राजनीति भी विचित्र है, जो रंग बदलने में गिरगिट को भी पूर्णरूप से बहुत पीछे छोड़ रही है। जन विरोधी सारे खेल खेलने के बाद बेनकाब होते हैं, आरोप दूसरे पर छाड़ दूध के धुले कहें या दूध से ज्यादा सफ़ेद बताने सामने आ जाते हैं।
नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में अब तक पकडे गए आरोपियों से जो सच्चाई सामने आ रही है, उससे घबरा कर अब मोदी विरोधी सारा दोष फेसबुक पर डाल अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने में लग गए हैं, क्योंकि दिल्ली और बंगाल चुनाव अति निकट हैं। क्या फेसबुक ने नेताओं अथवा निर्वाचित सदस्यों को बोला था कि "जाओ दंगा करो"? इन बेशर्मों से पूछा जाए कि "मरने वाला मर गया, किसी का घर/कार एवं स्कूटर जलाकर राख कर दिया, ये जो नुकसान हुआ, किसी और का नहीं हिन्दुस्तानियों का हुआ है। कौन है इन बिकाऊ दंगाइयों के पीछे? किसने पेट्रोल, एसिड, पत्थर, गुलेल और छुरे-चाकुओं का प्रबंध किया और किसने इस काम के लिए धन दिया?"
राजधानी दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को रोका जा सकता था, अगर फेसबुक ने सही समय पर दंगों को भड़काने वाले कंटेंट को रोका होता। यह दावा फेसबुक के पूर्व कर्मचारी मार्क एस लकी ने दिल्ली विधानसभा की शांति और सद्भाव समिति के सामने किया है। उन्होंने बताया कि कई बार वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के इशारों पर कंटेंट मॉडरेशन टीम पर दबाव बनाया जाता है। इसके चलते कई बार फेसबुक को अपने ही कम्युनिटी स्टैंडर्ड से समझौता करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि फेसबुक पर पहले भी दक्षिणपंथ के प्रति पूर्वग्रह रखने के आरोप लगते रहे हैं।
दिल्ली विधानसभा की इस कमेटी के अध्यक्ष विधायक राघव चड्ढा हैं। समिति ने गुरुवार (नवम्बर 12, 2020) को फेसबुक के अधिकारियों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली सामग्री को जानबूझकर नजरअंदाज करने से संबंधित शिकायतों की सुनवाई करते हुए एक बैठक बुलाई थी। दरअसल समिति का मानना है कि दिल्ली दंगों को भड़काने में फेसबुक का भी बहुत बड़ा हाथ था।
बैठक के दौरान पूर्व कर्मचारी लकी ने फेसबुक के पॉलिसी हेड समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों पर राजनीतिक दलों के इशारे पर काम करने के आरोप लगाए। लकी ने अपने बयान में कहा कि अगर समय रहने फेसबुक पर दिल्ली में दंगे भड़काने वाले कंटेंट को रोका गया होता जो शायद इतनी बड़ी घटना नहीं होती। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि अगर फेसबुक ने सही समय पर कार्रवाई की होती तो म्यांमार जनसंहार और श्रीलंका में हुए दंगों को आसानी से रोका जा सकता था।
लकी ने राजनीतिक पार्टियों और फेसबुक के बीच के कनेक्शन के बारे में खुलासा करते हुए यह भी बयान दिया कि फेसबुक के पॉलिसी हेड समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के इशारे पर कंटेंट मॉडरेशन टीम पर दबाव बनाया जाता है। इसके अलावा फेसबुक के वरिष्ठ अधिकारी और क्षेत्रीय प्रमुख उन देशों में राजनीतिक दलों से दोस्ती बनाकर रखते हैं, जहाँ फेसबुक को काफी ग्राहक हैं। इस सब की वजह से कई बार फेसबुक को अपने ही कम्युनिटी स्टैंडर्ड से समझौता करना पड़ता है। जिसका फायदा भी होता है और नुकसान भी झेलना पड़ता है। साथ ही उन्होंने कहा कि फेसबुक कंटेंट मॉडरेशन के संबंध में ऐसी नीतियां बना रहा है, जो पारदर्शी नहीं हैं।
बिज़नेस के सिलसिले को उजागर करते हुए मार्क ने बताया कि फेसबुक के लिए भारत के बाद अमेरिका दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन भारत को इसका कोई खास फायदा नहीं मिलता। क्योंकि फेसबुक भारत में अमेरिका जितना संसाधन खर्च नहीं करता है, जिससे भारत को अपेक्षाकृत नुकसान है। फेसबुक के दिशानिर्देशों पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अगर अधिकारी कंपनी के कर्मचारियों को वास्तविक गाइडलाइंस के मुताबिक काम करने दें तो समाज में ज्यादा शांति और सद्भाव रहेगा।

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