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30 देशों की 120 सीक्रेट बायोलैब्स में अमेरिकी फंडिंग: कुर्सी छोड़ने से पहले तुलसी गबार्ड ने खोले US के राज, कहा- खतरनाक Pathogens पर हुई रिसर्च

                                                                         तुलसी गबार्ड
अमेरिका की डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (DNI) तुलसी गबार्ड ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिकी सरकार ने दुनिया के 30 से अधिक देशों में 120 से ज्यादा जैविक प्रयोगशालाओं (Biolabs) को फंडिंग दी है, जिनमें यूक्रेन की लैब्स भी शामिल हैं। गबार्ड ने कहा कि इन लैब्स में खतरनाक रोगाणुओं (Pathogens) पर रिसर्च की गई और इसकी जानकारी अमेरिकी जनता से सालों तक छिपाई गई।

गबार्ड ने शुक्रवार (12 जून 2026) को जारी एक बयान में कहा कि कई महीनों तक खुफिया दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद उन्हें पता चला कि अमेरिकी फंडिंग से दुनिया भर में बायोलैब्स का एक बड़ा नेटवर्क चल रहा है। उन्होंने विशेष रूप से यूक्रेन में मौजूद लैब्स को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इन प्रयोगशालाओं को नुकसान पहुँचने, कब्जे में जाने या हमला होने का खतरा बना हुआ है।

गबार्ड ने दावा किया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की पहले की रिपोर्टों में भी चेतावनी दी गई थी कि यूक्रेन की कुछ लैब्स में संभावित रूप से खतरनाक रोगाणु रखे गए हैं। युद्ध के दौरान अगर ये लैब्स प्रभावित होती हैं तो बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लैब्स की लोकेशन, फंडिंग और गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जानबूझकर छिपाई गई।

गबार्ड ने कहा, “अमेरिकी फंडिंग वाली इन बायोलैब्स के अस्तित्व, इतिहास, स्थान और फंडिंग को प्रभावशाली लोगों ने जानबूझकर छिपाया। जो लोग इनके बारे में सवाल उठाते थे, उन्हें विदेशी एजेंट और अमेरिका का गद्दार तक बताया गया।”

गबार्ड ने ‘गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च’ (Gain-of-Function Research) पर भी चिंता जताई। यह ऐसी रिसर्च होती है जिसमें वायरस या रोगाणुओं को बदलकर यह समझने की कोशिश की जाती है कि वे कैसे फैलते हैं या ज्यादा खतरनाक बन सकते हैं। इस तरह की रिसर्च को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। गबार्ड ने इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 25 मई 2025 के उस एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से जोड़ा है जिसमें दुनिया भर में ऐसी रिसर्च के लिए फेडरल फंडिंग रोकने का फैसला लिया गया था।

उन्होंने पूर्व अमेरिकी सरकारों, कुछ स्वास्थ्य अधिकारियों और खासतौर पर एंथनी फाउची पर भी निशाना साधा। गबार्ड ने आरोप लगाया कि अमेरिकी जनता से इन लैब्स के बारे में सच छिपाया गया और जो लोग सवाल उठाते थे उन्हें दबाने की कोशिश की गई। गबार्ड ने कहा कि उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को विदेशों में मौजूद इन बायोलैब्स पर ज्यादा जानकारी जुटाने के निर्देश दिए हैं।

गबार्ड ने हाल ही में अपने पद से इस्तीफे का भी ऐलान किया है। उन्होंने 22 मई को बताया था कि वह 30 जून से पद छोड़ देंगी। गबार्ड ने कहा कि उनके पति अब्राहम विलियम्स को हड्डियों के कैंसर की एक दुर्लभ बीमारी हुई है और वह परिवार के साथ समय बिताना चाहती हैं। हालाँकि, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि विदेश नीति समेत कई मुद्दों पर प्रशासन के कुछ हिस्सों से उनके मतभेद थे।

भारत के खिलाफ आतंकी साजिश रचने के आरोप में 6 यूक्रेनी और 1 अमेरिकी गिरफ्तार, यूरोप से ड्रोन मँगाकर म्यांमार भेज रहे

        यूरोप से ड्रोन मंगवाकर म्यांमार भेज रहे थे विदेशी, भारत में रची आतंकी साजिश (साभार : Moneycontrol)
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने के आरोप में 7 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। इनमें 6 यूक्रेन के और 1 अमेरिका का नागरिक शामिल है। इन आरोपितों को दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता एयरपोर्ट से पकड़ा गया है।

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी विधानसभा में पुष्टि की कि अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई विदेशी नागरिक मिजोरम के रास्ते म्यांमार जाकर उग्रवादियों को हथियारों की ट्रेनिंग दे रहे हैं। इनमें से कुछ के रूस-यूक्रेन युद्ध में शामिल होने की भी खबर है।

NIA के मुताबिक, ये लोग यूरोप से ड्रोन की बड़ी खेप मँगाकर भारत के रास्ते म्यांमार के विद्रोही समूहों को सप्लाई कर रहे थे, जो भारतीय उग्रवादियों की मदद करते हैं। जाँच में सामने आया है कि ये सभी आरोपित वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन अनिवार्य ‘प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट’ (RAP) के बिना मिजोरम पहुँच गए।

वहाँ से इन्होंने सीमा पार कर म्यांमार में भारत विरोधी जातीय समूहों से मुलाकात की। NIA ने कोर्ट को बताया कि ये आरोपित ड्रोन की सप्लाई के साथ-साथ आतंकी ट्रेनिंग और हथियारों के नेटवर्क में भी शामिल थे।

पटियाला हाउस कोर्ट ने साजिश की गहराई और फंडिंग के स्रोतों का पता लगाने के लिए आरोपितों की हिरासत 27 मार्च तक बढ़ा दी है। एजेंसी अब इनके मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया अकाउंट्स को खंगाल रही है ताकि भारत में छिपे इनके अन्य साथियों और विदेशी हैंडलर्स का पर्दाफाश किया जा सके।

रूस ने ताबड़तोड़ ड्रोन छोड़े: 3 दिन में 500+ हवाई हमलों से दहला यूक्रेन, खारकीव में 9 मिनट तक होती रही लगातार बमबारी, 1 जून वाले हमले का बदला

खारकीव में ड्रोन हमले के बाद बिजली गुल की तस्वीर (बाएँ), यूक्रेनी सैनिकों के शवों को ले जाने वाले काफिले (दाएँ), (फोटो साभार : Hindustan Times & Mint)
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष में बुधवार (11 जून 2025) को रूस ने यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खारकीव पर 9 मिनट का लक्षित ड्रोन हमला किया, जिसके बाद यह दावा किया गया कि यह यूक्रेन द्वारा रूसी क्षेत्र में हालिया हमलों का ‘करारा जवाब’ था। इस सटीक सैन्य कार्रवाई में 6 लोगों की जान गई और 64 लोग घायल हुए, जिनमें 9 बच्चे भी शामिल थे।

वहीं, 12 जून 2025 को भी खारकीव में ड्रोन हमले हुए और दक्षिणी यूक्रेन के मायकोलाइव और खेरसॉन में बिजली गुल हो गई। युद्धग्रस्त इलाकों में 1,212 सैनिकों के शवों और कैदियों की अदला-बदली हुई है, लेकिन रूस अपनी शर्तों पर अड़ा है, जिससे शांति की उम्मीद अभी भी दूर है।

युद्ध की शुरुआत: 2022 का ‘महायुद्ध’

रूस और यूक्रेन के बीच यह भीषण युद्ध फरवरी 2022 में शुरू हुआ, जब रूस ने यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला कर दिया। हालाँकि, दोनों देशों के बीच तनाव की जड़ें 2014 से ही गहरी हो चुकी थीं, जब रूस ने क्रीमिया को अपने में मिला लिया और पूर्वी यूक्रेन के डोनबास इलाके में अलगाववादियों का समर्थन करना शुरू कर दिया था।

रूस इस युद्ध को अपनी सुरक्षा का मसला बताता है, खासकर नाटो (NATO) के लगातार बढ़ते दायरे और यूक्रेन के पश्चिमी देशों की तरफ झुकाव को लेकर उसकी चिंताएँ रही हैं।

 यूक्रेन ने 1 जून 2025 को रूस पर बड़ा ड्रोन हमला किया था, जिसे ‘ऑपरेशन स्पाइडरवेब‘ का नाम दिया गया था। इस हमले में यूक्रेन ने रूस के परमाणु-सक्षम लंबी दूरी के बॉम्बर को निशाना बनाने का दावा किया था, जिससे रूसी सैन्य शक्ति को भारी नुकसान पहुँचाने की बात कही गई थी।

यूक्रेन को आर्थिक मदद

इस युद्ध में मुख्य रूप से रूस और यूक्रेन आमने-सामने हैं। यूक्रेन को अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और कई अन्य पश्चिमी देशों से भारी मात्रा में सैन्य और आर्थिक मदद मिल रही है। रूस पर कई देशों ने कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, जबकि बेलारूस जैसे कुछ देश रूस का साथ दे रहे हैं।
युद्ध में दोनों पक्ष ड्रोन, मिसाइल, तोपखाने और हवाई हमलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। यूक्रेन में खारकीव, लुगांस्क, डोनेट्स्क, ज़ापोरिज़्ज़िया और खेरसॉन जैसे इलाके इस युद्ध के मुख्य मैदान बने हुए हैं, जहाँ लगातार गोलीबारी और हमले हो रहे हैं।

शांति वार्ता: एक उम्मीद, एक हताशा

हाल ही में, एक सकारात्मक खबर यह भी आई थी, कि रूस ने 1,212 यूक्रेनी सैनिकों के शव लौटाए हैं, जो युद्ध में मारे गए थे। यह वापसी पिछले सप्ताह इस्तांबुल में हुई शांति वार्ताओं के दौरान हुए समझौते का हिस्सा थी, जहाँ कैदियों की अदला-बदली पर भी सहमति बनी थी।
यूक्रेनी सरकार ने बताया कि लौटाए गए अवशेषों में खारकीव, लुगांस्क, डोनेट्स्क, ज़ापोरिज़्ज़िया और खेरसॉन जैसे इलाकों में मारे गए सैनिकों के साथ-साथ रूस के कुर्स्क क्षेत्र में यूक्रेन के जवाबी हमले में शहीद हुए सैनिक भी शामिल हैं।
हालाँकि, इस्तांबुल में हुई दो दौर की बातचीत के बावजूद युद्ध खत्म होने की कोई राह नहीं निकली। कैदियों की अदला-बदली और सैनिकों के शवों की वापसी ही इन वार्ताओं के एकमात्र ठोस नतीजे रहे हैं।

शांति की राह में दीवारें

शांति अभी भी दूर की कौड़ी है क्योंकि रूस बिना शर्त युद्धविराम की माँग को लगातार ठुकरा रहा है। रूस की माँग है कि यूक्रेन अपने महत्वपूर्ण इलाकों को छोड़ दे और नाटो में शामिल होने का सपना त्याग दे। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर नागरिकों को निशाना बनाने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन इस संघर्ष में हजारों नागरिक, जिनमें ज्यादातर यूक्रेनी हैं, अपनी जान गँवा चुके हैं।

जिस अमेरिका के भरोसे जंग में कूद गया यूक्रेन, अब वही निपटाने में जुटा: जेलेंस्की-ट्रंप फाइट के बाद हथियार-पैसा सब बंद


रूस से बीते तीन वर्षों से युद्ध लड़ रहे यूक्रेन की मुश्किलें बढ़ गई हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की के अड़ियल रवैये के चलते अब उनके देश की मदद रुक गई है। जेलेंस्की के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से बहस और झगड़ा करने के बाद यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद पर विराम लग गया है। जेलेंस्की लगातार ट्रम्प के दबाव के बाद भी युद्ध जारी रखना चाहते हैं। जेलेंस्की ने सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ही नहीं बल्कि अपने पुराने एक समर्थक सीनेटर से भी झगड़ा कर लिया है।

अमेरिका नहीं देगा अब सैन्य मदद

मीडिया रिपोर्ट्स ने बताया है कि व्हाइट हाउस ने यूक्रेन को जाने वाली सारी सैन्य मदद पर रोक लगाई है। फॉक्स न्यूज को व्हाइट हाउस के एक कर्मचारी ने बताया, “राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि उनका पूरा ध्यान सीजफायर पर है। हमें चाहिए कि हमारे बाकी मित्र देश भी इसी के प्रति प्रतिबद्ध हों। हम अपनी सहायता रोक रहे हैं और इसकी समीक्षा भी ताकि शान्ति बहाली का रास्ता आसानी से निकल सके।” व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि मदद अस्थायी तौर पर ही रोकी गई है।
फरवरी, 2022 में युद्ध चालू होने के बाद अमेरिका लगातार यूक्रेन को मिसाइल, छोटे हथियार, टैंक, तोपें, गोला बारूद और बख्तरबंद गाड़ियाँ तक दे रहा था। लेकिन अब इस पर विराम लग गया है। 2022 के बाद से तीन साल के भीतर अमेरिका यूक्रेन को लगभग 175 बिलियन डॉलर (₹15 लाख करोड़ से अधिक) के सैन्य साजोसामान देने की मंजूरी दे चुका है। इसमें से 90% से अधिक मदद दी भी जा चुकी है। यह सारी मदद पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन के राष्ट्रपति रहते हुए दी गई थी।
बायडेन ने दिसम्बर, 2024 में लगभग ₹50 हजार करोड़ से अधिक की मदद का भी ऐलान किया था। यूक्रेन को लगातार अमेरिकी हथियार भेजे जा रहे थे। कई मौकों पर यूक्रेन की हार को अमेरिकी हथियारों ने ही रोका। जेलेंस्की के नेतृत्व वाला यूक्रेन 2022 में अमेरिका और पश्चिमी देशों के दम पर ही युद्ध लड़ने गया था। इसमें भी यूरोपियन देशों ने उसके आर्थिक सहायता ज्यादा दी है। हथियार अमेरिका से ही आए हैं। लेकिन अब यह बंद हो गई है। इसका रूस से चल रहे युद्ध पर गंभीर प्रभाव हो सकता है।

ट्रम्प से जेलेंस्की ने की थी खुले में लड़ाई

अमेरिका का यह मदद बंद करने का फैसला जेलेंस्की के व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रम्प और उपराष्ट्रपति जेडी वांस के साथ झगड़ा करने के बाद हुआ है। 28 फरवरी, 2025 को व्हाइट हाउस में यह झगड़ा मीडिया के सामने हुआ था। बैठक के दौरान उपराष्ट्रपति वांस ने आरोप लगाया था कि जेलेंस्की प्रोपेगेंडा कर रहे हैं और कैमरा लाकर युद्ध दिखा रहे हैं।
वहीं जेलेंस्की ने कहा था कि रूस कल को अमेरिका पर भी हमला कर सकता है। ट्रम्प ने बैठक में उनसे स्पष्ट कर दिया था कि वह कोई भी डील करने की स्थिति में नहीं हैं। ट्रम्प ने बैठक में ही जेलेंस्की को कसके लताड़ लगाई थी। ट्रम्प ने यह भी कहा था कि जेलेंस्की रूस के राष्ट्रपति पुतिन से इतनी घृणा करते हैं कि कोई डील करना मुश्किल है।
ट्रम्प ने आरोप लगाया था कि जेलेंस्की ने अमेरिका सम्मान नहीं किया है। उन्होंने कहा था कि जेलेंस्की अमेरिकी मदद का फायदा उठाना चाहते हैं। इस तू-तू मैं-मैं का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुआ था। इसके बाद से साफ़ हो गया था कि अमेरिका अब यूक्रेन को समर्थन नहीं देने वाला और जल्द शांति का पक्षधर है।

पुराने समर्थक सीनेटर से भी कर लिया झगड़ा

जेलेंस्की ने अपने अड़ियल रवैये के चलते सिर्फ ट्रम्प से ही लड़ाई नहीं की। उन्होंने अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम से भी झगड़ा मोल ले लिया है। लिंडसे ग्राहम लगातार यूक्रेन के समर्थक रहे हैं। वह रूस के खिलाफ बोलते रहे हैं और जेलेंस्की की प्रशंसा करते रहे हैं। लेकिन उनकी हरकतों पर हाल ही में उन्होंने जेलेंस्की की आलोचना की।
इतनी सी बात पर जेलेंस्की उन पर भड़क गए। उन्होंने लिंडसे ग्राहम की आलोचना कर डाली। उन्होंने कहा, “मैं उन्हें यूक्रेन की नागरिकता दे सकता हूँ। वह हमारे देश का नागरिक बन जाएँगे, और फिर उनकी बात में दम होगा। और मैं उन्हें यूक्रेन के नागरिक के तौर पर उनसे जानना चाहूंगा कि राष्ट्रपति कौन बने।”
2015 के एक कानून के अनुसार यूक्रेन में जब तक युद्ध होगा तब तक देश में चुनाव नहीं हो सकते। इसी कानून का सहारा उठा कर जेलेंस्की लगातार राष्ट्रपति बने हुए हैं। उन पर राष्ट्रपति पद हथियाने का आरोप लग रहा है। यूक्रेन में चुनाव की माँग भी तेज हो रही है।

एक युद्ध समाप्त हो सकता है तो दूसरा और भड़क सकता है, जिसके परिणाम घातक होंगे पूरे विश्व के लिए

सुभाष चन्द्र

कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान पुतिन-मोदी की Chemistry देख कर जिस तरह यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भड़के थे और पुतिन समेत मोदी के लिए भी  अपमानित करने वाली भाषा प्रयोग की थी उसे देख कर यूक्रेन भारत के मित्र देशों की श्रेणी में तो नहीं माना जा सकता, लेकिन अब समाचार मिल रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी अगस्त में यूक्रेन की यात्रा पर जाएंगे। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अलग अलग मायने निकाले जा रहे हैं मोदी जी की यूक्रेन यात्रा के। लेकिन मेरा मानना है कि जैसे जैसे अमेरिकी चुनाव करीब आ रहा है जेलेंस्की को अमेरिकी मदद मिलना बंद होना निश्चित हो रहा है और अब जेलेंस्की युद्ध बंद कर Honourable Exit Route तलाश रहा है और यह उसे भी पता है और अमेरिका समेत पूरा यूरोप भी जानता है कि मोदी अकेला वो शख्स है जो राष्ट्रपति पुतिन को युद्ध रोकने के लिए प्रभावशाली ढंग से मना सकता है और शायद इसलिए ही जेलेंस्की ने युद्ध रोकने की पूरी तैयारी करके ही मोदी को यूक्रेन आने के लिए मनाया है। जेलेंस्की मोदी के सामने अपनी वो शर्तें रखेगा जिससे उसकी इज़्ज़त भी बनी रहे और युद्ध भी समाप्त हो जाए। यह मेरा आंकलन है लेकिन मुझे शंका है कि अमेरिका इस युद्ध को रुकने देगा, यह समय ही बताएगा।

दूसरी तरफ Hamas chief Ismail Haniyeh को इज़रायल द्वारा ईरान में मार गिराने के बाद ईरान, हमास, हिज़्बुल्ला, हूती की तरफ से इजराइल के साथ भयंकर युद्ध छिड़ने की संभावना बन रही है। देखना यह होगा कि कितने इस्लामिक देश ईरान के साथ युद्ध में साथ देते है क्योंकि ईरान के युद्ध में लीडर बनने का मतलब है इस्लामिक वर्ल्ड पर शिया प्रभुत्व कायम होना और यह सुन्नी बहुल इस्लामिक देश शायद कबूल नहीं करेंगे। 

हमास का इजरायल के साथ युद्ध एक पागलपन के सिवाय कुछ नहीं है और जो सोच हमास की हैं वह ईरान, हिज्बुल्लाह और हूती भी पाले बैठे हैं। इज़राइल के अस्तित्व को ये लोग मिटा देना चाहते हैं और यह सोच पूरे विश्व को हो सकता है एक अघोषित युद्ध में धकेल दे। विश्व के अनेक देशों में फलीस्तीन को समर्थन देने की आड़ में “हमास” को ही समर्थन दिया गया है।

यह युद्ध पागलपन है यह इसी बात से साबित हो जाता है कि अब तक 38000 लोग गाज़ा में मर चुके हैं और Ismail Haniyeh ने कहा था कि उसके परिवार के 60 लोग मारे गए हैं। भला क्या मिला लेकिन फिर इजराइल को ख़त्म करने का भूत सवार है।

और इजराइल के खिलाफ ईरान और अन्य कटटरपंथी आतंकियों संगठनों द्वारा छेड़ा गया युद्ध एक Christian+Jews बनाम इस्लाम  युद्ध में बदल सकता है और जिस तरह हर मुल्क में इस्लामिक ताकतें टकराव पैदा कर रही हैं चाहे वो जर्मनी हो, ब्रिटैन हो या अन्य यूरोपीय देश हों, हर मुल्क में गृह युद्ध की स्तिथि पैदा हो सकती है जिसमें भारत भी शामिल होगा। 

ऐसा कहा जा रहा है कि Ismail Haniyeh के उत्तराधिकारी का चयन आसान नहीं होगा जिसके दावेदार हैं Khaled Mashaal और Khalil al -Hayya, यह कहना है मिस्र अलकायदा के पूर्व-संस्थापक अबू मुहम्मद अल मसरी का। Khaled Mashaal वही लीडर है हमास का जिसने इज़रायल पर हमास के हमले  के कुछ दिन बाद 27 अक्टूबर को केरल के मल्लापुरम में Virtually भाषण देकर गाज़ा की unity के लिए call दी थी।

उसके हमास का चीफ बनने से हमास की एंट्री भारत में होने की पूरी सम्भावना है क्योंकि कांग्रेस और सेकुलर खरपतवार खुली बाँहों से उनका स्वागत करेंगे और नेतृत्व करेगा ओवैसी। यह एक अलग बहाना मिलेगा कांग्रेस को भारत को अस्थिर करने का। आने वाला समय चुनौतियों से भरा होगा भारत के लिए भी। हो सकता है Ismail Haniyeh जैसे क़तर में रहता था Khaled Mashaal छुप कर भारत में रहे और इजराइल उसे भारत में ठोक दे।

भारत रूस के संबंधों से किसी को परेशान होने की क्या जरूरत है; अमेरिका चीन पाकिस्तान का दर्द एक तरफ और यूक्रेन की नासमझी दूसरी तरफ

 सुभाष चन्द्र

ऐसा नहीं है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच यह पहली शिखर वार्ता हुई हो लेकिन यह उस समय हुई जब वाशिंगटन में 9 से 11 जुलाई के बीच नाटो देशों की मीटिंग होनी थी। इस मीटिंग से पहले ही नाटो के सेक्रेटरी जनरल Jens Stoltenberg ने एक बार फिर कहा कि यूक्रेन को जल्द ही नाटो में शामिल किया जाएगा और यह ही रूस यूक्रेन युद्ध का मुख्य कारण था। 

प्रधानमंत्री मोदी मास्को 10 जुलाई को गए लेकिन उसके पहले 8 जुलाई को रूस ने कीव पर जबरदस्त हमला कर 50 से ज्यादा मिसाइल दाग दी और बच्चों समेत 36 लोगों की मौत हुई। उस हमले का मोदी की यात्रा से कोई संबंध नहीं था बल्कि नाटो की मीटिंग से एक दिन पहले यह हमला करके पुतिन ने नाटो को एक बार फिर संदेश दिया था कि यूक्रेन के लिए गलती मत करना। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भारत रूस के संबंध वैसे तो बहुत समय से प्रगाढ़ रहे हैं लेकिन वर्तमान में इन संबंधों की वजह मोदी और पुतिन की निजी घनिष्ठता है। यह अमेरिका को बर्दाश्त नहीं होता और इसलिए 26 जून को अमेरिका के उप-मंत्री कर्ट कैम्पबेल ने स्पष्ट कहा कि “भारत-रूस के गहरे रिश्तों पर अमेरिका को एतराज है और हमने अपनी चिंताओं से भारत को अवगत करा दिया है; इन रिश्तों की वजह से अमेरिका द्वारा भारत को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी देने की कोशिशों में असर पड़ सकता है”। यानी अमेरिका भारत को ब्लैकमेल करना चाहता है जो कोई समझदारी नहीं है। 

अमेरिका का यह दृष्टिकोण उसके अपने हित में भी नहीं है क्योंकि रूस ने कभी अपने  भारत से संबंधों के चलते भारत अमेरिका के रिश्तों पर रोक लगाने की कोशिश नहीं की। दूसरी तरफ ढाई साल से चल रहे रूस यूक्रेन युद्ध में अमेरिका ने हर तरह के प्रतिबंध रूस पर लगा कर भारत से अपेक्षा की कि वह उन प्रतिबंधों के अनुसार रूस से दूरी बना कर रखें खासकर क्रूड आयल का आयात न करे लेकिन मोदी ने एक नहीं सुनी। दरअसल अमेरिका इस युद्ध के चलते रूस को आर्थिक तौर पर दिवालिया कर देना चाहता था जिसे भारत ने बचा लिया और यह बात पुतिन अच्छी तरह जानते हैं।  

भारत रूस ने एक दूसरे के प्रति उस कहावत को चरितार्थ किया है जिसमें कहा गया है कि  

“friend in need is a friend indeed in English” जबकि अमेरिका इस पर कई बार खरा नहीं उतरा। मोदी और पुतिन के निजी संबंधों की वजह से मोदी खुल कर पुतिन को कहा था “यह युद्ध का समय नहीं है”।  

और कल फिर बड़े स्पष्ट शब्दों में पुतिन के साथ रात्रिभोज और शिखर सम्मेलन में कीव में बच्चों की मौत का मामला उठाते हुए कहा कि। “जब युद्ध में मासूम बच्चों की मौत होती है तो ह्रदय छलनी हो जाता है और यह दर्द बहुत भयानक होता है”। इसके साथ ही मोदी ने पुतिन को और भी साफ़ कहा कि “बम, बंदूक और युद्ध से शांति नहीं आ सकती”। यह बातें केवल एक सच्चा मित्र ही किसी मित्र को कह सकता है। 

परंतु यूक्रेन के जेलेंस्की ने समझदारी की कमी का परिचय देते हुए मोदी पर कटाक्ष किया है कि “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता मास्को में दुनिया के सबसे खूंखार नेता को गले लगाता है”। मोदी का संदेश युद्ध से दूर रहने का पुतिन के लिए नहीं जेलेंस्की के लिए भी है क्योंकि जेलेंस्की अपने आप में रूस के सामने कोई हैसियत नहीं रखता अगर नाटो देश उसके साथ न होते। 

मोदी-पुतिन की दोस्ती में एक छुपा हुआ डर चीन को भी रहता है कि कहीं रूस चीन से अलग न हो जाए और मुझे लगता है भविष्य में ऐसा ही होगा क्योंकि रूस का तो भारत से साथ दे दिया अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते लेकिन कल चीन के साथ ऐसा हुआ ताइवान से छेड़छाड़ करके तो भारत किसी हालत में उसका साथ नहीं देगा।  

मोदी को चुनाव बाद, जेलेंस्की-पुतिन ने अपने-अपने देश आने का दिया न्योता, कहा – भारत कराए समझौता: विदेशी नेता भी मान रहे तीसरी बार सत्ता में लौट रही BJP


अभी भारत में चुनाव हुए भी नहीं हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विदेश से चुनाव बाद के आमंत्रण आने लगे हैं। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से बात करने के कुछ ही घंटों बाद पीएम मोदी ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की से फोन पर बातचीत की। बता दें कि रूस और यूक्रेन में पिछले 2 वर्षों से युद्ध चल रहा है और हाल ही में पुतिन ने चेताया था कि अगर NATO यूक्रेन में उतरता है तो तृतीया विश्व युद्ध होने से कोई नहीं रोक पाएगा। इस तनाव के बीच पीएम मोदी ने दोनों नेताओं से बात की।

बताया जा रहा है कि पुतिन और जेलेंस्की दोनों ने ही चुनाव बाद पीएम मोदी को अपने-अपने देश आने का न्योता दिया है। साथ ही दोनों ने ये भी कहा है कि वो भारत को समझौता करा कर शांति स्थापित कराने वाले देश के रूप में देखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले 2019 में रूस के दौरे पर गए थे। पीएम मोदी को न्योता मिलना ये भी दिखाता है कि अन्य देश भी ये मान कर चल रहे हैं कि बतौर प्रधानमंत्री लगातार तीसरी बार उनकी वापसी तय है और जनादेश उनके ही पक्ष में जाने वाला है।

पीएम मोदी ने वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की से रूस-यूक्रेन के आम लोगों के बीच संबंध प्रगाढ़ करने के साथ-साथ रूस से यूक्रेन का तनाव खत्म करने पर भी बात की। उन्होंने कहा कि बातचीत और कूटनीति के जरिए ही युद्ध को समाप्त किया जा सकता है। जापान के हिरोशिमा में मई 2023 में पीएम मोदी ने G7 समिट से इतर जेलेंस्की से मुलाकात भी की थी। भारत ने यूक्रेन को मानवीय सहायता भी भेजी थी, जिसके लिए जेलेसी ने पीएम मोदी को ताज़ा बातचीत के दौरान धन्यवाद दिया।

President Putin invites PM Modi to Russia hours after Modi-Zelensky talk

Ukraine and Russia see India as peacemaker@susanmtehrani joined by @siddhant for more insights

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— WION (@WIONews) March 20, 2024

इससे पहले पुतिन के फिर से रूस का राष्ट्रपति चुने जाने पर पीएम मोदी ने उन्हें फोन कॉल कर के बधाई दी थी। इस दौरान दोनों ने भारत-रूस के रणनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने पर सहमति जताई। पुतिन 87.17% वोटों से फिर से रूस के प्रेजिडेंट चुने गए हैं। इससे पहले 2000, 2004, 2012 और 2018 में भी वो राष्ट्रपति का चुनाव जीत चुके हैं। पश्चिमी देशों ने इस चुनाव को अलोकतांत्रिक करार दिया है। यूक्रेन ने यूएस कॉन्ग्रेस से 60 बिलियन डॉलर के पैकेज को अनब्लॉक करने की माँग की है, जो राजनीतिक खींचातानी में अटकी हुई है।

यूक्रेन : नेताओं की बैठक में पार्षद ने जेब से निकालकर ग्रेनेड बम फोड़ा: धमाके में गई खुद की जान, 26 घायल

                       (साभार: cbsnews.com वीडियो स्क्रीन ग्रैब/X हैंडल यूक्रेन पुलिस @MVS_UA)
यूक्रेन के एक गाँव से दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया है। यूक्रेन की पुलिस के मुताबिक, ज़कारपटिया इलाके में शुक्रवार (15 दिसंबर,2023) को केरेत्स्की ग्राम परिषद की इमारत में चल रही ग्राम सभा के दौरान एक ग्राम पाषर्द ही हथगोले लेकर घुस आए।

उन्होंने हथगोले (ग्रेनेड) से वहाँ विस्फोट किया। इस दौरान हमले में एक हमला करने वाले की मौत हो गई और 26 लोग घायल हो गए। घायलों में से 6 की हालत बेहद गंभीर है. इन सभी का इलाज अस्पताल में चल रहा है।

यूक्रेनी पुलिस के मुताबिक, “आज 11.37 बजे, लाइन 102 पर एक संदेश मिला कि एक सत्र बैठक के दौरान मुकाचेवो जिले के केरेत्स्की ग्राम परिषद की इमारत में एक प्रतिनिधि ने ग्रेनेड विस्फोट किया।”

На Закарпатті в будівлі Керецьківської сільської ради депутат підірвав гранати: поліція працює на місці події

За попередньою інформацією, внаслідок вибуху загинула одна особа, сам підривник, ще 11 людей поранено.

На місці події працюють всі профільні служби. pic.twitter.com/YbWnZPQMrS

— МВС України (@MVS_UA) December 15, 2023

पुलिस ने कहा, “प्रारंभिक जानकारी में विस्फोट से एक शख्स फ़्यूज़ की मौत होने और कई लोगों के घायल होने की सूचना मिली।” हादसे की प्राथमिक जाँच के तहत पुलिस जाँच दल, विस्फोटक विशेषज्ञ और अपराध विज्ञानी घटना स्थल पर कार्रवाई में जुटे हैं।

खबरों के मुताबिक, जब ग्राम सभा की बैठक बीच में थी। तभी आरोपी स्थानीय डिप्टी उस कमरे में दाखिल हुआ। वहाँ मौजूद लोग चर्चा में लगे हुए थे। अंदर पहुँचते ही आरोपित ने ग्रेनेड विस्फोट को अंजाम दिया। इस घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

WATCH: Deputy throws hand grenades into council meeting in western Ukraine, injuring at least 26 people pic.twitter.com/C6pGxG2TdD

— BNO News (@BNONews) December 15, 2023

इस वीडियो में देखा जा सकता है कि काले कपड़े पहने एक शख्स कमरे में दाखिल हुआ। फिर उसने किसी की परवाह किए बगैर लापरवाही से अपनी जेब से तीन हथगोले निकाले। हथगोले खोले और उन्हें फर्श पर फेंक दिया। इससे सिलसिलेवार विस्फोट हुए।

विस्फोट के चलते कमरे में धुआँ भर जाने से वहाँ अंधेरा हो गया और बैठक में मौजूद लोग चीखने-चिल्लाने लगे। इस ग्रेनेड हमले को अंजाम देने वाले शख्स की पहचान सेरही बैट्रिन के रूप में की गई है। इस हादसे में सेरही को भी गंभीर चोटें आई थीं।

हमले के पीछे के मकसद का पता लगाने के लिए उनकी जान बचाने की कोशिश की गई थी, लेकिन उनकी मौत हो गई। वह एक परिषद सदस्य हैं जो यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की की सर्वेंट ऑफ़ द पीपल पार्टी से जुड़े थे। बताते चलें कि यूक्रेन फरवरी 2022 से ही अपने पूर्वी मोर्चे पर रूस के साथ युद्ध में लगा हुआ है।

10-10 बच्चे करो पैदा, 13 लाख रुपए मिलेंगे: रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने महिलाओं से की अपील, ‘मदर हिरोइन’ पुरस्कार देने का वादा

                                                                                                          साभार: गार्जियन/ब्रिटानिका
रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने रूस की महिलाओं से कम से कम 8 बच्चे पैदा करने की अपील की है। मॉस्को में मंगलवार (28 नवंबर,2023) को वर्ल्ड रशियन पीपुल्स काउंसिल को संबोधित करते हुए पुतिन ने कहा कि देश को उस समय में लौटना चाहिए जब बड़े परिवार आदर्श थे।

राष्ट्रपति पुतिन ने रूसी महिलाओं को 10 या उससे अधिक बच्चे पैदा करने पर 13 लाख रुपए देने का ऐलान किया है। इस तरह से पुतिन ने सोवियत काल का 1944 का ‘मदर हीरोइन’ पुरस्कार फिर से शुरू कर दिया है। 10 या उससे ज्यादा बच्चे पैदा करने वाली महिला को ये पुरस्कार दिया जाता था।

दरअसल, पूर्व सोवियत देश कोविड और यूक्रेन युद्ध की जंग की वजह से जनसंख्या में कमी से जूझ रहा है। यूक्रेन में युद्ध और गहराते आर्थिक संकट के बीच रूसी जन्म दर लगातार गिर रही है। यूक्रेन के साथ उनके युद्ध में मारे जाने वाले रूसी सैनिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इससे ये देश जनसंख्या संकट के दौर से गुजर रहा है।

इसी को लेकर पुतिन फिक्रमंद हैं। उन्होंने रूस के लोगों से कहा, “हमारी कई दादी और परदादी के सात, आठ या उससे भी अधिक बच्चे थे। आइए हम इन उत्कृष्ट परंपराओं को संरक्षित और पुनर्जीवित करें। रूस में सभी को बड़े परिवारों को आदर्श बनाना चाहिए। परिवार सिर्फ राष्ट्र और समाज की नींव नहीं है। यह एक आध्यात्मिक घटना है, नैतिकता का जरिया है।”

पुतिन ने आगे कहा, “आने वाले दशकों और यहाँ तक कि आने वाली पीढ़ियों के लिए रूस की जनसंख्या को संरक्षित करना और बढ़ाना हमारा लक्ष्य है। यह रूसी दुनिया, सहस्राब्दी पुराने, शाश्वत रूस का भविष्य है।”

पुतिन का यह बयान रूस में दशकों से गिरती जा रही जन्म दर के बीच आया है। इस दौरान यूक्रेन पर उसके आक्रमण और उसके बाद के आर्थिक नतीजों ने इसे और बदतर हालात में ला दिया है। यूक्रेन में युद्ध की वजह से मोटे अनुमान के मुताबिक 900,000 लोगों को देश छोड़कर भागना पड़ा।

यही वजह रही कि यूक्रेन से लड़ने के लिए अतिरिक्त 300,000 लोगों को रूसी सेना में भर्ती किया गया है। इसकी वजह से रूस में काम करने वाले लोगों की कमी हो गई है। जुलाई में रूसी मीडिया आउटलेट मीडियाज़ोना और मेडुज़ा के किए एक सांख्यिकीय विश्लेषण में कहा गया था कि यूक्रेन के साथ युद्ध में लगभग 50,000 रूसी पुरुषों ने जान गवाई।

वहीं अक्टूबर में आए, ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के बयान के मुताबिक, रूस के यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में संभवतः 290,000 मारे गए या घायल हुए ।

बताते चलें की 24 साल पहले सत्ता में आने के बाद से ही पुतिन ने लोगों के लिए सरकारी प्रोत्साहनों की एक सीरीज शुरू करके रूस की जन्मदर को बढ़ावा देने की कोशिश की है।

पुतिन ने एक से अधिक बच्चे पैदा करने वाले परिवारों को पैसा देने की भी शुरुआत की। हालाँकि ये सब भी रूस की आबादी बढ़ाने में काम नहीं आया। ले मोंडे की रिपोर्ट के मुताबिक रूस की संघीय सांख्यिकी सेवा, रोसस्टैट के आँकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी तक रूसी जनसंख्या 146,447,424 थी, जो 1999 के मुकाबले में कम थी। तब पुतिन पहली बार राष्ट्रपति बने थे।

रोसस्टैट में काम कर चुके जनसांख्यिकी विशेषज्ञ एलेक्सी रशा ने फरवरी में एएफपी को बताया था, “रूस में मजदूरों की कमी है।” उन्होंने कहा था, “यह एक पुरानी समस्या है, लेकिन लोगों के सामूहिक तौर पर देश छोड़ कर जाने से यह और भी बदतर हो गई है।”

रेडियोफ्रीयूरोप/रेडियोलिबर्टी ने 2020 में रिपोर्ट दी थी कि कुछ रूसियों ने कहा था कि सरकार ने बड़े परिवारों के लिए जमीनी भूखंड देने जैसी आर्थिक मदद का जो वादा किया था, वह कभी पूरा नहीं हुआ। ऐसी अफवाह है कि पुतिन के चार से अधिक बच्चे हैं, हालाँकि उन्होंने कभी भी सार्वजनिक तौर पर नहीं स्वीकारा।


AAP और खालिस्तान के झंडे में समानता; यूक्रेन के झंडे से क्यों मिलता-जुलता है AAP का झंडा?


जो बात अक्सर लिखता रहता हूँ कि केजरीवाल पार्टी को शून्य करने के लिए कांग्रेस को मजबूत होना पड़ेगा, जो हिमाचल प्रदेश में सार्थक हो गयी, जहां केजरीवाल पार्टी के समस्त उम्मीदवारों की जमानत ही जब्त नहीं, बल्कि कई जगह NOTA से कम वोट मिले। जहां-जहां कांग्रेस मजबूत है, केजरीवाल उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हुई है। पंजाब में कांग्रेस में आपसी फूट के होने के कमजोर होने पर ही आम आदमी पार्टी सरकार बनाने में सफल हुई। राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होने का दावा भरने वाले केजरीवाल का भ्रम उस दिन धराशयी हो जायेगा, जिस दिन कांग्रेस मजबूत हो जाएगी। दिल्ली में भी भाजपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ना यह साबित करता है कि अगर भाजपा और कांग्रेस ने गंभीरता से चुनाव लड़ा होता, केजरीवाल पार्टी को कम से कम 40 सीटों का नुकसान निश्चित था।  
दिल्ली की समझदार जनता ने अपनी नासमझी होने का बार-बार सबूत देती रही है। केजरीवाल और इसके नेताओं का देश विरोधी विदेशी संगठनों के साथ संबंधों का समाचार यदाकदा उजागर होता रहा है, उसके बावजूद इस पार्टी को वोट और समर्थन देना देश के लिए खतरा बनने जा रहा है। जो अचानक उनके झंडे का रंग बदलना चीख-चीखकर कहा रहा है, फिर भी जनता का केजरीवाल को समर्थन देना उनकी नासमझी और बुद्धिविहीन होने का सबसे बड़ा सबूत होगा।  

आम आदमी पार्टी (AAP) के झंडे का रंग बदल गया है। यूं तो दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को अपनी बातों से पलटने के लिए सोशल मीडिया पर तमाम लोग अपनी राय जाहिर करते रहते हैं लेकिन कोई भी पार्टी अपना झंडा और उसका रंग काफी विचार-विमर्श के बाद तय करती है। एक तरह से कहें तो किसी भी पार्टी का चेहरा उसका झंडा ही होता है। ऐसे में अपनी स्थापना के 10 साल बाद किसी पार्टी के लिए अपना झंडा और उसका रंग बदलना आसान नहीं है। इसके बावजूद AAP ने अपने झंडे का रंग बदल दिया है। 

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के झंडे का रंग बदलने के पीछे क्या है रहस्य?

यहां सोचने वाली बात यह है कि ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि AAP को अपने झंडे का रंग बदलना पड़ा। पहले उनके झंडे का रंग सफेद और नीला था। अब यह बदलकर पीला और गहरा नीला हो गया है। नए झंडे के रंगों की विवेचना की जाए तो तीन बातें उभरकर सामने आती हैं। पहला कि उन्होंने भगत सिंह से पीला और अंबेडकर से नीला रंग लिया। भगत सिंह जहां क्रांति के प्रतीक हैं वहीं अंबेडकर सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं। लेकिन क्या पार्टी की विचारधारा इससे मेल खाती है? दूसरा कि खालिस्तान दो झंडों का प्रयोग करता है जो बिल्कुल AAP के झंडे के समान हैं। तो क्या खालिस्तान के प्रति एकजुटता जताने के लिए झंडे का रंग बदल दिया गया? तीसरा है यूक्रेन का झंडा। यूक्रेन और AAP में एक बात कॉमन है। ज़ेलेंस्की भी एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति थे और केजरीवाल की तरह आंदोलन से राजनीति में आए। इसकी गहराई में जाएं तो यह बात सामने आती है कि केजरीवाल और ज़ेलेंस्की एक कॉमन एजेंसी से जुड़े हुए हैं। यह है फोर्ड फाउंडेशन। वही फोर्ड फाउंडेशन जो अमेरिकी खुफिया एजेंकी CIA के लिए काम करता है। वही CIA जो दुनियाभर में सत्ता को पलटने के लिए जाना जाता है और भारत में पीएम मोदी के आने के बाद वह इस जुगत में लगा हुआ है। यह भी अपने आप में रहस्य है कि बात-बात पर प्रेस कांफ्रेंस करने वाले केजरीवाल ने पार्टी के झंडे का रंग बदले जाने को लेकर औपचारिक रूप से अब तक कुछ नहीं है।

आप के झंडे के रहस्य को लेकर ट्विटर यूजर Agenda Buster ने कुछ ट्वीट किए हैं। आप भी देखिए उसमें क्या बातें निकलकर आती हैं-

पहली तस्वीर दिसंबर 2021 की, दूसरी तस्वीर नवंबर 2022 की 

ऊपर दो रैलियों के फोटो हैं। पहली तस्वीर दिसंबर 2021 में आप की चंडीगढ़ रैली की है। दूसरी तस्वीर नवंबर 2022 में आप की गुजरात रैली की है। पहले उनके झंडे का रंग सफेद और नीला था। हाल का रंग है: पीला और गहरा नीला। उनकी हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी देखा जा सकता है कि पीला और गहरा नीला उनका नया रंग है। उन्होंने अपना पुराना सफेद और हल्का नीला रंग छोड़ दिया है।

झंडे को लेकर AAP ने अभी तक कुछ नहीं कहा 

AAP के झंडे के रंग बदलने को लेकर न तो इस बारे में पार्टी ने और न ही इसके संयोजक अरविंद केजरीवाल ने औपचारिक रूप से कुछ कहा है। लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि उन्होंने भगत सिंह से पीला रंग लिया और बाबा साहेब अंबेडकर से नीला रंग लिया है।  खाती है?

AAP और खालिस्तान के झंडे में समानता!

एक और तर्क दिया जाता है कि यह खालिस्तान का झंडा है। ऊपर जो तस्वीर है वह खालिस्तान की लंदन रैली की है। वे दो झंडों का उपयोग करते हैं जो बिल्कुल आप के झंडे के समान हैं। AAP पर खालिस्तानी समर्थकों से हमदर्दी रखने के आरोप लगते रहे हैं, हालांकि उन्होंने हमेशा इससे इनकार किया। तो क्या इस दावे को नज़रअंदाज किया जा सकता है कि उन्होंने खालिस्तान की एकजुटता में अपना झंडा बदल लिया?

यूक्रेन के झंडे से क्यों मिलता-जुलता है AAP का झंडा

एक पहलू और भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ऊपर यूक्रेन का झंडा है। यूक्रेन और आप में एक बात कॉमन है। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल दोनों ही राजनीति में आने से पहले गैर राजनीतिक व्यक्ति थे। दोनों आंदोलन की उपज हैं। आंदोलन में दोनों का कद जानबूझकर बढ़ाया गया जिससे वह राजनीति में सफल हो सकें और सरकार में शामिल हो सकें।

AAP के झंडे बदलने के पीछे क्या हो सकते हैं कारण 

उनके झंडे बदलने का सही कारण क्या है, यह साफ-साफ नहीं कहा जा सकता। यहां सभी संभावित कारणों पर प्रकाश डाला गया है। सामाजिक न्याय के लिए क्रांति। वास्तव में फ्रांसीसी क्रांति 1789 का विषय था जब शासन बदल गया था और बुद्धिजीवी अभी भी इसे शासन परिवर्तन के लिए अब तक का सबसे अच्छा केस स्टडी मानते हैं। जेएनयू में जिस तरह ब्राह्मणों को निशाना बनाया जा रहा है, वह वामपंथ का वैचारिक केंद्र है। ठीक उसी तरह जैसे फ़्रांसीसी क्रांति में शुरू में पादरियों को निशाना बनाया गया था। कुछ भी अचानक नहीं हुआ, हर चीज के पीछे कारण होता है। यहां तक ​​कि जहां तक झंडे के रंग की बात है। कोई भी पार्टी आसानी से अपना झंडा नहीं बदलती।

इस बारे में शर्लिन चोपड़ा ने ट्वीट किया है- क्या आप ने AAP पार्टी का अपग्रेडेड ध्वज देखा है? AAP पार्टी के अपग्रेडेड ध्वज और ख़ालिस्तानी ध्वज में कितनी समानताएं हैं, इस पर आप ज़रा ग़ौर कीजिएगा। हमारे देशभक्त नागरिक देश के विभाजन की बात करने वालों को करारा जवाब देंगे।

पोपोविक, योगेंद्र यादव, राहुल गांधी में क्या है लिंक 

एक और कॉमन लिंक है Srdja Popovik. पोपोविक को सत्ता परिवर्तन विशेषज्ञ माना जाता है। वह यूक्रेन में शासन परिवर्तन के पीछे था। वहीं कुछ साल पहले उनकी मुलाकात योगेंद्र यादव और शायद राहुल गांधी से भी हुई थी। शाहीन बाग, किसान आंदोलन सब उनके दिमाग की उपज हो सकता है। पहला एलएसई इंडिया शिखर सम्मेलन 28-30 जनवरी 2016 को गोवा में हुआ था, और इसमें कई पैनलिस्ट थे जो नागरिक समाज से लेकर भारत में बुनियादी ढांचे की चुनौतियों पर चर्चा कर रहे थे। सम्मेलन में स्पीकर पोपोविक और योगेंद्र यादव ने राजनीतिक सिद्धांत और 21वीं सदी में अहिंसक जन आंदोलनों को बढ़ावा देने की व्यावहारिकताओं पर चर्चा की।

फोर्ड फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं केजरीवाल, ज़ेलेंस्की, पोपोविक

अब अगर हम और गहराई में जाएं तो सभी कड़ियां एक ही स्थान पर मिलती हैं। फोर्ड फाउंडेशन के जरिए केजरीवाल, ज़ेलेंस्की, पोपोविक सभी एक एजेंसी से जुड़े हुए हैं। सर्बिया के पोपोविक को 1990 के दशक के उत्तरार्ध के बाद से पूर्वी यूरोप और अन्य जगहों पर शासन परिवर्तन के एक प्रमुख वास्तुकार के रूप में जाना जाता है, और Otpor के सह-संस्थापकों में से एक के रूप में जाना जाता है! Occu​py.com की रिपोर्ट से पता चलता है कि पोपोविक और ओट्पोर! ऑफशूट कैनवस (सेंटर फॉर एप्लाइड नॉनवायलेंट एक्शन एंड स्ट्रैटजीज) ने गोल्डमैन सैक्स के कार्यकारी और निजी खुफिया फर्म स्ट्रैटफोर (स्ट्रेटेजिक फोरकास्टिंग, इंक।) के साथ-साथ अमेरिकी सरकार के साथ भी घनिष्ठ संबंध बनाए रखा है। पोपोविक की पत्नी ने भी स्ट्रैटफोर में एक साल तक काम किया है।

अब फोर्ड फाउंडेशन के भारत में कार्यकलाप और इससे जुड़े लोगों पर नजर डालते हैं-

फोर्ड फाउंडेशन से जुड़े रहे हैं केजरीवाल के एनजीओ कबीर और राजीव गांधी फाउंडेशन

केजरीवाल के एनजीओ कबीर और राजीव गांधी फाउंडेशन से लेकर शबनम हाशमी के एनजीओ अनहद जैसे कई एनजीओ फोर्ड फाउंडेशन से फंडिंग लेते रहे हैं। और ये सब कांग्रेस और आम आदमी के करीब हैं। फोर्ड फाउंडेशन द्वारा बनाए गए एनजीओ और उनके आकाओं के इकोसिस्टम इन दोनों के बहुत करीब हैं और हाथ से हाथ मिलाकर काम करते हैं। ऐसे कई दस्तावेज हैं, जो बताते हैं कि फोर्ड फाउंडेशन अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के लिए काम करता है। इस तरह देखें तो यह साफ होता है कि फंडिंग से लेकर इकोसिस्टम तक, प्लानिंग से लेकर ग्राउंड सपोर्ट तक, दोनों पार्टियों को एक ही लोगों, एक ही इकोसिस्टम और एक ही विदेशी एनजीओ का समर्थन प्राप्त है!

मेधा पाटकर, AAP, कांग्रेस, फोर्ड फाउंडेशन

सभी जानते हैं कि मेधा पाटकर का आप और कांग्रेस से खास रिश्ता है। और वह AAP सदस्य थीं और उम्मीदवार भी! हर गुजराती को उनका नाम याद है। सिर्फ उन्हीं की वजह से गुजरात के लोगों ने दशकों से पानी के बिना बहुत कुछ झेला है। फोर्ड फाउंडेशन द्वारा बनाए गए एनजीओ और उनके आकाओं के इकोसिस्टम इन दोनों के बहुत करीब हैं और हाथ से हाथ मिलाकर काम करते हैं। आगे इसे कुछ उदाहरण से समझिए।

योगेंद्र यादव: 2001 में योगेंद्र यादव का एनजीओ सिर्फ इसलिए बच पाया क्योंकि फोर्ड फाउंडेशन ने उन्हें उस समय अनुदान दिया था! वह उस मदद को कैसे भूल सकते हैं! यह जगजाहिर कि उनके AAP और कांग्रेस के साथ संबंध किस तरह के रहे हैं।

शबनम हाशमी: शबनम हाशमी आतंकवादी इशरत जहां के लिए केस लड़ रही थी जो कुछ अन्य आतंकवादियों के साथ नरेंद्र मोदी को मारने आई थी। वह अनहद एनजीओ की संस्थापक हैं। वह उमर खालिद और फोर्ड फंडेड तीस्ता सीतलवाड़ आदि के इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। AAP के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध हैं।

आतंकवादी इशरत जहां का केस लड़ने वाले, हिंदू विरोधी और भारत विरोधी NGO से AAP के क्या हैं संबंध?

गुजरात चुनाव के दौरान घूम-घूम कर तमाम तरह की गारंटी बांटने वाले केजरीवाल और उनकी पार्टी का संबंध आतंकवादी इशरत जहां का केस लड़ने वाले, हिंदू विरोधी और भारत विरोधी NGO और इससे जुड़े लोगों से है। यह बात सामने आने के बाद इस बात की आशंका बढ़ जाती है कि केजरीवाल अपने छुपे एजेंडे पर काम कर रहे हैं। आखिर उनका छुपा एजेंडा क्या है और इन देश विरोधी लोगों से संबंध क्या है। गुजरात के लोगों को विदेशी फंड से चलने वाली हिंदू विरोधी और भारत विरोधी एनजीओ और उनके संस्थापकों के साथ उनके संबंधों के बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए। ये लोग हैं शबनम हाशमी, गगन सेठी, हर्ष मंदर, और अन्य विदेशी-वित्त पोषित प्रचार कार्यकर्ता। ये सभी लोग विदेशी वित्त पोषित एनजीओ चलाते हैं, जिसमें उन्हें फोर्ड फाउंडेशन, सोरोस, क्रिश्चियन चर्च और अन्य पश्चिमी संस्थाओं से फंड मिलता है। इन दिनों कई रिपोर्ट इस तरह की भी आई हैं कि कुछ विदेशी ताकतें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करना चाहती है। क्योंकि पीएम मोदी के रहते भारत में उनकी दाल नहीं गल रही है। इसीलिए इन ताकतों ने अब लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम को नफरत फैलाने का जिम्मा सौंपा है और केजरीवाल एवं उनके करीबी गोपाल इटालिया इसके अगुवा बने हुए हैं।

केजरीवाल के संबंध आतंकवादी का केस लड़ने वालों से क्यों?

केजरीवाल के संबंध शबनम हाशमी, गगन सेठी, हर्ष मंदर, और अन्य विदेशी फंड से चलने वाली एनजीओ के सदस्यों से है। ये सभी लोग विदेशी वित्त पोषित एनजीओ के कार्टेल चलाते हैं, जिसमें उन्हें फोर्ड फाउंडेशन, सोरोस, क्रिश्चियन चर्च और अन्य पश्चिमी संस्थाओं से फंड मिलता है। विदेशी फंड की मदद से ये लोग आतंकवादी का केस लड़ते हैं, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का विरोध करते हैं और देश की विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं और उसमें अड़ंगा डालते हैं। यहां यह सवाल उठता है कि इस तरह के देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों से केजरीवाल के संबंध क्यों हैं? वह भारत की बेहतरी के लिए कार्य कर रहे हैं या देश को कमजोर करने के लिए?

शहरी नक्सली मेधा पाटकर ने कच्छ को पांच दशक तक पानी से वंचित रखा

ये लोग विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं। इसलिए जो देश उन्हें फंड देते हैं वे विकास कर सकते हैं लेकिन इन्हें भारत के विकास की राह में रोड़ा अटकाने का काम दिया जाता है। अब जब नर्मदा का पानी कच्छ पहुंच गया है, तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि वे लोग कौन थे जिन्होंने करीब पांच दशकों से कच्छ को इस पानी से वंचित रखा था। हम सभी जानते हैं कि नर्मदा बांध परियोजना का विरोध करने वाले शहरी नक्सली कौन थे। उन शहरी नक्सलियों में से सबसे आगे थी मेधा पाटकर। हम सभी जानते हैं कि ये लोग किस राजनीतिक दल से जुड़े हैं और इनकी पॉलिटिकल सोच क्या है। शबनम हाशमी को आम आदमी पार्टी से जुड़ी मेधा पाटकर के साथ देखा सकता है। इससे इनके बीच गठजोड़ का पता चलता है और साथ ही यह भी पता चलता है कि भारत के विकास के खिलाफ साजिश में किस तरह ये लोग एक एकजुट हैं। शबनम हाशमी का एनजीओ और वह स्वयं सभी आंदोलनजीवी लोगों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं!

एनजीओ ‘कबीर’ के सह-संस्थापक हैं मनीष सिसोदिया

एक और विदेशी वित्त पोषित एनजीओ ‘कबीर’ के सह-संस्थापक मनीष सिसोदिया हैं। ऐसा लगता है कि वे लोग बहुत बारीकी से काम करते हैं। सिसोदिया ही नहीं, ऐसा लगता है कि AAP का शबनम हाशमी और विदेशी फंड से चलने वाले एनजीओ चलाने वाले ऐसे ही लोगों के साथ बहुत खास सहयोग है!