राहुल क्या अब जर्मनी तय करेगा भारत की न्याय प्रणाली कितनी स्वतंत्र? विदेशी टूलकिट और कांग्रेस के बीच संबंध का राज


कांग्रेस समर्थक विदेशी टूलकिट का राज खुल गया है। राहुल गांधी ने लंदन में कहा था कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो रहा है और अमेरिका और यूरोप से गुहार लगाई थी कि वे इसमें हस्तक्षेप करें। इसके बाद सबसे पहले अमेरिका ने बयान दिया कि उसकी राहुल गांधी मामले पर नजर है। अब जर्मनी ने बयान दिया है कि हम उम्मीद करते हैं कि राहुल गांधी मामले में न्यायिक स्वतंत्रता और मौलिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन किया जाएगा। तो क्या अब जर्मनी तय करेगा भारत की न्याय प्रणाली कितनी स्वतंत्र है? कायदे से अमेरिका और जर्मनी के बयान की भारत में आलोचना होनी चाहिए कि आखिर भारतीय न्यायिक प्रणाली पर और देश के आंतरिक मामले में जर्मनी का क्या काम? इसके उलट राहुल गांधी के करीबी कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने जर्मनी के बयान का स्वागत किया है। इससे कांग्रेस समर्थक विदेशी टूलकिट का राज खुल गया है।

टूलकिट के समर्थन से भारत को कमजोर वाले राहुल गाँधी और इनको समर्थन देने वाली पार्टियों से देश यह भी जानना चाहता है कि सोनिया गाँधी, राहुल, प्रियंका और अन्य पार्टियों के पास इतनी दौलत होने का क्या राज है? भाजपा और इसके समर्थक दलों को इस गंभीर मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाना चाहिए।  

देश ने मोदी को दिल में बसाया, 2024 में विदेशी ताकतों का सपना होगा चकनाचूर

जिस तरह 2014 के बाद से भारत विकास के पथ पर अग्रसर है उसे देखते हुए देशवासियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिल में बसाया है। इसकी झांकी पीएम मोदी के रोड शो में साफ देखने को मिलती है। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं भारतीय मतदाताओं को प्रभावित करने वाले ये विदेशी ताकतें कौन होता है। भारतीय मतदाता निश्चित रूप से 2024 में मोदी जी को फिर से वापस लाएगा! 2024 में विदेशी ताकतों का सपना चकनाचूर होगा। देशों में शासन परिवर्तन के उसके मंसूबे का अंत भारत में होगा। भारत में ऐसा कुछ करने की कोशिश करना मुश्किल है। अब देश ने मोदी को दिल में बसा लिया है।

राहुल ने कहा था – देश में लोकतंत्र समाप्त हो रहा, अमेरिका और यूरोप चुपचाप देख रहे

राहुल ने लंदन में जर्नलिस्ट एसोसिएशन नाम के संगठन की ओर से आयोजित कार्यकम में कहा था, ”यदि यूरोप से तीन या 4 गुना बड़े देश में लोकतंत्र खत्म हो जाता है, तो आप कैसे रिएक्ट करेंगे। असल में भारत में ऐसा हो चुका है, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है। इसकी वजह यह है कि कारोबार और पैसे का मामला है। अमेरिका से आबादी में तीन से 4 गुना बड़े देश में लोकतंत्र समाप्त हो रहा है और इसकी रक्षा करने का दावा करने वाले अमेरिका और यूरोप चुपचाप देख रहे हैं।” राहुल ने कहा था, विपक्ष के तौर पर हम लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन यह अकेले भारत की जंग नहीं है। यह पूरे लोकतंत्र का एक संघर्ष है।

राहुल खुद को समझते देश से ऊपर, देश को नीचा दिखाने का मौका नहीं छोड़ते

राहुल खुद को देश से ऊपर समझते हैं, राहुल गांधी को नियम तोड़ने की आदत हो गई है। यही वजह है कि उनके कर्म ने यह सजा दी है। लंदन जाकर देश को नीचा दिखाना, लोकतंत्र खतरे में है बताना और विदेशी ताकतों से हस्तक्षेप करने की बात करना इस तरह के अनगित उदाहरण हैं जब राहुल गांधी पीए मोदी बदनाम करने के लिए देश को नीचा दिखाते रहे हैं। ऐसा लगता है कि 9 साल से सत्ता सुख से वंचित राहुल इस कदर विचलित हो गए हैं कि वे अनाप-शनाप कुछ भी बोल देते हैं।

मोदी-विरोध से भारत विरोध पर उतरे राहुल

राहुल गांधी को जब भारत जोड़ो यात्रा में सफलता नहीं मिली तो वह विदेश की धरती पर जाकर मोदी-विरोधी प्रचार करने लगे। मोदी-विरोध करते-करते वे भारत विरोध भी उतर आए हैं जो कि काफी गंभीर बात है। राहुल गांधी को देश की सरकार या पीएम मोदी से चाहे कितनी भी घृणा, तथा नफरत क्यों ना हो, लेकिन उन्हें देश के बाहर जाकर देश की बुराई नहीं करनी चाहिए। राहुल को यह समझना चाहिए कि विदेश वाले उन्हें वोट देने नहीं आयेंगे। वोट तो उन्हें भारतवासी ही देंगे।

अमेरिका भी रख रहा राहुल गांधी विवाद पर नजर

अमेरिका ने राहुल गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि कानून के शासन और न्यायिक स्वतंत्रता के लिए सम्मान किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला है। अमेरिका भारतीय अदालतों में गांधी के मामले को देख रहा है। उनका कहना है कि भारत के साथ अमेरिका लोकतांत्रिक मूल्यों पर साझा प्रतिबद्धता को लेकर जुड़ा हुआ है।

भारत में राहुल गांधी की संसद से सदस्यता जाने के एक सवाल में उप प्रवक्ता वेदांत पटेल ने कहा, हम हमारे दोनों लोकतंत्रों को मजबूत करने के अहम पहलू के तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी के साथ लोकतांत्रिक सिद्धांतों की सुरक्षा की जरुरतों को दिखाना जारी रखते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या अमेरिका भारत या राहुल गांधी के साथ बातचीत कर रहा है। इसपर उन्होंने कहा कि इसपर कहने के लिए फिलहाल उनके पास कुछ नहीं है।

जर्मनी ने कहा- उम्मीद है न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों का पालन किया जाएगा

जर्मनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा, “हम भारत में विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी के खिलाफ आए अदालत के फैसले और उनकी संसद सदस्यता रद्द होने के मामले पर नजर बनाए हुए हैं। राहुल गांधी फैसले के खिलाफ अपील करने की स्थिति में हैं। अपील के बाद स्पष्ट होगा कि फैसला कायम रहेगा या नहीं और उनकी संसद सदस्यता रद्द करने का कोई आधार है या नहीं। हम उम्मीद करते हैं कि न्यायिक स्वतंत्रता और मौलिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन किया जाएगा।”

आंतरिक मामले में दखल के लिए दिग्विजय ने जर्मनी का जताया आभार

ओबीसी समाज को अपमानित करने के मामले में कोर्ट ने राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई। इसके बाद संसद ने कानून के तहत उनकी सदस्यता खत्म की। लेकिन दूसरे देशों की प्रतिक्रिया ने भारत को हैरान कर दिया है। भारत के आंतरिक मामले में जर्मनी की दखल के बाद कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने आभार जताते हुए ट्वीट किया। उन्होंने भारत में लोकतंत्र के कमजोर होने का आरोप लगाया। दिग्विजय सिंह ने लिखा, “धन्यवाद, जर्मनी विदेश मंत्रालय और रिचर्ड वॉकर, जिन्होंने इस पर ध्यान दिया कि किस तरह से राहुल गांधी को निशाना बनाने के लिए लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है।”

क्या भारत में जनतंत्र और न्यायपालिका चलाने के लिए विदेशी ताकतें आएंगी

जिस तरह राहुल गांधी ने अमेरिका और यूरोप से भारत में हस्तक्षेप करने की मांग की और उसके बाद अमेरिका और जर्मनी का बयान देना यह साबित करता है कांग्रेस विदेशी ताकतों से मिली हुई है। भारत में पीएम मोदी के नेतृत्व में जिस तरह देश लगातार तरक्की के रास्ते पर जा रहा है ऐसे में कांग्रेस के पास देश में मोदी सरकार का विरोध करने का कोई मुद्दा नहीं है। यही वजह है कि वे विदेशी ताकतों की शरण में पहुंच गए हैं। लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या अब भारत में जनतंत्र और न्यायपालिका चलाने के लिए विदेशी ताकतें आएंगी?

राहुल की विदेशी सांठगांठ और आमंत्रण की खुली पोल

राहुल गांधी से पहले कोर्ट की सजा के बाद 15 से अधिक सांसदों की सदस्यता खत्म हुई। लेकिन किसी भी मामले में दूसरे देशों ने कोई बयान जारी नहीं किया। लेकिन राहुल के मामले में बयान जारी करना और इस पर अमेरिका और जर्मनी द्वारा नजर बनाये रखना यह साबित करता है कि कांग्रेस की सरकारें रूस, अमेरिका, जर्मनी, चीन जैसे विदेशी सरकारों के इशारों पर चल रही थी। भारत की नीतियां इन देशों के अनुरूप बनाई जा रही थीं। कांग्रेस की सरकारें दूसरे देशों को खुश करने के लिए राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि दे रही थी। चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी और कांग्रेस के बीच इसका प्रमाण है। मोदी सरकार की स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता ने इन देशों को परेशान कर दिया है। इसलिए ये देश भारत में एक ऐसी कठपुतली सरकार चाहते हैं, जो इनके इशारों पर काम कर सके।

कांग्रेस को देश के लोगों पर नहीं, विदेशी पर ज्यादा भरोसा

कांग्रेस क्यों विदेशी ताकतों से मदद ले रही है, इसकी तह में जाएं तो पाएंगे कि कांग्रेस पार्टी को देश के लोगों पर कभी भरोसा ही नहीं रहा। इसीलिए वे लगातार देश विरोधी बातें करते हैं। वे लगातार देश को नीचा दिखाने का कृत्य करते हैं। सनातन धर्म का वे अनादर करते हैं। दशकों तक देश के लोगों को विकास से वंचित रखा। सीमा के गांवों में सड़कें इसलिए नहीं बनाई कि विदेशी सेना इसका उपयोग कर लेगी, यानि देश की सेना पर भी भरोसा नहीं था। 60 सालों तक देश लूटने वाली कांग्रेस ने देश भ्रष्टाचार जरूर दिया है। अब चूंकि उनका देश के लोगों में भरोसा नहीं है, इसीलिए वे फिर से सत्ता में लौटने और लूट को अंजाम देने के लिए विदेशी ताकतों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।

गांधी परिवार की चीन से नजदीकी का राज क्या है?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी लंदन यात्रा के दौरान कम्युनिस्ट राष्ट्र चीन की तारीफ़ करते हुए कहा कि चीन शांति का पक्षकार है। चीन की तारीफ करने से पूर्व अगर तारीखों पर नजर डालेंगे पाएंगे कि सिर्फ़ राहुल गांधी ही नहीं बल्कि पूरा गांधी परिवार चीन की कम्युनिस्ट विचारधारा की गिरफ़्त में रहा है। जब देश में डोकलाम विवाद चल रहा था, उस समय राहुल गांधी चीन के अधिकारियों से साथ मुलाकात कर रहे थे। उसी दौरान गांधी परिवार को चीनी राजदूत के साथ डिनर पर देखा जा सकता है। सवाल यह है कि गांधी परिवार किस हैसियत से चीनी राजदूतों के साथ यह मेलज़ोल कर रहा था? गांधी परिवार और कम्युनिस्ट राष्ट्र चीन की जुगलबंदी का राज क्या है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सकारात्मक छवि भारत में बनाने पर गांधी परिवार क्यों काम कर रहा था। आज देश की 140 करोड़ जनता यह जानना चाहती है कि राहुल गांधी और उनके परिवार के सदस्यों ने मिलकर चीनी सरकार से कौन सा गुप्त समझौता किया है।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ सोनिया गांधी की यह तस्वीर 7 अगस्त 2008 की है, जब चीन बीजिंग ओलंपिक का आयोजन कर रहा था। इसमें हैरान करने वाली बात यह थी कि भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की जगह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष को ठीक 7 अगस्त, 2008 के दिन ही सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता हुआ था। 2008 में CCP और कॉन्ग्रेस के बीच यह MoU तब हुआ जब भारत में वामपंथी दलों ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली UPA-1 सरकार में विश्वास की कमी प्रकट की थी।

विदेशी ताकतें भारत में चाहती है कमजोर और गठबंधन सरकार

विदेशी ताकतें और जार्ज सोरोस जैसे लोग भारत में एक कमजोर और गठबंधन सरकार को पसंद करते हैं, जिससे वे अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसे चला सकें। एक स्थिर, पूर्ण बहुमत वाली सरकार से वे डरते हैं और इसीलिए उसे हटाना चाहते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि राहुल गांधी 2022 में जब ब्रिटेन में थे उसी समय सोरोस भी ब्रिटेन में था। यह डीपस्टेट का षड़यंत्र है जिसमें कांग्रेस सहित लेफ्ट लिबरल मिले हुए हैं।

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