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कर्नाटक : चोरी की 10+ घटनाओं के नाबालिग अपराधी को सुधारने के लिए कर्नाटक पुलिस ने जमात के पास क्यों भेजा? 3 दिन में भाग गया

                                                                                                                 साभार: ABP & Justdial
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में पुलिस ने एक नाबालिग अपराधी को सुधरने के उद्देश्य से 30 दिनों के लिए जमात में भेजा। वह नाबालिग यहाँ सुधरने के बजाय तीन दिनों में ही जमात के पास से भाग गया। बताया जा रहा है कि यह नाबालिग आदतन अपराधी था और इसके 10 से अधिक मामलों में जुड़े होने की जानकारी है।

अब चर्चा यह है कि आदतन अपराधी को जमात में क्यों भेजा? अगर जमात में भेजने से अपराधी सुधरते हैं, फिर जेलों को बंद क्यों नहीं किया जाता? आखिर इस अनोखे निर्णय का असली खलनायक कौन? क्या अप्रत्यक्ष रूप से कर्नाटक सरकार शरीयत लागु कर रही है?  

डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ दिन पहले बेंगलुरु पुलिस ने इस लड़के को गिरफ्तार किया था। यह नाबालिग लगातार कई अपराध में संलिप्त रहा था। हमेशा नई तकनीक का सहारा लेने वाली बेंगलुरु पुलिस ने इस बार सुधार लाने के लिए इसे जमात के पास भेजा, ताकि वह वहाँ दीन से प्रभावित होकर अपराध छोड़ दे।

नाबालिग ने बीते वर्ष कर्नाटक के एक मंत्री से भी फोन छीन लिया था। मंत्री उस समय बनासवाड़ी पुलिस स्टेशन के तहत सुबह की सैर पर थे और यह दौड़ता हुआ आकर उनसे फ़ोन छीनकर फरार हो गया था। मंत्री द्वारा शिकायत दर्ज करवाने के बाद इसे गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसका इतिहास देखकर पुलिस चौंक गई। वह कई अपराधों में संलिप्त पाया गया।

लड़का पूर्वी बेंगलुरु के बनासवाड़ी उपखंड का निवासी है। कुछ साल पहले उनके पिता के निधन के बाद उनकी मां ही परिवार में कमाने वाली एकमात्र सदस्य हैं। उसका एक छोटा भाई है। पुलिस ने बताया कि यह नाबालिग चोरी और डकैती के तीन-तीन मामलों को मात्र 10 दिनों के भीतर अंजाम दे चुका है।

लगभग 15 साल के इस नाबालिग ने यह सारा कारनामा उसने 2023 के अंत में किया है। पुलिस ने बताया कि नाबालिग ने ताले तोड़कर गाड़ियाँ चुराने में महारत हासिल कर ली है और वह बिना किसी समस्या के गाड़ियों का ताला तोड़कर उन्हें लेकर भाग जाता था। वह 10 गाड़ियाँ चोरी कर चुका था, जो कि उसके पकड़े जाने के बाद बरामद कर ली गई हैं।

इन सबके बाद उसे गिरफ्तार करके बाल सुधार गृह भेजा गया। वहाँ उसमें कोई बदलाव नहीं आया और बाहर आकर फिर से चोरी करने लगा। इसके बाद पुलिस ने उसे फिर से पकड़ा। इस बार पुलिस ने उसे बाल सुधार गृह भेजने के बजाय उसे एक मदरसे में दाखिल करवाने का निर्णय लिया, ताकि उसे दीन की तालीम मिल सके।

हालाँकि, बेंगलुरु पुलिस का यह निर्णय उलटा पड़ा और यह नाबालिग तीन दिनों के भीतर ही जमात की निगरानी में मदरसे से चम्पत हो गया। उधर बेंगलुरु के डिप्टी पुलिस कमिश्नर का कहना है कि नाबालिग पर जमात और मदरसे ने सकारात्मक प्रभाव डाला है, क्योंकि बीते 25 दिनों से उसके किसी चोरी में पकड़े जाने की खबर नहीं आई है।

अमेरिका में राहुल गांधी का जमात-ISI-जॉर्ज सोरोस और सुनीता विश्वनाथ के साथ क्या है कनेक्शन?

सोनिया गाँधी के सक्रीय राजनीति ने आने से लेकर आज राहुल और प्रियंका तक की बयानबाज़ी से राजनैतिक पंडित कांग्रेस को सचेत करते आ रहे हैं, लेकिन परिवारभक्ति में अंधी हुई पार्टी ने कभी गंभीरता से नहीं लिया, और पार्टी निरन्तर डूबती जा रही है। पार्टी जनता की नब्ज तक को पढ़ने में पूर्णरूप से असफल रही है। अभी भी हिन्दू विरोध और मुस्लिम तुष्टिकरण को ही अस्त्र-शस्त्र मान चल रही है। भारत का वास्तविक इतिहास खुलना शुरू हो चुका है, फिर भी कांग्रेस की वही गतिविधियां रुकने का नाम नहीं ले रही। भारत विरोधी लोगों से निकटता बड़ाई जा रही है। जो कांग्रेस के लिए जरुरत से ज्यादा नुकसानदायक हो रही है। यदि यही हालत रहे, फिर वह दिन भी दूर नहीं, जब कांग्रेस एक इतिहास बन रह जाएगी। परिणाम सामने है कि क्षेत्रीय दल कांग्रेस से अधिक प्रभावी बन रहे हैं। 
राहुल गांधी इन दिनों एक हफ्ते के अमेरिका दौरे पर हैं। वह 30 मई को अमेरिका पहुंचे और तीन शहरों के दौरे के आखिरी चरण में वह 4 जून को न्यूयॉर्क में एक सार्वजनिक सभा के साथ अपनी यात्रा समाप्त करने वाले हैं। राहुल गांधी के विदेश दौरे का उद्देश्य भारत को नीचा दिखाना, पीएम मोदी और भाजपा को बदनाम करना और भारत में मुसलमान खतरे हैं, यही बताना रहता है। यह काम वह पिछले कई विदेश दौरे से करते आ रहे हैं। लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया पर उनका एक फोटो वायरल हो रहा है उसने उनकी पोल खोलकर रख दी है। जिस अमेरिकी अरबपति कारोबारी जार्ज सोरोस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर उगला था, जिसने पीएम मोदी को सत्ता से हटाने की बात कही थी, जिसने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए 100 अरब डॉलर का फंड देने की बात कही थी, अब राहुल गांधी उसी के करीबी सहयोगी सुनीता विश्वनाथ के साथ बैठते करते देखे गए। आखिर राहुल गांधी देश विरोधी लोगों से क्यों मिल रहे थे? क्या भारत को कमजोर करने की जार्ज सोरोस की साजिश में वे भी शामिल हैं? राहुल गांधी का जमात, ISI और जॉर्ज सोरोस से जुड़े लोगों से मिलना यह साबित करता है कि वे भारत से प्रेम नहीं करते बल्कि सत्ता के लिए देश को कमजोर करने से लेकर किसी भी हथकंडे को अपना सकते हैं।

जॉर्ज सोरोस की प्रतिनिधि हैं सुनीता विश्वनाथ
सुनीता विश्वनाथ जॉर्ज सोरोस की प्रतिनिधि हैं, जिसने विपक्षी नेताओं, थिंक टैंक, पत्रकारों, वकीलों और कार्यकर्ताओं के एक नेटवर्क के माध्यम से भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने के लिए 1 अरब डॉलर देने का वादा किया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राहुल गांधी सत्ता पाने के लिए इस हद तक समझौता कर रहे हैं। अमेरिकी एक्टिविस्ट सुनीता विश्वनाथ वही हैं जिन्हें तीन साल पहले अयोध्या में एंट्री से रोक दिया गया था।

हिंदुओं के विरोध में मुसलमानों के पक्ष में एजेंडा चलाती है सुनीता विश्वनाथ
सुनीता विश्वनाथ हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (एचएफएचआर) की सह-संस्थापक हैं, इसके जरिये भी वह हिंदुओं के खिलाफ एजेंडा चलाती है और इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी) जैसे कट्टर संगठनों के साथ कई कार्यक्रमों की सह-मेजबानी करती हैं। पश्चिम में व्यापक जमात-आईएसआई सांठगांठ का हिस्सा हैं और भारत में सामाजिक भेदभाव के मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उनका काम है। उनके अन्य संगठन वुमन फॉर अफगान वीमेन को सोरोस ओपन सोसाइटी फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित किया जाता है।

मुस्लिम4पीस के कार्यक्रम में सुनीता का हिंदू और मोदी-विरोधी भाषण
अमेरिका में “डिसमेंटल ग्लोबल हिंदुत्व” अभियान चलाने वाली सुनीता सोरोस द्वारा वित्तपोषित कई संगठनों के साथ जुड़ी हुई है। मुस्लिम4पीस संगठन द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टी में उन्हें हिंदू, मोदी-विरोधी भाषण देते हुए साफ देखा जा सकता है। इससे यह आशंका दृढ़ हो जाती है कि भारत में सत्ता-परिवर्तन की मंशा पाले लोगों द्वारा राहुल गांधी को तैयार किया जा रहा है?

बैठक में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI का एजेंट भी शामिल
आपने सुनीता विश्वनाथ के साथ राहुल गांधी की तस्वीर देखी। इस बैठक में और कौन-कौन मौजूद थे? अब्दुल मलिक मुजाहिद द्वारा प्रवर्तित भारतीय अमेरिकी मुस्लिम परिषद के जिहादी – आईएसआई फ्रंटमैन भी थे। हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स केवल मुजाहिद द्वारा समर्थित संगठन है। राहुल गांधी के कांग्रेस यूएसए इनर सर्कल के कनेक्शन के बारे में जानकर गंभीर चिंताएं होती हैं। एक चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन इंगित करता है कि सर्कल के एक सदस्य को सोरोस द्वारा सीधे वित्त पोषित किया जाता है, जिसका आईएसआई और जमात ए इस्लामी से जुड़े संगठनों से संबंध है, जो आतंकी गतिविधियों के लिए जाना जाता है।

सुनीता विश्वनाथ के पाकिस्तानी जमात-ए-इस्लामी से संबंध
हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की संस्थापक सुनीता विश्वनाथ एक ऐसी शख्सियत हैं जिनका कथित तौर पर पाकिस्तानी जमात-ए-इस्लामी के एक प्रमुख व्यक्ति अब्दुल मलिक मुजाहिद के साथ करीबी संबंध हैं, जो भारत में आतंकी हमलों में सीधे तौर पर शामिल होने के लिए जाना जाता है। मुजाहिद का भारतीय प्रवासी संगठनों पर प्रभाव स्पष्ट है। उनकी वेबसाइट पर भारत के खिलाफ एजेंडा के रूप में ‘सेव इंडिया फ्रॉम फासिज्म’ और ‘सेव कश्मीर’ आदि के पोस्टर-बैनर देखे जा सकते हैं।

सुनीता विश्वनाथ का आईएसआई और खालिस्तानियों से भी गहरा संबंध
सुनीता विश्वनाथ के बारे में और जानकारी हासिल करने पर पता चलता है उनका आईएसआई और खालिस्तानियों से भी गहरा संबंध है। इसके साथ ही कई अन्य संगठनों से भी संबंध है जो उनके भारत विरोधी होने को उजागर करते हैं। वह अमेरिका में आईएसआई समर्थित खालिस्तानी गुर्गों, भजन सिंह भिंडर और पीटर फ्रेडरिक के साथ एलायंस फॉर जस्टिस एंड अकाउंटेबिलिटी की सह-संस्थापक भी हैं।

भारत विरोधियों का कांग्रेस में सीधी पहुंच का क्या है मतलब?
सुनीता विश्वनाथ का विवादों से नाता यहीं तक नहीं है। सुनीता ने कई कार्यक्रमों का सह-आयोजन किया है और IAMC जैसे संगठनों के साथ सहयोग किया है, जो 2014 से पहले से ही भारत के खिलाफ खुले तौर पर पैरवी कर रहा है, देश के खिलाफ प्रतिबंधों का समर्थन करता रहा है। इन खुलासों से संकेत मिलता है कि अमेरिका में सुनीता विश्वनाथ और राहुल गांधी की बैठक किसी खतरनाक मंसूबे के तहत हुई। वे भारत के खिलाफ किसी एजेंडे पर काम कर रहे हैं। यह सोचना भी परेशान करने वाला है कि इस तरह की सोच वाला कोई व्यक्ति कांग्रेस पार्टी के अमेरिकी संगठन के अंदर तक सीधी पहुंच आखिर कैसे प्राप्त कर सकता है।

सुनीता विश्वनाथ भगवान शिव को बता चुकी ‘चिलमबाज’
हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स नामक संगठन की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ हिंदुओं के नाम पर हिंदुओं के खिलाफ झूठ और प्रोपेगेंडा फैलाने का काम करती रही है। ‘हिंदू बनाम हिंदुत्व’ के नैरेटिव का अभियान चलाकर लोगों को भ्रमित करने का काम करती रही है। वहीं सुनीता हिंदू देवी देवताओं को बदनाम करने के लिए उल-जुलूल बातें भी करती है। कभी वह भगवान शिव को चिलमबाज बताती है तो कभी कहती है हिंदुओं में शराब-सिगरेट का निषेध नहीं है, ये देवताओं को भी चढ़ाया जाता है।

राहुल गांधी को जेलेंस्की बनाना चाहता है डीप स्टेट!
राहुल गांधी हाल के समय में चीन का जिक्र बार-बार करते हैं। चीन भारत में घुसपैठ कर रहा है। चीनी सैनिक भारतीय जवानों को पीटते हैं। चीन में काफी सद्भावना है। इस तरह के न जाने कितने ही बयान हैं। लेकिन हाल में ब्रिटेन के दौरे के दौरान उनके जुबान से वह बात भी निकल गई जिसका उन्हें सब्जबाग दिखाया गया था। उन्होंने कहा- जैसा रूस ने यूक्रेन में किया, वही भारत के खिलाफ दोहरा सकता है चीन। पश्चिमी देशों के डीप स्टेट (दुनिया को अपने हिसाब से चलाने वाले) ने मई 2022 में राहुल गांधी के मेकओवर और पीएम उम्मीदवार बनाने की पटकथा तैयार की थी। उस वक्त राहुल भी ब्रिटेन के दौरे पर थे। उसी वक्त यह तय हुआ था कि जिस तरह यूक्रेन में आंदोलन खड़ा कर जेलेंस्की को प्रधानमंत्री बनाया गया उसी तरह 2024 में पीएम मोदी के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर राहुल की ताजपोशी करवाई जाएगी।
डीप स्टेट के प्लान के मुताबिक बयान दे रहे हैं राहुल गांधी
राहुल के मेकओवर की पटकथा की कहानी भारत जोड़ो यात्रा से शुरू होती है। इसके बाद पटकथा के मुताबिक पीएम मोदी की छवि खराब करने के लिए बीबीसी डॉक्यूमेंट्री, अडानी समूह को बदनाम करने के लिए हिंडनबर्ग रिपोर्ट और ANI, RSS जैसी संस्थाओं पर हमले किए जा रहे हैं। फिर रामचरितमानस विवाद के जरिये हिंदू धर्म को बदनाम करना और खालिस्तान मुद्दे को हवा देकर देश को आंदोलन की आग में झोंकने की साजिश रची जा रही है। यह कोई संयोग नहीं है कि खालिस्तान के नए झंडाबरदार अमृतपाल सिंह जो बात कहता है वही राहुल गांधी भी कहते हैं। RSS के खिलाफ एक तरफ कनाडा में रिपोर्ट तैयार होती है उसे आतंकवादी संगठन करार दिया जाता है तो दूसरी तरफ राहुल गांधी लंदन में RSS के खिलाफ जहर उगलते हैं। RSS को लेकर उनसे प्लांटेड सवाल किए जाते हैं।
सोरोस ने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए 100 करोड़ डॉलर देने का किया ऐलान
अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस ने साल 2020 में वैश्विक स्तर पर राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए 100 करोड़ डॉलर देने की बात कही थी। उसने कहा था कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना ‘राष्ट्रवादियों से लड़ने’ के लिए की जाएगी। सोरोस ने ‘अधिनायकवादी सरकारों’ और जलवायु परिवर्तन को अस्तित्व के लिए खतरा बताया था। सोरोस ने कहा था कि राष्ट्रवाद अब बहुत आगे निकल गया है। सबसे बड़ा और सबसे भयावह झटका भारत को लगा है, क्योंकि वहां लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नरेंद्र मोदी भारत को एक हिन्दू राष्ट्रवादी देश बना रहे हैं।

डीप स्टेट भारत की तरक्की से खुश नहीं
डीप स्टेट भारत की तरक्की से खुश नहीं है और वह चाहता कि किसी तरह से भारत को कमजोर किया जाए। इसीलिए उसने प्यादे के रूप में राहुल गांधी को चुना है। राहुल गांधी इसके लिए योग्य उम्मीदवार हैं। उनके पास अपना कोई विजन नहीं है। डीप स्टेट जैसा कहेगा वो वैसा ही करते जाएंगे। जैसा कि यूक्रेन में हो रहा है। कुल मिलाकर डीप स्टेट चाहता है कि पश्चिमी देशों को चुनौती देने वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारत और चीन के बीच रूस-यूक्रेन की तरह युद्ध छिड़ जाए जिससे ये दोनों देश कमजोर हो जाएं। और राहुल गांधी लालचवश में उनके एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्हें इस बात से तनिक भी दुख नहीं है कि इससे देश का क्या होगा।

क्या राहुल के भाषण की स्क्रिप्ट अमेरिका में लिखी जा रही?
करण थापर के एक शो में सुनीता ने कहा था कि भारत के हिंदुओं के लिए जरूरी है कि वो हिंदुत्व से लड़ें क्योंकि जो आज हो रहा है वो नरसंहार की शुरुआत है। सुनीता की तरह ही राहुल गांधी भी पिछले कुछ समय से हिंदू और हिंदुत्व को अलग बताकर प्रोपेगेंडा फैलाने में जुटे हैं। लेकिन इससे इस बात को बल मिल रहा है कि क्या राहुल के भाषण की स्क्रिप्ट अमेरिका में लिखी जा रही है।
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राहुल गांधी ने अमेरिका में ‘मोहब्बत की दुकान’ के लिए मस्जिदों से आये ग्राहकों में भारत के खिला

राहुल के आयोजकों के नाम शाहीन बाग की लिस्ट जैसी क्यों?
अमेरिका में राहुल गांधी के कार्यक्रम के आयोजकों में से कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार है- फ़्रैंक इस्लाम, माजिद अली, नियाज़ ख़ान, जावेद सैयद, मोहम्मद असलम, मीनाज़ ख़ान, अकील मोहम्मद आदि। इन नामों को देखने ऐसा लगता है कि गोया यह शाहीन बाग की वोटर लिस्ट हो। लेकिन नहीं, ये उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने राहुल गांधी का अमेरिका में प्रोग्राम ऑर्गनाइज़ कराया। इनमें से कई कश्मीर में कट्टरवाद के समर्थक हैं, यानी के आतंकवाद के समर्थक हैं। अब इससे यह समझना आसान हो जाता है कि राहुल गांधी क्यों सनातन संस्कृति का मजाक बना रहे थे और बस मुसलमान परेशान हैं, मुसलमानों को सेकेंड क्लास सिटीजन माना जाता है, भारत में यही सब गाना गा रहे थे।

साम्प्रदायिकता फैलाती ‘इंडिया टुडे’ के पूर्व इनपुट हेड रहे रिफत जावेद की चलायी अमूल कंपनी के बहिष्कार की मुहिम

क्या सच्चाई को दिखाना गुनाह है? हर सच्चाई को मुस्लिम कट्टरपंथी और वामपंथी साम्प्रदायिक दृष्टि से ही क्यों देखते है? दूसरे शब्दों में यही कहा जाएगा कि इन लोगों के कुकृत्यों के उजागर होने से इन्हे डर सता रहा है कि जनता-जनार्दन के समक्ष हमारी काली करतूतें उजागर होने से कोई इनकी आवाज़ पर नहीं आएगा। सेकुलरिज्म के नाम पर परोसे जा रहे जहर के सार्वजनिक होने से क्यों घबरा रहे हैं? क्या छद्दम सेकुलरिज्म के नाम पर फैलाए गए जहर को ख़त्म कर वास्तविक सेकुलरिज्म को लाना साम्प्रदायिकता है?
इस पाखंडी सेकुलरिज्म ने 
राजनीति का नाश करने के साथ-साथ समस्त कार्य-प्रणाली को प्रभावहीन कर दिया है। अपनी कुर्सी की खातिर देश के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर, मुग़ल आतताइयों को महान बताकर पढ़ाने का साहस सिर्फ और सिर्फ भारत में ही हो सकता है। अगर विदेश में ऐसा कुकृत्य किया होता, ऐसे इतिहासकारों को सलाखों के पीछे पटक दिया होता। हिन्दू हित की बात करने में साम्प्रदायिकता नजर आती है और मुस्लिम हित की बात करने पर सेकुलरिज्म, ये कौन-सी सियासत है, जहाँ मजहब के नाम पर गोटियां फेंकी जाती है? लगता है सेकुलरिज्म की दुहाई देने वालों को इसका क,ख,ग तक नहीं मालूम होगा, और सियासत करते हैं सेकुलरिज्म की। ये मजहब देख कर सियासत करने और धर्म के नाम साम्प्रदायिकता का जहर फ़ैलाने वाले लोग हैं। 
देश में कोरोना फैलने पर पूर्व चुनाव आयुक्त कुरैशी का कहना "मोदी को कोरोना हो जाए" क्या प्रमाणित करता है? पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ईरान में भारतीय राजदूत होते पाकिस्तान का समर्थन करते रॉ अधिकारियों की जानकारी देते हैं, फिर उप-राष्ट्रपति रहते दशहरा समारोह में सम्मिलित होते हैं, और जब उनसे भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की आरती के लिए अनुरोध किया जाने पर कहते हैं, "इस्लाम इजाजत नहीं देता", तो क्या वहां माल बटोरने गए थे? फिर 2014 में मोदी सरकार बनने पर पुनः उप-राष्ट्रपति न बनाये जाने पर, भारत में मुसलमानों को डर लगने की अफवाह फ़ैलाने को सेकुलरिज्म कहते हैं? 
कमाल है सच्चाई सामने आने से पहले ही घबराहट। सुरेश ने अभी अंगड़ाई ली ही कहाँ है?

देश में एक ऐसा ‘गैंग’ सक्रिय है, जो देश को आत्मनिर्भर बनाने वाली स्वदेशी कंपनियों के खिलाफ मुहिम चलाता है और लोगों को उनके बहिष्कार के लिए भड़कता है। यह ‘गैंग’ खासकर उन कंपनियों को निशाना बनाता है, जो किसी-न-किसी रूप में राष्ट्रीय भावना और देशप्रेम को प्रदर्शित करती है। यह ‘गैंग’ विदेशी सरकारों और कंपनियों के इशारे पर स्वदेशी कंपनियों के खिलाफ मनगढ़ंत आरोप लगाता है, ताकि लोगों में उनकी विश्वसनीयता को खत्म किया जा सके और अपने खास एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके। पतंजलि के बाद अब इस स्वदेशी विरोधी गैंग के निशाने पर विश्व की टॉप 20 डेयरी कंपनियों की सूची में शामिल अमूल कंपनी है। 
लेकिन चीन में इस्लाम के खिलाफ उठाए जा रहे किसी भी कदम पर बोलने का साहस नहीं, वहां भी किसी की आवाज़ नहीं निकल रही, सब मुंह में दही जमाए बैठे हैं। चीन के किसी भी उत्पाद के बहिष्कार करने की आवाज़ तक निकालने की हिम्मत नहीं। लेकिन भारत में किसी भी उचित कदम पर इन्हे साम्प्रदायिकता नज़र आने लगती है, क्योकि 2014 से पूर्व तक पिछली सरकारें इनकी गीदड़ भबकियों से डर तुष्टिकरण की बैसाखी के सहारे चलती थीं, जिस कारण "सोने की चिड़िया " के नाम से चर्चित देश घोटाला प्रधान बन गया। लेकिन सत्ता बदलने के साथ-साथ बहुत कुछ भी बदल रहा है, परन्तु तुष्टिकरण और कट्टरपंथी नहीं। जिसे बदलने में समय लगेगा। 

दरअसल जिस तरह अमूल कम्पनी अपने विज्ञापनों के माध्यम से देश की तरफदारी करती है इससे एक खास ‘गैंग’ को परेशानी हो रही है। इनमें ‘इंडिया टुडे’ के पूर्व इनपुट हेड रहे रिफत जावेद भी शामिल है। उन्होंने अमूल पर इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देने वाले टीवी चैनलों को विज्ञापन देने का आरोप लगाया है। उन्हें समस्या है कि अमूल कम्पनी ‘रिपब्लिक भारत’ और ‘सुदर्शन टीवी’ को विज्ञापन क्यों दे रही है? क्या इस तरह की अनर्गल बातें साम्प्रदायिकता नहीं फैला रहीं? गृह मंत्रालय को ऐसे तत्वों का संज्ञान लेकर सख्ती से पेश आए। अगर पलटवार में मुस्लिम संस्थानों द्वारा निर्मित उत्पादों को न खरीदने की मुहिम छिड़ने पर क्या हश्र होगा, उसका संज्ञान लेना चाहिए। हलाल मीट का तो हो चूका है। 


हालांकि इस ‘गैंग’ को इस्लामोफोबिया से कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें समस्या है कि अमूल कम्पनी सर्जिकल स्ट्राइक के समर्थन में विज्ञापन क्यों बनाती है? इस जमात को समस्या है कि अमूल कम्पनी ‘चीनी कम्पनियों’ के बहिष्कार पर विज्ञापन क्यों बनाती है? आखिर ये माइंडसेट क्या कहता है कि जब भी कोई कंपनी भारत के हित की बात करती है ये ‘गैंग’ नाक-मुंह सिकुड़ता हुआ अपने असली रंग में आ जाता है। सोशल मीडिया पर #BoycottAmul जैसा ट्रेंड चलाने लगता है।
इन पोस्टरों से स्पष्ट है कि इस ‘गैंग’ को विज्ञापन से ज्यादा अमूल की देशभक्ति से परेशानी है। इसके अलावा अमूल प्रोडक्ट्स के विरोध के पीछे इन लोगों की मानसिकता में जहर घुला हुआ है क्योंकि यह जानते हैं कि अमूल गुजरात का ब्रांड है और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खासी दिलचस्पी अमूल की सफलता में रही है। प्रधानमंत्री अक्सर अमूल की सफलता के किस्से उद्यमियों को सुनाते रहे हैं और गुजरात का ब्रांड व प्रधानमंत्री मोदी का विशेष लगाव अमूल से होने के चलते ही अमूल डेयरी प्रोडक्ट के खिलाफ ये लोग मुहिम चला रहे हैं।
अमूल से इन्हें नफरत इसलिए है क्योंकि अमूल प्रधानमंत्री मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान में मील का पहला पड़ाव है और अभी आगे इस अभियान के लिए लंबी लड़ाई बाकी है। 1946 में बनी अमूल कंपनी गुजरात की लाखों परिवारों को रोजी रोटी कमाने का मौका देती है, अमूल के लिए विशेष तौर पर लाखों महिलाएं प्रतिदिन काम करती हैं और इसलिए अमूल कंपनी प्रधानमंत्री मोदी की नजरों में विशेष दर्जा रखती है।




अवलोकन करें:-
एक खास एजेंडे तहत किए जा रहे इस बहिष्कार की धज्जियां उड़ाने के लिए भी लोग सामने आए हैं। अमूल के समर्थन में ट्रैंड चलाकर इस ‘गैंग’ को मुंहतोड़ जवाब दिया है।