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धर्मांतरण जिहाद पर TV शो इस्लामोफोबिया? #News Nation को NBDSA ने सारे वीडियो हटाने के दिए आदेश, क्यों?

                                           न्यूज नेशन द्वारा प्रसारित 'कन्वर्जन जिहाद' शो
न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (NBDSA) को न्यूज नेशन टीवी के शो ‘कन्वर्ज़न जिहाद’ (‘Conversion Jihad’) के खिलाफ 6 नवंबर को एक शिकायत मिली। इसके बाद 15 नवंबर को NBDSA ने एक आदेश पारित किया, जिसमें उसने ब्रॉडकास्टर से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि अगर उसका एंकर ‘निष्पक्ष’ नहीं रहता है तो उस पर कर्रवाई करे। NBDSA ने चैनल को कार्रवाई करने और कार्यक्रम के संचालन के लिए अपने एंकरों को उचित तरीके से प्रशिक्षित करने का निर्देश दिया। 

न्यूज़ ब्राडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी द्वारा News Nation को आदेश देकर क्यों सच्चाई को उजागर होने से रोक रहे हैं? क्या पत्रकारिता का गला नहीं घोटने का प्रयास किया जा रहा? क्या देश में इस्लामिक धर्मांतरण नहीं हो रहा? आखिर किस दबाव में NBDSA ने News Nation को सच्चाई को न दिखाने का आदेश दिया? क्या पत्रकारिता पर इमरजेंसी दिनों की वापसी हो रही?   

इसके अलावा, एनबीडीएसए ने निर्देश दिया कि न्यूज नेशन इस कार्यक्रम के सभी वीडियो 7 दिनों के भीतर सभी प्लेटफॉर्म से हटा ले। यदि वीडियो उपलब्ध रहते हैं तो चैनल को लिखित रूप में इसके बारे में NBDSA को सूचित करना होंगे। याद दिला दें कि न्यूज नेशन ने ‘कन्वर्ज़न जिहाद’ शो के लिए बिना शर्त माफी जारी किया था। 

एनबीडीएसए के चेयरपर्सन जस्टिस (रिटायर्ड) एके सीकरी ने कहा कि किसी भी न्यूज को प्रसारित करते समय आचार संहिता, प्रसारण मानक, सेल्फ-रेगुलेशन, मौलिक सिद्धांत और विशिष्ट दिशा-निर्देशों और निष्पक्षता का पालन किया जाना चाहिए।

एनबीडीएसए ने एंकर दीपक चौरसिया द्वारा शो के दौरान दिए गए कुछ बयानों पर भी नाराजगी जताई। एनबीडीएसए ने जिन कुछ बयानों का विरोध किया, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

1. “मेमचंद जिंदा है जमात शर्मिंदा है”

2. “500- हिंदू कैसे बनाए मुस्लिम?”

3. “क्या मेवात पाकिस्तान बन गया?”

सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एके सीकरी ने कहा कि इस तरह के बयान सिद्धांतों और दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हैं। बता दें कि YouTube पर NewsNation का वीडियो अब “प्राइवेट” है और इसे आम जनता के लिए ऑफ एयर कर दिया गया है।

न्यूज नेशन टीवी और ‘कन्वर्शन जिहाद’ शो के खिलाफ क्या थी शिकायत

CJP (सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस) नामक एक एनजीओ ने न्यूज नेशन टीवी के “कन्वर्ज़न जिहाद” शो को लेकर एनबीएसडीए में शिकायत दर्ज कराई थी। इस शो की एंकरिंग दीपक चौरसिया ने की थी। शिकायत में कहा गया कि एंकर ने मौलाना सैयद उल कादरी को ‘झूठ का कारखाना’ बताया था और पूरे मुस्लिम समुदाय की ओर से उन्हें माफी माँगने के लिए कहा था।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि जमात द्वारा गैर-धार्मिक और देश विरोधी गतिविधि को अंजाम देने की बात कहकर इस दौरान “इस्लामोफोबिक” विचारों को बढ़ावा देने का “प्रयास” किया गया। एनजीओ ने दावा किया कि इस तरह के कार्यक्रमों को प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वे भारत की “समग्र और विविधता” की संस्कृति को नुकसान पहुँचा सकते हैं और इससे हिंसा हो सकती है।
इस पर न्यूज नेशन टीवी ने कहा था कि कार्यक्रम में मेहमानों द्वारा दिए गए बयानों के लिए चैनल या एंकर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। हालाँकि, चैनल ने कहा कि इससे अगर किसी को ठेस पहुँची है तो उन्होंने बिना शर्त माफी माँग रहा है। माफी माँगने के बावजूद NBDSA ने इसे ‘इस्लामोफोबिया’ बताते हुए शो के वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने का आदेश दिया।

इस्लामोफोबिक प्रोग्राम पर 'सुदर्शन न्यूज़' वाले सुरेश चव्हाणके को बड़ा झटका

Suresh Chavhanke (Sudarshan News) Age, Wife, Biography, Family & More -  FamousJoy
दिल्ली हाईकोर्ट के बाद अब सुरेश चव्हाणके को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका मिला है। इनके ‘सुदर्शन’ चैनल के विवादित शो के प्रसारण पर सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी है
शो का नाम ‘बिंदास बोल’ है। इसके प्रोमो में सुरेश चव्हाणके ने ‘यूपीएससी जिहाद’, ‘नौकरशाही जिहाद’ का पर्दाफाश करने का दावा किया था। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने कहा कि ऊपरी तौर पर यही लगता है कि इस कार्यक्रम का मकसद मुस्लिमों की गलत छवि प्रस्तुत करना है
कोर्ट ने कहा,
‘प्रोग्राम में मुस्लिमों की अपर एज लिमिट और वो कितनी बार परीक्षा दे सकते हैं, इसे लेकर कई फैक्चुअली गलत दावे किए गए हैं. सभी समुदायों का को-एग्जिस्टेंस लोकतंत्र का मूल है ऐसे में किसी भी धर्म को विलेन की तरह प्रस्तुत करने की कोशिश का समर्थन नहीं किया जा सकता है
कोर्ट ने कहा कि अगले आदेश तक सुदर्शन न्यूज़ टीवी अपने शो के बचे हुए एपिसोड प्रसारित नहीं कर सकता है। नाम बदलकर भी प्रसारण करने पर रोक रहेगी


फैसला सुनाते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि वो पांच नागरिकों की एक ऐसी कमिटी बनाने पर भी विचार कर रहे हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कुछ स्टैंडर्ड तय कर सके
चैनल ने ट्रेलर जारी किया और विवाद शुरू हुआ
25 अगस्त सुदर्शन न्यूज़ के एडिटर इन चीफ सुदर्शन चव्हाणके ने एक ट्वीट किया। लिखा,
“सावधान. लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ कार्यपालिका के सबसे बड़े पदों पर मुस्लिम घुसपैठ का पर्दाफ़ाश। #UPSC_Jihad #नौकरशाही_जिहाद. देश को झकझोर देने वाली इस सीरीज़ का लगातार प्रसारण प्रतिदिन। शुक्रवार 28 अगस्त रात 8 बजे से सिर्फ सुदर्शन न्यूज़ पर।”


ट्वीट में उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी और आरएएस को टैग भी कर दिया. इसी ट्रेलर के ख़िलाफ याचिका लगाई गई। चव्हाणके पर जामिया मिल्लिया और मुस्लिम समुदाय के छात्रों के खिलाफ ग़लत भाषा के इस्तेमाल और मानहानि का आरोप लगा। प्रोग्राम के खिलाफ याचिका लगाई गई। इसमें कहा गया,
“ट्रेलर और इसके साथ प्रस्तावित प्रसारण केबल टीवी नेटवर्क अधिनियम के तहत प्रोग्राम कोड का उल्लंघन करता है। प्रस्तावित प्रसारण और ट्रेलर में अभद्र भाषा और आपराधिक मानहानि भी होती है। यह भारतीय दंड संहिता की धारा 153A (1), 153B (1), 295A और 499 के तहत अपराध है।”
याचिका में यह भी लिखा गया,
“इस ट्रेलर या प्रस्तावित प्रसारण को अनुमति दी जाती है, तो याचिकाकर्ताओं, अन्य छात्रों, जामिया मिल्लिया के पूर्व छात्रों और 2020 में सिविल सेवा परीक्षा पास कर चुके छात्रों और मुस्लिम कम्युनिटी को खतरे का सामना करना पड़ेगा। यह अनुच्छेद-21 के तहत याचिकाकर्ताओं को प्रदत्त जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन होगा।”
इसी के बाद कोर्ट ने ट्रेलर और प्रस्तावित शो पर रोक लगाने का फैसला किया। शो का पहला एपिसोड 28 अगस्त को प्रसारित होना था। चव्हाणके कह रहे थे कि उन्हें कोर्ट की तरफ से शो पर रोक का कोई नोटिस नहीं मिला, इसलिए वो प्रसारित करेंगे. लेकिन शो के टाइम से पहले उन्हें नोटिस मिल गया और प्रसारण रोक दिया गया
हालांकि, केंद्र सरकार ने 9 सितंबर को प्रसारण की अनुमति दे दी। इसके बाद 11 और 14 सितंबर को इसके दो एपिसोड प्रसारित हुए। अब सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक प्रोग्राम के प्रसारण पर रोक लगा दी है

OIC में भारत पर इस्लामोफोबिया के आरोप का मालदीव ने दिया पाकिस्तान को करारा जवाब

भारत के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने से पाकिस्तान बाज नहीं आ रहा है।ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन की वर्चुअल मीटिंग में भारत पर इस्लामोफोबिया के पाकिस्तान के आरोपों का मालदीव ने करारा जवाब दिया है। मालदीव ने कहा कि सोशल मीडिया पर चंद लोग और अलग-थलग पड़े समूहों की हरकतों या बयानबाजी को 130 करोड़ भारतीयों की राय नहीं समझा जा सकता।
मालदीव ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में 20 करोड़ से ज्यादा मुस्लिम रहते हैं और भारत पर यह आरोप लगाना गलत होगा। बयान में कहा गया कि ऐसा कदम दक्षिण एशियाई क्षेत्र के धार्मिक सौह्रद के लिए नुकसानदायक होगा। यह भी साफ किया गया कि किसी मंशा से दिए गए कुछ लोगों के बयानों और गलत जानकारी के लिए सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे कैंपेन को 130 करोड़ लोगों की भावना नहीं समझना चाहिए।

मालदीव ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और बहु-सांस्कृतिक समाज है। यहां 20 करोड़ से अधिक मुसलमान रह रहे हैं। ऐसे में इस्लामोफोबिया का आरोप लगाना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव के लिए ऐसा करना हानिकारक होगा। इस्लाम भारत में सदियों से मौजूद है और यह देश का 14.2 फीसद आबादी के साथ भारत में दूसरा सबसे बड़ा धर्म है।
मीटिंग में पाकिस्तान के संयुक्त राष्ट्र के राजदूत मुनीर अकरम ने कहा था कि भारत सक्रिय रूप से इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके बाद मालदीव की ओर से आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा गया कि दुनिया में नफरत की संस्कृति बढ़ती जा रही है और हिंसा को राजनीतिक और वैचारिक मंशाओं को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। मालदीव इस्लामोफोबिया समेत ऐसी सभी गतिविधियों के खिलाफ खड़ा है जो हिंसा को बढ़ावा देती हैं।

भारत में इस्लामोफोबिया कौन फैला रहा? वो अमेरिका और यूरोप जिन्होंने 14 मुस्लिम देशों पर हमले किए

इस्लामोफोबिया अमेरिका यूरोप भारतइस्लामोफ़ोबिया शब्द अमेरिका और यूरोप के बाद भारत के सन्दर्भ में भी स्थापित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हाल ही के वर्षों में हमने यह खूब देखा, जब भारत को इस्लामोफ़ोबिक साबित करने के नैरेटिव को सबसे ज्यादा हवा दी जाने लगी। कहा गया कि भारत भी इस्लामोफ़ोबिया से ग्रसित है, जहाँ मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं और इसके जिम्मेदार हिन्दू हैं।
इस्लामोफोबिआ 
लोरी पीक अमेरिका के कॉलोराडो विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान की प्रोफेसर हैं। उन्होंने साल 2011 में ‘BEHIND THE BACKLASH- Muslim Americans after 9/11′ नाम की एक किताब लिखी थी। किताब के बाहरी आवरण पर एक ग्राफ्टी आर्ट (दीवारों पर पेंटिंग) दिखाया गया है, जिस पर ‘MUSLIMS GO HOME’ (मुस्लिम्स घर जाओ) लिखा है।
प्रोफेसर पीक ने अपनी पुस्तक के माध्यम से सितंबर 11, 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिकी बहुसंख्यक ईसाई नागरिकों में इस्लाम के प्रति भेदभाव की जानकारियों को प्रस्तुत किया है।
पुस्तक की प्रस्तावना में ही प्रोफेसर पीक ने अमेरिकी सरकार और चर्च दोनों के मुसलमानों के विरुद्ध घृणा के कई उदाहरण क्रमबद्ध किए हैं। जैसे फ्रेंक्लिन ग्राहम ने इस्लाम को सबसे हानिकारक धर्म बताया था। ग्राहम जाने-माने ईसाई मिशनरी हैं और जॉर्ज बुश के शपथग्रहण समारोह में उन्होंने ही धार्मिक उपदेश दिया था।
प्रोफेसर ने इस बात का भी खुलासा किया कि अमेरिका पर हमले के तुरंत बाद (सितंबर-दिसंबर 2001) कुल 481 गैर-इस्लामिक अपराध दर्ज किए गए थे। इस दौरान तकरीबन 19 निर्दोष मुसलमानों की हत्या भी हुई थी।
साल 2002 में भी ‘द एवरलास्टिंग हेटरेड’ नाम से एक पुस्तक छपी थी। इसके लेखक हॉल लिंडसे, जो कि एक ईसाई धर्मगुरु हैं, उन्होंने इस्लाम को धरती का सबसे बड़ा खतरा घोषित किया था।
साल 2007 में गेब्रियल ग्रीनबर्ग और पीटर गोस्चाक ने मिलकर ‘इस्लामोफोबिया: मेकिंग मुस्लिम एनिमी’ पुस्तक को लिखा। उन्होंने बताया कि अमेरिका के रक्षा विभाग से जुड़े एक बड़े अधिकारी जनरल विलियम बोयकिन ने कई ईसाई धर्मसभाओं को संबोधित किया और सामान्य अमेरिकी नागरिकों के मन में इस्लाम के खिलाफ जहर भर दिया।
उस दौरान इस तरह की दर्जनों किताबें, सैकड़ों लेख और प्रचार सामग्री अमेरिका के बाज़ारों में आने लगी थी। जिसके परिणामस्वरूप अगले एक दशक में अधिकतर अमेरिकी नागरिकों का इस्लाम के प्रति नकारात्मक भाव बन चुका था।
उदाहरण के तौर पर साल 2010 में अमेरिकी नेशनल पब्लिक रेडियो से जुड़ी पत्रकार जुआन विलियम्स ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हवाई जहाज यात्रा के दौरान किसी मुसलमान की उपस्थिति उन्हें बैचैन कर देती है।
मुसलमानों के प्रति इस अमेरिकी नजरिए को इस्लामोफोबिया कहा गया। यह एक पुराना शब्द है, जिसे 1910 में फ्रेंच प्रशासन द्वारा अपने मुस्लिम नागरिकों के प्रति व्यवहार के लिए इस्तेमाल में लाया गया था। सामान्य बोलचाल में इसका प्रयोग फिर से ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित शोध संस्थान ने साल 1997 में किया था।
उस साल संस्थान ने ‘इस्लामोफोबिया, ए चेलेंज फ़ॉर उस आल’ नाम से एक शोध प्रकाशित किया था। शोध से जुड़ी एक मुस्लिम शोधकर्ता फराह इलाही ने ब्रिटिश सरकार पर इस्लाम के प्रति भेदभाव के आरोप लगाए थे।
साल 2017 में संस्थान ने फिर से ‘इस्लामोफोबिया स्टिल ए चैलेंज फ़ॉर उस आल’ नाम से शोध का प्रकाशन किया। मतलब साफ है कि यूरोप में कुछ भी नहीं बदला और आज भी वहाँ इस्लाम के प्रति नकारात्मक सोच रखी जाती है।
अमेरिका और यूरोप के बाद इस्लामोफोबिया का प्रयोग अब भारत के लिए भी किया जाने लगा है। पिछले कुछ महीनों से लगातार एक झूठा प्रचार फैलाया जा रहा है कि मुसलमान भारत में सुरक्षित नहीं है और इसके जिम्मेदार हिन्दू हैं।
यह प्रचार नागरिकता संशोधन कानून से शुरू हुआ और कोरोना संक्रमण में भी चलता आ रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जो देश खुद इस्लामोफोबिया से बुरी तरह ग्रस्त है वही आज भारत को धर्मनिरपेक्षता का ज्ञान अथवा प्रवचन दे रहे है। 
भारत में इस्लाम का इतिहास तब से है, जब पैगम्बर मोहम्मद जिन्दा थे। अमेरिका का उस दौरान कोई वजूद ही नहीं था। मोहम्मद बिन कासिम (712 ईसवी) से लेकर आखिरी मुगल बादशाह तक हज़ार सालों का लिखित इतिहास है – जिसमें हिन्दुओं का नरसंहार हुआ, मंदिरों को तोड़ा गया, जबरन धर्म परिवर्तन किए गए, महिलाओं के साथ बलात्कार और बच्चों को गुलाम बनाया गया।
ब्रिटिश इतिहासकार एचएम इलियट की बहुचर्चित पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया – एज टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियंस’ (1867) के पृष्ठ संख्या 121-122 के अनुसार हिन्दू राजा दाहिर की मृत्यु के बाद ‘मुसलमानों ने नरसंहार से अपनी प्यास बुझाई थी’।
ईश्वरी प्रसाद अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ़ मेडिवल इंडिया’ (1921) में लिखते हैं कि मुलतान में 17 साल से ऊपर के हर उस हिन्दू का कत्ल किया गया, जिसने इस्लाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
केएस लाल अपनी पुस्तक ‘ग्रोथ ऑफ़ मुस्लिम पापुलेशन इन मेडिवल इंडिया’ में महमूद गजनवी द्वारा 20 लाख हिन्दुओं के नरसंहार का उल्लेख करते हैं। 
दुर्भाग्य से अमानवीय और क्रूरता के सिलसिले कभी नहीं रुके और अगले 700 सालों तक भारत में यही सब होता रहा। अभी 70 साल पहले ही इस्लाम के नाम पर भारत का विभाजन भी कर दिया गया।
खुद एक यूरोपियन पत्रकार लियोनार्ड मोसेली अपनी पुस्तक ‘द लास्ट डेज ऑफ़ द ब्रिटिश राज’ में भारत विभाजन पर हृदयविदारक घटनाओं का जिक्र कुछ इस तरह किया है –
“अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों का विस्थापन हुआ। इस दौरान करीब 6,00,000 लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दीवार से फोड़ दिए गए, बच्चियों का बलात्कार किया गया, बलात्कार कर लड़कियों के स्तन काट दिए गए और गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।”
इन मार्मिक घटनाओं को देखते हुए सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को 2 सितम्बर, 1947 को पत्र लिखा, “सुबह से शाम तक मेरा पूरा समय पश्चिम पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू और सिखों के दुख और अत्याचारों की कहानियों में बीत जाता है।”
इस तरह की भयावह स्थितियों का सामना यूरोप के किसी देश और अमेरिका को नहीं करना पड़ा, जो 7वीं सदी से हिन्दू झेलते आ रहे हैं। इतना होने के बावजूद, हिन्दुओं की सहिष्णुता कायम रही और व्यक्तिगत तौर पर मुसलमानों को नुकसान भी नहीं पहुँचाया।
उपरोक्त तथ्य को आसानी से भी समझा जा सकता है, क्योंकि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी भारत में ही रहती है। दूसरी तरफ, अमेरिका को 80 के दशक में पहली बार इस्लामिक आतंकवाद का सामना करना पड़ा। नतीजतन तब से अब तक अमेरिका 14 मुस्लिम देशों पर हमले अथवा बम गिरा चुका है।
इसमें ईरान, लीबिया, लेबनान, कुवैत, ईराक, सोमालिया, बोसनिया, सऊदी अरब, अफगानिस्तान, सूडान, कोसोवो, यमन, पाकिस्तान और सीरिया शामिल है। ‘द इकोनॉमिस्ट’ की साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन हमलों में कितने निर्दोष लोगों की जान चली गई, इसका अनुमान भी पेंटागन को नहीं है।
भारतीय संस्कृति और पश्चिम के देशों में यही एक मूलभूत अंतर है कि हमने अपने अत्याचारों का बदला निर्दोष लोगों के खून से नहीं लिया। हमने इस्लामिक आतंकवाद, कट्टरवाद और अतिवाद का प्रतिकार किया है, क्योंकि मानवीय मूल्यों के नाते यह बेहद जरूरी कदम है। 
अब बात करते हैं, इस्लाम के ‘विक्टिमहुड’ यानी उत्पीड़ित होने की। वास्तव में, इस्लामोफोबिया शब्द एक भ्रम है, जिसका इस्तेमाल अपने पापों को छुपाने के लिए किया जा रहा है। साल 2006 में एक पोस्टर सामने आया था, जिस पर लिखा था – “हर उस व्यक्ति का सिर कलम कर दो, जो इस्लाम को हिंसक बताता है।”
मुझे नहीं लगता कि अब इस विषय पर ज्यादा स्पष्टीकरण की जरूरत है। यह एक पोस्टर ही पूरी विचारधारा की सच्चाई बयाँ कर देता है। 
कुछ वेबसाइट्स जो कि इस्लामिक जेहाद पर नज़र रखती है, उनका दावा है कि इस जेहाद के चलते पिछले 1400 सालों में तक़रीबन 270 मिलियन लोगों का नरसंहार हो चुका है।
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जफरुल इस्लाम पर हसन रिजवी का पलटवार हिंदुओं को अरबी मुसलमानों का डर दिखाने वाले दिल्ली माइनॉरिटी कमीशन के अध्यक्.....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एक ओर जब सारा विश्व कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है, ऐसे समय में पाकिस्तान अपने च....
इसलिए तथाकथित इस्लामिक पैरोकार पहले अपने आंतरिक आतंकवादी और जेहादी स्वरूप के खिलाफ बोलना शुरू करें, जिससे दुनिया में शांति और सौहार्द्र को स्थापित किया जा सके और इस्लामोफोबिया को भी खत्म करने का भी यही एकमात्र रास्ता है।                                              (साभार)

योगी को गोली मारने की बात कहने वाला ASI तनवीर खान बिहार से गिरफ्तार

तनवीर खान गिरफ्तार
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गोली मारने की बात कहने वाले ASI तनवीर खान को उत्तर प्रदेश पुलिस ने सोमवार (मई 4, 2020) को गिरफ्तार कर लिया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में बिहार के इस पुलिसकर्मी को नालंदा जिले के दीपनगर थाना इलाके से उत्तर प्रदेश की गाजीपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया। पुलिस ने सोशल मीडिया में अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में उस पर कई धाराएँ लगाई गईं और फिलहाल उसको जेल भेज दिया है।
उत्तर प्रदेश पुलिस को तनवीर से ऐसी अभद्र पोस्ट करने की साज़िश और किसके कहने से ऐसा किया पूछताछ करनी चाहिए। इतना ही नहीं, इसके साथ-साथ परिवार के सदस्यों के बैंक खातों की जाँच करनी चाहिए। क्योकि बिना किसी लेन-देन के कोई इस तरह की अभद्र टिप्पणी नहीं कर सकता। 
NBT
उत्तर प्रदेश पुलिस की FIR 
गाजीपुर एसपी डॉ ओमप्रकाश सिंह ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया है कि तनवीर खान गाजीपुर के दिलदारनगर क्षेत्र का रहने वाला है और बिहार के नालंदा में पुलिस विभाग में बतौर आरक्षी तैनात था। उस पर आरोप है कि उसने 24 अप्रैल को अपने फेसबुक पेज पर उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के खिलाफ रमजान में अजान के मामले को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी।
क्या लिखा था ASI ने 
24 अप्रैल को एक फेसबुक पोस्ट सामने आया। इस पोस्ट में अजान न होने पर योगी आदित्यनाथ को गोली मारने की बात थी। जिस पर दिलदारनगर निवासी धनन्जय और विशाल ने स्थानीय पोस्ट में अपनी शिकायत दर्ज कराई। मामला संज्ञान में आने के बाद पहले इस पोस्ट को देखकर अंदाजा लगाया गया कि ये किसी सिरफिरे का कारनामा है। मगर, बाद में जब इस मामले को गंभीरता से लिया गया तो मालूम चला कि मुख्यमंत्री योगी के लिए इतनी लापरवाही भरा पोस्ट लिखने वाले बिहार पुलिस का जवान है।

तनवीर खान ने अपने फेसबुक एकाउंट से पोस्ट किया था, “दिलदार नगर और पूरे कामसरोवर (कामसर) में अजान नहीं हो रही है। योगी को गोली मार दो **को।”  मगर, 30 अप्रैल तक पोस्ट वायरल होने के बाद तनवीर खान ने अपना एकाउंट डिएक्टिवेट कर लिया। लेकिन कुछ लोगों ने ट्विटर पर उसके पोस्ट के स्क्रीनशॉट लेते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस से इस पर संज्ञान लेने की अपील की।
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सोशल मीडिया पर विवेक भारद्वाज ने ऐसी मानसिकता के लोगों का पुलिस विभाग में होना दुर्भाग्य बताते हुए लिखा है, “इंदिरा गाँधी के साथ क्या हुआ था, यह जानने के बावजूद इस प्रकार की मानसिकता के लोगों का पुलिस और भारतीय सेना में होना आश्चर्यजनक है। ऐसे लोग सलाखों के भीतर होने चाहिए, ना कि वर्दी में।”

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगे :सफूरा जरगर को गर्भवती से बचने के लिए कंडोम इस्तेमाल करने की सलाह देने वाली MBBS छात्रा को कट्टरपंथी दे रहे गाली

सफूरा जरगर प्रेगनेंसी
डॉक्टर जेली (बाएँ) ने सफूरा जरगर (दाएँ)
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्र नेता सफूरा जरगर दिल्ली दंगों के मामले में जेल में बंद हैं। मीडिया के एक गिरोह विशेष ने सफूरा जरगर की प्रेगनेंसी की बात करते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा। सफूरा जरगर के बारे में ट्विटर यूजर डॉक्टर जेली ने ट्वीट किया था कि उन्हें किसने कहा था कि वो कंडोम के बिना सेक्स करें? इसके बाद से जेली के इनबॉक्स में गालियों की बौछार हो गई है।
दिल्ली में हुई हिन्दू विरोधी हिंसा में मीरान हैदर के साथ सफूरा जरगर को साजिश करने के आरोप में आरोपित बनाया गया है। जिसमें उस समय 50 से ज्यादा निर्दोष लोगों की लाशें गिरी थीं और राष्ट्रीय राजधानी ने 1984 में सिखों नरसंहार के बाद मुख्य रूप से हिंदुओं को निशाना बनते देखा था। जिसमें दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काटकर नृशंस हत्या की वारदात को अंजाम दिया गया था और आईबी के अंकित शर्मा को सुनियोजित ढंग से मारा गया था।
दरअसल, सलमान निजामी ने सफूरा जरगर को एक्टिविस्ट बताते हुए ट्वीट किया था कि वो प्रेगनेंसी के दौरान और रमजान के महीने में जेल में हैं जबकि कपिल मिश्रा जैसे ‘घृणा फैलाने वाले लोग’ खुले घूम रहे हैं। उन्होंने लिखा था कि भारत में मुस्लिम होना ही अपराध है, सरकार को कुछ तो शर्म करना चाहिए।
ये आपत्तिजनक क्या कपिल मिश्रा के बयान
के बाद आया? किसको पागल बना रहे हो?
कपिल शर्मा को दोषी बताने वाले उस समय कहाँ थे, जब CAA विरोध की आड़ में हिन्दुत्व, मोदी और योगी की कब्र खोदने के नारे लग रहे थे? साम्प्रदायिक रंग कौन दे रहा था? कहाँ था #mob lynching, #award vapasi, #not in my name, #intolerence और एमनेस्टी आदि गैंग? विरोध CAA का था या हिन्दुत्व का? दंगाई चाहे जो बोले और करें, लेकिन प्रतिक्रिया होने पर अपना दामन बचाकर सारा दोष दूसरे पर डाल दो, कहाँ का इंसाफ है? कहते थे "कागज नहीं दिखाएंगे", लेकिन आज कोरोना के कारण लॉक डाउन में बंट रहे राशन को लेने के लिए कागज हाथों में लिए लाइनों में खड़ा हो रही एवं रहे हैं। 
सलमान निजामी सहित अन्य इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी सफूरा जरगर को जेल से रिहा करने की माँग की थी। इस पर डॉक्टर जेली ने पूछा था कि उन्होंने बिना कंडोम का प्रयोग किए सेक्स किया ही क्यों?
बस इसके बाद खेल शुरू हुआ। उनके इनबॉक्स में इस्लामी कट्टरपंथी घुस आए। कादरी नायड नामक व्यक्ति ने अपशब्द कहे। मोहम्मद मुहीउद्दीन ने लिखा कि तुम डॉक्टर बनने लायक नहीं हो। अज़हरुद्दीन ने तो यहाँ तक लिख दिया कि काश आपके पैरेन्ट्स ने भी सेक्स करते वक़्त कंडोम का प्रयोग किया होता। सैयद अबरार ने तो माँ की गाली दी। इमरान मिर्जा ने तो पूछा कि क्या हम कंडोम के साथ सेक्स कर सकते हैं, मैं आपको इसके बदले रुपए दूँगा। सोहैब खान ने ‘कुतिया’ शब्द का प्रयोग किया।





डॉक्टर जेली ने ख़ुद सारे स्क्रीनशॉट्स शेयर करते हुए जानकारी दी कि उन्हें गालियाँ दी जा रही हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को ‘सिंगल सोर्स पीपल’ नाम दिया है। सफूरा जरगर सीएए विरोधी प्रदर्शनों और लोगों को भड़काने में भी सक्रिय थीं। वो अप्रैल 10, 2020 से तिहाड़ जेल में बंद हैं। पुलिस का कहना है कि वो दिल्ली में दंगे भड़काने वाले मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक है। सफूरा जामिया कोआर्डिनेशन कमिटी की मीडिया कोऑर्डिनेटर हैं।
सफूरा जरगर के खिलाफ यूएपीए के तहत मामला चल रहा है। सफूरा जरगर ने जाफराबाद-सीलमपुर में 50 दिनों के हंगामा की साजिश रची थी और वहाँ महिलाओं-बच्चों को बिठाने के लिए पूरा जोर लगाया था। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी के फिरोज ख़ान ने भी सफूरा जरगर को रिलीज करने की माँग की है। उन्होंने दिल्ली पुलिस पर अपनी शक्ति का दुरूपयोग करने और लोगों के अधिकारों का हनन करने का आरोप लगाया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी उन्हें रिलीज करने की माँग की है।
हिन्दू विरोधी दंगे की मुख्य साजिशकर्ता गर्भवती सफूरा जरगर को जेल में डालने पर लिबरल गिरोह कूट रहा छाती
दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में कट्टरपंथी समूह PFI का नाम सामने आने के बाद पुलिस ने जामिया के 2 छात्रों को इस संबंध में गिरफ्तार किया। एक नाम मीरान हैदर और दूसरा प्रेग्नेंट सफूरा जरगर (Safoora Zargar)। दोनों पर उत्तरपूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की साजिश रचने का आरोप है। जिसके कारण इनके खिलाफ़ गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। हालाँकि, हैदर की गिरफ्तारी को लेकर अप्रैल माह के शुरूआत में खूब सवाल उठाए गए थे। लेकिन संगीन आरोपों के कारण ये आवाज हल्की पड़ गई। इसके बाद सफूरा की गिरफ्तारी पर कट्टरपंथियों ने आवाज बुलंद की और दिल्ली पुलिस का क्रूर चेहरा दर्शाने के लिए उसकी प्रेग्नेंसी को लेकर बवाल खड़ा कर दिया।
सफूरा के लिए अलजजीरा के लिए रिपोर्टिंग 
हिन्दुओं पर अक्सर आक्रामक रिपोर्टिंग करने वाला अलजजीरा जैसे मीडिया संस्थान ने इस एंगल को लेकर बेहद मार्मिक रिपोर्ट पेश की। अपनी रिपोर्ट में अलजजीरा ने लिखा कि 27 वर्षीय गर्भवती (प्रेग्नेंट) महिला सफूरा जरगर को 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और उस पर साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया।
इसके अलावा उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कुछ अन्य बातों का भी उल्लेख किया जैसे जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी के बयान को, जिसमें उन्होंने सीएए को मुस्लिम विरोधी बिल बताया और जरगर के परिजनों के बयान को भी शामिल किया जिसमें उन्होंने कहा कि रमजान का पहला दिन सफूरा के बिन बहुत दुख में बीता।
इतना ही नहीं, रिपोर्ट में तिहाड़ के हालातों का भी उल्लेख किया गया कि और बताया गया है कि तिहाड़ जेल का परिसर भारत की सबसे भीड़भाड़ वाली जेलों में से एक है जिसमें लगभग दोगुने कैदी बंद हो सकते हैं।
सफूरा के समर्थन में कट्टरपंथी और लिबरल्स 
अब अलजजीरा की इस रिपोर्ट के बाद अगले चरण में मीडिया गिरोह के लोगों ने अपना काम करना शुरू किया। ये रिपोर्ट तेजी से शेयर की जाने लगी और सबा नकवी जैसे लोग ये सवाल करने लगे कि लोकतंत्र सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का अधिकार देता है। तो एक प्रेग्नेंट महिला को एंटी टेरर चार्ज के नाम पर लॉकडाउन और महामारी के बीच क्यों गिरफ्तार किया गया? उसका बच्चा क्या जेल में पैदा होगा?

इसके बाद, विजेता सिंह ने भी इस पर अपना दुख जाहिर किया। विजेता ने रिपोर्ट को शेयर करते हुए कहा, “तीन महीने की गर्भवती (प्रेग्नेंट) सफूरा जरगर तिहाड़ जेल में एकांत कारावास में है, उसका अपराध केवल सीएए का विरोध करना है।”
कांग्रेस की राष्ट्रीय संयोजक हसीबा आमीन ने लिखा, “27 वर्षीय जामिया की स्कॉलर ने, जो कि 3 माह की गर्भवती है, उसने अपने रमजान का पहला दिन तिहाड़ जेल में बिताया। क्यो? क्योंकि उसने सरकार द्वारा किए जा रहे गलत कामों के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत दिखाई।”

इसके बाद सीएनएन की पत्रकार जेबा वारसी ने लिखा कि ये जामिया की मीडिया कॉर्डिनेटर है और ये जामिया के बाहर हुए शार्तिपूर्ण प्रोटेस्ट में शामिल थी। ये गर्भवती हैं। अलजजीरा की रिपोर्ट कहती है कि इसे तिहाड़ में एकांत में रखा गया है।

इसी तरह अलजजीरा की इस खबर को दलित विरोधी इरेना अकबर समेत कई लोगों ने सोशल मीडिया पर शेयर किया और एक माहौल बनाने की कोशिश की, क्योंकि जामिया की छात्र नेता सफूरा जरगर 3 महीने की गर्भवती हैं। इसलिए उस समय में जब उन्हें उचित देखभाल और चिकित्सकीय देख-रेख की आवश्यकता है। तब उन्हें गिरफ्तार किया गया है और तिहाड़ में अकेले रखा गया है। कुछ लोगों ने तो सोशल मीडिया पर इस खबर के आधार पर मानवता के मरने का दावा भी किया है। कुछ ने कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की है।
किसी भी महिला से संबंधित ऐसी खबर सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाना आम बात है। लेकिन दिल्ली पुलिस पर सवाल उठाने से पहले, केंद्र सरकार को कोसने से पहले ये भी जानने की आवश्यकता है कि आरोपित महिला पर कैसे इल्जाम लगे हैं और मात्र प्रेगनेंसी का हवाला देकर उस पर लगे आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता और न ही इस बात से मुँह फेरा जा सकता है कि मीडिया गिरोह कैसे इस पूरे मामले को अलग कोण दे रहा है।
आज जब आरोपित महिला के ऊपर लगे आरोप इतने संगीन है उस समय उसके लिए रिपोर्ट में ‘छात्र’ और ‘स्कॉलर’ शब्द का प्रयोग हो रहा है। उसके प्रोफेसर उसे उसके अपराधों से निजात दिलाने के लिए उसके अकादमिक रिकॉर्ड का हवाला दे रहे हैं। उस समय सोचने वाली बात है कि सफूरा के लिए जो उसकी प्रेगनेंसी के नाम पर ट्रेंड चलाया जा रहा है उसमें उसके 3 महीने से प्रेग्नेंट होने की बात हैं, जबकि दिल्ली में हुई हिंसा 2 महीने पुरानी घटना है।
आज अगर वाकई ही इस एंगल से किसी के अपराध पर होने वाली कार्रवाई पर इतना फर्क पड़ता है, तो क्या जरूरत थी प्रेगनेंसी के दौरान सड़कों पर आने की, आंदोलनों में अपनी सक्रियता दिखाने की? अगर आज इस आधार पर सफूरा के लिए दया माँगी जाती है, उनकी जाँच को रोका जाता है, तो कल को क्या हर अपराधी महिला या अपराध करने के इल्जाम में गिरफ्तार हुई महिला प्रेगनेंसी के नाम पर अपने लिए छूट नहीं माँगेगी?
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लोकतंत्र की बातें करने वाले ही ये बताएँ कि किस किताब में लिखा है कि गर्भवती होने के बाद लोगों को भड़काओ और जब पकड़े जाओ तो विक्टिम कार्ड(Victim Card) खेल लो? आज सोशल मीडिया पर गिरोह का दोहरापन देखकर ऐसे तमाम सवाल तैर रहे हैं। लेकिन अलजजीरा की तर्ज पर अन्य मीडिया संस्थान इस एंगल से रिपोर्ट पेश करके इसे और मार्मिक रूप देने में लगे हैं और ये बता रहे हैं कि उसे सफूरा को क्वारंटाइन के नाम पर कैसे अलग रख कर परेशान किया जा रहा है। जबकि सच क्या है? ये किसी से छिपा नहीं हैं।