The Kashmir Files : ‘दोबारा शुरू हो कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार की जाँच’: राष्ट्रपति को पहुँची याचिका

                            कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं
‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म ने हिंसा और पलायन के शिकार कश्मीरी हिंदुओं का मामला उठाकर मामले को मुख्यधारा के बहस में ला दिया है। अब इस पूरे मामले की जाँच नए सिरे की कराने की माँग की जा रही है।

दिल्ली के वकील विनीत जिंदल ने साल 1990 में हुए कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की दोबारा जाँच के लिए रामनाथ कोविंद (Ram Nath kovind) के पास याचिका भेजी है। अपनी याचिका में जिंदल ने इस पूरे नरसंहार की जाँच एसआईटी (SIT) कराने की माँग की है।

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता जिंदल ने अपनी याचिका में कहा कि उस साल कश्मीर में हिंदुओं का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ। इस हत्याकांड के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने कश्मीरी पंडितों को न्याय का भरोसा दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। उन्होंने आगे कहा कि इस नरसंहार को लेकर 215 प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इन मामलों की जाँच जम्मू-कश्मीर पुलिस ने की थी, लेकिन वह आतंकवादियों को दंडित करने के लिए कोई उपाय करने में विफल रही।

जिंदल ने कहा कि अगर सिखों के नरसंहार के 33 साल बाद केस को ओपन किया जा सकता है और उसकी दोबारा जाँच हो सकती है तो 27 साल पहले कश्मीरी पंडितों के साथ हुई हिंसा के केस को खोला जा सकता है और इसकी दोबारा जाँच कराई जा सकती है। अधिवक्ता ने कहा कि यह एक भयानक घटना थी जब कश्मीरी पंडितों के साथ सामूहिक बलात्कार, हत्या, अपहरण ने उन्हें हमेशा के लिए सदमे में धकेल दिया।

वहीं, भरत गुप्ता नाम के एक यूजर ने ट्वीट कर सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि इस मामले वह स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करे। उन्होंने लिखा, “मैं भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से अपील करता हूँ कि वे 1990 में कश्मीर घाटी में हुए हिंदू नरसंहार का स्वत: संज्ञान लेते हुए आरोपितों की पहचान का आदेश दें। इतने सारे सबूतों के बीच नूरेमबर्ग ट्रायल की तरह आदेश देना उनका कर्तव्य है।”

इसका जवाब देतेे हुए कश्मीर फाइल्स के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कहा, “अगला कदम यह होना चाहिए। क्या कोई कानूनी विशेषज्ञ सलाह दे सकता है कि इस मसले को हम कैसे आगे बढ़ा सकते हैं?” इस पर सुप्रीम कोर्ट में वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने रास्ता बताया। उपाध्याय ने कहा, “पीड़ितों को जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल से NIA जाँच की सिफारिश करने का अनुरोध करना चाहिए। अगर उपराज्यपाल सिफारिश नहीं करते हैं तो पीड़ितों को जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए। यदि जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय याचिका को खारिज करता है तो मैं उच्चतम न्यायालय में उपलब्ध हूँ।”

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