साम्प्रदायिकता फैलाती ‘इंडिया टुडे’ के पूर्व इनपुट हेड रहे रिफत जावेद की चलायी अमूल कंपनी के बहिष्कार की मुहिम

क्या सच्चाई को दिखाना गुनाह है? हर सच्चाई को मुस्लिम कट्टरपंथी और वामपंथी साम्प्रदायिक दृष्टि से ही क्यों देखते है? दूसरे शब्दों में यही कहा जाएगा कि इन लोगों के कुकृत्यों के उजागर होने से इन्हे डर सता रहा है कि जनता-जनार्दन के समक्ष हमारी काली करतूतें उजागर होने से कोई इनकी आवाज़ पर नहीं आएगा। सेकुलरिज्म के नाम पर परोसे जा रहे जहर के सार्वजनिक होने से क्यों घबरा रहे हैं? क्या छद्दम सेकुलरिज्म के नाम पर फैलाए गए जहर को ख़त्म कर वास्तविक सेकुलरिज्म को लाना साम्प्रदायिकता है?
इस पाखंडी सेकुलरिज्म ने 
राजनीति का नाश करने के साथ-साथ समस्त कार्य-प्रणाली को प्रभावहीन कर दिया है। अपनी कुर्सी की खातिर देश के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर, मुग़ल आतताइयों को महान बताकर पढ़ाने का साहस सिर्फ और सिर्फ भारत में ही हो सकता है। अगर विदेश में ऐसा कुकृत्य किया होता, ऐसे इतिहासकारों को सलाखों के पीछे पटक दिया होता। हिन्दू हित की बात करने में साम्प्रदायिकता नजर आती है और मुस्लिम हित की बात करने पर सेकुलरिज्म, ये कौन-सी सियासत है, जहाँ मजहब के नाम पर गोटियां फेंकी जाती है? लगता है सेकुलरिज्म की दुहाई देने वालों को इसका क,ख,ग तक नहीं मालूम होगा, और सियासत करते हैं सेकुलरिज्म की। ये मजहब देख कर सियासत करने और धर्म के नाम साम्प्रदायिकता का जहर फ़ैलाने वाले लोग हैं। 
देश में कोरोना फैलने पर पूर्व चुनाव आयुक्त कुरैशी का कहना "मोदी को कोरोना हो जाए" क्या प्रमाणित करता है? पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ईरान में भारतीय राजदूत होते पाकिस्तान का समर्थन करते रॉ अधिकारियों की जानकारी देते हैं, फिर उप-राष्ट्रपति रहते दशहरा समारोह में सम्मिलित होते हैं, और जब उनसे भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की आरती के लिए अनुरोध किया जाने पर कहते हैं, "इस्लाम इजाजत नहीं देता", तो क्या वहां माल बटोरने गए थे? फिर 2014 में मोदी सरकार बनने पर पुनः उप-राष्ट्रपति न बनाये जाने पर, भारत में मुसलमानों को डर लगने की अफवाह फ़ैलाने को सेकुलरिज्म कहते हैं? 
कमाल है सच्चाई सामने आने से पहले ही घबराहट। सुरेश ने अभी अंगड़ाई ली ही कहाँ है?

देश में एक ऐसा ‘गैंग’ सक्रिय है, जो देश को आत्मनिर्भर बनाने वाली स्वदेशी कंपनियों के खिलाफ मुहिम चलाता है और लोगों को उनके बहिष्कार के लिए भड़कता है। यह ‘गैंग’ खासकर उन कंपनियों को निशाना बनाता है, जो किसी-न-किसी रूप में राष्ट्रीय भावना और देशप्रेम को प्रदर्शित करती है। यह ‘गैंग’ विदेशी सरकारों और कंपनियों के इशारे पर स्वदेशी कंपनियों के खिलाफ मनगढ़ंत आरोप लगाता है, ताकि लोगों में उनकी विश्वसनीयता को खत्म किया जा सके और अपने खास एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके। पतंजलि के बाद अब इस स्वदेशी विरोधी गैंग के निशाने पर विश्व की टॉप 20 डेयरी कंपनियों की सूची में शामिल अमूल कंपनी है। 
लेकिन चीन में इस्लाम के खिलाफ उठाए जा रहे किसी भी कदम पर बोलने का साहस नहीं, वहां भी किसी की आवाज़ नहीं निकल रही, सब मुंह में दही जमाए बैठे हैं। चीन के किसी भी उत्पाद के बहिष्कार करने की आवाज़ तक निकालने की हिम्मत नहीं। लेकिन भारत में किसी भी उचित कदम पर इन्हे साम्प्रदायिकता नज़र आने लगती है, क्योकि 2014 से पूर्व तक पिछली सरकारें इनकी गीदड़ भबकियों से डर तुष्टिकरण की बैसाखी के सहारे चलती थीं, जिस कारण "सोने की चिड़िया " के नाम से चर्चित देश घोटाला प्रधान बन गया। लेकिन सत्ता बदलने के साथ-साथ बहुत कुछ भी बदल रहा है, परन्तु तुष्टिकरण और कट्टरपंथी नहीं। जिसे बदलने में समय लगेगा। 

दरअसल जिस तरह अमूल कम्पनी अपने विज्ञापनों के माध्यम से देश की तरफदारी करती है इससे एक खास ‘गैंग’ को परेशानी हो रही है। इनमें ‘इंडिया टुडे’ के पूर्व इनपुट हेड रहे रिफत जावेद भी शामिल है। उन्होंने अमूल पर इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देने वाले टीवी चैनलों को विज्ञापन देने का आरोप लगाया है। उन्हें समस्या है कि अमूल कम्पनी ‘रिपब्लिक भारत’ और ‘सुदर्शन टीवी’ को विज्ञापन क्यों दे रही है? क्या इस तरह की अनर्गल बातें साम्प्रदायिकता नहीं फैला रहीं? गृह मंत्रालय को ऐसे तत्वों का संज्ञान लेकर सख्ती से पेश आए। अगर पलटवार में मुस्लिम संस्थानों द्वारा निर्मित उत्पादों को न खरीदने की मुहिम छिड़ने पर क्या हश्र होगा, उसका संज्ञान लेना चाहिए। हलाल मीट का तो हो चूका है। 


हालांकि इस ‘गैंग’ को इस्लामोफोबिया से कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें समस्या है कि अमूल कम्पनी सर्जिकल स्ट्राइक के समर्थन में विज्ञापन क्यों बनाती है? इस जमात को समस्या है कि अमूल कम्पनी ‘चीनी कम्पनियों’ के बहिष्कार पर विज्ञापन क्यों बनाती है? आखिर ये माइंडसेट क्या कहता है कि जब भी कोई कंपनी भारत के हित की बात करती है ये ‘गैंग’ नाक-मुंह सिकुड़ता हुआ अपने असली रंग में आ जाता है। सोशल मीडिया पर #BoycottAmul जैसा ट्रेंड चलाने लगता है।
इन पोस्टरों से स्पष्ट है कि इस ‘गैंग’ को विज्ञापन से ज्यादा अमूल की देशभक्ति से परेशानी है। इसके अलावा अमूल प्रोडक्ट्स के विरोध के पीछे इन लोगों की मानसिकता में जहर घुला हुआ है क्योंकि यह जानते हैं कि अमूल गुजरात का ब्रांड है और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खासी दिलचस्पी अमूल की सफलता में रही है। प्रधानमंत्री अक्सर अमूल की सफलता के किस्से उद्यमियों को सुनाते रहे हैं और गुजरात का ब्रांड व प्रधानमंत्री मोदी का विशेष लगाव अमूल से होने के चलते ही अमूल डेयरी प्रोडक्ट के खिलाफ ये लोग मुहिम चला रहे हैं।
अमूल से इन्हें नफरत इसलिए है क्योंकि अमूल प्रधानमंत्री मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान में मील का पहला पड़ाव है और अभी आगे इस अभियान के लिए लंबी लड़ाई बाकी है। 1946 में बनी अमूल कंपनी गुजरात की लाखों परिवारों को रोजी रोटी कमाने का मौका देती है, अमूल के लिए विशेष तौर पर लाखों महिलाएं प्रतिदिन काम करती हैं और इसलिए अमूल कंपनी प्रधानमंत्री मोदी की नजरों में विशेष दर्जा रखती है।




अवलोकन करें:-
एक खास एजेंडे तहत किए जा रहे इस बहिष्कार की धज्जियां उड़ाने के लिए भी लोग सामने आए हैं। अमूल के समर्थन में ट्रैंड चलाकर इस ‘गैंग’ को मुंहतोड़ जवाब दिया है।

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