रता का 75वाँ साल। अमृत महोत्सव का साल। हर घर तिरंगा अभियान का साल। श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा रैली का साल.. पर जरा थमिए, क्योंकि फिर से मजहबी खतरा उसी तरह आ खड़ा हुआ है, जिसने 1947 में स्वतंत्रता से पहले इस देश के टुकड़े करवाए।

इस्लामी आतंकवाद, इस्लामी कट्टरपंथ, इस्लामी घुसपैठ इन सबसे जूझते जब हम स्वतंत्रता के 75वें साल में हैं तो देश के भीतर मुस्लिम गलियारा बनाने की साजिशों का असर भी दिखने लगा है। हाल में सामने आए कुछ रिपोर्ट बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के जो 5 जिले नेपाल से लगते हैं, उनके 116 गाँव में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी से ज्यादा हो गई है। 303 गाँव में वे 30 से 50 फीसदी के बीच हैं। इसी तरह असम के जो जिले बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए हैं, वहॉं मुस्लिमों की आबादी 32 फीसदी तक बढ़ गई है। बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान के सीमावर्ती जिलों का भी यही हाल है। इसी रफ्तार से इन इलाकों में मस्जिद-मदरसे भी बढ़े हैं। रिपोर्ट बताते हैं कि यूपी के सीमावर्ती जिलों में 4 साल में मस्जिद-मदरसों की संख्या में 25 फीसदी का उछाल देखा गया है। असम में तो 1000 ऐसे मदरसे सामने आए हैं जिनका संचालन निजी स्तर पर हो रहा था।

इसके अलावा भी देश के हर हिस्से में इन्होंने अपने ऐसे इलाके में बना रखे हैं, जहाँ पुलिस भी जाने से डरती है। हाल ही में वे रिपोर्ट सामने आई हैं जो बताती हैं कि किस तरह बिहार और झारखंड के मुस्लिम बहुल इलाकों के सरकारी स्कूलों तक में ‘शरिया शासन’ लागू कर दिया गया। रविवार की जगह स्कूलों की छुट्टी शुक्रवार को होने लगी। स्कूलों के नाम में उर्दू तक जोड़ दिए गए। ऐसे में एक खास पट्टी में इस तरह इनकी आबादी का बढ़ना, मस्जिदों-मदरसों का कुकुरमुत्ते की तरह उग आना एक बड़े खतरे का संकेत है।

यह बात सामने आ चुकी है कि एक मुस्लिम गलियारा बनाने की साजिशें चल रही है। बांग्लादेश से पाकिस्तान तक जाने वाले यह गलियारा बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब होकर गुजरता है। इन राज्यों के सीमावर्ती इलाकों में बीते 10 साल के भीतर सुनियोजित तरीके से घुसपैठिए बसाए गए हैं। स्थानीय लोगों का पलायन हो रहा है और संसाधनों पर ये कब्जा करते जा रहे हैं। मजहबी शिक्षण संस्थान उन इलाकों में खोले जा रहे हैं जो सामरिक तौर पर ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इतना ही नहीं सीमा से सटे नेपाल के इलाकों में भी इसी तरह डेमोग्राफी बदली जा रही है।

इन सबके साथ भारत को 2047 तक इस्लामी मुल्क बनाने के लिए मुस्लिम युवाओं को हथियारों का प्रशिक्षण देने जैसे प्लान पर भी काम चल रहा है। कुल मिलाकर उसी तरह की स्थिति पैदा की जा रही है जो देश की स्वतंत्रता से पहले बनाया गया था। जिसकी वजह से पाकिस्तान की पैदाइश हुई। कन्हैया लाल हो या उमेश कोल्हे, हर्षा हो या प्रवीण नेट्टारू इन सबकी हत्या उन्हीं साजिशों का हिस्सा हैं। ऐसा लगता है जैसे डायरेक्ट एक्शन डे की तैयारियाँ हो।

ऐसे वक्त में इस देश का हिंदू क्या कर रहा है? वह एक ऐसी अंतहीन प्रतीक्षा में बैठा दिख रहा जब कोई ‘अवतार’ आएगा और एक साथ सारी आसुरी प्रवृत्तियों का संहार कर चला जाएगा। अवतार के आगमन तक उसने सरकार से सवाल को ही अपना कर्म मान लिया है। यदि इस देश को इस्लाम के नाम पर टूटने से बचाना है, काफिर कह कर काट डाले जाने से बचना है तो हमें इस तंद्रा को तोड़ना होगा।

यह सही है कि कुछ काम सरकार के होते हैं। उसकी एजेंसियों को ही उन्हें जमीन पर उतारना होगा। यकीनन सरकार और तंत्र का कार्य पूर्ण करने का बोझ भी हम अपने ऊपर नहीं ले सकते। हम उनकी तरह हथियार लेकर किसी का गला काटने भी नहीं निकल सकते। लेकिन इस देश का संविधान और कानून हमें आत्मरक्षा का अधिकार देता है, अफसोस हम ये भी भूल चुके हैं। हमें अपनी ही गलियों में उनकी घुसपैठ से फर्क नहीं पड़ता। अपने ही गाँव में अवैध मस्जिद-मदरसे खुलने से हमे खतरा नहीं लगता। हमारे ही हाथ गरम कर वे दस्तावेज बना ले जाते हैं और हमें वह अपना डेथ वारंट नहीं लगता। हमें तब भी फर्क नहीं पड़ता जब अपनी ही गली में बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक होकर कोई हिंदू अपना ही घर छोड़ने को मजबूर हो जाता है।

यह सही है कि हम व्यक्ति के तौर पर इस इकोसिस्टम से नहीं लड़ सकते। लेकिन यह भी सत्य है कि जब तक हम खुद काफिर कह कर काटे नहीं जाते, तब तक हम ही यह भी कह रहे होते हैं कि ‘मेरा अब्दुल वैसा नहीं है’। यह भी सत्य है कि जब कश्मीर के हिंदू अपने घर से भगाए जा रहे थे तो देश के दूसरे हिस्से के हिंदुओं के लिए यह कोई मसला नहीं था। दूसरी तरफ वे हैं जो फिलिस्तीन पर इजरायल का हमला हो तो सड़क पर उतर हिंदुओं को डरा जाते हैं। फिर ‘डरा हुआ मुसलमान’ और victim card का नैरेटिव भी बना जाते हैं।

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बॉर्डर पर 10 साल में 32% मुस्लिम बढ़े, BSF के हवाले हो सकता है 100 किमी इलाकाः नेपाल-बांग्लादेश से सटे इला

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ऐसे में इस लड़ाई को किसी सरकार या किसी व्यक्ति विशेष के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। न अवतार के भरोसे टाला जा सकता है। यह लड़ाई हर गली में लड़नी होगी। हर गॉंव में इसका विरोध करना होगा। हर शहर में इसके खिलाफ सड़क पर उतरना होगा। यह केवल तभी संभव है, जब हिंदू समूह में खड़े होंगे। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि हिंदू किसी खास संगठन, दल के साथ खड़े हों। जरूरी है कि हिंदू के साथ हिंदू खड़े हों।

इस्लाम की भेंट चढ़ गया 33% भारत, 75% वाले गाँव में चाहिए शरिया

डेमोग्राफी में बदलाव के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, ये हिन्दुओं को अब समझ में आ रहा है। ऐसा नहीं है कि इतिहास में इसका खामियाजा हमें नहीं भुगतना पड़ा, बल्कि उस इतिहास को हम भूल चुके हैं। पाकिस्तान के रूप में हमारा 8 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र और बांग्लादेश के रूप में डेढ़ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हमसे छिन गया। अफगानिस्तान, जो पहले भारतवर्ष का हिस्सा हुआ करता था, आज उस साढ़े 6 लाख वर्ग किलोमीटर में शरिया चलता है।

यानी, कुल मिला कर ये 16 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र हमारे हाथों से इस्लाम को फिसल गया। ये कोई छोटा क्षेत्र नहीं है, बल्कि भारत के वर्तमान क्षेत्रफल का लगभग आधा है। अर्थात, आधा भारत हमने खो दिया। वहाँ आज हिन्दू बेहाल हैं। पाकिस्तान में उनकी बहू-बेटियों का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण और निकाह करा दिया जाता है, अफगानिस्तान में गुरु ग्रन्थ साहिब सिर पर लाद कर भारत लाना पड़ता है और बांग्लादेश में एक झूठी अफवाह के कारण देश भर में दुर्गा पूजा पंडालों पर हमले होते हैं।

ये होता है जनसांख्यिकी में बदलाव का असर। 1930 के दशक के कराची की तस्वीर देखिए। महाशिवरात्रि के मेले में भीड़ दिखेगी। आम हिन्दू वहाँ आते थे, समृद्ध हिन्दुओं की गाड़ियाँ पार्क हुई दिखेंगी। आज कराची में इस तरह के नज़ारे के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। क्यों? क्योंकि ये मुस्लिम बहुल इलाका है। नेपाल, भूटान, तिब्बत या म्यांमार भी प्राचीन भारत से अलग हुए, लेकिन वहाँ हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं होते। कारण कि वहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक नहीं हैं।

अफगानिस्तान में शरिया लागू है। यहाँ तक कि सिनेमा और गीत-संगीत पर भी प्रतिबंध है। भगवान बुद्ध की प्रतिमा को बम से उड़ा दिया गया। गुरुद्वारों पर हमले होते हैं। बांग्लादेश में क़ुरान के अपमान की झूठी अफवाह से कैसे देश भर के मंदिरों पर हमले और आगजनी हुई, हमने देखा। तीनों देशों में अल्पसंख्यकों, खासकर हिन्दुओं की जनसंख्या पिछले कुछ दशकों में कई गुना कम हो गई। जो बचे-खुचे हैं, डर कर रहते हैं। डर कर रहना पड़ता है।

लेकिन, ये तो इस्लामी कट्टरवाद की बस 33% सफलता है। बाकी की सफलता उन्हें तब प्राप्त होगी, जब उनका ‘गजवा-ए-हिंदुस्तान’ का सपना पूरा होगा। पूरे भारत पर इस्लाम का राज। इसकी एक साजिश हमें तभी देखने को मिली थी, जब देश के बँटवारे के समय बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से लेकर पाकिस्तान तक एक ‘मुस्लिम पट्टी’ की माँग की गई थी। अर्थात, भारत के बीचोंबीच मुस्लिम जनसंख्या बढ़ा कर देश को और खंडित करना।

ये साजिश अभी भी चल रही है। बांग्लादेश से पाकिस्तान तक एक ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाए जाने के आरोप लगते रहे हैं, यानी रास्ते में आने वाले सभी जिलों को मुस्लिम बहुसंख्यक बना दो। इससे न सिर्फ भारत के टुकड़े होंगे, बल्कि हिन्दू भी डर कर रहेंगे। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। पूर्व विधान पार्षद हरेंद्र प्रताप के इस मुस्लिम गलियारे के बारे में बताते हुए जानकारी दी थी कि कैसे इससे पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ने की साजिश चल रही है।

उन्होंने आँकड़े गिनाए थे कि मुस्लिम बहुल इलाकों मुजफ्फरनगर (50.14%), मुरादाबाद (46.77%), बरेली (50.13%), सीतापुर (129.66%), हरदोई (40.14%), बहराइच (49.17%) और गोंडा (42.20%) से ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाने की साजिश है। कैराना से हिन्दुओं के पलायन और पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या मुस्लिमों के बढ़ते प्रभाव को उन्होंने इससे जोड़ कर देखा था। चिकेन्स नेक काटने की साजिश की तो शाहीन बाग़ में शरजील इमाम जैसों ने ही पोल खोल दी।

झारखंड की एक हालिया घटना को ही देख लीजिए। गढ़वा के एक विद्यालय में प्रधानाध्यापक पर इसीलिए इस्लामी नियम-कानून लागू करने का दबाव है, क्योंकि वहाँ मुस्लिम 75% हो गए हैं। ये अलग बात है कि देश के 8 राज्यों में अल्पसंख्यक होने के बावजूद हिन्दुओं को इसका फायदा नहीं मिलता और सुप्रीम कोर्ट भी इससे जुड़ी याचिका रद्द कर चुका है। मुस्लिम कहीं 100% हो जाएँ, फिर भी उन्हें सरकारी स्तर पर अल्पसंख्यकों वाली सारी सुविधाएँ मिलती रहेंगी।

गढ़वा में समुदाय के दबाव के चलते स्कूल की प्रार्थना बदल गई है। पहले यहाँ ‘दया का दान विद्या का…’ प्रार्थना करवाई जाती थी। हालाँकि अब ‘तू ही राम है तू ही रहीम’ प्रार्थना स्कूल में होने लगी है। इसके साथ स्कूल में बच्चों को हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने से भी मना कर दिया गया है। गाँव का मुखिया शरीफ अंसारी है। मुस्लिमों के हंगामे के कारण प्रिंसिपल को सलाह दी गई कि उनके कहे अनुसार चलाएँ। क्या आज तक हिन्दुओं ने किसी स्कूल में घुस कर हंगामा किया है कि वहाँ यज्ञ-हवन करवाएँ जाएँ।

ये इस तरह की अकेली घटना नहीं है। राजस्थान के उदयपुर में टेलर कन्हैया लाल तेली का सिर कलम किए जाने का मामला हो या महाराष्ट्र के अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे की गर्दन में खंजर घोंप कर उनकी हत्या की घटना, इस्लामी कट्टरपंथ का प्रयास यही है कि हिन्दू डर कर रहें। कश्मीर में दशकों से आम नागरिक निशाना बनाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में एक छोटी सी घटना पर निकली मुस्लिम भीड़ रेलवे की अरबों की संपत्ति का झटकों में नुकसान कर देती है।

खासकर जहाँ भाजपा की सरकार नहीं है, वहाँ ऐसी घटनाएँ और ज्यादा होती हैं। अव्वल तो ये कि इन्हें तुरंत अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल जाता है। 50 से अधिक इस्लामी मुल्क हैं दुनिया में, ऊपर से कई देशों में वो बहुसंख्यक हैं और कइयों में प्रभावशाली स्थिति में हैं। फिर भी वो पीड़ित बन कर ही रहते हैं। मीडिया आतंकवाद और कट्टरपंथ के विरोध को ‘इस्लामोफोबिया’ कहता है। किसी हिन्दू का सिर जिहादी काट लें, फिर भी ‘TIME’ जैसे मैगजीन एक तरह से ये पूछते हैं कि ये हिन्दू बिना शोर मचाए क्यों नहीं मर रहे?

जहाँ मुस्लिमों की जनसंख्या ज्यादा नहीं है, वहाँ भी कई गली-मोहल्लों में ये एक साथ रहते हैं। ये इलाके फिर ‘संवेदनशील’ कहे जाते हैं। वहाँ मस्जिद होता है। सड़क सरकार की होती है, लेकिन वहाँ से हिन्दू त्योहारों के जुलूस नहीं गुजर सकते। डीजे बजाने पर पत्थरबाजी होती है। लेकिन, ये सड़क पर नमाज पढ़ सकते हैं। सार्वजनिक स्थान पर शांतिपूर्ण हनुमान चालीसा पाठ को ‘गुंडई’ बता दिया जाता है। यानी, इनकी मंशा है कि ये जहाँ भी रहें, मर्जी इनकी ही चले। शरिया का पालन मुस्लिम ही नहीं, सभी गैर-मुस्लिम भी करें।

उत्तराखंड में भी डेमोग्राफी बदलने की बात सामने आई है। पर्यटन और हिन्दू तीर्थाटन आधारित इस राज्य के उद्योग-धंधों में बाहरी मुस्लिमों का वर्चस्व हो गया है। पश्चिम बंगाल में तो लगभग एक तिहाई जनसंख्या मुस्लिमों की होने जा रही है। तभी भाजपा कार्यकर्ताओं के नरसंहार पर मुस्लिमों की बदौलत सत्ता में आई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुप रहती हैं। हैदराबाद की सभी विधानसभा और लोकसभा सीटें असदुद्दीन ओवैसी को जाती हैं। बिहार के सीमांचल में मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते हैं। ये होता है डेमोग्राफी में बदलाव का असर।

हम कश्मीर को कैसे भूल सकते हैं। लाखों की संख्या में जहाँ पंडित हुआ करते थे और डल झील के किनारे मंत्र जपते पंडित जिस राज्य की पहचान थे, वहाँ से उन्हें अपनी घर-संपत्ति छोड़ कर भागना पड़ा और अपने ही देश में शरणार्थी बन कर जीना पड़ रहा है। नरसंहार हुआ, बलात्कार हुआ, पलायन हुआ – बदल गई डेमोग्राफी। इसकी कोई गारंटी नहीं कि ये प्रक्रिया भारत के अन्य हिस्सों में नहीं दोहराई जाएगी। गुजरात में एक जैन कॉलोनी का इस्लामीकरण कर दिया गया, जहाँ अहिंसक जैन को कटते हुए पशुओं की चीखें सुननी पड़ती है, बहता खून देखना पड़ता है। यही तो है डेमोग्राफी चेन्ज की प्रक्रिया।