मेरी बात हो सकता है कुछ अजीब लगे परंतु दिखाई तो यही दे रहा है कि केजरीवाल न्यायपालिका को नाच नचाने में सफल हो रहा है। ऐसा पिछले 3 दिनों में साफ़ नज़र आया। न्यायपालिका जितना भोला और ईमानदार इसे समझ रही है, उतना है नहीं। इसका बस चले तो न्यायपालिका को ही घर बुला ले। आइए इन मामलों पर नज़र डालते हैं।
कल शराब घोटाले में ED के समन के संबंध में केजरीवाल को Rouse Avenue court में पेश होना था लेकिन उसके पहले उसने विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव और बजट अधिवेशन रख दिया और जज साहब को virtually पेश हो कर गोली खिला दी कि अभी वह नहीं आ सकता और जज साहब ने एक माह बाद 16 मार्च की तारीख लगा दी। इतनी लंबी तारीख लगाने का क्या मतलब था, विधानसभा का अधिवेशन चल रहा है तो कोर्ट उसे रविवार को बुला सकता था या रात के समय बुला सकता था लेकिन लगता है कोर्ट की ऐसी कोई मंशा थी ही नहीं;
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तीसरा मामला वर्ष 2014 का है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस M M Sundresh और जस्टिस S V N Bhatti की पीठ ने चौथी बार केजरीवाल पर मुकदमा चलाने पर रोक को बढ़ा दिया। यह मामला 2 मई, 2014 का है (10 साल पुराना) जब केजरीवाल मुख्यमंत्री नहीं था, तब उसने उत्तर प्रदेश की एक चुनाव सभा में बयान दिया था :-
“जो कांग्रेस को वोट देंगे, उन्हें गद्दार माना जाएगा और जो भाजपा को वोट देंगे, उन्हें “खुदा” भी कभी माफ़ नहीं करेगा”
एक शिकायतकर्ता ने People Representation Act के section 125 में दर्ज केस करा दिया जिसमे लोगों के बीच “religion, race, caste, community या Language के आधार पर नफरत फ़ैलाने के आरोप में 3 साल की सजा का प्रावधान है। ये केस सुल्तानपुर ट्रायल कोर्ट में लंबित है जिसे रद्द करने की केजरीवाल की याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 9 साल बाद 16 जनवरी, 2023 को ख़ारिज कर दी थी।
अब आप देखिए कि 10 साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट केजरीवाल पर मुकदमा चलाने पर रोक लगा रहा है तो कब केस चलेगा और कब फैसला होगा। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि “Let the interim order continue. What is all this? These are all irrelevant matters. It is not a matter for us to go into,”
सुप्रीम कोर्ट को अगर लगता है कि यह irrelevant matter है तो खारिज कर देना चाहिए लेकिन इतने समय बाद केस रोकना नहीं चाहिए। उस समय केजरीवाल क्योंकि मुख्यमंत्री नहीं था तो आज उस केस का खर्च भी दिल्ली सरकार को वहन नहीं करना चाहिए जबकि हर तारीख पर केजरीवाल की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट जाता है और लाखों की फीस लेता होगा।
यह खर्च केजरीवाल को उठाना चाहिए, मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कुछ समय पहले पंजाब की भगवंत मान सरकार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और जेल मंत्री रहे सुखजिंदर सिंह रंधावा से 55 लाख रुपए की मांग की थी मुख़्तार अंसारी पर हुए खर्च की भरपाई के लिए। ऐसे में केजरीवाल के मुक़दमे का खर्च भी उसे खुद ही उठाना चाहिए। इतना ही नहीं मोदी की डिग्री केस में भी सारा खर्च केजरीवाल को उठाना चाहिए क्योंकि मोदी की डिग्री मांगना और उसके लिए आरोप लगाना केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की हैसियत से नहीं किया था।
अदालतों को केजरीवाल पर सख्त होना चाहिए वरना यह व्यक्ति अपने मामले लटकाने में सफल होता रहेगा -
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