राजनीति रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड़ दिया है। एक समय था, जब मोदी को रोकने के लिए किये गए गठबंधनों को असफल होते देख मोदी विरोधियों की नींद हराम ही नहीं हुई, बल्कि सत्ता की छटपटाहट में उल्टे-पुल्टे बयानों से इनकी बैचनी भी बढ़ गयी। शायद यही कारण है कि कांग्रेस वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली द्वारा मोदी के विरुद्ध किसी भी गठबंधन को एक भूल बता रहे हैं।
वैसे मोइली के इस बयान में सच्चाई भी है, क्योकि गठबंधन से किसी अन्य गैर-भाजपाई के मुकाबले कांग्रेस को ही सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। अपने आपको मुस्लिम पार्टी बताने वाली कांग्रेस के वोट बैंक पर दूसरे दल कब्ज़ा करते जा रहे हैं। कांग्रेस की हिन्दू विरोधी साज़िश भी अब बेनकाब होने के होने के कारण हिन्दू वोट भी कम हो रहा है। दरअसल में, कांग्रेस को वही हिन्दू एवं मुस्लिम अपना समर्थन दे रहे हैं, जो कांग्रेस के फैलाये झूठ को ही वास्तविक मानते हैं।
खैर, देखना यह है कि मोइली के इस बयान को सोनिया परिवार कितनी गंभीरता से लेता है, क्योकि 2014 में मोदी लहर को रोकने के लिए अपनी सलाहकार समिति के सदस्य अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव और संजय सिंह आदि को आम आदमी पार्टी बनवाए जाने का विरोध करने के बावजूद पार्टी बनवा दी, जिसने कांग्रेस को ही सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया और अभी तक पहुंचा भी रही है।
बंगाल में जीत से उत्साहित ममता बनर्जी और कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी का प्रयास कर रहा है। उन्हें लग रहा है कि 2024 में एकजुट होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती दी जा सकती है। ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे से विपक्षी दलों को ऊर्जा मिली और विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम शुरू हुई। लेकिन वरिष्ठ कांग्रेस नेता एम वीरप्पा मोइली ने विपक्षी दलों को आईना दिखाया और विपक्षी मोर्चाबंदी को लेकर भी आगाह किया। मोइली का कहना है कि केवल मोदी विरोधी एजेंडे से विपक्षी मोर्चे को बीजेपी का मुकाबला करने में सफलता नहीं मिलने वाली।
वीरप्पा मोइली ने चुनाव से पूर्व मोर्चे के नेतृत्व को लेकर चल रही कवायद पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर अभी से मोर्चे के नेतृत्व को लेकर बात होगी, तो ऐसा मोर्चा कभी कामयाब नहीं होगा। साथ ही यह भी कहा कि कुछ वर्गों में आम धारणा बन गई है कि केवल मोदी विरोधी भावना विपक्षी दलों को एक साथ ला रही है। ऐसे में यह नहीं दिखाई देनी चाहिए। विपक्ष को नसीहत देते हुए मोइली ने कहा कि किसी व्यक्ति विशेष का विरोध किसी भी राजनीतिक मोर्चे को आगे लेकर नहीं जाएगा।
वीरप्पा मोइली की नसीहत से लग रहा है कि यह मुहिम अभी ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई है कि जनता के बीच संदेश जाने लगा है कि विपक्ष का एजेंडा मोदी विरोध पर आधारित है। उसके पास कोई ठोस विकल्प नहीं है। वहीं मोर्चाबंदी को लेकर विपक्षी दलों के बीच एकराय उभरकर सामने नहीं आ रही है। शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता नरेश गुजराल ने कहा कि विपक्ष की ओर से इस तरह की मुहिम की अभी से शुरुआत करना जल्दबाजी होगी। लोकसभा चुनाव आने में अभी भी तीन साल का समय है। इसके पहले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों के नतीजों को देखने के बाद ही इस तरह की मुहिम की शुरुआत करना सही साबित होगा।
विपक्षी दलों के अलग-अलग सुर देखकर लग रहा है कि विपक्षी मोर्चाबंदी फिलहाल संभव नहीं दिखती है, क्योंकि बंगाल जीत के बाद ममता बनर्जी मोर्चे का नेतृत्व करने को लेकर काफी उत्साहित है, वहीं वीरप्पा मोइली की नसीहत से लगता है कि कांग्रेस चुनाव से पहले ममता के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वह न्यूनतम साझा कार्यक्रम के जाल में ममता को उलझाकर गठबंधन के नेतृत्व से दूर रखना चाहती है। कांग्रेस को लग रहा है कि अगर ममता को अभी से मोर्चे का नेतृत्व करने का मौका दिया जाता है, तो आगे चलकर गांधी पारिवार की राह मुश्किल हो सकती है, जैसे पी वी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते हुआ था।
कुछ विपक्षी दल राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव तक इंतजार करने और नतीजे देखने की रणनीति पर चल रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि राज्य विधानसभा चुनाव खासकर उत्तर प्रदेश का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिए निर्णायक साबित होगा। अगर योगी के नेतृत्व में बीजेपी की जीत होती है तो प्रधानमंत्री मोदी का जादू बरकार रहेगा और उन्हें लोकसभा में चुनौती देना मुश्किल होगा। शिरोमणि अकाली दल की नजर पंजाब चुनाव पर है। कृषि कानून को लेकर चल रहा विवाद और उसका असर पंजाब चुनाव में देखने को मिल सकता है। इसलिए अकाली दल पंजाब चुनाव के नतीजे आने के बाद बनने वाले समीकरण में अपनी भूमिका तलाश रहा है। उधर महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार में भी खींचतान चल रही है। ऐसे में मोर्चा बनने से पहले ही बिखरता नजर आ रहा है।


1 comment:
Jabtak hindu dharm me kamine log rahenge tabtak secular party jivit rahegi.
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