जब कभी देश पर किसी भी प्रकार की आपदा आई हो, जावेद अख्तर या अन्य संघ का घोर विरोधी बताए, कौन सा संगठन सबसे आगे आकर पीड़ितों की सहायता को आया। देशभक्ति की बातें सभी करने आ जाते हैं, लेकिन विपदा आने पर अपनी जेब से खर्च करने वाला कोई नहीं। मार्ग सुगम होने पर बहुत संस्थाएं आती है लेकिन केवल अपने मजहब के लिए, जबकि आरआरएस विपदा के समय कोई धर्म, मजहब अथवा जाति नहीं देखता। जावेद अख्तर अगर RSS तालिबान जैसा होता, तो 1962 इंडो-चीन युद्ध के बाद RSS को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल नहीं किया जाता। 1963 में तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान बीजेपी कहीं सत्ता में नहीं थी और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। युद्ध के दौरान इनकी सेवाभावना से प्रभावित होकर तत्कालीन जवाहर लाल नेहरू के विशेष अनुरोध पर संघ की बटेलियन शामिल हुई थी।
केंद्र सरकार को चाहिए कि भारत में जितने भी तालिबान समर्थक हैं, सबको परिवार सहित कुछ वर्षों के लिए अफ़ग़ानिस्तान भेज दे, फिर वहीं से इनके समर्थक चैनल पूछे कि कैसा अनुभव कर रहे हो?
बॉलीवुड के मशहूर गीतकार जावेद अख्तर द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की तुलना तालिबान से करने पर शिवसेना ने उन पर हमला बोला है। शिवसेना ने 6 सितंबर को जावेद अख्तर की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की तुलना ‘हिंदू संस्कृति के लिए अपमानजनक’ है। अपने मुखपत्र सामना में शिवसेना ने इस तरह की तुलना करने वालों से ‘अपने विचारों पर पुन: विचार करने’ को कहा।26 जनवरी 1963 को राजपथ पर RSS स्वयंसेवक
शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में जावेद अख्तर पर बसरते हुए कहा, ”इन दिनों कुछ लोग किसी की तुलना तालिबान से कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे समाज और मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। पाकिस्तान और चीन, जो लोकतांत्रिक देश नहीं हैं, वो भी अफगानिस्तान में तालिबान का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि इन दोनों देशों में मानवाधिकारों का कोई स्थान नहीं है। हालाँकि, हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं जहाँ एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है। इसलिए, तालिबान से आरएसएस की तुलना करना गलत है। भारत हर तरह से बेहद सहिष्णु है।”
संपादकीय में आगे कहा गया है कि आरएसएस और विहिप जैसे संगठनों के लिए हिंदुत्व एक ‘संस्कृति’ है। इसमें कहा गया है, ”आरएसएस और विहिप चाहते हैं कि हिंदुओं के अधिकारों का दमन न किया जाए। इसके अलावा, उन्होंने कभी भी महिलाओं के अधिकारों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। वहीं, अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति बेहद भयावह है। लोग दहशत में हैं। तालिबानियों से डर कर अपने ही देश से भाग गए और वहाँ महिलाओं के अधिकारों का दमन किया जा रहा है।”
This is EXACTLY how self-certified ‘atheist muzlims’ like @Javedakhtarjadu manage to do things, 1) legitimise terror outfits like Taliban by comparing them to a social organisation like RSS and 2) Repeat the lie RSS = Taliban so many times thae it sticks. pic.twitter.com/LFLAl2EVmr
— Shefali Vaidya. 🇮🇳 (@ShefVaidya) September 3, 2021
Le Chacha : pic.twitter.com/ca8HTEaKyU
— Arth Dubey (@arthskill) September 3, 2021
be !! And regards NDTV @ndtv has nothing but venom spewing machines and preserving minorities vote bank's for their channel sponsorers !!
— Jyotilaxhmi Kurup 🇮🇳🇮🇳🇮🇳 (@JyotilaxhmiR) September 3, 2021
इन्होंने जो तालिबान और आर॰एस॰एस॰ में तुलनात्मक मिलान का असफल प्रयास किए है वो इनके गीतों की तुकबंदी की तरह है जो सहूलियत के हिसाब से बैठाया जाता है। रोचक लग सकता हैं पर वास्तविकता और जज़्बात दोनों में तुकबंदी रात और दिन को एक करना है।
— Harish Benjwal (@benj_hari) September 4, 2021
तालिबान एक आंतकवादी संगठन है जबकि RSS देश प्रेमी संगठन है जिसने जब जब देश पर कोई आपदा आयी तब तब सरकार की मदद मिलने से पहले मदद करने पहुँच जाते है।
— K V Tulsiani (@k_tulsiani) September 4, 2021
Kab ka thok dete ya latka dete if he was in Afghanistan @Javedakhtarjadu
— Chandan K (@chandanshillong) September 3, 2021
Who frightened under Mughals converted .
— Prashant (@Pkd1963P) September 6, 2021
Who fought & didn't converted became warrior,patriots.
Who supports enemies,are dangerous.
Who doesn't love the country they live are Traitors.
Many NGO hv been actually working against Nation are doomed now.
Real Hindus won't
सामना ने अपने संपादकीय में अख्तर को ऐसे व्यक्ति के रूप में चिन्हित किया है, जो अपने विवादित बयानों के लिए जाने जाते हैं। साथ ही उन्होंने मुस्लिम समाज के चरमपंथी विचारों पर भी हमला किया है। इसमें आगे लिखा गया है, ”संघ की तुलना तालिबान से स्वीकार्य नहीं है। हमारे देश में ज्यादातर लोग धर्मनिरपेक्ष हैं और तालिबान की विचारधारा को स्वीकार नहीं करेंगे। भारत में हिंदू बहुसंख्यक है, इसके बावजूद यह एक धर्मनिरपेक्ष देश है।”
3 सितंबर को एनडीटीवी के एक शो में अख्तर ने कहा था, “आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल का समर्थन करने वालों की मानसिकता भी तालिबान जैसी ही है।” उन्होंने कहा, ”जिस तरह तालिबान एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है। उसी तरह कुछ लोग हमारे सामने हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पेश करते हैं।” जावेद अख्तर ने आगे कहा, “इन लोगों की मानसिकता एक जैसी है। तालिबान हिंसक हैं। जंगली हैं। उसी तरह आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल का समर्थन करने वाले लोगों की मानसिकता एक जैसी है।”
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