उत्तर प्रदेश : नीलकंठ मंदिर को ध्वस्त कर बनाई गई जामा मस्जिद शम्सी: कोर्ट ने तय कर दी सुनवाई की तारीख़, होगा सर्वे?

बदायूँ की जामा मस्जिद शम्सी के नीलकंठ महादेव होने का दावा, अदालत में उठी सर्वे करनी की माँग (फोटो साभार: jagran.com)
उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले की जामा मस्जिद शम्सी और नीलकंठ मंदिर विवाद पर अदालत में अब 6 जनवरी, 2023 को सुनवाई होगी। जामा मस्जिद शम्सी का वैज्ञानिक सर्वे और वहाँ पूजा करने की अनुमति की माँग संबंधित विवाद पर अदालत में सुनवाई हुई थी।

रामजन्मभूमि मंदिर के लिए हो रही लड़ाई के समय हिन्दू संगठनों ने बाबरी समर्थकों से स्पष्ट रूप में कहा था कि 'तुम हमारे तीन तीर्थ-अयोध्या, काशी और मथुरा- हमें दे दो, अन्यथा हम अपने 30,000 धार्मिक लेकर रहेंगे', लेकिन बाबरी समर्थकों को इस बात का आभास नहीं था कि जब समय चक्र घुमेगा केवल चीख-पुकार के कुछ नहीं होगा। 2014 में ऐसा समय चक्र घुमा कि अब एक-एक कर मुग़ल आतताइयों द्वारा हिन्दू धार्मिक को मस्जिद, दरगाह या कब्रिस्तान बनाया गया था, उनके आंदोलन का शंखनाद हो चूका है। ये कट्टरपंथी भूल रहे हैं कि जिन मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध भड़का रहे हो, वही मुसलमान सच्चाई सामने आने पर तुम्हारा ही दुश्मन बनने से पीछे नहीं हटेगा। अयोध्या का मामला तो निपट गया, काशी, मथुरा और दो-एक स्थानों से झूठ का पर्दा उठने दो, फिर कोई 'सर तन से जुदा' में भी साथ देने वाला नहीं मिलेगा। यह कटु सच्चाई। सच्चाई सामने आने में देरी हो सकती है, लेकिन सच परास्त नहीं हो सकता। सनातन धर्म यही कहता है। कट्टरपंथी पुरातत्व सर्वे से क्यों भाग रहे हैं? क्यों इसका विरोध कर रहे हैं? इस कटु सच्चाई को गंभीरता से लेना होगा।   

दरअसल, इसे मामले को लेकर मंगलवार (19 दिसंबर, 2023) को ‘अखिल भारत हिंदू महासभा’ की तरफ से सिविल जज सीनियर डिवीजन (फास्ट ट्रैक) अदालत में अर्जी दी गई थी। अपनी अर्जी को सही साबित करने के लिए हिंदू महासभा की तरफ से गजटीय सुबूत भी पेश किए गए थे।

अगस्त 2022 में हिन्दू महासभा के प्रदेश संयोजक मुकेश पटेल ने बदायूँ की जिला अदालत में मस्जिद में पूजा पाठ करने की याचिका दायर दी थी। हिन्दू पक्ष ने बदायूँ की जामा मस्जिद शम्सी में पूजा के अधिकार और मस्जिद के ASI के सर्वेक्षण की माँग की थी। उन्होंने दावा किया था कि जामा मस्जिद शम्सी वाली जमीन पर अतीत में नीलकंठ महादेव मंदिर था। मुस्लिम शासकों ने इस मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद बना दी थी। वहाँ अभी भी मंदिर के अवशेष होने का तर्क देते हुए हिंदू पक्ष ने वहाँ पूजा की मंज़ूरी की माँगी थी।

 इस केस में अदालती सुनवाई के दौरान जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी, जिला प्रशासन, वक्फ बोर्ड, पुरातत्व विभाग ने अपना-अपना पक्ष पेश कर चुका है। वहीं जामा मस्जिद शम्सी की तरफ से इस याचिका को खारिज करने की माँग की गई है।

मंगलवार को इस अदालत में सुनवाई के दौरान हिंदू महासभा के अधिवक्ता वेदप्रकाश साहू ने जामा मस्जिद शम्सी वैज्ञानिक सर्वे की अर्जी भी लगा दी। उनके मुताबिक, याचिका के समर्थन में अदालत को गजेटियर में मौजूद सुबूत दिए गए हैं। अब याचिका सुनवाई का इंतजार है। दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में अयोध्या, काशी और मथुरा के बाद बदायूँ की जामा मस्जिद शम्सी भी इस्लामी आक्रांताओं ने भगवान शंकर के मंदिर को नष्ट कर खड़ी की थी।

हिन्दू पक्ष ने दावा है कि इस जगह पर भारत में इस्लामी आक्रांताओं के आने से पहले भगवान शिव का नीलकंठ मन्दिर था। बदायूँ के सूबेदार रहने के दौरान भारत के पहले इस्लामिक शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के दामाद इल्तुतमिश ने इस मंदिर को तोड़कर यहाँ जामा मस्जिद शम्सी बनवाई थी।

इसका पहला सुबूत पहला प्रमाण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की साल 1875 से 1880 तक बदायूँ से लेकर बिहार तक किए गए सर्वेक्षण की 148 साल पुरानी ‘TOURS IN THE GANGETIC PROVINCES from Badaon to Bihar’ नाम की रिपोर्ट में मिलता है। इसे खुद ASI के नींव रखवे वाले अलेक्जेंडर कनिंघम ने तैयार किया था।

इस रिपोर्ट के पहले पेज पर ही बदायूँ की विवादित जामा मस्जिद शम्सी की सर्वेक्षण रिपोर्ट है। इस सर्वे रिपोर्ट में लिखा है कि बदायूँ में इस्लामिक आक्रांताओं के शासन से पहले यहाँ के राजा महिपाल ने हरमंदर नाम से एक हिन्दू मन्दिर बनवाया था। इसे जिसे मुस्लिम आक्रांताओं ने तोड़ दिया था और इसी जगह पर बदायूँ की जामा मस्जिद को बनवाया था।

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