भारत रूस के संबंधों से किसी को परेशान होने की क्या जरूरत है; अमेरिका चीन पाकिस्तान का दर्द एक तरफ और यूक्रेन की नासमझी दूसरी तरफ

 सुभाष चन्द्र

ऐसा नहीं है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच यह पहली शिखर वार्ता हुई हो लेकिन यह उस समय हुई जब वाशिंगटन में 9 से 11 जुलाई के बीच नाटो देशों की मीटिंग होनी थी। इस मीटिंग से पहले ही नाटो के सेक्रेटरी जनरल Jens Stoltenberg ने एक बार फिर कहा कि यूक्रेन को जल्द ही नाटो में शामिल किया जाएगा और यह ही रूस यूक्रेन युद्ध का मुख्य कारण था। 

प्रधानमंत्री मोदी मास्को 10 जुलाई को गए लेकिन उसके पहले 8 जुलाई को रूस ने कीव पर जबरदस्त हमला कर 50 से ज्यादा मिसाइल दाग दी और बच्चों समेत 36 लोगों की मौत हुई। उस हमले का मोदी की यात्रा से कोई संबंध नहीं था बल्कि नाटो की मीटिंग से एक दिन पहले यह हमला करके पुतिन ने नाटो को एक बार फिर संदेश दिया था कि यूक्रेन के लिए गलती मत करना। 

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भारत रूस के संबंध वैसे तो बहुत समय से प्रगाढ़ रहे हैं लेकिन वर्तमान में इन संबंधों की वजह मोदी और पुतिन की निजी घनिष्ठता है यह अमेरिका को बर्दाश्त नहीं होता और इसलिए 26 जून को अमेरिका के उप-मंत्री कर्ट कैम्पबेल ने स्पष्ट कहा कि “भारत-रूस के गहरे रिश्तों पर अमेरिका को एतराज है और हमने अपनी चिंताओं से भारत को अवगत करा दिया है; इन रिश्तों की वजह से अमेरिका द्वारा भारत को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी देने की कोशिशों में असर पड़ सकता है” यानी अमेरिका भारत को ब्लैकमेल करना चाहता है जो कोई समझदारी नहीं है। 

अमेरिका का यह दृष्टिकोण उसके अपने हित में भी नहीं है क्योंकि रूस ने कभी अपने  भारत से संबंधों के चलते भारत अमेरिका के रिश्तों पर रोक लगाने की कोशिश नहीं की दूसरी तरफ ढाई साल से चल रहे रूस यूक्रेन युद्ध में अमेरिका ने हर तरह के प्रतिबंध रूस पर लगा कर भारत से अपेक्षा की कि वह उन प्रतिबंधों के अनुसार रूस से दूरी बना कर रखें खासकर क्रूड आयल का आयात न करे लेकिन मोदी ने एक नहीं सुनी दरअसल अमेरिका इस युद्ध के चलते रूस को आर्थिक तौर पर दिवालिया कर देना चाहता था जिसे भारत ने बचा लिया और यह बात पुतिन अच्छी तरह जानते हैं।  

भारत रूस ने एक दूसरे के प्रति उस कहावत को चरितार्थ किया है जिसमें कहा गया है कि  

“friend in need is a friend indeed in English” जबकि अमेरिका इस पर कई बार खरा नहीं उतरा मोदी और पुतिन के निजी संबंधों की वजह से मोदी खुल कर पुतिन को कहा था “यह युद्ध का समय नहीं है”।  

और कल फिर बड़े स्पष्ट शब्दों में पुतिन के साथ रात्रिभोज और शिखर सम्मेलन में कीव में बच्चों की मौत का मामला उठाते हुए कहा कि। “जब युद्ध में मासूम बच्चों की मौत होती है तो ह्रदय छलनी हो जाता है और यह दर्द बहुत भयानक होता है” इसके साथ ही मोदी ने पुतिन को और भी साफ़ कहा कि “बम, बंदूक और युद्ध से शांति नहीं आ सकती” यह बातें केवल एक सच्चा मित्र ही किसी मित्र को कह सकता है। 

परंतु यूक्रेन के जेलेंस्की ने समझदारी की कमी का परिचय देते हुए मोदी पर कटाक्ष किया है कि “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता मास्को में दुनिया के सबसे खूंखार नेता को गले लगाता है” मोदी का संदेश युद्ध से दूर रहने का पुतिन के लिए नहीं जेलेंस्की के लिए भी है क्योंकि जेलेंस्की अपने आप में रूस के सामने कोई हैसियत नहीं रखता अगर नाटो देश उसके साथ न होते। 

मोदी-पुतिन की दोस्ती में एक छुपा हुआ डर चीन को भी रहता है कि कहीं रूस चीन से अलग न हो जाए और मुझे लगता है भविष्य में ऐसा ही होगा क्योंकि रूस का तो भारत से साथ दे दिया अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते लेकिन कल चीन के साथ ऐसा हुआ ताइवान से छेड़छाड़ करके तो भारत किसी हालत में उसका साथ नहीं देगा।  

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